कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
७२४ कथासरित्सागर
७२४ कथासरित्सागर
कृत्स्वान्योन्यपरित्यागशपथं तैः समं सतः।
विष्णुदत्त प्रतस्थे स पित्रोरविदितो निशि॥४५॥
प्रस्थितश्चाग्रतोऽकस्मादनिमित्तमुपस्थितम् ।
दृष्ट्वा सोऽत्र वयस्यांस्तान् सहप्रस्थायिनोऽभ्यधात् ॥४६॥
अनिमित्तमिदं हन्त युक्तमद्य निवर्तितुम्।
पुनरेव प्रयास्यामः सिद्धये शकुनान्विताः ॥४७॥
तच्छ्रुत्वैव ससायस्तं मूर्खाः सप्तापि तेऽब्रुवन्।
मृषा मा जीगणः शङ्कां नह्यतो बिभिमो वयम् ॥४८॥
त्वं चेद्बिभेषि तन्मा गा वयं यामोऽधुनैव तु।
प्रातर्विदितवृत्तान्ता नास्मांस्त्यक्ष्यन्ति बान्धवाः ॥४९॥
इत्युक्तवद्भिरग्रैस्तैः साकं क्षपद्वयन्वितः।
विष्णुदत्तो ययावेव स स्मृत्वाष्टहरं हरिम् ॥५०॥
राज्यान्ते च विलोक्याम्यदनिमित्तं पुनर्वदन्।
मूर्खैस्तैः सखिभिः सर्वैः स एवं निरभर्त्स्यत ॥५१॥
एतदेवानिमित्तं न किमन्येनाप्यभीरुणा।
यत्त्वमस्माभिरानीतः काकशङ्की पदे पदे ॥५२॥
इत्यादि भर्त्सनां कृत्वा गच्छद्भिस्तैः समं च सः।
विवशः प्रययौ विष्णुदत्तस्तूष्णीं बभूव च ॥५३॥
नोपदेशो विधातव्यो मूर्खस्य स्वाभिचारिणः।
सत्कारोऽन्धकरस्येव तिरस्कारकरो हि सः॥५४॥
एको बहूनां मूर्खाणां मध्ये निपतितो बुधः।
पङ्क पायस्तरङ्गाणामिव क्लिश्यते ध्रुवम्॥५५॥
तस्मादेषां न वक्तव्यं मया भूयो हिताहितम्।
तूष्णीमेव प्रयात्तव्यं विधि र्धेयो विधास्यति ॥५६॥
इत्याद्याकलयन्मूर्खैः प्रक्रमस्तैः समं पथि।
विष्णुदत्तो दिनस्यान्ते शबरग्राममाप सः ॥५७॥
तत्र श्रान्त्वा निशि प्राप तरुप्याधिष्ठितं स्त्रिया।
गृहमर्कं ययाचे च निवासं सोऽत्र तां स्त्रियम् ॥५८॥
तया दत्तेऽववरके सहाम्यैस्तैर्विवेश सः।
सखिभिस्ते च सप्तापि तत्र निद्रां शणं ययुः ॥५९॥
तब वे आपस में एक-दूसरे का साथ न छोड़ने की प्रतिज्ञा करके माता-पिता से
छिपकर रात में एक साथ ही निकले। चलते ही उनके सामने अकस्मात् अपशकुन हुआ। उसे
देखकर विष्णुदत्त ने अपने साथी मित्रों से कहा—'यह अपशकुन है, अतः लौट जाना उचित है।
फिर कभी शुभ शकुन मिलने पर कार्यसिद्धि के लिए चलेंगे' ॥४५-४७॥
यह सुनकर उसके सातों मूर्ख साथी उससे कहने लगे—'व्यर्थ चिन्ता न करो। हमलोग
ऐसे अपशकुनों से नहीं डरते ॥४८॥
यदि तू डरता है तो मत जा हमलोग अभी जायेंगे। प्रातःकाल हमारा समाचार जान
कर घरवाले हमें नहीं छोड़ेंगे' ॥४९॥
ऐसा कहते हुए उन मूर्ख मित्रों के साथ प्रतिज्ञाबद्ध बेचारा विष्णुदत्त पापहारी भगवान्
का ध्यान करके उनके साथ चल पड़ा ॥५०॥
रात बीतने पर, प्रातःकाल ही उसने और अपशकुन देखे। फिर उसने उन मित्रों से कहा
किन्तु उन हठीले मित्रों द्वारा वह फिर फटकारा गया ॥५१॥
वे कहने लगे कि सबसे बड़ा अपशकुन तो यही है कि मार्ग के डरपोक कौवे के समान तुझे
हमलोग साथ लाये ॥५२॥
ऐसी-ऐसी फटकारों को सुनता हुआ विष्णुदत्त जाते हुए उनके साथ चलने को विवश हो
गया। सच है, मनमानी करनेवाले मूर्ख को उपदेश देना ऐसा ही है, जैसे कूड़ा-करकट साफ करता
हुआ व्यक्ति उसकी धूल-मिट्टी से अपने शरीर को गंदा करके अपना ही तिरस्कार कराता
है ॥५३-५४॥
एक बुद्धिमान् व्यक्ति बहुत-से मूर्खों की संगति में पड़कर उसी प्रकार की स्थिति में आ
जाता है, जैसे सरोवर में खड़ा हुआ एक कमल तरंगों के थपेड़ों से आहत होकर हिलता ही
रहता है ॥५५॥
अतः अब मुझे इनसे हित या अहित कुछ न कहकर चुप ही रहना चाहिए। भाग्य भला
करेगा—॥५६॥
ऐसा सोचकर उन मूर्खों के साथ जाते हुए सायंकाल विष्णुदत्त को भीलों का एक गाँव
मिला। वहाँ घूम-फिरकर उसे एक युवती स्त्रीवाला घर मिला। तब उसने उस स्त्री से रहने
के लिए स्थान माँगा ॥५७-५८॥
उसने एक स्थान उसे दे दिया और उसमें वह अपने सातों मित्रों के साथ ठहर गया। कुछ
ही समय में वे सातो मित्र मार्ग की श्रान्ति के कारण सो गये ॥५९॥