कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
७३२ कथासरित्सागर
७३२ कथासरित्सागर
सम्भूता कदलीगर्भे यस्मात्तस्माच्चकार ताम्।
नाम्ना स कदलीगर्भा पिता मङ्कणको मुनिः ॥१०३॥
तस्याश्रमे सा ववृधे गौतमस्य कृपी यथा।
द्रोणभार्या पुरा रम्भादर्शनच्युतवीर्यजा ॥१०४॥
एकदा च विषेधीतमाश्रमं मृगया रसात्।
दृढवर्मा धृतोऽश्वेन मध्यदेशभवो नृपः ॥१०५॥
स तां ददर्श कदलीगर्भां प्रावृतवल्कलाम्।
मुनिकन्योचितेनात्र वेषेणात्यन्तशोभिताम् ॥१०६॥
सा च दृष्ट्वास्य नृपते स्वीचक्रे हृदयं तथा।
यथावकाशोऽपि हतस्तत्रान्तःपुरयोषिताम् ॥१०७॥
अपीमां प्राप्नुयां भार्या कस्यापीह सुतामृषेः।
दुष्यन्त इव कण्वस्य मुनेः कन्यां शकुन्तलाम् ॥१०८॥
इति सञ्चिन्तयन्नेव संगृहीतसमिच्छुभम्।
सोऽप्रापश्यत्समायान्तं मुनिं मङ्कणकं नृपः ॥१०९॥
ववन्दे चैनमभ्येत्य पादयोर्मुक्तवाहनः।
पृष्टश्चात्मानमेतस्मै मुनये स न्यवेदयत् ॥११०॥
छत्रं स कदलीगर्भां मुनिराविशति स्म ताम्।
वत्से राज्ञोऽतिथिपरस्य स्वयार्घ्यं फलप्स्यतामिति ॥१११॥
तथेति कल्पितातिथ्यस्तया राजा स सम्भ्रया।
संवृक्कुतस्ते कन्येयमिति पप्रच्छ तं मुनिम् ॥११२॥
मुनिश्च स ततस्तस्यास्तामुत्पत्तिं च नाम च।
अन्वर्थं कदलीगर्भेत्यस्मै राज्ञे न्यवेदयत् ॥११३॥
ततस्तां स मुनेः कन्यां मेनकामावनोद्भवम्।
प्रत्यप्सरसमप्युक्तो राजा तस्मादयाचत ॥११४॥
सोऽप्येतां कदलीगर्भां ददौ तस्मै सुतामृषिः।
स्थित्यानुभावं पूर्वोक्तामविधाय हि धष्टितम् ॥११५॥
तच्च दृष्ट्वा प्रभावेण सम्भाव्यय सुरङ्गना।
संमदाप्रीतिरुत्सस्याप्यवदद्व्याहृष्णन्नम् ॥११६॥
दत्त्वा च मर्षपाङ्गन्मे जगदुस्तां तदैव ताः।
यान्तीं मार्गे वपस्यैतांस्त्वममभिज्ञानदिछये ॥११७॥
षष्ठ स्तम्भक ७११
उस कन्या के पिता ऋषि ने उसका नाम 'कदलीगर्भा' रख दिया। वह कन्या कदली
गर्भा अपने पिता मंचणक ऋषि के आश्रम में उसी प्रकार पलने और बढ़ने लगी जैसे रम्भा के
दर्शन से विष्णुपद स्थान पर गौतम ऋषि की कन्या और द्रोणाचार्य की पत्नी कृपी पल
रही थी ॥१-३ । ४॥
एक बार मध्यदेश का राजा दृढवर्मा शिकार के प्रसंग में घोड़े द्वारा उसी आश्रम में
ले जाया गया ॥१-५॥
उस राजा ने वहाँ अकस्मात् आए हुए उस कदलीगर्भा को देखा। वह कन्या मुनिकन्या के
आभूषणहीन वेष में अत्यन्त सुन्दरी लग रही थी ॥१-६॥
उसके देखते ही राजा दृढवर्मा का हृदय उसी प्रकार आकृष्ट हो गया जिस प्रकार
कण्व के आश्रम में शकुन्तला को देखकर राजा दुष्यन्त का हृदय आकृष्ट हो गया था।
राजा सोचने लगा कि क्या मैं दुष्यन्त की शकुन्तला के समान इस कन्या को प्राप्त कर
सकूँगा ? ॥१-७-८॥
इस प्रकार सोचते हुए राजा ने नित्यकर्म के लिए समिधा और कुशा लेकर आते हुए
मंचणक ऋषि को देखा ॥१- ९ । १०॥
उस समय घोड़े से उतरते हुए राजा ने ऋषि के समीप आकर उनके चरणों में प्रणाम किया
और प्रश्न करने पर उसे अपना परिचय दिया ॥११॥
तब ऋषि ने कन्या कदलीगर्भा को आज्ञा दी कि बेटी इस अतिथि राजा के लिए तुम
अर्घ्य ला ॥१२-१३॥
इस प्रकार उस विनम्र कन्या से सन्तुष्ट राजा ने उस मुनि से पूछा कि यह स्त्री कन्या तुम्हें
कहाँ से और कैसे प्राप्त हुई ? ॥१४-१५॥
तब मुनि ने उसकी उत्पत्ति और उसके नाम का अनुकूल अर्थ 'कदलीगर्भा' बताया ॥१६-१७॥
तब राजा ने उस कन्या को मेनका अप्सरा की सन्तान समझकर अत्यन्त उत्कण्ठा के साथ
ऋषि से उस कन्या को माँगा ॥१८-१९॥
राजा के माँगने पर उस ऋषि ने भी उस कन्या दे दी क्योंकि प्राचीन व्यक्तियों को दिव्य
और प्रभावशाली व्यक्तियों पर विचार न करना चाहिए ॥१२-२०॥
अपने दिव्य प्रभाव से स्वर्ग की अप्सराओं ने यह जानकर और मेनका के प्रेम से यहाँ
आकर उस कन्या को विवाह के वेष में अलंकृत किया। और उसके हाथ में सरसों देते हुए
कहा- तू पतिके घर जाती हुई मार्ग में इसे डालती हुई जाना जिससे लौटते समय के लिए
मार्ग का परिचय बना रहे ॥१२८-१३०॥
१ उत्तर में हिमालय दक्षिण में विन्ध्याचल पूर्व में प्रयाग और पश्चिम में मारवाड़
के मध्य में आया हुआ देश, मध्यदेश कहा जाता है।
२ दिव्य अतिथि के स्वागत के लिए उसे अक्षत दूब और फल डालकर जल देना
अर्घ्य है जो सम्मान का चिह्न है।
३ अर्थात् केले के वृक्ष के मध्य से उत्पन्न।