जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
१८१. असदिस जातक
दूसरा परिच्छेद
४. असदिस वर्ग
१८१. असदिस जातक
“धनुग्गहो असदिसो...” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय
महाभिनिष्क्रमण के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
एक दिन धर्मसभा में बैठे हुए भिक्षु भगवान् की नैष्क्रम्यपारमी की प्रशंसा
कर रहे थे। शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, यहाँ बैठे क्या बात चीत कर
रहे हो ?” 'अमुक बात चीत ।' "भिक्षुओ ! तथागत ने केवल अभी अभि-
निष्क्रमण नहीं किया, पहले भी श्वेत-छत्र छोडकर अभिनिष्क्रमण किया है।"
इतना कह शास्ता ने पूर्व-जन्म की कथा कही।
ख. अतीत कथा
पुराने समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ने उसकी रानी की कोख में जन्म ग्रहण किया।
सकुशल पैदा हुए उस राजकुमार का, नामग्रहण के दिन नाम रक्खा गया
असदिसकुमार। जिस समय वह दौड भाग कर चलन फिरने लगा, एक दूसरे
पुण्यवान् प्राणी ने देवी की कोख में जन्म ग्रहण किया। सकुशल पैदा हुए उस
कुमार का नाम रक्खा गया ब्रह्मदत्त कुमार।
असदिस ] २४५
वशोड हो वाराणसी लौटे। राजा न मरते समय कहा, असदिसकुमार को
राजा तथा ब्रह्मदत्त कुमार को उपराजा बनाना। इतना कह वह मर गया।
उसके मर जाने पर जब बोधिसत्त्व को राज्य दिया जाने लगा, उसने मना
कर दिया कि मुझे राज्य की ज़रूरत नहीं है। ब्रह्मदत्त का राज्याभिषेक कर दिया
गया। बोधिसत्त्व ने कहा कि मुझे यश नहीं चाहिए; और किसी भी चीज
की इच्छा नहीं की। छोटे भाई के राज्य करते हुए वह जैसे साधारण ढंग से
रहते थे, उसी तरह रहते रहे।
राजा के नौकर चाकरों ने राजा को यह कह कर कि बोधिसत्त्व राज्य
चाहते हैं, राजा का मन बोधिसत्त्व की ओर से फेर दिया। उसने उनका
विश्वास कर, चित्त में सन्देह पैदा हो जाने के कारण मनुष्यों को आज्ञा दी
कि मेरे भाई को पकड़ो।
बोधिसत्त्व के किसी हितचिन्तक ने उन्हें इसकी सूचना दी। छोटे भाई
से क्रुद्ध हो बोधिसत्त्व किसी दूसरे राष्ट्र में चले गए। वहाँ राजद्वार पर पहुँचे
कहलाया कि एक धनुर्धारी आया है। राजा ने पूछा कि क्या वेतन लेगा ?
उत्तर दिया—एक वर्ष के लिए एक लाख। राजा ने आज्ञा दी—अच्छा, आ
जाए। उसके समीप आकर खड़े होने पर पूछा—
“तू धनुर्धारी है ?”
“देव ! हाँ।”
“अच्छा ! मेरी सेवा में रह।”
तब से वह राजा की सेवा में रहने लगे। उन्हें जो वेतन मिलता था, उसे
देख पुराने धनुर्धारी क्रुद्ध हुए कि इसे बहुत मिलता है।
एक दिन राजा उद्यान गया। वहाँ मङ्गल-शिला की शय्या के पास कनात
तनवा आम के वृक्ष के नीचे महाशय्या पर लेटा। ऊपर देखते हुए उसने एक
आम देखा। उसे लगा कि इस आम को चढ़ कर नहीं तोड़ा जा सकता।
इसलिए उसने धनुर्धारियों को बुलवा कर पूछा—"क्या इस आम को तीर
मार कर गिरा सकते हो ?”
