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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 336, कुल 479 में से

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पृष्ठ 336

वीरक ] ४१६
उतर, मछलियाँ खा, बाहर निकल शरीर को सुखाते देख सोचा-इस कौवे
के आश्रय से मुझे बहुत मछलियाँ मिल सकती हैं। इसकी सेवा करूँ।
यह कौवे के पास गया। कौवे ने पूछा-
"सौम्य क्यो ?"
"स्वामी ! तुम्हारी सेवा में रहना चाहता हूँ।"
उसके 'अच्छा' कह स्वीकार करने पर उस समय से सेवा करने लगा।
तब से वीरक भी अपने गुज़ारे लायक खा मछलियाँ निकाल कर सविट्ठक को
देता। वह भी अपने गुज़ारे लायक खा बाकी कौवी को देता।
आगे चलकर उसको अभिमान हो गया। वह सोचने लगा-यह जल-
कौवा भी काला है। मैं भी काला हूँ। मेरे और इसके आँख, चोंच तथा पैरो
में भी कोई भेद नही है। अब से इसकी पकड़ी हुई मछलियो से मुझे सरोकार
नही। मैं स्वयं पकडूंगा। बोला- 'सौम्य ! अब से मैं स्वयं तालाब में उतर
कर मछलियाँ पकडूँगा।' वीरक ने मना किया-तू पानी में उतर मछलियाँ
पकडने वाले कुल में पैदा नही हुआ। तू अभिमान करता है। वह वीरक की
बात न मान तालाब में उतरा। पानी में प्रवेश कर ऊपर आते समय काई को
छेद कर बाहर नही निकल सका। काई में ही फँस गया। केवल चोंच का अगला
भाग दिखाई दिया। वह साँस घुट कर पानी के अन्दर ही मर गया।
उसकी भार्या ने जब उसे आता न देखा तो वह उसका समाचार जानने
के लिए वीरक के पास गई। उसने 'स्वामी ! सविट्ठक दिखाई नही देता।
इस समय वह कहाँ है ?' पूछते हुए पहली गाथा कही-
अपि वीरक पस्सेसि सकुण मञ्जुभाणक,
मयूरगीवसङ्कास पतिं मह सविट्ठकं ॥
[ वीरक ! क्या मधुरभाषी, मोर पक्षी की सी गर्दन वाले मेरे पति सविट्ठक
को देखते हो ? ]
अपि वीरक पस्सेसि स्वामी ! वीरक भी दिखाई देता है ? मञ्जुभाणक,
सुन्दर भाषी, वह राग के कारण अपने पति को मधुरभाषी समझती है।
इसलिए ऐसा कहा। मयूरगीवसङ्कास, मोर की गर्दन के समान वर्ण वाला।