जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
३१२ [ २.६.२०३
[ हंस, क्रोञ्च, मोर, हाथी तथा चितकबरा मृग सभी सिंह से डरते हैं।
शरीर से बड़ा-छोटा नही होता। इसी प्रकार मनुष्यो में चाहे आयु का छोटा
हो लेकिन यदि यह बुद्धिमान् हैं तो वह ही बडा है। बडे शरीर वाला मूर्ख
बडा नही होता।]
पसदामिगा, पसद नामक मृग, पसद मृग तथा शेष मृग भी अर्थ है। पसद-
मिगा भी पाठ है। पसद मृग अर्थ है। नत्थि कायस्मि तुल्यता, शरीर से बडा
छोटा नही है, यदि हो तो बडे शरीर वाले पसद मृग और हाथी सिंह को मार
डालें। सिंह हंसादि क्षुद्र शरीर वालो को ही मारे। छोटे ही सिंह से डरें, बडे
नही, ऐसा नही है। इसलिए सभी सिंह से डरते है। सरीरवा मूर्ख वडे शरीर
वाला होने पर भी बडा नही होता। इसलिए लकुण्टक भद्दिय यद्यपि शरीर
से छोटा है, इससे यह न समझो कि वह ज्ञान में भी छोटा हैं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यो को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यो के अन्त में उन भिक्षुओ में से कोई स्रोतापन्न, कोई सकृदागामी,
कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हो गए।
उस समय राजा लकुण्टक भद्दिय था। उसके क्रीडा-प्रिय होने से दूसरे
क्रीडा-प्रिय हो गए। शक्र मै ही था।
* २०३. खन्धवत्त जातक
“विरूपक्खेहि मे मेत्तं .” इसे शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
एक भिक्षु के बारे में कहा।
क. वर्तमान कथा
स्कन्धवत्त ] ३१३
क. वर्तमान कथा
जिस समय वह अग्नि-गृह¹ के द्वार पर लकड़ियां चीर रहा था, पुराने वृक्ष
में से एक सांप ने निकल कर उसे पाँव की अँगुलियों में डसा। वह वहीं मर
गया। उसके मरने की खबर सारे विहार में फैल गई।
धर्मसभा में भिक्षुओं ने बातचीत चलाई—आयुष्मानो ! अमुक भिक्षु
अग्नि-गृह के दरवाजे पर लकड़ियाँ फाड़ता हुआ सर्प से डसा जाकर वहीं मर
गया।
शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत कर
रहे हो ?
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, यदि वह भिक्षु चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना करता,
उसे सर्प न डसता। पुराने तपस्वी भी, जिस समय बुद्ध उत्पन्न नहीं हुए थे उस
समय चारो सर्पराज-कुलो के प्रति मैत्री भावना कर, उन सर्पराज-कुलो से जो
भय था उससे मुक्त हुए।"
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
काशी राष्ट्र में ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर गृहस्थी छोड़ ऋषियो
के प्रब्रज्या क्रम से प्रब्रजित हो, अभिज्ञा तथा समापत्तियाँ प्राप्त कर, हिमवन्त
प्रदेश में एक जगह जहाँ गङ्गा का मोड़ था आश्रम बना कर, ध्यान क्रीड़ा में
रत हो ऋषिगणो के साथ रहने लग।
उस समय नाना प्रकार के सर्प ऋषियों को बाधक होते थे। अधिकांश
ऋषि मर जाते। तपस्वियों ने बोधिसत्त्व से यह बात कही। बोधिसत्त्व ने
सभी तपस्वियों को इकट्ठा कर कहा—"यदि तुम चारो सर्पराज-कुलो के
¹ जन्ताघर, जिसमें आग जलाकर स्वेद-स्नान लेते थे।
३१४ [ २.६.२०३
प्रति मैत्री भावना करो, तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे। अब से चारो सर्पराज-कुलों
के बारे में इस प्रकार मैत्री भावना करो।"
इतना कह यह गाथा कही—
विरूपक्खेहि मे मेत्तं मेत्तं एरापथेहि मे,
छब्यापुत्तेहि मे मेत्तं मेत्तं कण्हागोतमकेहि च ॥
[ विरूपक्खो के प्रति मे मैत्री-भाव रखता हूँ; एरापथों के प्रति भी मेरी
मैत्री है। छब्यापुत्रो के प्रति मेरी मैत्री है और मैत्री है कण्हागोतमो के
प्रति ] .