‘देव ! यह हमारे लिए कठिन कार्य नहीं है। लेकिन ! देव ! हमारा
कौशल तो आपने पहले अनेक बार देखा है। जो नया धनुर्धर आया है, वह
हमारी अपेक्षा बहुत पाता है। उससे गिरवाएँ।”
२४६ [ २.४.१८१
राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर पूछा—"तात ! इसे गिरा सकते हो !"
"महाराज ! हाँ ! थोड़ी जगह मिलने पर गिरा सकूँगा।"
"जगह कहाँ चाहिए ?"
"जहाँ आपकी शय्या है।"
राजा ने शय्या हटवा कर जगह करा दी। बोधिसत्त्व हाथ में धनुष
नहीं रखते थे। वह कपड़ों के नीचे छिपाए रहते थे। इसलिए कहा कि क़नात
चाहिए। राजा ने कहा 'अच्छा' और क़नात मँगवा कर तनवा दी। बोधिसत्त्व
क़नात के अन्दर चले गए। वहाँ पहुँच उन्होंने ऊपर पहना श्वेत वस्त्र उतार
एक लाल कपड़ा पहना। फिर पच्छ पहन, थैली से जुड़ने-वाली तलवार
निकाल, बाईं ओर बाँधी। तब सुनहरी वस्त्र पहन, कमर पर तरकश बाँध,
जुड़ने वाला, मेढ़े की सींग का बना बड़ा धनुष ले, मूँगे के रंग की डोरी बाँध,
सिर पर पगड़ी धारण की। तेज तीर को नाखून पर घुमाते हुए वह क़नात
के दो हिस्से कर ऐसे निकला मानो पृथ्वी फाड़ कर अलङ्कृत नाग-कुमार बाहर
आया हो। फिर बोधिसत्त्व तीर चलाने की जगह पर जा, तीर को तैयार कर
राजा से बोले—
"महाराज ! इस आम को ऊपर जाने वाले तीर से गिराऊँ, अथवा नीचे
जाने वाले तीर से ?"
"तात ! मैंने ऊपर जाने वाले तीर से बहुत गिराते देखा है, लेकिन नीचे
जाने वाले तीर से गिराते नहीं देखा है। नीचे जाने वाले तीर से गिराएँ।"
"महाराज ! यह तीर दूर तक जाएगा। चातुर्महाराजिक भवन तक
जाकर स्वयं नीचे उतरेगा। जब तक यह नीचे उतरे, तब तक आपको प्रतीक्षा
करनी होगी।"
राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया।
बोधिसत्त्व ने फिर कहा—"महाराज ! यह तीर ऊपर जाता हुआ आम
की डंठल को ठीक बीच में से छेदता हुआ ऊपर जाएगा; और नीचे उतरता
हुआ केशप्रमाण भी इधर उधर न हो, निश्चित जगह पर लग, आम को लेकर
नीचे उतरेगा। महाराज ! देखें।"
तब बोधिसत्त्व ने जोर लगाकर तीर छोड़ा। आम की डंठल को बीच में
से छेदता हुआ तीर ऊपर बढ़ा। बोधिसत्त्व ने यह समझ कि अब यह तीर
असदिस ] २४७
चातुर्महाराजिक भवन पहुँचा होगा, पहले तीर से भी अधिक जोर से एक
दूसरा तीर चलाया। यह तीर जाकर पहले छोड़े हुए तीर के पख में लगा
और उसे लोटा स्वयं तावतिंस भवन को चला गया। उसे वहाँ देवताओ ने
पकड लिया। जो तीर लोट रहा था उसके हवा छेदते हुए आने की आवाज
बिजली की आवाज के समान थी।
लोगो ने पूछा—"यह कैसी आवाज है?"
