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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

Jataka Kathayen (Authentic Hindi Translation from Pali)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

१६८ [ २.१.१५७
करता। स्थविर ने यह सोच कि इसने मेरा बडा उपकार किया है पीछे मिले
सब वस्त्र उसी को देना उचित समझ दे डाले। उसने भी वह सब वस्त्र बांट
कर अपने गुरु-भाइयो को दिए।
वे सभी भिक्षु जिन्हें वस्त्र मिला वस्त्र के टुकडे टुकडे कर उन्हें रज कर्णिकार
पुष्प के सदृश काषाय वस्त्र पहन शास्ता के पास गए। वहां प्रणाम कर एक
ओर बैठे भिक्षु कहने लगे-
"भन्ते ! क्या श्रोतापन्न आर्य-श्रावक भी मुंह देखकर दान देते है ?"
"भिक्षुओ, आर्य-श्रावक मुंह देखकर दान नही देते।"
"भन्ते ! हमारे उपाध्याय धर्म-भण्डागारिक स्थविर ने हजार हजार की
कीमत के पांच सौ वस्त्र एक ही छोटी आयु के भिक्षु को दे दिए। उसने जो
उसे मिले बांट कर हमे दिए।"
"भिक्षुओ, आनन्द मुख देखकर दान नही देता। उस भिक्षु ने इसकी बहुत
सेवा की। उसने अपने उपकार का प्रत्युपकार करने के विचार से गुणवान होने
के ख्याल से, उचित होने से सोचा कि उपकारी का प्रत्युपकार करना चाहिए,
और इसी लिए अपनी कृतज्ञता प्रकट करने के लिए दिए। पुराने पण्डितों ने
भी अपना उपकार करने वाले का बदले मे उपकार किया है।" उनके प्रार्थना
करने पर पूर्व-जन्म की बात कही -
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
सिंह की योनि मे पैदा हो पर्वत-गुफा मे रहते थे।
उन्होने एक दिन गुफा से निकल पर्वत के नीचे की ओर देखा। उस पर्वत
के चारो ओर बडा भारी तालाब था। उस के एक (तरफ) ऊंची जगह पर
कडे दलदल के ऊपर कोमल हरी घास उगी थी। खरगोश, हरिण, और हलके
मृग उसके ऊपर विचर कर उसे खाते। उस दिन भी एक मृग उन तिनकों को
खाता हुआ घूम रहा था। सिंह उस मृग को पकडने के लिए पर्वत पर से उछल
कर मृग की तरफ कूदा ! मृग मरने के भय से डरकर चिल्लाता हुआ भाग
गया। सिंह वेग को न रोक सकने के कारण दलदल पर गिरकर नीचे चला
गया। उलट न आ सकने के कारण चारो पैर खंभे की तरह हो गए। उसे एक