विरूपक्खेहि मे मेत्तं, विरूपक्ख नागराज-कुल के प्रति मेरा मैत्री-भाव
है। एरापथ आदि में भी इसी प्रकार। यह एरापथ नागराज-कुल, छब्यापुत्त
नागराजकुल और कण्हागोतम नगराज-कुल भी नागराज-कुल ही हैं।
इस प्रकार चार नागराज-कुल दिखाकर कहा कि यदि तुम इनके प्रति
मैत्री-भावना कर सको तो तुम्हें सर्प नहीं डसेंगे, कष्ट नहीं देंगे।, इतना कह
दूसरी गाथा कही—
अपादकेहि मे मेत्तं मेत्तं दिपादकेहि मे,
चतुप्पदेहि मे मेत्तं मेत्तं बहुप्पदेहि मे ॥
[ जिनके पैर नहीं हैं उनसे मेरी मैत्री है, जिनके दो पैर हैं उनसे मेरी मैत्री
है, जिनके चार पैर हैं उनसे मेरी मैत्री है और जिनके अनेक पैर है उनसे मेरी
मैत्री है।]
पहले पद से विशेष रूप से सभी पैर-रहित सर्पों तथा मछलियो के प्रति
मैत्री-भावना कही गई। दूसरे पद से मनुष्यो तथा पक्षियो के प्रति। तीसरे
से हाथी घोड़े आदि सभी चतुष्पदों के प्रति। चौथे पद से बिच्छु, गूजर, कीडे
मकोड़े, मकडी आदि के प्रति।
४ खन्धवत्त ] ३१५
इस प्रकार मैत्री-भावना का क्रम बता अब प्रार्थना-क्रम कहते हुए यह
गाथा कही—
मा मं अपादको हिंसि मा मं हिंसि दिपादको,
मा मं चतुप्पदो हिंसि मा म हिंसि बहुप्पदो ॥
[ जो पैर-रहित है वे मेरी हिंसा न करे, जो द्विपद हैं वे मेरी हिंसा न करें,
जो चतुष्पद हैं वे मेरी हिंसा न करें और जो अनेक पैर वाले हैं वे भी मेरी हिंसा
न करें । ]
मा मं इस प्रकार 'उन पैर-रहित आदि में कोई एक भी मेरी हिंसा न करे
मुझे कष्ट न दे' प्रार्थना करते हुए मैत्री-भावना करो—यही अर्थ है।
अब सामान्य रूप से भावना-क्रम प्रकट करते हुए यह गाथा कही—
सब्बे सत्ता सब्बे पाणा सब्बे भूता च केवला,
सब्बे भद्रानि पस्सन्तु मा कञ्चि पापमागमा ॥
[ सभी सत्त्व, सभी प्राणी, सारे के सारे जीव; सभी का कल्याण हो।
किसी को दुख न हो।]
तृष्णा-दृष्टि के कारण ससार में, पाँच स्कन्धो में आसक्त, विशेष आसक्त
होने से सत्ता (सक्ता) । स्वास प्रश्वास कहलाने वाले प्राण के कारण प्राणी ।
भूत(=जीवित) भावित (जीने वालो) का जन्म होने से भूता। इस प्रकार
जानना चाहिए कि वचन-मात्र की ही विशेषता है। सामान्य तौर पर इन सभी
पदो का अर्थ सभी प्राणी ही है। केवला सकल, यह सर्व शब्द का ही पर्याय-
वाची है। भद्रानि पस्सन्तु, यह सभी प्राणी कल्याण को ही प्राप्त हो ।
मा कञ्चि पापमागमा, इनमें से किसी एक भी प्राणी को दुख न हो। सभी
वैर-रहित ओघ-रहित, सुखी तथा दुख-रहित हो ।
इस प्रकार सामान्य रूप से सभी प्राणियो के प्रति मैत्री-भावना की बात
कह तीनो रत्नो के गुणो की याद दिलाने के लिए कहा—
, ३१६ [ २.६.२०३
अप्पमाणो बुद्धो अप्पमाणो धम्मो अप्पमाणो सङ्घो।
सीमित (प्रमाण-सहित) विकारो का अभाव होने से और गुण असीम
(अप्रमाण) होने से बुद्ध रत्न असीम (अप्रमाण) है, धर्म, नौ प्रकार¹ का
लोकोत्तर धर्म; उसकी भी सीमा नहीं की जा सकती इसलिए असीम (अप्रमाण)।
उस असीम (अप्रमाण) धर्म से युक्त होने के कारण सङ्घ भी असीम (अप्रमाण)।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उन तीनो रत्नो के गुणो को स्मरण करने के लिए
कह तथा उन तीन रत्नो के गुणो का असीम होना दिखा सीमित प्राणियो के
बारे में बोले—
पमाणवन्तानि सिरिसपानि अहिविच्छिका,
सतपदी उण्णनाभि सरबूमूसिका ।
[ रेंगने वाले, सर्प, विच्छू, गूजर, मकड़ी तथा छिपकली—यह सब सीमा
वाले हैं।]
सिरिसपा, सब दीर्घाकार प्राणियो का यह नाम है। वे सरक कर चलते
हैं, वा सिर से चलते हैं, इसीलिए सिरिसपा। अहि आदि उनके स्वरूप का
वर्णन किया गया है। तत्थ उण्णनाभि मकड़ी, उसकी नाभि से ऊन सदृश
सूत निकलता है, इसलिए उण्णनाभि कहलाती है। सरबू, छिपकली।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने 'क्योकि इनके अन्दर जो रागादि है वह सीमा
वाले धर्म हैं, इसलिए ये सिरिसप आदि सीमा वाले हैं दिखा तीनो असीम
रत्नो के प्रताप से यह सीमा वाले रात दिन रक्षा करे' कह तीनो रत्नो
के गुणो का अनुस्मरण करने को कहा। उसके आगे जो कर्तव्य है वह बताने
के लिए यह गाथा कही—
¹ चार मार्ग, चार फल तथा निर्वाण।
खन्धवत्त ] ३१७.