बोधिसत्व ने उत्तर दिया—"यह तीर के लौटने की आवाज है।"
लोगो को डर लगने लगा कि उनमे से किसी के बदन पर न गिरे। बोधि-
सत्त्व ने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं तीर को जमीन पर गिरने न दूंगा।
उतरते हुए तीर ने बाल की नोक भर भी इधर उधर न जा निश्चित
स्थान पर गिर आम को तोडा। बोधिसत्व ने तीर तथा आम को जमीन पर
गिरने न दे, आकाश में ही रोक कर एक हाथ में तीर और दूसरे में आम लिया।
जनता उस आश्चर्य को देख "ऐसा तो हमने कभी पहले नहीं देखा" कहते
हुए महापुरुष की प्रशंसा करने लगी, चिल्लाने लगी, तालियां पीटने लगी;
अंगुलियां चटकाने लगी, और सहस्रो वस्त्रो को ऊपर उछालने लगी। सन्तुष्ट
चित्त राज्य-परिषद ने बोधिसत्त्व को एक करोड धन दिया। राजा ने भी
धन की वर्षा करते हुए इसे बहुत सा धन तथा यश दिया।
इस प्रकार आदृत तथा सत्कृत होकर बोधिसत्त्व के वहाँ रहते समय सात
राजाओ ने यह जान कि अब असदिसकुमार वाराणसी में नही है, वाराणसी को
घेर लिया और सन्देस भेजा कि चाहे राज्य दें, चाहे युद्ध करें। राजा ने मरने
से भयभीत हो पूछा—"इस समय मेरा भाई कहाँ है?"
"एक सामन्त राजा की सेवा में है।"
उसने दूत भेजे—यदि भाई नहीं आएगा, तो मेरी जान नही बचेगी। जाओ
मेरी ओर से उनके चरणो में प्रणाम कर क्षमा माँग उन्हें लिवा कर आओ।
उन्होने जाकर बोधिसत्त्व को वह समाचार कहा। बोधिसत्व ने उस
राजा को पूछ वाराणसी लौट कर अपने भाई को आश्वासन दिया कि मत
डरें। फिर उसने एक तीर पर यह लिखा कि मैं असदिसकुमार आ गया हूँ।
दूसरा तीर चला कर सब की जान ले लूंगा। इसलिए जिन्हे जान प्यारी हो,
वह भाग जाएँ। उस तीर को उसने अट्टालिका पर चढ़ ऐसे चलाया कि वह
२४८ [ २४.१८१
जहाँ सातो राजा भोजन कर रहे थे वहाँ सोने की थाली के ठीक बीच में
जाकर गिरा। उन अक्षरों को देख मरने के भय से वह सभी भाग गए।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने, छोटी मक्खी जितना खून पीती है उतना खून
भी बिना बहाए सातो राजाओ को भगा दिया। फिर छोटे भाई से भेट कर,
काम-भोग के जीवन को त्याग ऋषियो के प्रव्रज्या-क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की।
अभिज्ञा तथा समापत्तियां प्राप्त कर जीवन समाप्त होने पर ब्रह्मलोकगामी हुए।
शास्ता ने बुद्ध हुए रहने पर "भिक्षुओ ! असदिसकुमार ने सात राजाओ
को भगा, संग्राम विजयी हो ऋषियों के क्रम से प्रव्रज्या ग्रहण की" कह, यह
गाथाएँ कही—
६ धनुग्गहो असदिसो राजपुत्तो महब्बलो
दूरेपाती अक्खणवेधी महाकायप्पदालनो ॥
सब्बामित्ते रणं कत्वान च किञ्चि विहेठयि
भातरं सोत्थि कत्वान सञ्जमं अज्झुपागमि ॥
[ महाबलशाली, बडी बडी चीजो को बींधने वाले, अचूक निशाना लगाने
वाले, धनुर्धारी असदिस राजपुत्र ने जो तीर को दूर गिराता था, बिना किसी
को कष्ट दिए सभी शत्रुओं से युद्ध कर भाई का उपकार किया। वह स्वयं
सन्यासी हो गया । ]
