जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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इस प्रकार मैत्री-भावना का क्रम बता अब प्रार्थना-क्रम कहते हुए यह
गाथा कही—
मा मं अपादको हिंसि मा मं हिंसि दिपादको,
मा मं चतुप्पदो हिंसि मा म हिंसि बहुप्पदो ॥
[ जो पैर-रहित है वे मेरी हिंसा न करे, जो द्विपद हैं वे मेरी हिंसा न करें,
जो चतुष्पद हैं वे मेरी हिंसा न करें और जो अनेक पैर वाले हैं वे भी मेरी हिंसा
न करें । ]
मा मं इस प्रकार 'उन पैर-रहित आदि में कोई एक भी मेरी हिंसा न करे
मुझे कष्ट न दे' प्रार्थना करते हुए मैत्री-भावना करो—यही अर्थ है।
अब सामान्य रूप से भावना-क्रम प्रकट करते हुए यह गाथा कही—
सब्बे सत्ता सब्बे पाणा सब्बे भूता च केवला,
सब्बे भद्रानि पस्सन्तु मा कञ्चि पापमागमा ॥
[ सभी सत्त्व, सभी प्राणी, सारे के सारे जीव; सभी का कल्याण हो।
किसी को दुख न हो।]
तृष्णा-दृष्टि के कारण ससार में, पाँच स्कन्धो में आसक्त, विशेष आसक्त
होने से सत्ता (सक्ता) । स्वास प्रश्वास कहलाने वाले प्राण के कारण प्राणी ।
भूत(=जीवित) भावित (जीने वालो) का जन्म होने से भूता। इस प्रकार
जानना चाहिए कि वचन-मात्र की ही विशेषता है। सामान्य तौर पर इन सभी
पदो का अर्थ सभी प्राणी ही है। केवला सकल, यह सर्व शब्द का ही पर्याय-
वाची है। भद्रानि पस्सन्तु, यह सभी प्राणी कल्याण को ही प्राप्त हो ।
मा कञ्चि पापमागमा, इनमें से किसी एक भी प्राणी को दुख न हो। सभी
वैर-रहित ओघ-रहित, सुखी तथा दुख-रहित हो ।
इस प्रकार सामान्य रूप से सभी प्राणियो के प्रति मैत्री-भावना की बात
कह तीनो रत्नो के गुणो की याद दिलाने के लिए कहा—