गुण ] १६६

सप्ताह तक वही निराहार खडा रहना पडा।
एक सियार शिकार खोज रहा था। उसे देख भय से भागा। सिंह ने
उसे बुलाकर कहा—"भो ! सियार ! भाग मत। मै दलदल में फँसा हूँ।
मेरे जीवन की रक्षा कर।" सियार उस के पास जाकर बोला—"मै तो तुझे
निकालूँ, लेकिन डर लगता है कि तू निकलकर मुझे खा न जाए।
"डर मत। मै तुझे नही खाऊँगा। तेरा बडा उपकार करूँगा। मुझे
किसी उपाय से निकाल।"
सियार ने उससे प्रतिज्ञा करवा चारो पैरो के इर्द-गिर्द से दलदल हटा
चारो पैरो से चार नालियाँ पानी की ओर बना दीं। पानी ने घुस कर गारे को
नरम कर दिया।
उसी समय सियार ने सिंह के पेट के नीचे घुस कर चिल्लाया—
स्वामी ! जोर लगाएँ। स्वय सिंह के पेट में सिर से टक्कर लगाई।
सिंह जोर लगाने से गारे के ऊपर आया और कूद कर स्थल पर जा खडा
हुआ।
थोडी देर विश्राम कर, तालाब में उतर गारे को धो, स्नान कर सिंह ने
एक भैंसे का वध किया। उसे दाढो से चीर उसका मास उधेड सियार के आगे
रख कहा—'सौम्य ! ले खा। सियार के खा चुकने पर अपने खाया। सियार
ने एक मास-पेशी मुंह में ली।
शेर ने पूछा—"सौम्य ! यह किसके लिए ?"
सियार बोला—"तुम्हारी दासी है। यह उसके लिए।"
सिंह बोला—'ले ले।' स्वय भी सिंहनी के लिए मास लेकर उसने सियार
से कहा—"सौम्य ! आ अपने पर्वत के शिखर पर जाकर वहाँ से सखि
के निवास स्थान पर जाएँगे।" वहाँ पहुँच, मास खिला चुकने पर उसने सियार
और सियारनी को आश्वासन दिया—अब से मैं तुम्हारी देख-भाल करूँगा।
वह उन्हें अपन निवास स्थान पर ले गया। वहाँ गुफा के द्वार पर ही दूसरी
गुफा में बसाया।
उसके बाद से सिंह सिंहनी और सियारनी को छोड सियार के साथ शिकार
के लिए जाता। वहाँ नाना पशुओ को मार कर दोनो वही खाते। सिंहनी
और सियारनी को भी ला कर देते। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा।

१७० [ २.१.१५७

सिंहनी ने तथा सियारनी ने भी दो दो पुत्रो को जन्म दिया। वे सब इकट्ठे
रहने लगे।
एक दिन सिंहनी के मन में आया—यह सिंह सियार को, सियारनी को,
तथा उसके बच्चो को बहुत प्यार करता है। इसका सियारनी से सम्बन्ध अवश्य
होगा। इसी लिए उससे स्नेह करता है। मैं इसे कष्ट देकर, डराकर भगाऊँ।
जिस समय सिंह सियार को साथ ले शिकार के लिए जाता सिंहनी सियारनी
को डराती, धमकाती—तू यहाँ क्यो रहती है? यहाँ से भागती क्यो नही?
उसके बच्चे भी सियारनी के बच्चो को वैसे ही तग करते, धमकाते।
सियारनी ने सियार से सब हाल कहा और बोली—"पता नही, सिंहनी
सिंह के ही कहने से ऐसा व्यवहार करती है। हम यहाँ बहुत दिन रह चुके।
वह हमारी जान भी ले सकता है। अपने निवास स्थान पर ही चले।"
सियार ने उसकी बात सुन सिंह के पास आकर कहा—
"स्वामी ! हम तुम्हारे पास बहुत समय रहे। अधिक देर तक
समीप रहने वाले अप्रिय हो जाते हैं। हमारे शिकार के लिए चले जाने पर
सिंहनी सियारनी को तग करती है। उसे डराती है कि यहाँ क्यो रहती है?
यहाँ से भाग। सिंह-बच्चे भी सियार-बच्चो को डराते धमकाते है। यदि किसी
को किसी का अपने पास रहना अच्छा न लगे तो 'जाओ' कह कर उसे निकाल
देना चाहिए, तग करने की क्या जरूरत है।"
इतना कह यह पहली गाथा कही—
येन काम पणामेति धम्मो बलवत मिगो!
उन्नदन्ति विजानाहि जात सरणतो भयं ॥
[ हे सिंह ! बलवान् का यही स्वभाव है कि जहाँ चाहता है भगा देता है।
हे उन्नत दाँत वाले (सिंह) ! यह जान ले कि शरण-स्थल से ही भय पैदा हो
गया।]
येन कामं पणामेति धम्मो बलवतं बलवान अथवा ऐश्वर्यशाली अपने सेवक
को जिस दिशा में चाहता है उस दिशा में भगा देता है, निकाल देता है, यह
बलवानो का धर्म है। यह ऐश्वर्य-शालियो का स्वभाव है। यही परम्परा है।