कता मे रक्खा कता मे परित्ता,
पटिक्कमन्तु भूतानि सोहं नमो भगवतो;
नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं ॥
[ मैने अपनी हिफाजत कर ली; मैने अपना परित्राण कर लिया। (हानि-
कर) जीव दूर हों। मै भगवान् (बुद्ध) को और सात सम्यक् सम्बुद्धो१ को
प्रणाम करता हूँ । ]
कता मे रक्खा, रत्नत्रय का गुणानुस्मरण कर मैने अपनी रक्षा, हिफा-
जत कर ली। कता मे परित्ता मैने अपना परित्राण भी कर लिया। पटिक्कमन्तु
भूतानि, मेरा अहित चिन्तन करने वाले प्राणी चले जाएँ, दूर हों। सोहं नमो
भगवतो, सो मै इस प्रकार अपनी रक्षा कर पूर्व के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए
बुद्ध भगवान् को नमस्कार करता हूँ। नमो सत्तन्न सम्मासम्बुद्धानं, विशेष
रूप से अतीत के क्रम से परिनिर्वाण को प्राप्त हुए सात बुद्धो को नमस्कार
करता हूँ ।
इस प्रकार नमस्कार करते हुए भी सात बुद्धो का अनुस्मरण करो, (करके)
बोधिसत्त्व ने ऋषिगण को यह परित्राण-धर्मदेशना रच कर दी।
आरम्भ में दो गाथाओ द्वारा चारो सर्पराज कुलो में मैत्री-भावना प्रकट
की होने से, विशेष रूप से तथा सामान्य रूप से दोनो मैत्री-भावनाएँ प्रकट की
होने से, यह परित्राण धर्मदेशना यहाँ दी गई है। और कारण खोजना चाहिए।
उस समय से ऋषियो का समूह बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल मैत्री-
भावना करने लगा। बुद्ध के गुणो का स्मरण करने लगा। इस प्रकार उनके
बुद्ध-गुणो का स्मरण करने ही पर सब सांप चले गए। बोधिसत्त्व भी ब्रह्म-
विहारो की भावना कर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल वैठाया। उस समय
ऋषि-गण बुद्ध परिषद थी। गण का शास्ता तो मै ही था।
१ देखो महापदान सूत्र (दीर्घनिकाय) ।
२०४. वीरक जातक
. ३१८ [ २.६.२०४
२०४. वीरक जातक
“अपि वीरक पस्सेसि....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
बुद्ध का रग-ढंग बनाने के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
देवदत्त की परिषद लेकर स्थविरो के लौट आने पर शास्ता ने पूछा—
सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?
“भन्ते ! सुगत का रग-ढंग बनाया।”
“सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त
हुआ। पहले भी प्राप्त हुआ है।”
स्थविरो के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हिमालय प्रदेश में जल-कौए की योनि में पैदा हो एक तालाब के पास रहते
थे। उसका नाम था वीरक।
उस समय काशी देश में अकाल पड़ा। मनुष्य कौओ को भोजन देने या
यक्ष-भाग बलिकर्म करने में असमर्थ हो गए। अकाल-पीड़ित प्रदेश से अधिकांश
कौवे जगल चले गए। वाराणसी वासी सविट्ठक नाम का एक कौआ अपनी
कौवी को ले वीरक के निवासस्थान पर जा, उस तालाब के पास एक ओर रहने
लगा।
एक दिन उसने उस तालाब में शिकार खोजते हुए वीरक को तालाब में
वीरक ] ४१६
उतर, मछलियाँ खा, बाहर निकल शरीर को सुखाते देख सोचा-इस कौवे
के आश्रय से मुझे बहुत मछलियाँ मिल सकती हैं। इसकी सेवा करूँ।
यह कौवे के पास गया। कौवे ने पूछा-
"सौम्य क्यो ?"
