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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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२५० [ २.४.१८२
कुमार को प्रव्रजित किया। कपिलपुर से निकल क्रमशः श्रावस्ती जाते समय
आयुष्मान् नन्द भगवान् का पात्र ले शास्ता के साथ साथ चले। जनपद-
कल्याणि¹ ने सुना तो आधे बिखरे केशो से झरोखे में से देख कर कहा कि आय्यँ-
पुत्र शीघ्र लौटना। नन्द जनपदकल्याणि के इस कथन को याद करता हुआ
उत्कण्ठा के कारण शासन में मन न लगा सका। वह पाण्डुवर्ण का हो गया;
और उसके शरीर में नसें ही नसें दिखाई देने लगीं।
शास्ता ने उसका हाल जान सोचा कि मैं नन्द को अर्हत्-पद पर प्रतिष्ठित
करूँ। इसलिए उन्होने उसके रहने के परिवेण में जा वहाँ बिछे आसन पर
बैठ पूछा—"नन्द ! इस शासन में तेरा मन लगता है वा नही ?
"भन्ते ! जनपदकल्याणि में आसक्ति होने के कारण मन नही लगता।"
"नन्द ! तू पहले हिमालय में चारिका करने गया है ?"
"भन्ते ! नही गया हूँ।"
"तो ! आओ चले।"
"भन्ते ! मुझे ऋद्धि (-बल) नही हैं। मैं कैसे जाऊँगा ?"
"नन्द ! मैं तुझे अपने ऋद्धि (-बल) से ले जाऊँगा।"
शास्ता ने स्थविर को हाथ से पकड आकाश मार्ग से जाते हुए रास्ते में
जला हुआ खेत दिखाया। वहाँ जले हुए एक ठूंठ पर एक बन्दरी बैठी दिखाई;
जिसके कान, नाक और पूंछ कटी थी; जिसके बाल जल गए थे; जिसकी
खाल फट गई थी; जिसकी चमड़ी मात्र बाकी रह गई थी तथा जिसमें से
रक्त बह रहा था।
"नन्द ! इस बन्दरी को देखते हो ?"
"भन्ते ! हाँ।"
"अच्छी तरह से प्रत्यक्ष करो।"
फिर उसे ले साठ योजन का मनोशिला-तल, अनवतप्त आदि सात महा-
सर, पांच महानदियाँ, स्वर्ण-पर्वत, रजत-पर्वत तथा मणि-पर्वत से युक्त सैकडो
रमणीय-स्थान और हिमालय-पर्वत दिखा पूछा—

¹नन्द की भार्या।