असदिसो केवल नाम से ही नही, बल, वीर्य तथा प्रज्ञा में भी असदृश ।
महब्बलो शरीर-बल तथा ज्ञान-बल, दोनो बलो से बलशाली। दूरेपाती
चातुर्महाराजिक भवन तथा तावतिंस भवन तक तीर पहुँचाने की सामर्थ्य
रखने से, दूर गिराने वाला। अक्खणवेधि अचूक निशाने वाला, अथवा अक्खणा
कहते है बिजली को, जितनी देर एक बार बिजली चमकती है, एक बार बिजली
चमकने के, उतनी ही देर के प्रकाश में सात आठ बार तीर खेंकर बींधने वाला।
महाकायप्पदालनो बडी चीजो को बींधने वाला। चर्म-काय, लकडी-काय,
लोह-काय,¹ अयस्-काय, बालू-काय, उदक-काय तथा स्फटिक-काय, यह सात
¹ लोह = तांबा ।
सङ्गामावचर ] २४६
महाकाय हैं। कोई दूसरा चर्म-काय को बीधने वाला केवल भैंस के चर्म को
बीधता है। वह सात भैंस-चर्मों को बीधता। दूसरा कोई आठ अगुल मोटे
अजीर के तख्ते को, वा चार अगुल मोटे असन वृक्ष के तख्ते को बीधता है। वह
एक साथ सौ तख्ते बँधे हो, तो उनको भी बीधता। उसी तरह दो अगुल मोटे
ताम्बे के तख्ते, वा अगुल मोटे अयस्-तख्ते को अथवा बालू की गाडी, वा तख्तो
की गाडी, वा पराल की गाडी में पीछे से तीर मार कर आग निकाल देता।
पानी में सामान्यतया चार ऋषभ की दूरी पर तीर पहुँचा देता, स्थल में आठ
ऋषभ की दूरी पर। इस प्रकार इन सात कायो को बीधने वाला होने से
महाकाय बीधने वाला। सव्वमित्ते, सभी शत्रु। रण कत्वा युद्ध करके भगा
दिए। न च किञ्चि विहेठयि किसी एक को भी कष्ट नही दिया। बिना
कष्ट दिए उनके साथ केवल तीर भेज कर ही युद्ध करके। सञ्जम अब्भु-
पागमि शील-सयम रूपी प्रव्रज्या को प्राप्त किया।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय छोटा भाई आनन्द था। असदिसकुमार तो मैं ही था।
१८२. सङ्गामावचर जातक
“सङ्गामावचरो सूरो ”यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय नन्द
स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जिस समय शास्ता पहली वार कपिलपुर¹ गए, उन्होने छोटे भाई नन्द-
¹ कपिलवस्तु।
२५० [ २.४.१८२
कुमार को प्रव्रजित किया। कपिलपुर से निकल क्रमशः श्रावस्ती जाते समय
आयुष्मान् नन्द भगवान् का पात्र ले शास्ता के साथ साथ चले। जनपद-
कल्याणि¹ ने सुना तो आधे बिखरे केशो से झरोखे में से देख कर कहा कि आय्यँ-
पुत्र शीघ्र लौटना। नन्द जनपदकल्याणि के इस कथन को याद करता हुआ
उत्कण्ठा के कारण शासन में मन न लगा सका। वह पाण्डुवर्ण का हो गया;
और उसके शरीर में नसें ही नसें दिखाई देने लगीं।
शास्ता ने उसका हाल जान सोचा कि मैं नन्द को अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित
करूँ। इसलिए उन्होने उसके रहने के परिवेण में जा वहाँ बिछे आसन पर
बैठ पूछा—"नन्द ! इस शासन में तेरा मन लगता है वा नही ?
"भन्ते ! जनपदकल्याणि में आसक्ति होने के कारण मन नही लगता।"
"नन्द ! तू पहले हिमालय में चारिका करने गया है ?"
"भन्ते ! नही गया हूँ।"
"तो ! आओ चले।"
"भन्ते ! मुझे ऋद्धि (-बल) नही हैं। मैं कैसे जाऊँगा ?"
