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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 333

, ३१६ [ २.६.२०३
अप्पमाणो बुद्धो अप्पमाणो धम्मो अप्पमाणो सङ्घो।
सीमित (प्रमाण-सहित) विकारो का अभाव होने से और गुण असीम
(अप्रमाण) होने से बुद्ध रत्न असीम (अप्रमाण) है, धर्म, नौ प्रकार¹ का
लोकोत्तर धर्म; उसकी भी सीमा नहीं की जा सकती इसलिए असीम (अप्रमाण)।
उस असीम (अप्रमाण) धर्म से युक्त होने के कारण सङ्घ भी असीम (अप्रमाण)।
इस प्रकार बोधिसत्त्व उन तीनो रत्नो के गुणो को स्मरण करने के लिए
कह तथा उन तीन रत्नो के गुणो का असीम होना दिखा सीमित प्राणियो के
बारे में बोले—
पमाणवन्तानि सिरिसपानि अहिविच्छिका,
सतपदी उण्णनाभि सरबूमूसिका ।
[ रेंगने वाले, सर्प, विच्छू, गूजर, मकड़ी तथा छिपकली—यह सब सीमा
वाले हैं।]
सिरिसपा, सब दीर्घाकार प्राणियो का यह नाम है। वे सरक कर चलते
हैं, वा सिर से चलते हैं, इसीलिए सिरिसपा। अहि आदि उनके स्वरूप का
वर्णन किया गया है। तत्थ उण्णनाभि मकड़ी, उसकी नाभि से ऊन सदृश
सूत निकलता है, इसलिए उण्णनाभि कहलाती है। सरबू, छिपकली।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने 'क्योकि इनके अन्दर जो रागादि है वह सीमा
वाले धर्म हैं, इसलिए ये सिरिसप आदि सीमा वाले हैं दिखा तीनो असीम
रत्नो के प्रताप से यह सीमा वाले रात दिन रक्षा करे' कह तीनो रत्नो
के गुणो का अनुस्मरण करने को कहा। उसके आगे जो कर्तव्य है वह बताने
के लिए यह गाथा कही—
¹ चार मार्ग, चार फल तथा निर्वाण।