जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगङ्गेय्य ] ३२१
दोनो में रूप को लेकर विवाद उठ खड़ा हुआ । एक ने कहा—'मैं शोभा देता
हूँ। दूसरे ने कहा—तू नही शोभा देता, मे शोभा देता हूँ। कुछ ही दूर पर
एक वृद्ध स्थविर को बैठे देख उन्होने सोचा—यह जानेंगे। हम में से कौन
शोभनीय है, कौन नही ? उन्होने पास जाकर पूछा—हम में से कौन सुन्दर
है ? स्थविर ने उत्तर दिया—तुम दोनो से में ही सुन्दर हूँ।
तरुण भिक्षुओ ने कहा, यह बूढ़ा जो हम पूछते हैं वह न बता जो नही
पूछते हैं वही कहता हैं। वे उसकी निन्दा कर चले गए।
उनकी यह करतूत भिक्षु-सघ में प्रकट हो गई। एक दिन धर्मसभा में बात-
चीत चली—आयुष्मानो, वृद्ध स्थविर ने उन रूप-प्रिय तरुण भिक्षुओ को लज्जित
कर दिया। शास्ता ने आकर पूछा—भिक्षुओ, इस समय बैठे क्या बातचीत
कर रहे हो ? "यह बातचीत" कहने पर "भिक्षुओ, यह दो तरुण केवल अभी
रूप प्रशसक नही हैं, यह पहले भी रूप को ही प्यार करते हुए विचरते थे"
कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व काल में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
गङ्गा के किनारे वृक्ष-देवता थे। उस समय गङ्गा-यमुना के सङ्गम पर गङ्गेय्य
और यामुनेय्य नाम की दो मछलियाँ थीं। वे आपस में विवाद करने लगीं—
मे शोभा देती हूँ, तू नही शोभती। इस प्रकार रूप के बारे में विवाद करते हुए
उन्होने थोडी दूर पर गङ्गा के किनारे पड़े एक कछुए को देखकर सोचा—,
यह जानेगा कि हम में कौन सुन्दर है ? कौन असुन्दर ? उसके पास जाकर
उन्होने पूछा—सोम्य ! गङ्गेय्य सुन्दर है ? अथवा यामुनेय्य ?।
कछुए ने कहा—गङ्गेय्य भी सुन्दर है, यामुनेय्य भी सुन्दर है, लेकिन
में तुम दोनो से अधिक सुंदर हूँ।
इस बात को प्रकट करते हुए उसने पहली गाथा कही—
सोभति मच्छो गङ्गेय्यो अथो सोभति यामुनो,
अनुपदप कुरिसो निग्रोधपरिमण्डलो;
ईसायतगीवो च सब्बेव अतिरोचति ॥
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