कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
१५८ कथासरित्सागर
१५८ कथासरित्सागर
ततस्तं सह देवीभ्यां सचिवैश्च तपःस्थितम्।
त्रिरात्रोपोषितं भूपं शिवः स्वप्ने समादिशत् ॥६॥
तुष्टोऽस्मि ते समुत्तिष्ठ निर्विघ्नं जयमाप्स्यसि।
सर्वविद्याधराधीशं पुत्रं धवाचिरादिति ॥७॥
ततः स बुबुधे राजा तत्प्रसादाद्धतक्लमः।
अर्कांशुश्वसिताप्यायि प्रतिपच्चन्द्रमा इव ॥८॥
आनन्दयच्च सचिवानां प्रातः स्वप्नेन तेन सः।
व्रतोपवासक्लान्ते च देव्यौ द्वे पुष्पकोमले ॥९॥
तत्स्वप्नश्रवणेनैव श्रोत्रपेयेन तृप्तयोः।
तयोश्च विमलावाव जात: स्वास्थ्योपचक्रमः ॥१०॥
लेभे स राजा तपसा प्रभावं पूर्वजैः समम्।
पुण्यां पतिव्रतानां च तत्पत्न्योः कीर्तिमापतुः ॥११॥
उत्सवव्यग्रपौरैश्च विहितव्रतपारणः।
यौगन्धरायणोऽन्यद्युरिति राजानमब्रवीत् ॥१२॥
धन्यस्त्वं यस्य चैवेत्थं प्रसन्नो भगवान् हरः।
तदिदानीं रिपून् जित्वा भज लक्ष्मीं भुजार्जिताम् ॥१३॥
सा हि स्वकर्मसम्भूता भूभृतामन्वये स्थिरा।
निजधर्माजितानां हि विनाशो नास्ति सम्पदां ॥१४॥
तथा च चिरभूमिष्ठो निधिः पूर्वजसम्भृतः।
प्रनष्टो भवता प्राप्तः किं चात्रेतां कथां शृणु ॥१५॥
देवदासवैश्यस्य कथा
बभूव देवदासाख्यः पुरे पाटलिपुत्रके।
[L24: पुरा कोऽपि वणिक्पुत्रो महाधनकुलोद्गतः ॥१६॥
अभवत्तस्य भार्या च नगरात् पौण्ड्रवर्धनात्।
परिणीता समृद्धस्य कस्यापि वणिजः सुता ॥१७॥
गते पितरि पञ्चत्वं क्रमेण व्यसनान्वितः।
स देवदासो द्यूतेन सर्वं धनमहारयत् ॥१८॥
ततश्च तस्य सा भार्या दुःसवाद्दारिद्र्यदुःखिता।
एरयं नीता निजं गृहं स्वपित्रा पौण्ड्रवर्धनम् ॥१९॥
तदनन्तर राजा रानियां और मन्त्रियों के साथ तीन रात तक उपवास करते हुए राजा को
शिवजी ने स्वप्न में आदेश दिया ॥६॥
'मैं तुमसे प्रसन्न हूँ लगे तुम बिना किसी विघ्न-बाधा के विजय प्राप्त करोगे' ॥७॥
शिवजी के प्रसाद से कष्ट रहित राजा इस प्रकार उद्यत हुआ जिस प्रकार सूर्य की किरणों
से वृद्धि प्राप्त करके प्रतिपदा का चन्द्रमा शोभित होता है ॥८॥
प्रभातकाल में उठकर राजा ने मन्त्रियो तथा व्रत-उपवास से क्लान्त फूल के समान कोमल
दोनों पत्नियों को स्वप्न का वर्णन करके हर्षित कर दिया ॥९॥
कानों द्वारा पीने (सुनने) के योग्य उस स्वप्न के कथन से दोनों महारानियों को मानों
मीठी औषधि का उपचार हुआ ॥१०॥
राजा वत्सराज ने तपस्या के प्रभाव से अपने पूर्वजा के समान प्रभाव प्राप्त किया।
और, उसकी दोनों पत्नियों ने पतिव्रताता की पवित्र कीर्ति प्राप्त की ॥११॥
व्रत की समाप्ति के उत्सव पर समस्त नगरवासी उत्सव में व्यग्र रहे। उसके दूसरे दिन
यौगन्धरायण ने राजा को कहा ॥१२॥
स्वामी ! तुम धन्य हो जिस पर शिवजी इस प्रकार प्रसन्न हैं। इसलिए तुम अब
शत्रुओ को जीतकर अपनी भुजा से अर्जित लक्ष्मी प्राप्त करो ॥१३॥
अपन धर्म से प्राप्त सम्पत्ति का विनाश नहीं होता ॥१४॥
इसीलिए तुमने अपने पूर्वजों की चिरकाल से भूमि में गड़ी हुई नष्ट लक्ष्मी को प्राप्त
किया है। इस पर एक कथा सुनो ॥१५॥
देवदास वैश्य की कथा
पाटलिपुत्र नगर में बड़े धनी कुल में उत्पन्न देवदास नामका वैश्य-पुत्र था ॥१६॥
उसकी पत्नी पौण्ड्रवर्धन नगर के किसी धनी वैश्य की कन्या थी ॥१७॥
पिता के मर जाने पर व्यसनी देवदास ने जुए में सारा धन गँवा दिया ॥१८॥
उसके दरिद्र हो जाने पर उसकी पत्नी दुःख से कष्ट में रहती थी। इसलिए उसका
धनी पिता आकर उसे अपने घर (पौण्ड्रवर्धन) ले गया ॥१९॥