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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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६० [ १.१३.१२५
उस समय से वह लोगो में बैठकर इस प्रकार बातें बनाने लगा—दूसरे
मूर्ख लोग मातापिता के किए उपकार को भूल, उनके भोजन करने के समय
उनके प्रति अपने कर्तव्य को पूरा न कर उनके साथ ही भोजन करने बैठ जाते
हैं। हम तो मातापिता के भोजन करने के समय पानी का बर्तन ले जाते हैं,
थूकने का बर्तन ले जाते हैं, (दूसरे) पाय ले जाते हैं, पानी और पखा लेकर
खड़े रहते हैं। शौच के लिए जाते समय परदे की जगह तक पानी का बरतन
लेकर जाते हैं। इस प्रकार स्वामी के प्रति जो जो दास के कर्तव्य होते हैं, उन
सबको प्रगट किया।
इस तरह लोगो को समझा बोधिसत्त्व के प्रत्यन्त देश के समीप पहुँच
जाने के समय अपने श्वसुर से कहा—"तात ! मेरे पिता आपके दर्शन के
लिए आ रहे हैं। आप खाद्य भोज तैयार कराएँ। मैं भेंट लेकर आगे जाता
हूँ।" उसने "तात ! अच्छा" कह स्वीकार किया।
कटाहक ने बहुत सी भेंट ले जाकर बहुत से लोगो के साथ जा बोधिसत्त्व
को प्रणाम कर भेंट अर्पण की।
बोधिसत्त्व ने भेंट स्वीकार कर कुशल समाचार पूछ हाजरी के समय तम्बू
लगवा शौच के लिए परदे की जगह में प्रवेश किया। कटाहक ने अपने अनु-
यायियों को पीछे छोड़ा। पानी ले बोधिसत्त्व के पास पहुँचे। वहाँ उनके पानी
छू चुकने पर पैरो में गिर कर कहा—'स्वामी मैं आपको जितना चाहे उतना
धन दूंगा। मुझे बदनाम न करे।' बोधिसत्त्व उसकी सेवा से प्रसन्न हो बोले—
'मत डरो। मुझ से तुम्हें कुछ हानि न होगी।' इस प्रकार उसे तसल्ली दे
प्रत्यन्त-नगर में प्रवेश किया। बड़ा आदर-सत्कार हुआ।
कटाहक दास की तरह से उसकी सब प्रकार की सेवा करता रहा।
एक बार जब बोधिसत्त्व सुखपूर्वक बैठे हुए थे प्रत्यन्त-देश के सेठ ने कहा—
"महासेठ ! मैंने तुम्हारे पत्र को देखकर ही तुम्हारे लड़के को अपनी लड़की
दे दी।" बोधिसत्त्व ने कटाहक को पुत्र ही बना उस (अवसर) के योग्य प्रिय
वचन कह सेठ को सन्तुष्ट किया। लेकिन फिर उसके बाद से वह कटाह का
मुँह नहीं देख सका।
एक दिन बोधिसत्त्व ने सेठ की लड़की को बुलाकर कहा—अम्म ! आ !
मेरे सिर में जुएं हैं, उन्हें चुन। उसके आकर जुएं चुनती हुई खड़ी होने पर