"स्वामी ! तुम्हारी सेवा में रहना चाहता हूँ।"
उसके 'अच्छा' कह स्वीकार करने पर उस समय से सेवा करने लगा।
तब से वीरक भी अपने गुज़ारे लायक खा मछलियाँ निकाल कर सविट्ठक को
देता। वह भी अपने गुज़ारे लायक खा बाकी कौवी को देता।
आगे चलकर उसको अभिमान हो गया। वह सोचने लगा-यह जल-
कौवा भी काला है। मैं भी काला हूँ। मेरे और इसके आँख, चोंच तथा पैरो
में भी कोई भेद नही है। अब से इसकी पकड़ी हुई मछलियो से मुझे सरोकार
नही। मैं स्वयं पकडूंगा। बोला- 'सौम्य ! अब से मैं स्वयं तालाब में उतर
कर मछलियाँ पकडूँगा।' वीरक ने मना किया-तू पानी में उतर मछलियाँ
पकडने वाले कुल में पैदा नही हुआ। तू अभिमान करता है। वह वीरक की
बात न मान तालाब में उतरा। पानी में प्रवेश कर ऊपर आते समय काई को
छेद कर बाहर नही निकल सका। काई में ही फँस गया। केवल चोंच का अगला
भाग दिखाई दिया। वह साँस घुट कर पानी के अन्दर ही मर गया।
उसकी भार्या ने जब उसे आता न देखा तो वह उसका समाचार जानने
के लिए वीरक के पास गई। उसने 'स्वामी ! सविट्ठक दिखाई नही देता।
इस समय वह कहाँ है ?' पूछते हुए पहली गाथा कही-
अपि वीरक पस्सेसि सकुण मञ्जुभाणक,
मयूरगीवसङ्कास पतिं मह सविट्ठकं ॥
[ वीरक ! क्या मधुरभाषी, मोर पक्षी की सी गर्दन वाले मेरे पति सविट्ठक
को देखते हो ? ]
अपि वीरक पस्सेसि स्वामी ! वीरक भी दिखाई देता है ? मञ्जुभाणक,
सुन्दर भाषी, वह राग के कारण अपने पति को मधुरभाषी समझती है।
इसलिए ऐसा कहा। मयूरगीवसङ्कास, मोर की गर्दन के समान वर्ण वाला।
३२० [ २.६.२०५
यह सुन वीरक ने 'हाँ, मै जानता हूँ कि तेरा स्वामी कहाँ गया है' कह दूसरी
गाथा कही—
उदकथलचरस्स पक्खिनो निच्चं आमकमच्छभोजिनो,
तस्सानुकरं सविट्ठको सेवाले पळिगुण्ठितो मतो ॥
[ सविट्ठक जल और स्थल पर चलने वाले, नित्य कच्ची मछली खाने वाले,
पक्षी की नकल करने जाकर काई में फँस कर मर गया । ]
उदकथलचरस्स, जो जल और स्थल में चलने में समर्थ है। पक्खिनो,
अपने सम्बंध में कहता है। तस्सानुकरं उसकी नकल करता हुआ। पळि-
गुण्ठितो मतो, पानी में घुस काई को छेद कर बाहर न निकल सकने के कारण
काई में उलझ कर पानी के अन्दर ही मर गया। देख, उसकी चोच दिखाई
देती है।
इसे सुन कौवी रो पीट कर वाराणसी ही चली गई।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। तब सविट्ठक
देवदत्त था। वीरक मैं ही था।
२०५. गङ्गेय्य जातक
"सोभति मच्छो गङ्गेय्यो..." यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय दो तरुण भिक्षुओं के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
वे दो श्रावस्ती वासी कुलपुत्र बुद्ध-शासन में प्रव्रजित हो अशुभ-भावना में
न लग रूप के प्रशंसक हो, रूप को ही प्यार करते हुए घूमते थे। एक दिन उन
गङ्गेय्य ] ३२१
दोनो में रूप को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ । एक ने कहा—'मैं शोभा देता
हूँ। दूसरे ने कहा—तू नही शोभा देता, मे शोभा देता हूँ। कुछ ही दूर पर
एक वृद्ध स्थविर को बैठे देख उन्होने सोचा—यह जानेंगे। हम में से कौन
शोभनीय है, कौन नही ? उन्होने पास जाकर पूछा—हम में से कौन सुन्दर
है ? स्थविर ने उत्तर दिया—तुम दोनो से में ही सुन्दर हूँ।
तरुण भिक्षुओ ने कहा, यह बूढ़ा जो हम पूछते हैं वह न बता जो नही
पूछते हैं वही कहता हैं। वे उसकी निन्दा कर चले गए।
उनकी यह करतूत भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई। एक दिन धर्मसभा में बात-
चीत चली—आयुष्मानो, वृद्ध स्थविर ने उन रूप-प्रिय तरुण भिक्षुओ को लज्जित
कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत
कर रहे हो ? "यह बातचीत" कहने पर "भिक्षुओ, यह दो तरुण केवल अभी
रूप प्रशसक नही हैं, यह पहले भी रूप को ही प्यार करते हुए विचरते थे"
