जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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में अपना दासत्व प्रगट कराकर मत पछताना, यही यहाँ सेठ के कहने का
मतलब है ।
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सेठ की लड़की यह सब नही जानती थी । वह जैसे सीखा था वैसे शब्द-
मात्र कहती थी ।
कटाहक ने सोचा, निश्चय से सेठ ने मेरा नाम बताकर इसे सब कह दिया
होगा । उसके बाद से फिर उसकी भोजन की निन्दा करने की हिम्मत न हुई ।
मान-मर्दित होकर वह यथा प्राप्त भोजन करता हुआ कर्मानुसार परलोक
सिधारा ।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया । उस समय
कटाहक बकवादी भिक्षु था । वाराणसी सेठ तो में ही था ।
१२६. असिलक्खण जातक
"तथेवेकस्स कल्याण" यह (धर्मोपदेश) शास्ता ने जेतवन में रहते समय
कोशल-नरेश के तलवार के लक्षण कहनेवाले ब्राह्मण के बारे में दिया ।
क. वर्तमान कथा
यह (ब्राह्मण) राजा के पास लोहारों के तलवार लाने के समय तलवार
को सूंघकर तलवार का लक्षण बताता था । जिनके हाथ से कुछ प्राप्त हो
जाता उन की तलवार को वह सुलक्षण और माङ्गलिक कहता, जिनके हाथ से
कुछ न मिलता उनकी तलवार को अमाङ्गलिक बता निन्दा करता ।
एक शिल्पी तलवार बना उसके म्यान में मिर्चों का बारीक चूर्ण भर राजा
के पास तलवार लाया । राजा ने ब्राह्मण को बुलवाकर कहा—तलवार की
परीक्षा कर ।