जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअसिलक्खण ] ६५
भाग्य बतानेवाली ने राजकन्या को मण्डलपीठ की जगह पर जाते हुए 'डर मत'
इशारा कर चारपाई पर लिटाया ।
उसी समय कुमार ने मिर्च-चूर्ण नाक पर फेंक छींक मारी । उसके छींक
मारते ही (वह) भाग्य बतानेवाली राजकन्या को छोड़ बड़ा शोर मचाती हुई
सबसे पहले भागी । उसके भागने पर एक भी न ठहर सका । जिसके पास जो
शस्त्र थे उन्हें छोड़ सभी भाग गए ।
राजकुमार जैसे निश्चय किया गया था उसके अनुसार सब करके राजकन्या
को अपने घर ले गया । भाग्य बतानेवाली ने जाकर राजा को सब हाल कहा ।
राजा ने स्वीकार किया, बोला—यूँ भी मैने उसे उसी के लिए पाला था ।
दूध म घी पड़ने जैसा हुआ। आगे चलकर भानजे को राज्य दे अपनी कन्या
को उसकी पटरानी बनाया । वह उसके साथ मेल से रहता हुआ धर्म-पूर्वक
राज्य करता रहा ।
वह तलवार के लक्षण बतानेवाला भी उसी की सेवा में रहता था ।
एक दिन राज्य-सेवा में आ सूर्य के सामने खड़े हो सेवा-कार्य करते हुए उसकी
नाक की लाख पिघल गई । नकली नाक जमीन पर गिर पड़ी । वह शर्म
के मारे सिर नीचा करके खड़ा हुआ ।
राजा ने हँसते हुए कहा—आचार्य्य सोच मत करो । छींकना एक के लिए
कल्याणकर होता है, दूसरे के लिए बुरा । तुम्हारे छींकने पर नाक पृथक हो
गई, लेकिन हमने छींका तो हमें मामा की लड़की और राज्य मिला। इतना
कह यह गाथा कही—
तथेवेकस्स कल्याणं तथेवेकस्स पापकं,
तस्मा सब्बं न कल्याणं सब्बं वापि न पापकं ॥
[ वही किसी के लिए कल्याणकारक है, वही किसी के लिए बुरा । इस
लिए न सब कल्याणकारक ही है, न सब बुरा ही है।]
तथेवेक्स्स तवेवेकस्स—यह भी पाठ है । दूसरे पद में भी ऐस ही ।
इस प्रकार इस गाथा द्वारा उसने यह बात कही । फिर दान आदि
पुण्यकर्म करके यथाकर्म परलोक सिधारा ।
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