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गङ्गा के किनारे वृक्ष-देवता थे। उस समय गङ्गा-यमुना के सङ्गम पर गङ्गेय्य
और यामुनेय्य नाम की दो मछलियाँ थीं। वे आपस में विवाद करने लगीं—
मे शोभा देती हूँ, तू नही शोभती। इस प्रकार रूप के बारे में विवाद करते हुए
उन्होने थोडी दूर पर गङ्गा के किनारे पड़े एक कछुए को देखकर सोचा—,
यह जानेगा कि हम में कौन सुन्दर है ? कौन असुन्दर ? उसके पास जाकर
उन्होने पूछा—सोम्य ! गङ्गेय्य सुन्दर है ? अथवा यामुनेय्य ?।
कछुए ने कहा—गङ्गेय्य भी सुन्दर है, यामुनेय्य भी सुन्दर है, लेकिन
में तुम दोनो से अधिक सुंदर हूँ।
इस बात को प्रकट करते हुए उसने पहली गाथा कही—
सोभति मच्छो गङ्गेय्यो अथो सोभति यामुनो,
अनुपदप कुरिसो निग्रोधपरिमण्डलो;
ईसायतगीवो च सब्बेव अतिरोचति ॥
२१
३२२ [ २.६.२०५
[ गङ्गेय्य मछली शोभा देती है, यामुनेय्य भी शोभा देती है; लेकिन यह
चार पैरों वाला, बट-वृक्ष की तरह गोलाकार, गाड़ी की बल्ली की तरह लम्बी
गर्दन वाला (पुरुष) सब से अधिक सुन्दर है।]
चतुप्पदायं, यह चतुष्पाद पुरिसो अपने बारे में कहता है। निग्रोध परि-
मण्डलो, अच्छी तरह उलझा न्यग्रोध वृक्ष की तरह गोलाकार। ईसाकामतगीवो
रथ की धड़ की तरह लम्बी वल्ली वाला। सम्बेव अतिरोचति इस प्रकार
के आकार वाला कछुवा सबसे बढ़कर सुन्दर है, तुम दोनों से बढ़कर शोभा
देता है।
मछलियों ने उसकी बात सुन 'अरे पापी कछुए ! हमारी पूछी बात का
उत्तर न दे, दूसरी ही कहता है' यह दूसरी गाथा कही—
यं पुच्छितो न तं अक्खा अञ्ञं अक्खासि पुच्छितो,
अत्तप्पसंसको पोसो नायं अस्माक रुच्चति ॥
[ जो पूछा है वह नहीं कहता; पूछने पर दूसरी बात कहता है। यह
अपनी ही प्रशंसा करने वाला पुरुष हमें अच्छा नहीं लगता।]
अत्तप्पसंसको, अपनी प्रशंसा करने वाला, अपनी बड़ाई करने वाला पुरुष।
नायं अस्माक रुच्चति, यह पापी कछुवा हमें अच्छा नहीं लगता, रुचिकर नहीं
है। वे कछुए के ऊपर पानी फेंक अपने निवासस्थान को गईं।
२०६. कुरुङ्गमृग जातक
दङ्गमृग ] ३२३
२०६. कुरुङ्गमृग जातक
“इधं वद्धमय पाश ..” यह शास्ता ने वेळुवन मे विहार करते समय
देवदत्त के सम्बन्ध में कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय यह सुनकर कि देवदत्त वध के लिए प्रयत्न करता है शास्ता
ने कहा, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्नशील है, उसने
पहले भी कोशिश की है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कुरुङ्ग मृग की योनि में पैदा हो जगल म एक तालाब के पास एक झाडी में
रहता था। उसी तालाब के नजदीक वृक्ष पर एक कठफोड़ा¹ और तालाब
में कछुआ रहता था। वे तीनो परस्पर प्रेम से रहते।
एक शिकारी जगल में घूमते हुए पानी पीने के स्थान पर बोधिसत्त्व के
पैरो का चिन्ह देख लोहे की जजीर सदृश पट्ठे का जाल लगा कर गया।
बोधिसत्त्व पानी पीने आकर (रात्रि के) पहले पहर में ही फँस गए,
तब फँस जाने की आवाज की। उसकी आवाज सुन वृक्ष शाखा पर से कठफोडा
और पानी में से कछुआ आया।, उन्होने सलाह की—क्या किया जाए ?
कठफोड ने कछुवे को सम्बोधन कर कहा—मित्र ! तेरे दांत है। तू जाल को
¹ कठफोडा = शतपत्र ।
३२२ [ २.६.२०५
[ गङ्गेय्य मछली शोभा देती है, यामुनेय्य भी शोभा देती है, लेकिन यह
चार पैरो वाला, बड-वृक्ष की तरह गोलाकार, गाडी की बल्ली की तरह लम्बी
गर्दन वाला (पुरुष) सब से अधिक सुन्दर है।]
चतुप्पदायं, यह चतुष्पाद पुरिसो अपने बारे में कहता है। निग्रोध परि-
मण्डलो, अच्छी तरह उत्पन्न न्यग्रोध वृक्ष की तरह गोलाकार। ईसकायतगीवो
रथ की छड की तरह लम्बी बल्ली वाला। सब्बेव अतिरोचति इस प्रकार
के आकार वाला कछुआ सबसे बढकर सुन्दर है, तुम दोनो से बढकर शोभा
देता है।
