कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
प्रथम लम्बक ६१
प्रथम लम्बक ६१
इस प्रकार कहकर राक्षस के अन्तर्धान हो जाने पर मैं अपने रास्ते से चला गया। इस
प्रकार यह राक्षस मेरा मित्र बना ॥५४॥
ऐसा कहकर शकटाल द्वारा पुनः प्रार्थना किये जाने पर मैंने ध्यान से उपस्थित मूर्त्तिमती
गंगा को दिखाया ॥५५॥
मुझसे स्तुति द्वारा सन्तुष्ट की गई गंगा देवी तिरोहित हो गईं। यह सब देख-सुनकर
शकटाल मुझे प्रणाम करता हुआ मेरा सहायक बन गया ॥५६॥
एक बार मन्त्री शकटाल ने छिपे हुए और खिन्न मुझे देखकर कहा—"तुम अपनी
आत्मा में खेद क्यों कर रहे हो। क्या तुम नहीं जानते कि 'राजाओं की बुद्धि अविचार
पूर्ण होती है' इसलिए शीघ्र ही तुम्हारी शुद्धि हो जायगी। मैं इस सम्बन्ध में एक कथा सुनाता हूँ
सुनो" ॥५७-५८॥
राजा आदित्यवर्मा और मन्त्री शिववर्मा की कथा
पूर्वकाल में आदित्यवर्मा नामक एक राजा था। शिववर्मा नामक उसका महा बुद्धिमान्
मन्त्री था ॥५९॥
इस राजा की एक रानी एक बार गर्भवती हुई, यह सुनकर राजा ने रक्षकों से पूछा 'मुझे
रनिवास में गये हुए दो वर्ष हो गए फिर भी रानी का यह गर्भ-धारण कैसे हुआ—यह
बताओ' ॥६०-६१॥
रक्षकों ने कहा—महाराज आपके इस अन्तःपुर में किसी पुरुष का प्रवेश असम्भव है
किन्तु आपका मन्त्री शिववर्मा बे-रोक टोक अन्दर आता-जाता है' ॥६२॥
यह सुनकर राजा ने सोचा कि अवश्य यह मन्त्री मेरा द्रोही है, किन्तु इसे प्रकट रूप में
मार देने पर मेरी निन्दा होगी ॥६३॥
ऐसा सोचकर राजा ने शिवशर्मा को अपने मित्र सामन्त राजा गोपवर्मा के पास
भेज दिया ॥६४॥
उसके जाने के अनन्तर राजा ने गुप्त रूप से मन्त्री का वध करने के लिए पत्र लिखकर छिपे
तौर पर पत्रवाहक को भेजा ॥६५॥
मन्त्री के चले जाने पर एक सप्ताह व्यतीत होने के अनन्तर वह गर्भवती रानी भय से भाग
गई और सिपाहियों ने उसे स्त्री-रूप धारण किये हुए पुरुष के साथ पकड़ा ॥६६॥
यह समाचार जानकर आदित्यवर्मा शोक से पश्चात्ताप करने लगा कि मैंने ऐसे भले मन्त्री
को बिना कारण ही मार डाला ॥६७॥
इसी बीच शिववर्मा भोगवर्मा के पास पहुँचा किन्तु राजाज्ञा का पत्र लेकर पत्रवाहक
भी तबतक न पहुँचा ॥६८॥