गुण ] १७१
इस लिए यदि हमारा रहना अच्छा न लगता हो, तो हमें सीधा निकाल दे।
कष्ट देने से क्या लाभ ? —यही अर्थ प्रकट करने के लिए यह कहा। मिगो,
सिंह को सम्बोधन करता है। वह मृगराज होने से मृगो का मालिक है, इसी
लिए मिगी। उन्नदन्ति—यह भी उसी का सम्बोधन है। ऊँचे दांतो वाला
होने से उन्नदन्ति। उन्नतदन्ति, यह भी पाठ है। विजानाहि, यही ऐश्वर्य-
शालियो का स्वभाव है, यह जान लें। जात सरणतो भय, हमें तुमसे प्रतिष्ठा
मिली, इससे तुम्ही हमारे शरण। अब तुम्हारे ही पास से भय पैदा हो गया।
इस लिए हम अपने निवास-स्थान को जायेंगे।
दूसरा अर्थ—मिगी (सिंहनी) उन्नदन्ती मेरे बच्चो और स्त्री को ताडती
है। येन काम पणमेति, जिस जिस तरह से चाहता है उस उस तरह से निकाल
देता है, प्रर्वतित करता है तग करता है—इसे तू जान ले। इसमे हम क्या कर
सकते हैं ? धम्मो बलवत, यह बलवानो का स्वभाव है। हम जाते हैं।
किस लिए ? क्योकि जात सरणतो भय ।
उसकी बात सुनकर सिंह ने सिंहनी से पूछा—"भद्रे ! अमुक समय मे
शिकार के लिए गया था और सातवें दिन इस सियार और सियारनी के साथ
लोटा था, इसकी कुछ याद है ?"
"हाँ, याद है।"
'मेरे एक सप्ताह तक न आ सकने का कारण जानती है।"
"स्वामी ! नही जानती हूँ।"
'भद्रे ! मैं एक मृग को पकडने जाकर चूक कर दलदल में फँस गया।
उसमें से न निकल सकने के कारण सप्ताह भर भूखा खडा रहा। अरे, इस सियार
ने मेरे प्राण बचाए। यह मुझे जीवन-दान देने वाला मित्र है। जो मित्र का
धर्म पूरा कर सके वह मित्र दुर्बल नही माना जाता। इस के बाद मेरे मित्र,
मेरी सखी तथा उसके बच्चो का इस प्रकार अपमान न करना।"
इतना कह सिंह ने दूसरी गाथा कही—
अपिचेपि दुब्बलो मित्तो मित्तधम्मेसु तिट्ठति
सो जातको च बन्धू च सो मित्तो सो च मे सखा,
दाठिनि ! मातिमिन्र्ञत्थो सिगालो मम पाणदो ॥

अपि तिट्ठति, यदि स्थित रह सकता है । सो जातको च बन्धु च सो, मैत्री

१७२ [ २-१-१५८
[ यदि मित्र दुर्बल है, लेकिन वह मित्र के कर्तव्य को पूरा करता है तो वही
रिश्तेदार है, बन्धु है, मित्र है, सखा है । सिंहनी ! अपमान मत कर । सियार
मेरे प्राणो की रक्षा करने वाला है । ]
अपि चेपि, एक 'अपि' जोर डालने के लिए है, दूसरा 'अपि' सम्भावना
प्रकट करता है । अन्वय इस प्रकार है—दुब्बलो चेपि मित्तो मित्तधम्मेसु
अपि तिट्ठति, यदि स्थित रह सकता है । सो जातको च बन्धु च सो, मैत्री
चित्त होने से मित्तो । सो च मे सहायक होने से सखा । दाठिनि ! माति-
मञ्ञित्थो, भद्रे ! दाढ वाली ! सिंहनी ! मेर मित्र अथवा मेरी सखी
का अपमान न कर । यहु सिगालो मम पाजदो ।
उसने सिंह की बात सुन सियारनी से क्षमा माँगी । फिर उसके तथा उसके
बच्चो के साथ मिल जुल कर रहने लगी । सिंह-बच्चे भी सियार के बच्चो के
साथ खेलते हुए मौज करते हुए रहने लगे । माता पिता के मरने पर भी मैत्री
बनाए रख मिलजुल कर रहे । सात पीढ़ी तक उनकी मैत्री बराबर बनी रही ।
शास्ता ने यह धर्म देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर कोई श्रोतापन्न, कोई
सकृदागामी कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हुए ।
उस समय सियार आनन्द था । सिंह तो मै ही था ।
१५८. सुहनु जातक
“नयिदं विसमसीलेन ”यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय दो
भिक्षुओ के बारे में जिनका स्वभाव बडा उद्दण्ड था, कही ।

