कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
चतुर्थ लम्बक ४४५
चतुर्थ लम्बक ४४५
मैं भवानीभक्त शबरराज हूँ। गजमुक्ता लेने के हेतु इस जंगल में आया हूँ तुम्हें
देखकर मुझे अपना एक जीवनाधार आत्मीय मित्र स्मरण आ गया जो एक बड़े व्यापारी और धनी
का पुत्र है उसका नाम वसुदत्त है ॥८८-८९॥
हे सुवदि! वह रूप और यौवन में तुम्हारे ही समान सुन्दर है। आँखों के लिए मानों
अमृत का झरना है ऐसा पुरुष इस विश्व में दूसरा नहीं है॥९०॥
इस संसार में वह लड़की धन्य होगी जिसका वह पाणिग्रहण करेगा। वह मित्रता दया
दान और धैर्य का समुद्र है॥९१॥
यदि तुम्हारी ऐसी सुन्दर आकृति उसे न मिली तो कामदेव का धनुष-बाण धारण करना
ही व्यर्थ हो जायगा। इसका मुझे दुःख है॥९२॥
इस प्रकार कामदेव के मोहन-मन्त्रों के समान भीलराज के वचनों से वह कुमारी तुरन्त
अन्यमनस्क हो उठी॥९३॥
साथ ही कामदेव से प्रेरित हो उस भील से बोली कि 'तुम्हारा वह मित्र कहाँ है उसे
लाकर दिखाओ ॥९४॥
यह सुनकर और अच्छा लाता हूँ—कहकर वह भील अपने को सफल समझता हुआ
प्रसन्नता से चला ॥९५॥
तदनन्तर अपने घर जाकर मोती कस्तूरी आदि के सैकड़ों बोझे लदवाकर वह वसुदत्त
के घर पहुँचा ॥९६॥
वहाँ सभी लोगों द्वारा स्वागत किये गये भीलराज ने कई लाख मुद्राओं के मूल्य के उस
उपहार को वसुदत्त के पिता को भेंट किया ॥९७॥
हँसी-खुशी में दिन व्यतीत होने पर रात्रि में एकान्त के समय भीलराज ने मेरे पास
आकर कन्या को देखने का समस्त वृत्तान्त प्रारम्भ से सुनाया और कहा कि 'चलो वहीं
चलें'—ऐसा कहकर रात्रि में ही मुझे साथ लेकर भीलराज चल पड़ा॥ ९८ ॥
प्रातःकाल ही भीलराज के साथ मुझे कहीं चला गया जानकर मेरे पिता ने भीलराज में
विश्वस्त होकर धैर्यपूर्वक दिन व्यतीत किये ॥९९॥
शीघ्र चलनेवाले उस भीलराज ने मार्ग में मेरी सहायता करते हुए मुझे हिमाचल पर
पहुँचा दिया॥१००॥
मैं और वह दोनों सायंकाल उस तालाब पर पहुँचे और स्नान करके स्वादिष्टफल खाकर
उस रात वहीं सो गये। वह सुन्दर स्थान खिले हुए विविध पुष्पों से सुगन्धित भ्रमरियों के संगीत
से आकर्षक और रात्रि में जलनेवाली औषधियों से आलोकित था॥१०१-१०२॥
रतेस्तद्वासवेश्मेव विधात्र्यै गिरिकाननम् ।
आवयोरभवल्लक्ष्म पिवतोस्तत्सरोजलम् ॥१४॥
ततोऽन्येषु प्रतिपदं तत्तत्पुरुकलिकामृता ।
प्रत्युद्गतेव मनसा मम तन्मार्गभाविना ॥१५॥
चक्षुषा दक्षिणेनापि सूचितागमनामूना ।
दिवुक्षयेव स्फुरता सा कन्यात्रागताभवत् ॥१०६॥
सटारुत्सिंहपृष्ठस्था सुभ्रूदृष्टा मया च सा ।
शरव्यम्भोघरोत्सङ्गसङ्गिनीवन्द्यवी कला ॥१०७॥
विलसद्विस्मयौत्सुक्यसाध्वसं पश्यतश्च ताम् ।
ममावर्तत तत्काल न जाने हृदय कथम् ॥१०८॥
अथावतीर्य सिंहात्सा पुष्पाण्युच्चित्य कन्यका ।
स्नात्वा सरसि तत्तीरगत हरमपूजयत् ॥१०९॥
पूजावसाने चोपैत्य स सखा शबरो मम ।
प्रणम्यात्मानमावेद्य तामबोचत् कृतादराम् ॥११०॥
आनीतः स मया देवी सुहृद्योग्यो वरस्तव ।
मन्यस यदि तत्तुभ्य दर्शयाम्यधुनैव तम् ॥१११॥
तच्छ्रुत्वा दर्शयेत्युक्ते तया स शबरस्ततः ।
आगत्य निकटं नीत्वा मां तस्याः समदर्शयत् ॥११२॥
सापि मां तिर्यगालोक्य चक्षुषा प्रणयलुठता ।
मदनावेशसन्नगा शबरेश तमभ्यधात् ॥११३॥
सखा ते मानुषो नाय कामः कोऽप्ययमागतः ।
मद्गच्छनाय देवोऽस्य मर्त्यस्याप्याकृति कृतः ॥११४॥
तदाकर्ण्योक्तवानस्मि तां प्रत्याययितुं स्वयम् ।
सत्यं सुवरि ! मर्त्योऽहं किं व्याजनाजने जने ॥११५॥
अह हि सार्थवाहस्य वल्मीकासिनः सुतः ।
महाधनाभिधानस्य महेश्वरवराजितः ॥११६॥
तपस्यन्स हि पुत्रार्थमुद्दिश्य शशिशेखरम् ।
समादिष्टस्ततस्तेन स्वप्ने देवेन तुष्यता ॥११७॥
उत्तिष्ठोत्तस्यते कोऽपि महात्मा तनयस्तव ।
रहस्यं परमं यत्तत्सम्प्रवक्ष्याम विस्तरम् ॥११८॥