सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

५३४ कथासरित्सागर

५३४ कथासरित्सागर
अथैकां तस्य पृष्ठेऽथ सर्वालङ्कारभूषिताम्।
अदृष्टपूर्वां सर्वाङ्गसुन्दरीं स्त्रियमैक्षत ॥१३९॥
कृष्णपक्षपरिक्षीणे गतप्रभे रजनीपतौ।
चितारोहाय तद्रश्मिरम्यां रात्रिमिवागताम् ॥१४०॥
का त्वमम्ब कथं चेह कृत्येष्वहमवस्थिता।
इति पृष्टा च सा तेन योषिदेवं समब्रवीत् ॥१४१॥
अस्याहं शूलविद्धस्य भार्या विगतलक्षणा।
निश्चिताद्या स्थितास्मीह चितारोहे महामुना ॥१४२॥
कञ्चित्कालं प्रतीक्ष्यात्र प्राणानामस्य निष्क्रमम्।
तृतीयेऽहनि गतेऽप्यद्य यान्त्यतस्य हि नासवः ॥१४३॥
याचते च मुहुस्तोयमानीतं च मयेह तत्।
किं त्वहं नोन्नते शूले प्राप्नोम्यस्य मुखं सखे! ॥१४४॥
इति तस्या वचः श्रुत्वा स प्रवीरोऽप्युवाच ताम्।
इव स्वस्य नृपेणाऽपि हस्ते म प्रेषितं जलम् ॥१४५॥
तम पृष्ठे पदं दत्त्वा वार्यतस्योत्तानने।
न परस्पर्शमात्रं हि स्त्रीणामापदि दूषणम् ॥१४६॥
एतच्छ्रुत्वा तथैत्यात्तजला दत्त्वा पदद्वयम्।
शूलमूलावभग्नस्य पृष्ठे सन्त्यारुरोह सा ॥१४७॥
क्षणाद् भुवि स्वपृष्ठे च रक्तबिन्दुव्यशङ्कितम्।
पतत्सु मुखमुन्नम्य स वीरो यावदीक्षते ॥१४८॥
तावत्स्त्रियमपश्यत्सां छित्त्वा छुरिकया मुहुः।
खादन्तीं तस्य मांसानि पुनः शूलाग्रवर्तिनः ॥१४९॥
ततस्तां विकृतिं मत्वा क्रोधादाकृष्य सा द्रुतौ।
आस्फोटयिष्यन्प्रग्राह पादे रणितनूपुरे ॥१५०॥
सापि तं तरसा पादमाक्षिप्य स्वप्रभावया।
क्षिप्रं गगनमुत्पत्य जगाम क्वाप्यदर्शनम् ॥१५१॥
तस्य चादोलदस्तस्य सत्पाशान्मणिनूपुरम्।
तस्मादावर्षणभ्रष्टमेकतस्य करान्तरे ॥१५२॥
तत्तन्मां चेदमामादाश्चर्यकर्त्री च मन्यते।
धन्ते विताम्फोरां च दुर्जनस्य सङ्गतिम् ॥१५३॥

उसने उस शूली के नीचे सुन्दर आभूषणों से सुशोभित एक रोती हुई स्त्री को देखा। वह
अपूर्व रमणी सर्वांग सुन्दरी थी मानों कृष्णपक्ष के बीतने के कारण चन्द्रमा का अस्त हो जाने पर
चाँदनी के समान रजनीचरणी चिता पर चढ़कर सती होने के लिए आई हो॥१३९-१४०॥
'हे माता तू कौन है, यहाँ क्यों रो रही है और इस प्रकार क्या बैठी है?'—इस प्रकार
अशोकदत्त के प्रश्न करने पर वह स्त्री बोली—'मैं शूली पर चढ़े हुए इस पुरुष की अभागिन स्त्री
हूँ। इसके साथ सती होने का निश्चय करके यहाँ बैठी हूँ। कुछ समय तक इसके प्राणों के निकलने
की प्रतीक्षा कर रही हूँ। तीन दिन बीत जाने पर भी इसके प्राण नहीं निकले हैं॥१४१-१४३॥
यह बार-बार पानी माँगता है। मैं पानी लाई भी किन्तु ऊँची शूली पर लटके हुए
इसके मुँह तक नहीं पहुँच पा रही हूँ'॥१४४॥
स्त्री की बातें सुनकर वीर अशोकदत्त बोला—'राजा ने मेरे हाथों यह जल भेजा है।
अब तू मेरी पीठ पर पैर रखकर इसके मुख में यह जल डाल दे। आपत्ति के समय पुरुष का स्पर्श
स्त्री के लिए दूषित नहीं है ॥१४५-१४६॥
यह सुनकर और उसकी बात मानकर वह स्त्री पानी लेकर, शूली की जड़ में नीचे मुँह
किये हुए अशोकदत्त की पीठ पर दोनों पैर से चढ़ गई॥१४७॥
कुछ ही समय पश्चात् उसने भूमि पर और अपनी पीठ पर रक्त की बूँदों के गिरने से शङ्कित
हो मुँह उठाकर ऊपर देखा तो उसे मालूम हुआ कि वह स्त्री शूली पर चढ़े हुए उस पुरुष का
मांस कटार से काटकर खा रही है॥१४८-१४९॥
उस स्त्री की इस प्रकार विकृति को देखकर उस वीर ने उसे पछाड़ने के लिए उसके पैर
पकड़े जिनमें पैरों का आभूषण (पायजेब) बज रहा था॥१५०॥
वह स्त्री भी पैरों को छुड़ाकर और अपनी माया से आकाश में उड़कर अदृश्य
हो गई॥१५१॥
पैरों को छुड़ाते समय अशोकदत्त के बलपूर्वक खींचने पर उसके एक पैर का पायजेब
उसी अशोकदत्त के हाथ में ही रह गया॥१५२॥
और, दुर्जनों की संगति के समान प्रारम्भ में अच्छी मध्य में सन्तापकारिणी और अंत
में घोर विकारवाली वह स्त्री हाथ से निकल गई॥१५३॥