मछलियो ने उसकी बात सुन 'अरे पापी कछुए ! हमारी पूछी बात का
उत्तर न दे, दूसरी ही कहता है' कह दूसरी गाथा कही—
यं पुच्छितो न तं अक्खा अञ्ञं अक्खासि पुच्छितो,
अत्तप्पसंसको पोसो नायं अस्माक रुच्चति ॥
[ जो पूछा है वह नही कहता; पूछने पर दूसरी बात कहता है। यह
अपनी ही प्रशसा करने वाला पुरुष हमें अच्छा नही लगता।]
अत्तप्पसंसको, अपनी प्रशसा करने वाला, अपनी बडाई करने वाला पुरुष।
नायं अस्माक रुच्चति, यह पापी कछुआ हमें अच्छा नही लगता, रुचिकर नही
है। वे कछुए के ऊपर पानी फेंक अपने निवासस्थान को गईं।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय दो
मछलियाँ तरुण भिक्षु थे। कच्छप बूढ़ा था। इस बात को प्रत्यक्ष करने वाला
गङ्गा-तट पर पैदा हुआ वृक्ष-देवता मैं ही था।
२०६. कुरुङ्गमृग जातक
־ कुरुङ्गमृग ] ३२३
२०६. कुरुङ्गमृग जातक
"इङ्घं वद्धमयं पासं .." यह शास्ता ने वेळुवन में विहार करते समय
देवदत्त के सम्बन्ध मे कही।
क. वर्तमान कथा
उस समय यह सुनकर कि देवदत्त वध के लिए प्रयत्न करता है शास्ता
ने कहा, 'भिक्षुओ, न केवल अभी देवदत्त मेरे वध के लिए प्रयत्नशील है, उसने
पहले भी कोशिश की है।' इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल मे वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
कुरुङ्ग मृग की योनि मे पैदा हो जगल में एक तालाब के पास एक झाडी में
रहता था। उसी तालाब के नजदीक वृक्ष पर एक कठफोडा¹ और तालाब
मे कछुआ रहता था। वे तीनो परस्पर प्रेम से रहते।
एक शिकारी जगल में घूमते हुए पानी पीने के स्थान पर बोधिसत्त्व के
पैरो का चिन्ह देख लोहे की जजीर सदृश फंदे वा जाल लगा कर गया।
बोधिसत्त्व पानी पीने आकर (रात्रि के) पहले पहर में ही फँस गए,
तब फँस जाने की आवाज की। उसकी आवाज सुन वृक्ष-शाखा पर से कठफोडा
और पानी मे से कछुआ आया। उन्होने सलाह की—क्या किया जाए?
कठफोडे ने कछुवे को सम्बोधन कर कहा—मित्र ! तेरे दांत है। तू जाल को
¹ कठफोडा=शतपत्र ।
३२४ [ २.६.२०६
काट। में जाकर ऐसा करूँगा जिसमे वह आने न पाएँ। इस प्रकार हम दोनो
के प्रयत्न से हमारे मित्र की जान बचेगी।
इस बात को प्रकट करते हुए यह गाथा कही—
इदं वढमयं पासं छिन्द दन्तेहि कच्छप
अहं तया करिस्सामि यथा नेहिति लुद्दको ॥
[देख कछुए ! तू दांतो से चमडे के जाल को काट। मैं ऐसा करूँगा जिससे
शिकारी आने न पावे ।]
कछुए ने चमडे की डोरी खानी शुरू की। कठफोडा शिकारी के घर गया।
शिकारी प्रात काल ही शक्ति लेकर निकला। पक्षी ने यह जान कि वह घर
से निकल रहा हूँ आवाज कर, परो को फडफडा कर आगे के द्वार से निकलते
हुए उसके मुंह पर चोट की। शिकारी ने सोचा—मनहूस पक्षी ने मुझ पर
प्रहार किया।
वह रुका, थोडी देर लेट फिर शक्ति लेकर उठा। 'पहले यह आगे के
द्वार से निकला, अब पीछे के द्वार से निकलेगा' सोच पक्षी जाकर घर के पीछे
की ओर बैठा। शिकारी ने भी यह सोचा—आगे के द्वार से निकलते समय
मैने मनहूस पक्षी देखा अब पिछले द्वार से निकलूंगा। वह पीछे के द्वार से
निकला। पक्षी ने फिर जाकर आवाज लगा मुंह पर चोट की। शिकारी ने
कहा—फिर मुझ पर मनहूस पक्षी ने चोट की। यह मुझे निकलने नही देता।
वह रुका, अरुणोदय तक लेटा रहा; फिर अरुणोदय होने पर शक्ति लेकर
निकला।
पक्षी ने जल्दी से जाकर बोधिसत्त्व को सूचना दी कि शिकारी आ रहा है।
उस समय तक कछुए ने एक को छोड शेष सभी डोरियाँ काट डाली थी। उसके
दांत गिरने वाले हो गए थे, मुंह लोहू से लाल हो गया था। बोधिसत्त्व शिकारी
को शक्ति लिए बिजली की तेजी से आता देख बन्धन तोड वन में जा
घुसा। पक्षी वृक्ष-शाखा पर जा बैठा। कछुआ दुर्बलता के कारण वहीं पड़ा
रहा। शिकारी ने कछुए को एक थैली में डाल किसी ठूंट पर रख दिया।
