कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
११८ कथासरित्सागर
११८ कथासरित्सागर
तच्छ्रुत्वा स्थूलदत्तस्तं हरिशर्माणमाह्वयत् ।
प्रभो विस्मृतो हृतेऽश्वे तु स्मृतोऽस्म्यद्येति वादिनम् ॥१०५॥
विस्मरं न क्षमस्वेति प्रार्थितं ब्राह्मणं च सः ।
पप्रच्छ केनापहृतो हयो नः कथ्यतामिति ॥१०६॥
हरिशर्मा ततो मिथ्या रेखाः कुर्वन्नुवाच सः ।
हतो दक्षिणसीमान्ते चोरैः संस्थापितो ह्ययम् ॥१०७॥
प्रच्छन्नस्थो दिनान्ते च दूरं यावन्न नीयते ।
तावदानीयतां गत्वा त्वरितं स तुरङ्गमः ॥१०८॥
तच्छ्रुत्वा धावितैः प्राप्य क्षणात्स बहुभिर्नरैः ।
आनिन्येऽश्वः प्रशंसद्भिर्विज्ञानं हरिशर्मणः ॥१०९॥
ततो ज्ञानीति सर्वेण पूज्यमानो जनेन सः ।
उवास हरिशर्मात्र स्थूलदत्ताश्रिमः सुखम् ॥११०॥
अथ गच्छत्सु दिवसेष्वत्र राजगृहान्तरात् ।
हेमरत्नानि चौरेण भूरि केनाप्यनीयत ॥१११॥
नाज्ञायत यदा चौरस्तदा ज्ञानिप्रसिद्धितः ।
आनाययामास नृपो हरिशर्माणमाशु तम् ॥११२॥
स धानीतः क्षिपन् कालं वक्ष्ये प्रातरिति ब्रुवन् ।
वासके स्थापितो भ्रान्तखिन्नो राज्ञासुरक्षितः ॥११३॥
तत्र राजकुले चासीन्नाम्ना जिह्वेति चेटिका ।
यया भ्रात्रा समं तच्च नीतमभ्यन्तराद्धनम् ॥११४॥
सा गत्वा निशि तत्रास्य वासके हरिशर्मणः ।
जिह्वासया ददौ द्वारि कर्णं तज्ज्ञानशङ्किता ॥११५॥
हरिशर्मा च तत्कालमेकतोऽभ्यन्तरे स्थितः ।
निजां जिह्वां निनिन्दैव मपाविज्ञातवादिनीम् ॥११६॥
मापल्लम्पटया जिह्वे ! किमिदं विहितं त्वया ।
दुराचारे सहस्व स्वमिदानीमिह निग्रहम् ॥११७॥
तच्छ्रुत्वा ज्ञानिनानेन ज्ञातास्मीति भयेन सा ।
जिह्वाख्या चेटिका युक्त्या प्रविश्य तदन्तिकम् ॥११८॥
पतिस्वा पादयोस्तस्य ज्ञानिप्रच्छन्नमब्रवीत् ।
प्रत्यप्सि सा जिह्वाहं त्वया ज्ञातार्थहारिणी ॥११९॥
यह सुनकर स्थूलदत्त ने उस हरिशर्मा को बुलवाया। हरिशर्मा ने कहा—'कल से
भूख हुए मुझे आज घोड़ा खोने पर आपने याद किया' ॥१९५॥
तब 'हमारी भूल को क्षमा करना' ऐसा कहते हुए स्थूलदत्त ने पूछा—हमारा घोड़ा
किसने चुराया यह बताओ' ॥१९६॥
उसके यह पूछने पर हरिशर्मा भूमि पर झूठी रेखाएँ खींचता हुआ बताने लगा कि यहाँ
से दक्षिणी सीमा के पास चोरों ने घोड़ा रखा है ॥१९७॥
यह छिपा हुआ है, सायंकाल होने पर चोर उसे दूर ले जायेंगे ॥१९८॥
यह सुनकर उधर दौड़कर ढूँढ़ते हुए बहुत-से लोगों ने घोड़ा पा लिया और हरिशर्मा के
विज्ञान की प्रशंसा करते हुए उसे घर ले आये ॥१९९॥
तभी से 'विद्वान् है'—ऐसा समझकर स्थूलदत्त से सम्मानित हरिशर्मा जनता में भी
सम्मानित हुआ और सुखपूर्वक वहाँ रहने लगा ॥१००॥
कुछ दिनों के उपरान्त उस नगर के राजा के यहाँ सोना रत्न आदि की चोरी हो