क. वर्तमान कथा

सुहनु ] १७३
क. वर्तमान कथा
उस समय जेतवन में भी एक उद्दण्ड, कठोर, दुस्साहसी भिक्षु था और
एक दूसरा देहात (= जनपद) में भी था ।
एक दिन देहात का भिक्षु किसी काम से जेतवन गया । श्रामणेर और
छोटी आयु के भिक्षु उसके चण्ड-स्वभाव की बात जानते थे । उन्होने दोनो
उद्दण्ड भिक्षुओं का झगडा देखने की इच्छा से कुतूहलवश उस भिक्षु को जेतवन
वासी भिक्षु के परिवेण में भेज दिया ।
दोनो उद्दण्ड भिक्षु एक दूसरे को देखते ही परस्पर एक हो गए, मित्र बन
गए । वह एक दूसरे के हाथ, पैर, पीठ दबाना आदि करने लगे ।
भिक्षुओ ने धर्म सभा मे बात चलाई—"भिक्षुओ ! उद्दण्ड भिक्षु दूसरो
के प्रति तो बड़े उद्दण्ड हैं, कठोर है तथा दुस्साहसी है लेकिन दोनो परस्पर
एक हो गए, मेल कर लिया, प्रेमी बन गए ।"
शास्ता ने आकर पूछा—'भिक्षुओ ! इस समय बैठे क्या बात चीत कर
रहे हो ?'
"अमुक बातचीत ।"
"भिक्षुओ ! केवल अभी नही पहले भी यह औरो के प्रति तो उद्दण्ड,
कठोर तथा दुस्साहसी थे लेकिन दोनो परस्पर एक हो गए थे, मेल से रहते थे
तथा प्रेमी थे ।
इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय मे बाराणसी मे ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
उस राजा के सर्वार्थसाधक आमात्य हुए। वे उसे अर्थ तथा धर्म की बातो में
सलाह देते थे । वह राजा थोडा लोभी स्वभाव का था । उसके यहाँ महासोण
नाम का एक दुष्ट घोडा था ।
गान्धार (= उत्तरापथ) देश के घोडो के व्यापारी पाँच सौ घोडे लाए ।
राजा को घोडो के आने की खबर दी गई ।
पहले बोधिसत्त्व घोडो की कीमत लगा उसे कम न कर दिलवाते थे ।