बोधिसत्त्व ने मुड कर देखा तो पता लगा कि कछुआ पकड़ा गया। उसने
सोचा—मित्र की जान बचाऊँगा। तब उसने अपने आपको शिकारी को ऐसे
कुरुङ्गमिग ] ३२५
दिखाया जैसे बहुत दुर्बल हो गया हो। शिकारी ने सोचा—यह (घोर)
दुर्बल होगा; इसे मारूँगा। उसने शक्ति ले बोधिसत्त्व का पीछा किया।
बोधिसत्त्व न बहुत दूर, न बहुत नजदीक चलते हुए उसे ले जंगल में गए।
जब जाना कि दूर निकल आए तब मुड़ कर दूसरे रास्ते से हवा की तेजी से जा,
सींग से थैली उठा, जमीन पर गिरा, फाड़ कर कछुए को बाहर निकाला।
कठफोडा भी वृक्ष पर से उतरा। बोधिसत्त्व ने दोनो को उपदेश देते हुए कहा—
तुम्हारी सहायता से मेरे प्राण बचे। मैने भी तुम्हारे प्रति मित्र का कर्तव्य
पालन किया। अब वही शिकारी आकर तुम्हे पकड़ न ले, इसलिए मित्र कठ-
फोडे, तू अपने पुत्रो को ले दूसरी जगह चला जा, और मित्र कछुए तू पानी
में जा।
उन्होने वैसा किया। शास्ता ने बुद्ध होने पर दूसरी गाथा कही—
कच्छपो पाविसि वारिं कुरुङ्गो पाविसि वनं
सतपत्तो दुमग्गम्हा दूरे पुत्ते अपानयि ॥
[ कछुआ पानी में जा घुसा। कुरुङ्ग वन में चला गया। कठफोड़ा वृक्ष-
शाखा पर से अपने पुत्रो को दूर ले गया।]
अपानयि, अपनयि अर्थात् लेकर चला गया।
शिकारी वहाँ आ किसीको न देख फटी थैली ले दुःखी चित्त से अपने घर
गया। वे भी तीनो मित्र जीवन भर विश्वास बनाए रखकर यथाकर्म गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय शिकारी देवदत्त था। कठफोडा सारिपुत्र। कछुआ मोग्गल्लान।
कुरुङ्ग मृग तो मैं ही था।
२०७. अस्सक जातक
३२६ [ २.६.२०७
२०७. अस्सक जातक
“अयमसस्सकराजेन....” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
पूर्व भार्य्या के प्रलोभन के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
शास्ता ने उस भिक्षु से पूछा—क्या तू सचमुच उत्कण्ठित है ?
“हाँ, सचमुच ।”
“किसने उत्कण्ठित किया ?”
“पूर्व-भार्य्या ने ।”
शास्ता ने कहा—भिक्षु, उस स्त्री का तेरे प्रति स्नेह नहीं है। पहले भी
तू उसके कारण महान् दुख भोग चुका है।
इतना कह पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में काशी राष्ट्र के पोतली¹ नाम के नगर में अस्सक नामक
राजा राज्य करता था। उसकी उब्बरी नाम की पटरानी थी। वह प्रिया थी,
मनोज्ञ थी, सुन्दर थी, दर्शनीय थी और थी मानुषिक और दिव्य-वर्ण के बीच
के वर्ण की। यह मर गई। उसकी मृत्यु से राजा शोकाभिभूत हुआ। उसे
दुख हुआ और वह दौर्मनस्य को प्राप्त हुआ। उसने रानी का शरीर द्रोणी में,
तेल की काई में रखवा उसे अपनी चारपाई के नीचे रखवाया। फिर स्वयं
बिना कुछ खाए पीए रोता पीटता हुआ चारपाई पर पड रहा।
¹ ‘पोतल’ भी पाठ है।
अरुसक ] ३२७
माता-पिता, अन्य नातेदार, मित्र अमात्य तथा ब्राह्मण गृहपति आदि
“महाराज ! सस्कार अनित्य है . ” कहते हुए उसे होश में न ला सके।
उसके रोते पीटते ही सात दिन बीत गए।
उस समय पाँच अभिज्ञा तथा आठ समापत्तियो के लाभी, तपस्वी होकर
हिमवन्त प्रदेश में विचरते हुए बोधिसत्त्व ने प्रकाश फैला दिव्य चक्षु से जम्बु
द्वीप को देखते हुए उस राजा को उस प्रकार रोते देखा। 'मुझे इसकी सहायता
करनी चाहिए' सोच ऋद्विबल से आकाश में उड राजा के बाग में उतर मङ्गल
शिला-पट पर सोने की प्रतिमा की तरह बैठे।
पोतली नगर वासी एक ब्राह्मण-माणवक उद्यान में जा बोधिसत्त्व को देख
प्रणाम करके बैठा।
बोधिसत्त्व ने उससे बातचीत कर पूछा—माणवक ! क्या राजा धार्मिक
हैं ?
“भन्ते ! हाँ राजा धार्मिक हैं। लेकिन उसकी भार्या मर गई हैं। वह
उसके शरीर को द्रोणी मे रखवा रोता पीटता लेटा है। आज उसे सातवाँ दिन
हो गया। तुम राजा को इस प्रकार के दुख से क्यो मुक्त नही करते ? क्या
यह ठीक है कि तुम्हारे जैसे शीलवान् के रहते राजा इस प्रकार का दुख अनु-
भव करे ?”
