कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
तृतीय लम्बक २८९
तृतीय लम्बक २८९
राजा का भी उसके प्रति स्नेह था अतः उसने नगर के कोतवाल को गुहसेन के साथ कर
दिया और उसने उसके साथ धर्मगुप्त का घर घेर लिया तथा साथ ही सर्वनाश की शंका से
भयभीत धर्मगुप्त के प्राणों ने उसके गले को घेर लिया॥८०-८१॥
पिता की इस स्थिति को देखकर सोमप्रभा ने उससे कहा कि 'तुम मुझे दे दो मेरे लिये
यह उपद्रव हो रहा है किन्तु यह शर्त लगा दो कि मेरा पति मुझे शैया पर कभी न चढ़ाये'। ऐसी
मौखिक शर्त तुम समधी से करा लो॥८२-८३॥
कन्या के इस प्रकार कहने पर धर्मगुप्त ने शर्त के साथ कन्या का देना स्वीकार कर
लिया। गुहसेन ने मन-ही-मन हँसते हुए उसकी शर्त स्वीकार कर ली कि किसी प्रकार मेरे लड़के
का विवाह तो हो फिर देखा जायगा॥८४-८५॥
तदनन्तर गुहसेन का पुत्र गुहचन्द्र विवाह करके सोमप्रभा को लेकर अपने घर आ
गया॥८६॥
सायंकाल होने पर गुहसेन ने अपने पुत्र से कहा कि 'बेटा तुम इसे शैया पर चढ़ा
लो। किसकी पत्नी शैया पर नहीं चढ़ती॥८७॥
श्वसुर की ऐसी बात सुनकर सोमप्रभा ने क्रोध से अपनी तर्जनी अंगुली को यमराज की
आज्ञा के समान घुमाया॥८८॥
बहु की उस घूमती हुई उंगली को देखकर ससुर के प्राण उसी समय निकल गये। पिता के
मरने पर गुहचन्द्र ने भी समझा कि यह स्त्री महामारी के रूप में मेरे घर आ गई है॥८९ १ ॥
अतः उसका सेवन न करके घर में रहती हुई भी उससे दूर रहकर मानो असिधारा-व्रत
का पालन करता था॥९१॥
उस दुःख से दुःखी गुहचन्द्र सांसारिक भोगों से विरक्त होकर प्रतिदिन व्रत करता
और ब्राह्मणों को भोजन कराता था॥९२॥
उसकी दिव्यरूप-धारिणी स्त्री भी मौनव्रत धारण करती हुई भोजन किये हुए ब्राह्मणों
को दक्षिणा देती थी॥९३॥
एक दिन भोजन के लिए आये हुए एक बूढ़े ब्राह्मण ने संसार को चकित करनेवाले
अनुपम सौन्दर्यशालिनी उस स्त्री को देखा। और एकान्त में गुहचन्द्र से पूछा कि यह बालिका
तुम्हारी कौन है? मुझे बताओ'॥९४ ९५॥
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