"नन्द ! मैं तुझे अपने ऋद्धि (-बल) से ले जाऊँगा।"
शास्ता ने स्थविर को हाथ से पकड आकाश मार्ग से जाते हुए रास्ते में
जला हुआ खेत दिखाया। वहाँ जले हुए एक ठूंठ पर एक बन्दरी बैठी दिखाई;
जिसके कान, नाक और पूंछ कटी थी; जिसके बाल जल गए थे; जिसकी
खाल फट गई थी; जिसकी चमड़ी मात्र बाकी रह गई थी तथा जिसमें से
रक्त बह रहा था।
"नन्द ! इस बन्दरी को देखते हो ?"
"भन्ते ! हाँ।"
"अच्छी तरह से प्रत्यक्ष करो।"
फिर उसे ले साठ योजन का मनोशिला-तल, अनवतप्त आदि सात महा-
सर, पांच महानदियाँ, स्वर्ण-पर्वत, रजत-पर्वत तथा मणि-पर्वत से युक्त सैकडो
रमणीय-स्थान और हिमालय-पर्वत दिखा पूछा—
¹नन्द की भार्या।
सङ्गामावचर ] २५१
“नन्द ! तूने तावतिंस-भवन¹ देखा है ?”
“भन्ते ! नही देखा ?”
“नन्द ! आ तुझे तावतिंस भवन दिखाएँ ।”
शास्ता उसे वहाँ ले जा पाण्डु-कम्बल शिला आसन पर बैठें। दोनो देव-
लोकों के देवताओ सहित देवेन्द्र शक्र-राजा ने आकर प्रणाम किया और एक
ओर बैठ गया। उसकी ढाई करोड सेविकाएँ और कबूतरी की तरह लाल
पाँव वाली पांच सौ अप्सराएँ भी आकर, प्रणाम कर एक ओर बैठीं। शास्ता
ने नन्द को ऐसा किया कि वह उन पाँच सौ अप्सराओ पर आसक्त हो उन्हें
बार बार देखने लगा।
“नन्द ! कबूतरी जैसे पाँव वाली इन अप्सराओ को देखता है ?”
“भन्ते ! हाँ ।”
“क्या यह अच्छी लगती है, अथवा जनपदकल्याणि ?”
“भन्ते ! जनपदकल्याणि की तुलना में जैसे यह लुजी बन्दरी थी, उसी
तरह इनकी तुलना में जनपदकल्याणि है।”
“नन्द ! अब क्या करेगा ?”
“भन्ते ! क्या करने से यह अप्सराएँ मिल सकेगी ?”
“श्रमण धर्म पूरा करने से ।”
“यदि भन्ते ! आप मुझे इन्हें दिलाने के जिम्मेवार हो तो मै श्रमण-
धर्म पूरा करूँगा ।”
“नन्द ! कर। मै जिम्मेवार होता हूँ।”
इस प्रकार देवसमूह के बीच में स्थविर ने तथागत को जिम्मेवार ठहरा
कर कहा—“भन्ते ! देर न करें। आएँ चलें। मै श्रमण धर्म करूँगा ।”
शास्ता उसे ले जेतवन चले आए। स्थविर ने श्रमण-धर्म करना आरम्भ
किया।
शास्ता ने धर्मसेनापति सारिपुत्र को सम्बोधन कर कहा—“सारिपुत्र !
मेरे छोटे भाई नन्द ने त्रयस्त्रिंशत् देवलोक में देवसमूह के बीच अप्सराऐं
¹ त्रयस्त्रिंशत् देवताओ का भवन।
२५२ [ २.४.१८२
दिलाने के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराया है। इस उपाय से महामौद्गल्यायन
स्थविर, महाकाश्यप स्थविर, अनुरुद्ध स्थविर, धर्मभण्डारी आनन्द स्थविर,
अस्सी महाश्रावकों तथा प्रायः करके शेष सभी भिक्षुओं को कहा। धर्मसेनापति
सारिपुत्र स्थविर ने नन्द स्थविर के पास जाकर कहा—आयुष्मन् ! क्या
तूने सचमुच त्रयस्त्रिंशत् लोक में देवसमूह के बीच अप्सराएँ मिलें तो श्रमण-
धर्म करूँगा, इसके लिए दसबलधारी (बुद्ध) को जामिन ठहराया है ?