'माणवक ! में राजा को नही जानता। लेकिन यदि वह आकर मुझे
पूछे तो मैं उसे उसकी भार्या का जन्म ग्रहण करने का स्थान बताकर, राजा
के सामने ही उससे बातचीत करवाऊँ।"
“भन्ते ! तो में जब तक राजा को लेकर आऊँ तब तक आप यही बैठें।"
माणवक ने बोधिसत्त्व से बचन ले राजा के पास जा यह बात सुनाकर
कहा—उस दिव्य-चक्षुधारी के पास चलना चाहिए।
राजा यह सोच कि उब्बरी को देख सकूँगा सन्तुष्ट हो रथ पर चढ वहाँ
गया। बोधिसत्त्व को प्रणाम कर उसने पूछा—क्या तुम सचमुच देवी के जन्म
ग्रहण करने की जगह जानते हो ?
“महाराज ! हाँ।”
“वह कहाँ पैदा हुई हैं ?”
“महाराज ! उसने रूप मे मत्त होने के कारण, प्रमादवश कोई अच्छा
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काम नहीं किया। इसलिए वह इसी उद्यान में गोबर के कीड़े की योनि
में पैदा हुई।"
“मैं विश्वास नहीं करता।”
“तो तुझे दिखा कर उससे कहलवाता हूँ।”
“अच्छा, कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से ऐसा किया कि दो गोबर-पिण्ड लुढ़कते हुए
राजा के सामने आएँ। वे चले आए। बोधिसत्त्व ने उसे दिखाते हुए कहा—
महाराज ! यह तेरी उब्ब्री देवी तुझे छोड़ गोबर के कीड़े के पीछे पीछे आती
है। उसे देखें।
“भन्ते ! मैं विश्वास नहीं करता कि उम्बरी गोबर के कीड़े की योनि में
जन्म ग्रहण करेगी।”
“महाराज ! उससे कहलवाता हूँ।”
“भन्ते ! कहलवाएँ।”
बोधिसत्त्व ने अपने प्रताप से उसे बुलवाते हुए पूछा—उब्ब्री ! उसने
मानुषी वाणी में कहा—हाँ भन्ते ! क्या ?
“पूर्व-जन्म में तेरा क्या नाम था ?”
“भन्ते ! मैं अस्सक राजा की उब्ब्री नाम की पटरानी थी।”
“इस समय तुझे अस्सक राजा प्रिय हैं या गोबर का कीड़ा।”
“भन्ते ! वह मेरा पूर्व-जन्म था; उस समय मैं उसके साथ इस बाग़ में
रूप, शब्द, गन्ध, रस तथा स्पर्श का आनन्द लेती हुई विचरती थी। लेकिन
अब जब से मेरा नया जन्म हुआ है, वह मेरा क्या लगता है ? मैं अब अस्सक
राजा को मार कर उसकी गर्दन के खून से अपने स्वामी गोबर के कीड़े के पैरों
को धो सकती हूँ।”
यह कह परिषद् के बीच में आदमियों की भाषा में उसने यह गाथाएँ
कही—
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया,
अनुकामनुकामेन पियेन पतिना सह ॥
नवेन, सुखदुक्खेन, पोरणं, अपिथीयति.,
तस्मा अस्सकरञ्ञाव कीटो पियतरो ममं ॥
अस्सक ] ३२६
[परस्पर एक दूसरे की कामना करते हुए अपने प्रिय पति इस अस्सक
राजा के साथ मैंने इस प्रदेश में विचरण किया। नए सुख दुःख से पुराना सुख
दुःख ढक जाता है। इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा यह कीड़ा ही मेरा
अधिक प्रिय है।]
अयमस्सकराजेन देसो विचरितो मया इस रमणीय उद्यान प्रदेश में पहले
मैंने अस्सक राजा के साथ विचरण किया। अनुकामयानुक़ामेन; अनु निपात
मात्र है। मैं उसकी कामना करती, वह मेरी कामना करता। इस प्रकार
परस्पर कामना करते हुए के साथ। पियेन उस जन्म में प्रिय।
नयेन सुखदुक्खेन पोराणं अपिधीयति, भन्ते ! नए सुख से पुराना सुख
नए दुःख से पुराना दुःख ढक जाता है। यही लोक-स्वभाव है—प्रगट करती
है। तस्मा अस्सकरञ्ञाय कीटो पियतरो मम; क्योंकि नवीन से पुराना ढक
जाता है इसलिए अस्सक राजा की अपेक्षा कीड़ा मुझे सौ गुणा प्रिय है।
इसे सुन अस्सक राजा को पश्चात्ताप हुआ। उसने वहाँ खड़े ही सड़े
लाश निकलवा सिर से स्नान कर बोधिसत्व को प्रणाम किया। फिर नगर
में प्रवेश कर दूसरी पटरानी बना धर्म से राज्य करने लगा।
बोधिसत्त्व भी राजा को उपदेश दे शोक-रहित कर हिमवन्त चले गए।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला सत्यों को प्रकाशित कर जातक का मेल
बैठाया। सत्यों के अन्त में उत्कण्ठित (भिक्षु) सोतापत्ति फल में प्रतिष्ठित
हुआ।
• उस समय उव्वरी पूर्व-भार्य्या थी। अस्सक राजा उत्कण्ठित भिक्षु था।
माणवक सारिपुत्र। तपस्वी तो मैं ही था। *