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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

तृतीय लम्बक १४७

तृतीय लम्बक १४७
उसने वहाँ जाकर आकार से प्रेममयी और निराशा के दुख से व्याकुल एवं आँसू भरे नेत्रों
से निहारती हुई राजकन्या को देखा॥१२८॥
विदूषक वहाँ सतर्क होकर स्मरणमात्र से उपस्थित होनेवाले अग्नि देवता के खड्ग को
हाथ में लिये हुए रात-भर जागता रहा। सहसा उसने शयनागार के द्वार पर एक
अत्यन्त भीषण राक्षस को देखा जो दाहिना हाथ कट जाने से छाती को फैलाये हुए
था॥१२९ ३० ॥
उसे देखकर विदूषक ने सोचा कि आह! यह तो वही राक्षस है जिसका हाथ मैंने
पौण्ड्रवर्धन नगर में काटा था॥१३१॥
तो आज इसका हाथ नहीं काटता नहीं तो यह पहले की तरह भागकर कहीं चला
जायगा। अतः इसे भली भाँति मार डालता हूँ॥१३२॥
ऐसा सोचकर और दौड़कर उसने उसके बालों को पकड़ा और वध करने के लिए
तलवार उठाई॥१३३॥
तब वह डरा हुआ राक्षस बोला—'तुम मुझे मत मारो तुम साहसी वीर पुरुष हो। मुझ
पर दया करो'॥१३४॥
'तुम कौन हो ? और तुम्हारा यह क्या कार्य है ? इस प्रकार वीर विदूषक के पूछने पर
वह राक्षस फिर बोला॥१३५॥
'मैं मयवेष्ट नामक राक्षस हूँ। मेरी दो कन्याएँ हैं, एक तो यह और दूसरी पौण्ड्रवर्धन
राजा की॥१३६॥
'इन दोनों कन्याओं की कायर पुरुषों के संसर्ग से रक्षा करना'—इस प्रकार भगवान् शिव
की आज्ञा हुई। इसमें एक वीर ने पहले पौण्ड्रवर्धन में मेरी भुजा काटी और आज तुमने मुझे जीत
लिया। अब मेरा यह कार्य समाप्त हुआ' ॥१३७-१३९॥
राक्षस ने और कहा कि 'तुम पुरुष नहीं देवता का अंश हो। समझता हूँ तुम्हारे लिए
ही शिवजी की आज्ञा की कृपा हुई थी॥१४०॥
अब तुम मेरे मित्र हो गये। तुम जब कभी संकट में स्मरण करोगे तब मैं तुम्हारी
सफलता के लिए उपस्थित रहूँगा' ॥१४१॥
इस प्रकार विदूषक को मित्रता से वरण करके और उसकी स्वीकृति प्राप्त करके राक्षस
मयवेष्ट अन्तर्धान हो गया॥१४२॥

विदूषकोऽपि सानन्दमभिनन्दितविक्रमः।
राजपुत्र्या तया सत्र हृष्टस्तामनयन्निशाम् ॥३४३॥
प्रातश्च ज्ञातवृत्तान्तस्तुष्टस्तस्मै ददौ नृपः।
विभवैः सह शौर्यैकपताकामिव तां सुताम् ॥३४४॥
स तया सह तत्रासीद्रात्रीः काश्चिद् विदूषकः।
पवात्पदमिवोच्छन्त्या लक्ष्म्येव गुणवत्तया ॥३४५॥
एकदा च निशि स्वरं ततः प्रायात्प्रियोत्सुकः।
लब्धदिव्यरसास्वादः को हि रज्येदसान्तरे ॥३४६॥
नगराच्च विनिर्गत्य स च सस्मार राक्षसम्।
स्मृतमात्रमागतं तं च जगाद रचितानतिम् ॥३४७॥
सिद्धक्षेत्रे प्रयातव्यमुदयाद्रौ मया सखे।
मद्राविद्याधरीहेतोस्तत्त्वं सत्र मां नय ॥३४८॥
तथेत्युक्तवतस्तस्य स्कन्धमारुह्य रक्षसः।
ययौ च स तया गत्या दुर्गां षष्टियोजनीम् ॥३४९॥
प्रातश्च तीर्त्वा शीतोदामलङ्घ्यां मानुषैर्नदीम्।
उदयाद्रेश्र्च प्रापसन्निकर्षमयत्नतः ॥३५०॥
अय स पर्वत श्रीमानुदयाख्यः पुरस्तव।
अत्रोपरि च नास्त्येव सिद्धिधाम्नि गतिर्मम ॥३५१॥
इत्युक्त्वा राक्षसे तस्मिन्प्राप्तानुज्ञे तिरोहिते।
दीर्घिकां स ददर्शैकां रम्यां सत्र विदूषकः ॥३५२॥
वदन्त्या स्वागतमिव भ्रमद्भ्रमरगुञ्जितैः।
तस्यास्तीरे न्यषीदच्च फुल्लपद्माननश्रियः ॥३५३॥
स्त्रीणामिवात्र चापल्पत्त्वचपंक्तिः सुविस्तरात्।
अद्य प्रियागमे मार्गस्त्वेतेसि ब्रुवतीमिव ॥३५४॥
अरूढव्योऽय गिरिमैरयस्तद्विह्व वर क्षणम्।
स्थितो भवामि पश्यामि कस्यय पदपद्धतिः ॥३५५॥
इति चिन्तयतस्तस्य तत्र तोयार्थमाययुः।
गृहीतकाञ्चनघटा भव्या सुयहवः स्त्रियः ॥३५६॥
वारिपूरितकुम्भाश्च ताः स पप्रच्छ योषितः।
कस्येदं नीयते तोयमिति प्रणयपेशलम् ॥३५७॥