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सर्वकोश
कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)

महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा

स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)

DevanagariHindipublished876 पृष्ठ

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द्वितीय लम्बक ११५
इसके अतिरिक्त गोपालक द्वारा वासवदत्ता के लिए उपहार में भेजी हुई बन्धुमती नाम
की राजकुमारी को वत्सराज ने गान्धर्व विधि से विवाहित किया। उसे मंजुक्षिका के नाम से
छिपाकर भेजा गया था। वह लावण्य-समुद्र से निकली हुई लक्ष्मी के समान सुन्दर थी। इस
गुप्त विवाह को वासवदत्ता ने छिपकर देख लिया था। फलतः उस कार्य के प्रधान आयोजक
वसन्तक पर वह अत्यन्त क्रुद्ध हुई और उसे बँधवाकर ले गई॥६७-७० ॥
तब राजा ने वासवदत्ता के पितृकुल से आई हुई सांकृत्यायनी नाम की परिव्राजिका की
शरण ली॥७१॥
राजा ने परिव्राजिका को प्रसन्न करके महारानी को मनाया। परिव्राजिका की आज्ञा
से वासवदत्ता ने बन्धुमती को राजा के लिए दे दिया और वसन्तक को कैद से मुक्त कर दिया।
सती स्त्रियों का हृदय कोमल होता है॥७२॥
बन्धन से छूटने पर विदूषक वसन्तक ने हँसते हुए कहा कि अपराध तो बन्धुमती ने
(विवाह कराकर) किया मैंने क्या किया (जो कैद किया गया) ? विषधर साँपों का
क्रोध बेचारे डेंडहों (पानी के निर्विष साँपों) पर निकालती हो ॥७३-७४॥
उसके यह कहने पर वासवदत्ता ने कौतुक से पूछा—इस उदाहरण को विस्तृत रूप से
समझाओ ॥७५॥
रुरु और प्रमद्वरा की कथा
वसन्तक ने समझाते हुए फिर कहा—प्राचीन समय में रुरुकुमार नाम का एक मुनिकुमार
था। उसने भ्रमण करते हुए एक अद्भुत सुन्दरी कन्या को देखा॥७६॥
वह कन्या किसी विद्याधर द्वारा स्वर्गीय अप्सरा मेनका से उत्पन्न की गई थी और
स्थूलकेशा नाम के ऋषि ने अपने आश्रम में उसका पालन-पोषण किया था॥७७॥
उस रुरुनामक ऋषिकुमार ने उस प्रमद्वरा नाम की कन्या को स्थूलकेशा ऋषि से माँगा
क्योंकि उस कन्या ने उसका मन हर लिया था॥७८॥
स्थूलकेशा ने भी उसे कन्या देना स्वीकार कर लिया था। किन्तु विवाह-समय के निकट
ही उस कन्या को सर्प ने काट लिया था॥७९॥
तब दुःखी ऋषिकुमार ने आकाशवाणी सुनी कि 'तुम अपनी आयुष्य का आधा भाग
देकर इसे जीवि करो अन्यथा इसकी आयु क्षीण हो चुकी है' ॥८० ॥