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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 262, कुल 479 में से

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असदिस ] २४७
चातुर्महाराजिक भवन पहुँचा होगा, पहले तीर से भी अधिक जोर से एक
दूसरा तीर चलाया। यह तीर जाकर पहले छोड़े हुए तीर के पख में लगा
और उसे लोटा स्वयं तावतिंस भवन को चला गया। उसे वहाँ देवताओ ने
पकड लिया। जो तीर लोट रहा था उसके हवा छेदते हुए आने की आवाज
बिजली की आवाज के समान थी।
लोगो ने पूछा—"यह कैसी आवाज है?"
बोधिसत्व ने उत्तर दिया—"यह तीर के लौटने की आवाज है।"
लोगो को डर लगने लगा कि उनमे से किसी के बदन पर न गिरे। बोधि-
सत्त्व ने उन्हें आश्वासन दिया कि मैं तीर को जमीन पर गिरने न दूंगा।
उतरते हुए तीर ने बाल की नोक भर भी इधर उधर न जा निश्चित
स्थान पर गिर आम को तोडा। बोधिसत्व ने तीर तथा आम को जमीन पर
गिरने न दे, आकाश में ही रोक कर एक हाथ में तीर और दूसरे में आम लिया।
जनता उस आश्चर्य को देख "ऐसा तो हमने कभी पहले नहीं देखा" कहते
हुए महापुरुष की प्रशंसा करने लगी, चिल्लाने लगी, तालियां पीटने लगी;
अंगुलियां चटकाने लगी, और सहस्रो वस्त्रो को ऊपर उछालने लगी। सन्तुष्ट
चित्त राज्य-परिषद ने बोधिसत्त्व को एक करोड धन दिया। राजा ने भी
धन की वर्षा करते हुए इसे बहुत सा धन तथा यश दिया।
इस प्रकार आदृत तथा सत्कृत होकर बोधिसत्त्व के वहाँ रहते समय सात
राजाओ ने यह जान कि अब असदिसकुमार वाराणसी में नही है, वाराणसी को
घेर लिया और सन्देस भेजा कि चाहे राज्य दें, चाहे युद्ध करें। राजा ने मरने
से भयभीत हो पूछा—"इस समय मेरा भाई कहाँ है?"
"एक सामन्त राजा की सेवा में है।"
उसने दूत भेजे—यदि भाई नहीं आएगा, तो मेरी जान नही बचेगी। जाओ
मेरी ओर से उनके चरणो में प्रणाम कर क्षमा माँग उन्हें लिवा कर आओ।
उन्होने जाकर बोधिसत्त्व को वह समाचार कहा। बोधिसत्व ने उस
राजा को पूछ वाराणसी लौट कर अपने भाई को आश्वासन दिया कि मत
डरें। फिर उसने एक तीर पर यह लिखा कि मैं असदिसकुमार आ गया हूँ।
दूसरा तीर चला कर सब की जान ले लूंगा। इसलिए जिन्हे जान प्यारी हो,
वह भाग जाएँ। उस तीर को उसने अट्टालिका पर चढ़ ऐसे चलाया कि वह