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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 261, कुल 479 में से

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२४६ [ २.४.१८१
राजा ने बोधिसत्व को बुलाकर पूछा—"तात ! इसे गिरा सकते हो !"
"महाराज ! हाँ ! थोड़ी जगह मिलने पर गिरा सकूँगा।"
"जगह कहाँ चाहिए ?"
"जहाँ आपकी शय्या है।"
राजा ने शय्या हटवा कर जगह करा दी। बोधिसत्त्व हाथ में धनुष
नहीं रखते थे। वह कपड़ों के नीचे छिपाए रहते थे। इसलिए कहा कि क़नात
चाहिए। राजा ने कहा 'अच्छा' और क़नात मँगवा कर तनवा दी। बोधिसत्त्व
क़नात के अन्दर चले गए। वहाँ पहुँच उन्होंने ऊपर पहना श्वेत वस्त्र उतार
एक लाल कपड़ा पहना। फिर पच्छ पहन, थैली से जुड़ने-वाली तलवार
निकाल, बाईं ओर बाँधी। तब सुनहरी वस्त्र पहन, कमर पर तरकश बाँध,
जुड़ने वाला, मेढ़े की सींग का बना बड़ा धनुष ले, मूँगे के रंग की डोरी बाँध,
सिर पर पगड़ी धारण की। तेज तीर को नाखून पर घुमाते हुए वह क़नात
के दो हिस्से कर ऐसे निकला मानो पृथ्वी फाड़ कर अलङ्कृत नाग-कुमार बाहर
आया हो। फिर बोधिसत्त्व तीर चलाने की जगह पर जा, तीर को तैयार कर
राजा से बोले—
"महाराज ! इस आम को ऊपर जाने वाले तीर से गिराऊँ, अथवा नीचे
जाने वाले तीर से ?"
"तात ! मैंने ऊपर जाने वाले तीर से बहुत गिराते देखा है, लेकिन नीचे
जाने वाले तीर से गिराते नहीं देखा है। नीचे जाने वाले तीर से गिराएँ।"
"महाराज ! यह तीर दूर तक जाएगा। चातुर्महाराजिक भवन तक
जाकर स्वयं नीचे उतरेगा। जब तक यह नीचे उतरे, तब तक आपको प्रतीक्षा
करनी होगी।"
राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार किया।
बोधिसत्त्व ने फिर कहा—"महाराज ! यह तीर ऊपर जाता हुआ आम
की डंठल को ठीक बीच में से छेदता हुआ ऊपर जाएगा; और नीचे उतरता
हुआ केशप्रमाण भी इधर उधर न हो, निश्चित जगह पर लग, आम को लेकर
नीचे उतरेगा। महाराज ! देखें।"
तब बोधिसत्त्व ने जोर लगाकर तीर छोड़ा। आम की डंठल को बीच में
से छेदता हुआ तीर ऊपर बढ़ा। बोधिसत्त्व ने यह समझ कि अब यह तीर