१७४ [ २-१.१५८
राजा को उससे संतोप न होता था। इस लिए उसने दूसरे धामात्य को बुलाकर
कहा—"तात ! तू घोडो की कीमत लगा । लेकिन कीमत लगाने से पहले
महासोण को ऐसा कर कि वह इन घोडो में जाकर उन्हें काट कर जख्मी कर
दे । जब ये दुर्बल हो जायें और उनका मूल्य घट जाए, तब उनकी कीमत
लगाना।"
उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर वैसा ही किया । घोड़ो के व्यापारियो ने,
असन्तुष्ट हो, उसने जो किया वह बोधिसत्त्व से कहा ।
बोधिसत्त्व ने पूछा—"क्या तुम्हारे नगर में दुष्ट घोड़ा नही है ?"
"स्वामी ! सुहनु नाम का दुष्ट, चण्ड, कडे स्वभाव का घोड़ा है।"
"अच्छा तो फिर आते समय उस घोड़े को लेते आना।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । फिर आते समय उस घोड़े को
साथ लिवाकर आए ।
राजा ने सुना कि घोडो के व्यापारी आए । उसने खिडकी खोलकर
घोड़ो को देखा और महासोण को छुड़वा दिया । घोड़ो के व्यापारियो ने भी
महासोण को आते देख सुहनु को छोड़ा । वे दोनो पास आने पर एक दूसरे का
शरीर चाटने लगे । राजा ने बोधिसत्त्व से पूछा—"मित्र ! यह दो घोड़े
दूसरों के प्रति चण्ड हैं, कडे स्वभाव के हैं, दुस्साहसी हैं । दूसरे घोड़ो को
काट कर रोगी कर देते हैं। लेकिन एक दूसरे के शरीर को चाटते हुए आनन्द-
पूर्वक खड़े हैं। यह क्या बात है ?"
बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया, "महाराज ! यह परस्पर विरोधी स्वभाव
के नही हैं, समान स्वभाव के हैं, समान धातु के हैं" और यह दो गाथाएँ कहीँ—
नयिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह,
सुहनूंपि सादिसोयेव यो सोणस्स स गोचरो ॥
पक्खन्दिना पलब्भेन निच्चं सन्दान खादिना,
समेति पापं पापेन समेति असत्ता अस ॥
[ सुहनु और सोण का स्वभाव विरोधी नही है । जैसा सुहनु है, वैसा ही
सोण । उछल-कूद करने वाले, प्रगल्भ तथा हमेशा लगाम खा जाने वाले
इस घोड़े का पापकर्म और असत्कर्म दूसरे के बराबर हैं] ।

सुहनु ] १७५
यदपिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह, यह जो सुहनु दुष्ट घोडा सोण
के साथ प्रेम करता है, यह अपने विरुद्ध स्वभाव वाले के साथ नहीं। यह अपने
समान शील वाल के ही साथ करता है। यह दोनो दुष्ट स्वभाव वाले होने से
समान स्वभाव वाले या समान धातु वाले हैं। सुहनू'पि तादिसोयेव यो
सोणस्स सगोचरो, जैसा सोण सुहनु भी वैसा ही। यो सोणस्स सगोचरो, जो
सोण की चरने की जगह है, वही उसकी भी। जैसे सोण अश्व-गोचर है अश्वो
को काटता हुआ ही चरता है, उसी तरह सुहनु भी। इस प्रकार उनकी समान
गोचरता प्रदर्शित की गई है। उनके आचरण की एकता दिखाने के लिए
पक्खन्दिना आदि कहा गया है।
पक्खन्दिना, अश्वो के ऊपर कूद पडने के स्वभाव वाला। पगलब्भेन, काय-
प्रगल्भता आदि दुश्शीलता से युक्त। निच्च संदानखादिना, हमेशा अपनी लगाम
खा जाने की आदत वाले से। समेति पाप पापेन, इन दोनो में से एक का पाप,
दुष्टता दूसरे के बराबर है। असन्ता अस इन दोनो मे से एक दुष्ट दुराचारी
के साथ दूसरे का अस बुरा काम बराबरी करता है। जैसे गूंह आदि के साथ
गूंह आदि मिल जाता है, कोई अन्तर नही रहता, वैसा ही।
इतना कहकर बोधिसत्त्व ने राजा को उपदेश दिया—'महाराज !
राजा को अधिक लोभी नही होना चाहिए। दूसरो का धन नष्ट करना उचित
नही।' फिर घोडो की कीमत लगवा उचित मूल्य दिलवाया।
घोडो के व्यापारी यथोचित मूल्य पाकर सतुष्ट लौटे। राजा भी बोधि-
सत्त्व के उपदेशानुसार रह कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय दो घोड यह दो दुष्ट भिक्षु थे। राजा आनन्द था। पण्डित
थामात्य तो में ही था।

