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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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पृष्ठ 81

कटाहक ] ६१

पूछा—'अम्म ! क्या मेरा पुत्र तेरे दुःख-सुख मे आलस्य रहित हो साथ देता
हैं ? दोनो जने मिलकर प्रसन्नता-पूर्वक रहते हो न ?''
"तात ! सेठ के पुत्र में और कोई दोष नही। केवल आहार की निन्दा
करता है।"
"अम्म ! वह सदैव से दुख देनेवाला है। लेकिन मै तुझे उसका मुंह
बन्द करने का मन्त्र देता हूँ। तू उसे अच्छी तरह सीख। मेरे पुत्र के भोजन की
निन्दा करने के समय, जैसे सीखा वैसे ही उसके सामने खडी होकर कहना'—
इस प्रकार एक गाथा सिखा कुछ दिन रह वाराणसी चले गए।
कटाहक भी बहुत सा खाद्य-भोज्य ले, उनके पीछे पीछे जा बहुत सा धन
देकर लौट आया।
बोधिसत्त्व के जाने के बाद से कटाहक और भी अभिमानी हो गया।
एक दिन जब सेठ की लडकी नाना प्रकार के अच्छे अच्छे भोजन ले कडछी से
परोस रही थी उसने भोजन की निन्दा आरम्भ की। सेठ की लडकी ने जैसे
बोधिसत्त्व से सीखी थी, उसी प्रकार यह गाथा कही—
बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो,
अन्वागन्त्वान दूसेय्य भुञ्ज भोगे कटाहक ॥
[ दूसरे देश में जाकर वह बहुत बकता है। फिर आकर उसे दोषी
ठहरा दे, (इसका ख्याल कर) कटाहक जो भोग मिल रहा है, उसका उपभोग
कर । ]

बहुम्पि सो विकत्थेय्य अञ्ञ जनपद गतो, जो अपने जन्म-स्थान से किसी
ऐसे दूसरे देश मे गया रहता है, जहाँ उसकी जाति नही जानते, वह बहुत बकता
हैं। धोका देने की ठगने की बात करता है। अन्वागन्त्वान दूसेय्य, इस वार
स्वामी की अगवानी करके दास कर्म करने के कारण चाबुक से पीटे जा कर
पीठ की चमडी उधेडी जाने से और दाग दिए जाने से बच गया। यदि अनाचार
करेगा तो दोबारा आने पर तेरा स्वामी तुझे दोषी ठहरायेगा, इस डर से आकर
चाबुक से सजा देगा। दाग देकर तथा तेरी जाति प्रकट करके तुझे खराब करेगा,
पीटेगा। इसलिए इस अनाचार को छोड भुञ्ज भोगे कटाहक ! फिर बाद