गई। जब चोरों का पता न लगा तब ज्योतिषी के नाम से प्रसिद्ध हरिशर्मा को राजा ने
बुलवाया ॥१०१-१०२॥
बुलवाये हुए हरिशर्मा ने व्यर्थ समय व्यतीत करके कहा कि 'सवेरे बताऊँगा'। तब
राजा ने सुरक्षा के साथ उसे किसी कमरे में ठहरा दिया ॥१०३॥
राजा के यहाँ जिह्वा नाम की एक सेविका थी। उसने अपने भाई की सहायता से राज
महल से चोरी कराकर धन का अपहरण किया था ॥१०४॥
वह जिह्वा चोरी के कारण शंकितहृदय होकर रात को हरिशर्मा के निवास पर
आकर द्वार से कान लगाकर सुनने लगी। उस समय हरिशर्मा कमरे में अकेला बैठा हुआ झूठा
विज्ञान बतानेवाली अपनी जिह्वा (जीभ) की निन्दा कर रहा था ॥१०५-१०६॥
'हे जिह्वा लोभ की लम्पट —तूने यह क्या किया ? दुराकाङ्क्षी अब उसका दंड सहन
कर' ॥१०७॥
यह सुनकर भयभीत सेविका इसने मुझे जान लिया ऐसा सोचकर प्राणदंड के भय से
व्याकुल होकर उसी उपाय में हरिशर्मा के पास पहुँची ॥१०८॥
और उस बनावटी ज्योतिषी के चरणों में गिरकर कहने लगी —'हे ब्राह्मण मैं ही वह
जिह्वा हूँ जिस धनरत्नादि को तुमने जान लिया है ॥१०९॥
नीत्वा तच्च मयास्यैव मन्दिरस्येह पृष्ठतः।
उद्याने दाडिमीस्तम्भो निखातं भूतले घनम् ॥१२०॥
सद्रत्नं मा गृहाण त्वं किञ्चिन्मे हेम हस्तगम्।
एतच्छ्रुत्वा सगर्वः स हरिशर्मा जगाद ताम् ॥१२१॥
गच्छ जानाम्यहं सर्वं भूतं भव्यं भवत्तथा।
त्वां तु नोद्घाटयिष्यामि कृपणां शरणागताम् ॥१२२॥
यच्च हस्तगतं तर्ह्यस्ति तद्दास्यसि पुनर्मम।
इत्युक्त्वा तन्न सा चेटी तथेत्याशु ततो ययौ ॥१२३॥
हरिशर्मा च स ततो विस्मयान्वितमचिन्तयत्।
असाध्यं साधयत्यर्थं हेम्न्याभिमुखो विधिः ॥१२४॥
यदिहोपस्थितेऽन्ये सिद्धोऽस्म्यौत्पातिकैरिव मम।
स्वजिह्वां निन्दतो जिह्वा चौरी मे पतिता पुरः ॥१२५॥
द्यूतैरिव प्रकाश्यन्ते बत प्रच्छन्नपातकाः।
इत्याद्याकलयन्सोऽत्र हृष्टो रात्रिं निनाय ताम् ॥१२६॥
प्रातश्चालीकविज्ञानयुक्त्या नीत्वा स तं नृपम्।
तत्रोद्याने निखातस्य प्रापयामास तद्धनम् ॥१२७॥
चौरं चाप्यपनीतांशं शशंस प्रपलायितम्।
ततस्तुष्टो नृपस्तस्मै ग्रामान्दातुं प्रचक्रमे ॥१२८॥
कथं स्यान्मानुषागम्यं ज्ञानं शास्त्रं विनेदृशम्।
तन्नूनं चौरसङ्केतकृतेयं धूर्तजीविका ॥१२९॥
तस्मादेषोऽन्यया युक्त्या वारमेकं परीक्ष्यताम्।
देव ज्ञानीति कर्णे तं मन्त्री राजानमभ्यधात् ॥१३०॥
ततोऽन्तः क्षिप्तमण्डूकं सपिधानं नवं घटम्।
स्वैरमानाय्य राजा तं हरिशर्माणमब्रवीत् ॥१३१॥
ब्रह्मन् यदस्मिन् घटके स्थितं जानासि तद्वद।
सदद्य ते करिष्यामि पूजां सुमहतीमहम् ॥१३२॥
तच्छ्रुत्वा नाशकालं तं मत्वा स्मृत्वा ततो निजम्।
पित्रा क्रीडाकृतं बाल्ये मण्डूक इति नाम सः ॥१३३॥
विधातुप्रेरितं मुञ्चस्तेनात्र परिवेदनम्।
ब्राह्मणो हरिशर्मा सहसैवैवमब्रवीत् ॥१३४॥