मोर ] १७७
पर्वत-शृंखला में एक दण्डक-हिरण्य पर्वत के नीचे रहना शुरू किया। रात्रि का
प्रभात होने पर वह पर्वत के शिखर पर बैठ, उगते सूर्य्य को देख अपने घूमने
फिरने की जगह को सुरक्षित करने के लिए ब्रह्म (महान्-) मन्त्र बनाता हुआ
यह कहता—
उदेतयं चक्खुमा एकराजा
हरिस्सवण्णो पठविप्पभासो
तं तं नमस्सामि हरिस्सवण्णं पठविप्पभासं
तयज्ज गुत्ता विहरेमु दिवसं ॥
[ यह चक्षुमान एक राजा जिसका रंग सुनहरी है और जो पृथ्वी को प्रका-
शित करता है उदय हो रहा है। मैं इस पृथ्वी को प्रकाशित करने वाले, सुवर्ण
वर्ण को नमस्कार करता हूँ। आज इसके द्वारा रक्षित होकर दिन में घूमें।]
उदेति, प्राचीन लोकधातु से ऊपर उठता है। चक्खुमा, सारे ब्रह्माण्ड
के निवासियो के अन्धकार को दूर कर आँख प्राप्त कराने से वह जिस आँख
का देने वाला हुआ उसी आँख वाला होने से चक्खुमा। एकराजा, सारे चक्रवाल
में प्रकाश फैलाने वालो में सर्वश्रेष्ठ होने से एकराजा। हरिसवण्णो, हरि जैसा
रंग, अर्थात् स्वर्ण वर्ण। पठवि को प्रकाशित करता है, इस लिए पठविप्प-
भासो। तं तं नमस्सामि, इसलिए ऐसे उन्हें नमस्कार करता हूँ, वन्दना करता
हूँ। तयज्जगुत्ता विहरेमु दिवस, उससे सुरक्षित होकर, उसकी हिफाजत में
हम आज का दिन सुखपूर्वक उठ बैठ चल फिर कर गुजारें।
इस प्रकार बोधिसत्त्व इस गाथा से सूर्य्य को नमस्कार कर इस दूसरी
गाथा से अतीत काल के परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्धो तथा बुद्ध-गुणो को
स्मरण करते—
ये ब्राह्मणा वेदगु सब्ब धम्मे
ते मे नमो ते च मं पालयन्तु
नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया
नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया
इमं सो परित्तं कत्वा मोरो चरति एसना ॥
१२

१७८ [ २-१.१५६
[ जो ब्राह्मण सब धर्मों के जानने वाले हैं, उन्हें मेरा नमस्कार है। वे
मेरी रक्षा करें। बुद्धो को नमस्कार है। बोधि को नमस्कार है। विमुक्तो
को नमस्कार है। विमुक्ति को नमस्कार है—वह मोर इसे अपनी रक्षा
(का साधन) बना खोजता रहता था।]
ये ब्राह्मणा, जिन्होंने पापो को बहा दिया हैं, जो विशुद्ध होने से ब्राह्मण
कहे गए हैं। वेदगु, जो वेद के पार गए वह भी वेदगु और वेद द्वारा जो पार
गए वह भी वेदगु। यहाँ मतलब है कि जितने सस्कृत असस्कृत धर्म हैं उन सभी
को प्रकट करके गए इस लिए वेदगु। तभी कहा गया है—सब्ब धम्मे।
सब स्कन्ध, आयतन, धातु, धर्मों को स्वलक्षण तथा सामान्य लक्षण की दृष्टि
से अपने ज्ञान को प्रकट करके गए अथवा तीनो मारो के मस्तक को मर्दित कर
दस सहस्र लोकधातु को उन्नादित कर बोधि-वृक्ष के नीचे सम्यक् सम्बुद्धत्व
प्राप्त कर ससार के पार पहुँचे। ते मे नमो, वे मेरे इस नमस्कार को स्वीकार
करें। ते च म पालयन्तु इस प्रकार मुझसे नमस्कृत वे भगवान् मेरी पालना
करें, रक्षा करें, हिफाजत करें। नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया नमो विमुत्तानं
नमो विमुत्तिया, यह मेरा नमस्कार अतीत में परिनिर्वाण को प्राप्त हुए बुद्धो
को पहुँचे, उन्ही की चार मार्गो तथा चार फलो का ज्ञान स्वरूप जो बोधि है
उस बोधि को पहुँचे, उन्हीं की अर्हत्व-फल रूपी विमुक्ति को प्राप्त करने वाले
विमुक्तो को पहुंचे, जो उनकी पाँच प्रकार की विमुक्ति है अर्थात् तदङ्ग विमुक्ति
विक्खम्भन विमुक्ति, समुच्छेद विमुक्ति, पटिप्पस्सद्ध विमुक्ति, तथा निस्सरण
विमुक्ति; उस विमुक्ति को भी पहुँचे। इम सो परित्तं कत्वा मोरो चरति
एसना, यह दो पद शास्ता ने बुद्धत्व प्राप्त करके कहे। इनका अर्थ है 'भिक्षुओ
वह मोर इसे परित्राण बना, उसे रक्षा का साधन बना अपनी गोचर-भूमि में
फल-फूल के लिए नाना प्रकार से खोजता फिरता था।'
इस प्रकार दिन भर घूम कर शाम को पर्वत के शिखर पर बैठ डूबते हुए
सूर्य्य को देख बुद्धगुणो का ध्यान कर निवास-स्थान की रक्षा के लिए फिर ब्रह्म-
मन्त्र बाँधता हुआ 'अपेतय' आदि कहता—

