जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंसङ्गामावचर ] २४६
महाकाय हैं। कोई दूसरा चर्म-काय को बीधने वाला केवल भैंस के चर्म को
बीधता है। वह सात भैंस-चर्मों को बीधता। दूसरा कोई आठ अगुल मोटे
अजीर के तख्ते को, वा चार अगुल मोटे असन वृक्ष के तख्ते को बीधता है। वह
एक साथ सौ तख्ते बँधे हो, तो उनको भी बीधता। उसी तरह दो अगुल मोटे
ताम्बे के तख्ते, वा अगुल मोटे अयस्-तख्ते को अथवा बालू की गाडी, वा तख्तो
की गाडी, वा पराल की गाडी में पीछे से तीर मार कर आग निकाल देता।
पानी में सामान्यतया चार ऋषभ की दूरी पर तीर पहुँचा देता, स्थल में आठ
ऋषभ की दूरी पर। इस प्रकार इन सात कायो को बीधने वाला होने से
महाकाय बीधने वाला। सव्वमित्ते, सभी शत्रु। रण कत्वा युद्ध करके भगा
दिए। न च किञ्चि विहेठयि किसी एक को भी कष्ट नही दिया। बिना
कष्ट दिए उनके साथ केवल तीर भेज कर ही युद्ध करके। सञ्जम अब्भु-
पागमि शील-सयम रूपी प्रव्रज्या को प्राप्त किया।
इस प्रकार शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय छोटा भाई आनन्द था। असदिसकुमार तो मैं ही था।
१८२. सङ्गामावचर जातक
“सङ्गामावचरो सूरो ”यह शास्ता ने जेतवन में रहते समय नन्द
स्थविर के बारे में कही।
क. वर्तमान कथा
जिस समय शास्ता पहली वार कपिलपुर¹ गए, उन्होने छोटे भाई नन्द-
¹ कपिलवस्तु।