कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४११
चतुर्थ लम्बक ४११
सुरापूर्ण अनेक स्फटिक के प्यालों से भरी हुई राजा की पानभूमि प्रभातकालीन सूर्य
की लाल किरणों से रक्त और श्वेत कमलों से युक्त कनक-लता के समान सुशोभित हो
रही थी॥१०॥
वत्सराज का मृगया-वर्णन
इसी विलास-क्रीड़ा के बीच कभी-कभी राजा बहेलिया के साथ हरे पत्तों का-सा वेष
धारण किये हुए और धनुष लिये हुए मृगवनों का भी सेवन करता था (अर्थात् शिकार खेलने
के लिए भी जाता था) ॥११॥
इस क्रीड़ा में कीचड़ से सने हुए सूकरों के मुखों को वह बाणों से बेधकर मार देता था।
उसके पीछा करने पर भय से इधर-उधर भागे हुए कृष्णसार मृग ऐसे मालूम होते थे जैसे मानों
पूर्वकाल में विजय की हुई दिशाएँ उसपर कटाक्षपात कर रही हों॥१२-१३॥
जंगली भैंसों को मारने के कारण उनके रक्त से रंजित वनभूमि ऐसी मालूम होती थी कि
माना वन-कमलिनी राजा की सेवा के लिए उपस्थित हुई हो॥१४॥
मुँह फाड़े हुए, अतएव भालों में बिधे (पिरोय) हुए मुखोंवाले सिंहों को देखकर राजा
प्रसन्न होता था॥१५॥
अपने शस्त्र पर विश्वास रखनेवाले उस राजा की मृगया-क्रीड़ा में गड्ढों में छिपे हुए
शिकारी कुत्ते और मार्ग में बिछे हुए जाल—यह परिस्थिति थी॥१६॥
वत्सराज को नारदजी का उपदेश
इस प्रकार के आनन्द के दिनों में एक बार नारद मुनि सभा (दरबार) में बैठे हुए राजा
के समीप आये—॥१७॥
अपनी देह के कान्ति-मंडल से आवृत वे ऐसे मालूम होते थे मानों तेजस्वी राजा के प्रेम से
तेजस्वी सूर्य अवतार धारण करके आये हों॥१८॥
सादर प्रणाम करते हुए राजा से समुचित सत्कार प्राप्त करने पर प्रसन्नचेता मुनि कुछ
ठहरकर बोले॥१९॥
राजा पाण्डु की कथा
हे वत्सराज ! संक्षेप में ही कहता हूँ सुनो। पहले समय में पांडु नाम का राजा था जो
तेरा पहला पितामह (परदादा) था॥२०॥
तुम्हारे ही समान उस महान् प्रतापी राजा के दो पत्नियां थीं—एक कुन्ती और दूसरी
माद्री॥२१॥
अपने अतुल बल से सातोद्वीप पृथ्वी को विजय करके एक बार शिकार का व्यसनी होने
के कारण वह पांडु वन को गया॥२२॥
तत्र किन्दमनामानं स मुनिं मुक्तसायकः।
जघान मृगरूपेण सम्भार्यं सुरतस्थितम्॥२३॥
स मुनिर्मृगरूपं तत्त्यक्त्वा कण्ठविवर्तिभिः।
प्राणैः शशाप तं पाण्डुं विषण्णं मुक्तकार्मुकम्॥२४॥
स्वैरन्ध्यो निर्विमर्षेण हतोऽहं यत्त्वया ततः।
भार्यासंभोगकाले ते मद्धव मृत्युर्भविष्यति॥२५॥
इत्याप्तशापस्तद्भीत्या त्यक्तभोगस्पृहोऽथ सः।
पत्नीभ्यामन्वितः पाण्डुस्तस्थौ शान्ते तपोवने॥२६॥
तत्रस्थोऽपि स शापेन प्रेरितेनेव नैकदा।
अकस्माच्चकमे माद्रीं प्रियां प्राप च पञ्चताम्॥२७॥
तदेवं मृगया नाम प्रमादो भूप भूभृताम्।
क्षपिता ह्यनयाऽयेऽपि नृपास्तं ते मृगा इव॥२८॥
घोरनाषामिषव्याप्ता रुक्षा भूत्राश्वंमूर्खता।
कुलदन्ता कथं कुर्यात्प्राज्ञस्त्रीय हि सा क्षिवम्॥२९॥
तस्माद् विफळभाभास जहीहि मृगयारसम्।
वन्यवाहनहन्तॄणां समानं प्राणसंक्षयः॥३०॥
त्वं च त्वत्पूर्वजप्रीत्या प्रिय कल्याणपात्र ! मे।
पुत्रश्च तव कामांशो यथा भावी तथा शृणु॥३१॥
पुरानङ्गाङ्गसम्भूत्य रत्या स्तुतिभिरर्चितः।
तुष्टो रहसि सङ्घपमिव तस्याः शिवोऽभ्यधात्॥३२॥
अवतीर्य निजांशेन भूमावागच्छ मां स्वयम्।
गौरी पुषायिनी कामं जनयिष्यत्यसाविति॥३३॥
अतरचण्डमहासेनसुता देवी नरेन्द्र सा।
माता वासवदत्तेयं सम्पन्ना महिषी च ते॥३४॥
तदेषा शम्भुमाराध्य कामांशा सोष्यते सुतम्।
सर्वविद्याधराणां यश्चक्रवर्ती भविष्यति॥३५॥
इत्युक्तेनादृतवचा राजा पृथ्वीं तदर्पिताम्।
प्रत्यर्प्य तस्मै स ययो मन्दारगिरिवर्धनम्॥३६॥
तस्मिन्गते धरमराजं स तद्वासवदत्तया।
जातपुत्रच्छया साकं निन्ये तच्चिन्तया दिनम्॥३७॥