मोर ] १७६
अपेतयं चक्खुमा एकराजा
हरिस्सवण्णो पठविप्पभासो
तं तं नमस्सामि हरिस्सवण्णं पठविप्पभास
तयज्ज गुत्ता विहरेमु रत्तिं ॥
ये ब्राह्मणा वेदगु सब्ब धम्मे
ते मे नमो ते च मं पालयन्तु
नमत्थु बुद्धान नमत्थु बोधिया
नमो विमुत्तानं नमो विमुत्तिया
इमं सो परित्तं कत्वा मोरो वासमकप्पयि ॥
[ये ....अस्त हो रहा है। इसे रक्षा (का साधन) बना वह मोर
रहने को गया]।
अपेति, जाता है, अस्त को प्राप्त होता है। इमं सो परित्तं कत्वा मोरो
वासमकप्पयि, यह भी बुद्धत्व प्राप्त करने पर कहा। इसका अर्थ है—
भिक्षुओ ! वह मोर इसे परित्राण बना, इसे रक्षा (का साधन) बना, अपने
निवासस्थान पर रहने लगा। इस परित्राण के प्रताप से उसे न दिन में डर
लगा न रात में, न रोमान्च हुआ।
उस समय बाराणसी से कुछ ही दूर पर शिकारियों का एक गांव था।
वहाँ के निवासी एक शिकारी ने हिमालय-प्रदेश में घूमते हुए उस दण्डक-हिरण्य
पर्वत पर बैठे हुए बोधिसत्व को देख आकर पुत्र को कहा।
बाराणसी-नरेश की खेमा नामक देवी ने स्वप्न में देखा कि सुनहरी रंग का
मोर धर्मोपदेश कर रहा है। उसने राजा से कहा—"देव ! मैं सुनहरी रंग
के मोर से धर्मोपदेश सुनना चाहती हूँ।"
राजा ने आमात्यों से पूछा। आमात्य बोले—ब्राह्मण जानते होंगे।
ब्राह्मणों ने कहा—सुनहरी रंग के मोर होते हैं। "कहाँ होते हैं" ? पूछने
पर बोले—"शिकारी जानते होंगे।"
राजा ने शिकारियों को इकट्ठा कर पूछा। वह शिकारी-पुत्र बोला—