यदि ऐसा है तो तेरा ब्रह्मचर्य-जीवन स्त्रियों के लिए है, आसक्ति के लिए है।
यदि तू स्त्रियों के लिए श्रमण-धर्म कर रहा है तो तुझ में और उस मजदूर में
क्या अन्तर है जो मजदूरी के लिए काम करता है ?" इस प्रकार नन्द स्थविर
को लज्जित किया, निस्तेज किया। इसी तरह सभी अस्सी महाश्रावकों ने
तथा शेष भिक्षुओं ने उस आयुष्मन् को लज्जित किया।
उसे लज्जा आई और निन्दा-भय के कारण उसने दृढ़ पराक्रम कर विप-
श्यना-भावना बढ़ा अर्हत्व प्राप्त किया। फिर शास्ता के पास जाकर कहा—
"भन्ते ! मैं आपको आपकी जिम्मेदारी से मुक्त करता हूँ।" शास्ता ने
कहा—"नन्द ! जिस समय तूने अर्हत्व प्राप्त किया, उसी क्षण में अपनी
जिम्मेदारी से मुक्त हो गया।"
यह समाचार सुन भिक्षुओं ने धर्मसभा में बात चीत चलाई—"यह
आयुष्मन् नन्द स्थविर उपदेश के कितने अधिकारी हैं। एक बार उपदेश
देने से ही लज्जा तथा निन्दा-भय का ख्याल कर श्रमण-धर्म करके अर्हत्व प्राप्त
कर लिया।" शास्ता ने आकर पूछा—"भिक्षुओ, बैठे क्या बातचीत कर रहे
हो ?"
"अमुक बातचीत।"
"भिक्षुओ, न केवल अभी, पूर्व में भी नन्द उपदेश का अधिकारी ही रहा है।"
फिर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में वाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
हाथी-शिक्षक के कुल में पैदा हुए। बडे होने पर हाथी-शिक्षा के कार्य में
सङ्गामावचर ] २५३
निष्णात हो वाराणसी राजा के एक शत्रु-राजा की सेवा म रहने लगा। उसने
उसके मङ्गल हाथी को अच्छी तरह सिखाया। राजा ने वाराणसी राज्य
को जीतने की इच्छा से बोधिसत्त्व को साथ ले मङ्गल हाथी पर चढ बडी
भारी सेना के साथ चढाई की। उसने वाराणसी-नरेश के पास सन्देश भेजा—
युद्ध करें या राज्य दे।
ब्रह्मदत्त ने युद्ध करने का निर्णय किया। उसने चारदीवारी के दरवाजो
पर, अट्टालिकाओ पर, नगर-द्वारो पर सेना को बिठा युद्ध करना शुरु किया।
शत्रु-राजा ने मङ्गल हाथी को कवच बाँध, स्वय भी कवच पहन, हाथी
के कन्धे पर बैठ तेज अङ्कुस ले हाथी को नगर की ओर बढाया, ताकि नगर
(की चारदीवारी) को तोड शत्रु को मार राज्य को हस्तगत कर सके। हाथी
ने जब देखा कि उधर से गर्म-गारा आदि फेंका जा रहा है तथा गुलेल और
नाना प्रकार के दूसरे प्रहार किए जा रहे हैं तो वह मरने से भयभीत हो पास
न जा सकने के कारण लौट पडा।
हाथी-शिक्षक ने उसके पास जाकर कहा—"तात ! तू शूर है। सग्राम-
जित है। इस तरह के मौके पर पीछे लौटना तेरे लिए अयोग्य है।" इतना
कह हाथी को उपदेश देते हुए यह दो गाथाएँ कही—
सङ्गामावचरो सूरो बलवा इति विस्सुतो
किन्नु तोरणमासज्ज पटिक्कमसि कुञ्जर !
