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कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

१२८ कथासरित्सागर

१२८ कथासरित्सागर
चिक्रीड च चिरं सोऽत्र साकमप्सरसा तया।
दिवं सापि न सस्मार रम्यं प्रेम न जन्मभूः ॥६४॥
तत्सखीयक्षिणीवृष्टेरुपरी स्वर्णराशिभिः।
सास्यभूमिर्नरेन्द्रस्य धौतैश्शिखरैरिव ॥६५॥
कालेन चास्य राज्ञ सा सुवेगस्य वराप्सराः।
असूतानन्यसदृशीं धृतगर्भा सती सुताम् ॥६६॥
प्रसूतमात्रैव च सा जगादेनं महीपतिम्।
राजञ्शापोऽयमीवृद्धमे क्षीणो जात' स चाधुना ॥६७॥
अहं हि रम्भा नाकस्त्री त्वयि दृष्टेऽनुरागिणी।
जाते च गर्भे मुक्त्वा तं गच्छामस्तत्क्षणं वयम् ॥६८॥
समयो हीदृशोऽस्माकं तद्रक्षे कन्यकामिमाम्।
एतद्विवाहाज्ञाके नो भूयो भावी समागमः ॥६९॥
एवमुक्त्वाप्सरा रम्भा विवशा सा तिरोदधे।
तद्दुःखान्न च स राजाभूत्तदा प्राणव्ययोद्यतः ॥७०॥
निरास्थेनापि किं त्यक्तं विश्वामित्रेण जीवितम्।
मेनकायां प्रयातायां प्रसूयैव शकुन्तलाम् ॥७१॥
इत्यादि सचिवैरुक्तो ज्ञातार्थः स नृपो धृतिम्।
शनैरादत्त कन्यां च पुनस्सङ्गमकारणम् ॥७२॥
तां च बालां सवेगाग्र पिता सर्वाङ्गसुन्दरीम्।
सोऽतिलोचनसौन्दर्यान्नाम्ना चक्रे सुलोचनाम् ॥७३॥
कालेन यौवनप्राप्तामुद्यानस्थां ददर्श ताम्।
युवा यदृच्छया भ्राम्यन्वत्सस्य काश्यपो मुनिः ॥७४॥
स तपोराशिरूपोऽपि दृष्ट्वैवैतां नृपात्मजाम्।
अनुरागरसोऽभूदिति धाम व्यचिन्तयत् ॥७५॥
अहो रूपं किमप्यस्याः कन्यायाः परमाद्भुतम्।
नेमां प्राप्नोति चेद् भार्या किमन्यत्तपसः फलम् ॥७६॥
इति ध्यायन् मुन्युवा स सुलोचनया तया।
अददर्शि प्रज्वलत्तेजा विधूम इव पावकः ॥७७॥
तं वीक्ष्य सापि सप्रेमा साक्षसूत्रकमण्डलुम्।
शान्तश्च कमनीयश्च कोऽयं स्यादित्यचिन्तयत् ॥७८॥

षष्ठ स्तबक ६६१
तदनन्तर वह राजा चिरकाल तक इस उद्यान में उस अप्सरा के साथ क्रीड़ा करता रहा।
रम्भा भी स्वर्ग को भूल गई। सच है, प्रेम प्यारा होता है, जन्मभूमि नहीं॥१४॥
जैसे आकाश सुभट के स्वर्ण-शृंगों से भर जाता है, उसी प्रकार रम्भा की सखी यक्षिणी ने
राजा की वह भूमि मान की वर्षा से भर दी॥१५॥
कुछ समय पश्चात् सुरत के समागम से गर्भवती रम्भा ने असाधारण सुन्दरी कन्या
उत्पन्न की॥१६॥
कन्या प्रसव करते ही रम्भा राजा से बोली—'राजन्, मुझे इतने दिनों का शाप प्राप्त था।
अब वह क्षीण हो गया। मैं रम्भा नाम की स्वर्गाङ्गना हूँ। तुम्हें देखने पर प्रेम से आकृष्ट
हो गई थी। तदुपारन्त गर्भ हो जाने पर इसे यहीं छोड़कर अभी ही जा रही हूँ॥१७-१८॥
हमारी मर्यादा ही ऐसी है। तुम इस कन्या की रक्षा करना। इसके विवाह से स्वर्ग
में हम दोनों का पुनः समागम होगा'॥१९॥
ऐसा कहकर वह विवश रम्भा अन्तर्धान हो गई। उसके वियोग-दुःख से राजा प्राण देने
के लिए तैयार हो गया॥२०॥
'इसी प्रकार शकुन्तला को उत्पन्न करके ही स्वर्ग चली गई। मेनका के लिए क्या विश्वा-
मित्र ने प्राण दे दिये थे?' मन्त्रियों की इस प्रकार की बातों से धीरज दिलाया गया वह राजा
किसी प्रकार धीरे-धीरे धीरज रख सका और उस रम्भा से पुनर्मिलन की आशा के कारण उसने
कन्या को ग्रहण किया॥२१-२२॥
उस सर्वाङ्गसुन्दरी कन्या का राजा ने एकाधिपत्य से पालन प्रारम्भ किया और उसके
लोचनों के अत्यन्त सुन्दर होने के कारण उसका नाम सुलोचना रखा॥२३॥
समग्र यौवन में आई हुई और उद्यान में विचरण करती हुई उसे अकस्मात् कश्यप
ऋषि के पुत्र वत्स्य ने देखा॥२४॥
तपोबलि होने पर भी वत्स्य मुनि उस कन्या को देखकर प्रेमरस (ज्ञाता) रसिक होकर
सोचने लगा॥२५॥
'अहा! इस बालिका का कैसा अद्भुत रूप है! यदि इसे पत्नी के रूप में प्राप्त न
कर सके तो मेरे तप का और दूसरा फल ही क्या होगा॥२६॥
इस प्रकार सोचता हुआ उस मुनि वत्स्य को सुलोचना ने जलती हुई ज्वालावाला निर्धूम
अग्नि के समान देखा॥२७॥
उस मुनि को देखकर प्रणमयी वह कन्या भी 'स्फटिक-माला और कमण्डलु लिए हुए
शान्त और सुन्दर यह युवक कौन है?' इस प्रकार सोचने लगी॥२८॥