कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५)
Kathasaritsagara Part 1 (Lambaka 1–5)
महाकवि सोमदेव भट्ट द्वारा
स्रोत: कथासरित्सागर : प्रथम खण्ड (लम्बक १ से ५) · बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना · 1960 (उद्गम)
७५२ कथासरित्सागर
७५२ कथासरित्सागर
तौ पुनस्तत एवांशं दत्त्वा प्रेर्य च घातकान्।
तस्याच्छेद्यतां पाणिपादं धनजिहीर्षया ॥४८॥
तथापि न स चुक्रोध निर्मत्सयुर्भ्रातरौ प्रति।
तेन सत्येन तस्याथ हस्तपादमजायत ॥४९॥
तदा प्रभृति तद्वुद्ध्वा त्यक्तः क्रोधोऽखिलो मया।
त्वया तु तापसेनापि क्रोधोऽद्यापि न मुच्यते ॥५०॥
अक्रोधेन जितं स्वर्गं पश्यैतदधुनैव भोः।
इत्युक्त्वैव तनुं त्यक्त्वा क्षापिकः स दिवं गतः ॥५१॥
इदमाश्चर्यं मया दृष्टं द्वितीयं शृणु भूपते।
इत्युक्त्वा श्रुतसेनं स नृपं विप्रोऽब्रवीत्पुनः ॥५२॥
विद्युद्द्योतायाः श्रुतसेननृपतेश्च कथा
ततोऽपि तीर्थयात्रार्थं पर्यटन्नम्बुधेस्तटे।
अह वसन्तसेनस्य राज्ञो राष्ट्रमवाप्तवान् ॥५३॥
सत्रं भोक्तुं प्रविष्टं मां राजसत्रेऽब्रुवन् द्विजाः।
ब्रह्मन् पथामुना मा गाः स्थिता ह्यत्र नृपात्मजा ॥५४॥
विद्युद्द्योताभिधाना तां पश्येदपि मुनिर्यदि।
स कामशरनिर्भिन्नः प्राप्योन्मादं न जीवति ॥५५॥
ततोऽहं प्रत्यवोचं तान्नैतच्चित्रं सदा ह्यहम्।
पश्याम्यपरकन्दर्पं श्रुतसेनमहीपतिम् ॥५६॥
यात्रादौ निर्गते यस्मिन्नरक्षिभिर्दृष्टिगोचरात्।
उत्सार्यन्ते सतीवृत्तमङ्गीकृत्या कुलाङ्गनाः ॥५७॥
इत्युक्तवन्तं विज्ञाय भावकं भोजनाय माम्।
नृपान्तिकं नीतवन्तौ सत्राधिपपुरोहितौ ॥५८॥
तत्र सा राजतनया विद्युद्द्योता मयेक्षिता।
कामस्येव जगन्मोहम प्रविद्या शरीरिणी ॥५९॥
चिरात्तद्दर्शनक्षोभं नियम्याहमचिन्तयम्।
अस्मत्प्रभावेनेद् भार्यैयं भवेद्राज्यं स विस्मरेत् ॥६०॥
तथापि कथनीयोऽयमुदन्तः स्वामिने मया।
उन्मादिनीभ्येसेनवृत्तान्तो ह्यन्यथा भवेत् ॥६१॥
उन दोनों ने उस धन को लेकर और कुछ भाग उसे देकर, कुछ गुंडों को उभाड़ा और उस
धन को भी लेने की इच्छा से उसके हाथ-पैर कटवा दिये ॥४८॥
इतने अत्याचार करने पर भी वह अपने बड़े भाइयों पर क्रुद्ध नहीं हुआ। फलतः इस सत्य
वाक्य के प्रभाव से उसके हाथ-पैर ठीक हो गये ॥४९॥
उसे देखकर तब से मैंने सारा क्रोध छोड़ दिया। पर तुमने तपस्वी होकर भी अभी
तक क्रोध नहीं छोड़ा ॥५०॥
इस प्रभाव के कारण ही मैंने स्वयं पर विजय पाई है। अभी देखो'—ऐसा कहकर वह
विप्र अपना चोला (शरीर) त्यागकर उसी समय स्वर्ग को चला गया ॥५१॥
एक आश्चर्य तो मैंने यह देखा—'हे राजन् अब दूसरा सुनो—ऐसा कहकर वह
ब्राह्मण राजा श्रुतसेन से यह कहने लगा ॥५२॥
वहाँ से मैं तीर्थयात्रा के लिए समुद्र-तट पर भ्रमण करते हुए राजा बसन्तसेन के राज्य
में गया ॥५३॥
विद्युत्प्रभा और राजा श्रुतसेन की कथा (चालू)
वहाँ पर राजा के भोजन-क्षेत्र में प्रवेश करने पर ब्राह्मण लोग मुझसे कहने लगे— 'ब्राह्मण
इस मार्ग से न जाओ। आगे मार्ग में राजा की कन्या बैठी है ॥५४॥
उसका नाम विद्युत्प्रभा है। उसे यदि कोई संयमी मुनि भी देख ले तो वह कामबाण
से आहत होकर बच नहीं सकता' ॥५५॥
तब मैंने उन्हें कहा 'कि यह कोई आश्चर्य नहीं है। मैं दूसरे कामदेव के समान श्रुतसेन राजा
को प्रतिदिन देखता हूँ। जिस राजा के बाहर निकलने पर सैनिक गण कुलस्त्रियों का उनका
सती चरित्र भंग होने के भय से मार्ग से हटा देते हैं' ॥५६-५७॥
ऐसा कहते हुए मुझे आपका कृपापात्र समझकर सत्र के व्यवस्थापक और पुरोहित राजा
के समीप ले गये ॥५८॥
वहाँ मैंने राजपुत्री विद्युत्प्रभा को देखा है। वह मानों काम की शरीरधारिणी जग मोहिनी
पराविद्या है। उसके दर्शन से होनेवाले क्षोभ को बहुत विलम्ब के पश्चात् नियन्त्रित करके
मैंने यह सोचा—'यदि यह हमारे स्वामी की पत्नी हो जाय तो वह सारा राज्यकार्य भूल
जाय' ॥५९-६०॥
फिर भी मुझे यह समाचार तो प्रभु (आप) से कहना ही चाहिए अन्यथा देवसेन और
उन्मादिनी की-सी गति हो जायगी ॥६१॥
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