ओमह् खिप्पं पळिघ एसिकानि च अब्बह
तोरणानि पमद्दित्वा खिप्पं पविस कुञ्जर !
[ कुञ्जर ! यह प्रसिद्ध है कि तू सङ्ग्राम-जित है, शूर है, बलवान् है।
तोरण के पास पहुँच कर तू क्यो पीछे लौटता है ? बाधा को जल्दी तोड
डाल। स्तम्भो को उखाड फेंक। कुञ्जर ! दरवाजो का मर्दन करके तू
जल्दी नगर में प्रविष्ट हो।]
इति विस्सुतो तात ! तू ऐसे सङ्ग्राम को जिसमें प्रहार मिलते हो मर्दन
करके विचरने वाला होने से सङ्गामावचरो, दृढ-हृदय वाला होने से सूरो।
बल-सम्पन्न होने से बलवा, यह प्रसिद्ध है, ज्ञात है, प्रकट है। तोरणमासज्ज,
२५४ [ २.४ ।८३
नगर-द्वार पर पहुँचे । पटिक्कमसि किस कारण से पीछे हटता है ? किस कारण
से रुकता है ? श्रोमद्द मर्दन कर, नीचे गिरा दे । एसिकानि च अब्बूह, नगर-द्वार
पर सोलह हाथ या आठ हाथ भूमि के अन्दर प्रवेश करके स्थिर रूप से गाडे हुए
स्तम्भ एसिका-स्तम्भ कहलाते हैं। उन्हें जल्दी उखाड फेकने की आज्ञा देता
है। तोरणानि पमद्दित्वा नगर-द्वार के पीछे के चौखट मर्दित कर। खिप्प
पविस, जल्दी से नगर में प्रवेश कर। कुञ्जर, नाग को सम्बोधित करता है। -
उसे सुन बोधिसत्त्व ने एक ही उपदेश से रुक, स्तम्भो को सूण्ड से लपेट,
'सांप की छतरियों' की तरह उखाड, तोरण का मर्दन कर बाधा को उखाड़
फेंका। फिर नगर-द्वार को तोड, नगर में प्रवेश कर राजा को राज्य ले दिया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया। उस समय
हाथी नन्द था। राजा आनन्द था। हाथी शिक्षक तो मैं ही था।
१८३. वाळोदक जातक
"वाळोदक अप्परसं विहीनं, ॰" यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय
पांच सौ जूठन खाने वालो के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
श्रावस्ती में पाँच सौ श्रावक घर-गृहस्थी का भार अपने स्त्री-बच्चो को
सौंप, शास्ता का धर्मोपदेश सुनते हुए एक साथ रहते थे। उनमे कोई स्रोतापन्न
थे, कोई सकृदागामी तथा कोई अनागामी, पृथकजन कोई भी नही था। शास्ता
को निमन्त्रित करते तो भी वह मिलकर ही निमन्त्रित करते।
उनको दातुन, मुख धोने का जल, सुगन्धि तथा माला आदि देने वाले
उनके पांच सौ छोटे सेवक जूठन खाकर रहते। वह प्रात काल का भोजन खा,
वाळोदक ] २५५
सो जाते और उठ कर अचिरवती नदी के किनारे जा कुश्ती लड़ते। लेकिन
वह पाँच सौ उपासक हल्ला न मचाते हुए ध्यान-रत रहते थे।
शास्ता ने उन जूठन खाने वालो का शोर सुनकर पूछा—
"आनन्द ! यह शोर कैसा है ?"
"भन्ते ! यह जूठन खाने वालो का शब्द है।"
'आनन्द ! यह जूठन खाने वाले केवल अभी जूठन खाकर शोर नही
मचाते, पहले भी शोर मचाते रहे हैं, और यह उपासक भी न केवल अभी
शान्त हैं पहले भी शान्त रहे हैं।"
स्थविर के प्रार्थना करने पर शास्ता ने पूर्व-जन्म की बात कही।
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करते समय बोधिसत्व अमात्य
कुल में पैदा हुए। बड़े होने पर राजा के अर्थधर्मानुशासक का पद मिला।
एक बार वह राजा यह सुन कि उसके इलाके में उपद्रव हो गया है,
पांच सौ सैन्धव घोडे तैयार करा, चतुरंगिनी सेना के साथ जा, इलाके को
शान्त कर बाराणसी लौट आया। उसने आज्ञा दी कि घोडे थके है, इसलिए
उन्हें कोई नरम चीज अगूर का पेय ही पिलाया जाए।
सैन्धव घोडे सुगन्धित पेय पीकर अश्व-शाला में आ अपनी अपनी जगह
खड़े हो गए। उनको जो रस दिया गया था, उसमें से बचा हुआ बहुत कसैला
हो गया। आदमियो ने राजा से पूछा—"इसका क्या करें ?" राजा ने
आज्ञा दी—"इसमें पानी मिला, मोटे कपडे से छान, जो गधे घोडो का चारा
ढो कर ले गए थे, उन्हे पिला दो।" पिला दिया गया।
गधे उस कसैले पानी को भी मस्त होकर रेंकते हुए राजाङ्गण में घूमने
लगे। राजा ने बडी खिड़की खोल राजाङ्गण को देखते हुए पास खडे बोधिसत्व
को सम्बोधित करके कहा—"मित्र ! यह गधे कसैला पानी पीकर मस्त हो
रेंकते हुए उछलते फिरते हैं। सिन्धु-कुल में पैदा हुए सैन्धव घोडे सुगन्धित
पेय पीकर निःशब्द बैठे हुए उछलते कूदते नही हैं। इसका क्या कारण है ?"
यह पूछते हुए राजा ने पहली गाथा कही—
२४६ [ २.४.१८३
थाळोदकं अप्परसं निहीनं
पीत्वा मदो जायति गद्दभानं
इमं च पीत्वान रसं पणीतं
मदो न सञ्जायति सिन्धवानं
[ गधों को थोड़े से रस वाला, तुच्छ, बोरे से छना हुआ पानी पीकर भी
मद हो जाता है। सैन्धव घोड़ों को यह श्रेष्ठ रस पीकर भी मद नहीं होता।]
वालोदकं बोरे से छाना हुआ पानी, घालूदकं भी पाठ है। निहीनं हीन
रस से युक्त, न सञ्जायति, सैन्धव घोड़ो को मद नहीं होता है, क्या कारण है ?
इसका कारण कहते हुए बोधिसत्त्व ने दूसरी गाथा कही—
अप्पं पिवित्वान निहीनजच्चो
सो मज्जति तेन ऽजनिन्द फुट्ठो
धोरय्हसीलो च कुलम्हि जातो
न मज्जति अग्गरसं पिवित्वा
[ राजन् ! हीन कुल में पैदा हुआ, थोड़ी भी पी लेने से उसके स्पर्श से
(ही) मस्त हो जाता है। स्थिर शील वाला तथा श्रेष्ठ कुल में पैदा हुआ, श्रेष्ठ
रस पीकर भी मस्त नहीं होता।]
• तेन जनिन्द, फुट्ठो, जनेन्द्र ! श्रेष्ठ राजन् ! वह हीन कुल में पैदा
हुआ, अपने कुल की हीनता के कारण मज्जति, प्रमाद को प्राप्त होता है,
धोरय्हसीलो स्थिर रूप से वहन करने की योग्यता वाला सैन्धव जाति का
घोड़ा, अग्गरसं सबसे पहले लिया हुआ अंगूर-रस, पिवित्वा न मज्जति।
राजा ने बोधिसत्त्व की बात सुन गधों को राजाङ्गण से निकलवाया।
फिर उसी के उपदेशानुसार चल दानादि पुण्यकर्म करते हुए कर्मानुसार परलोक
सिधारे।