१८० [ २.१.१५६
"महाराज ! हाँ । दण्डक हिरण्य नाम का पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का
मोर रहता है ।"
"तो उसे बिना मारे, जीवित ही बांध कर लाओ ।"
शिकारी ने जाकर उसके घूमने की भूमि पर जाल फैलाया । मोर के
आने की जगह पर भी जाल न फसा । शिकारी उसे न पकड़ सका । सात साल
घूमते रह कर वह वही मर गया ।
खेमा देवी की भी इच्छा पूरी न हुई । वह भी मर गई ।
राजा को क्रोध आया कि मोर के कारण मेरी रानी की जान गई । उसने
एक सोने के पट्टे पर लिखाया—"हिमालय प्रदेश मे दण्डक-हिरण्य नाम का
पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का मोर रहता है । जो उसका मांस खाते हैं वह
अजर अमर हो जाते हैं।" उस सोने के पट्टे को उसने एक सन्दूकची में रखवा
दिया ।
उसके मरने पर दूसरे राजा ने उस स्वर्ण-पट्टे को पढकर अजर अमर होने
को इच्छा से दूसरे शिकारी को भेजा । वह भी जाकर बोधिसत्व को न पकड़
सका । वही मर गया । इस प्रकार छह राज-पीडियां गई ।
सातवें राजा ने राज्य पाकर एक शिकारी को भेजा । उसने जाकर देखा
कि बोधिसत्त्व की चलने फिरन की जगह पर भी फंदा नही लगता । वह
समझ गया कि अपनी रक्षा करके ही मोर चरने आता है । वह देहात में आया
और वहाँ से एक मोरनी ले, उसे ऐसी शिक्षा दी कि वह ताली बजाने पर
नाचने लगती और चुटकी बजाने पर आवाज लगाती । ऐसा सिखा कर वह
मोरनी को लेकर गया । प्रात काल ही जब अभी मोर ने परित्राण द्वारा अपने
को रक्षित नही किया था उसने फंदे के खूंटे गाड फंदा फैला मोरनी से आवाज
लगवाई । मोर ने जब मोरनी का असाधारण शब्द सुना तो कामासक्त हो
परित्राण न कर सकने के कारण जाकर फंदे में फँस गया ।
शिकारी ने उसे पकड ले जाकर वाराणसी के राजा को दिया । राजा ने
उसका सौंदर्य देख प्रसन्न हो उसे आसन दिलाया ।
बोधिसत्व ने बिछे आसन पर बैठ, पूछा—"महाराज ! मुझे क्यो
पकड़वाया ?"
"जो तेरा मांस खाते हैं, वह अजर अमर हो जाते है । मैंने तेरा मांस

मोर ] १८१
खाकर अजर अमर होने की इच्छा से तुझे पकड़वाया है ?"
"महाराज ! मेरा मास खाने वाले तो अमर हो, और मुझे मरना होगा ?"
"हाँ, मरना होगा ।"
"जब मैं मरूँगा, तो मेरा मास खाने वाले किस लिए नहीं मरेंगे ?"
"तू सुनहरी रंग का है, इसलिए तेरा मास खाने वाले अजर अमर होंगे।"
"महाराज ! मैं यूँ ही सुनहरी रंग का पैदा नहीं हुआ हूँ । पहले मैं
इसी नगर में चक्रवर्ती राजा था । मैने अपने आप भी पांच शीलो की रक्षा की
और सारे चक्रवाल के निवासियो से भी करवाई । मर कर मैं त्रयोत्रिंश लोक
म पैदा हुआ । वहाँ आयु भर रह कर एक दूसरे पापकर्म के फलस्वरूप मोर
होकर पैदा हुआ, लेकिन पुराने सदाचार के प्रताप से सुनहरी रंग का
हुआ ।"
"तू चक्रवर्ती होकर (पच-) शील की रक्षा कर उसी के फलस्वरूप सुन-
हरी रंग का हुआ, इस बात पर हम कैसे विश्वास करें ? तेरा कोई साक्षी है ?"
"महाराज ! है ।"
"कौन है ?"
"महाराज ! जब मैं चक्रवर्ती था, तो रत्नमय रथ में बैठ कर आकाश
में विचरता था । वह मेरा रथ मङ्गल-पुष्करिणी के अन्दर जमीन में गड़वाया
हुआ है । उसे मङ्गल पुष्करिणी से निकलवाये । वह रथ मेरे कथन का साक्षी
होगा ।"
राजा ने 'अच्छा' कह स्वीकार कर पुष्करिणी मे से पानी निकलवा रथ
को बाहर करवाया । तब उसे बोधिसत्त्व की बात पर विश्वास हुआ ।
बोधिसत्त्व ने राजा को धर्म उपदेश दिया—"महाराज ! अमृत महा
निर्वाण को छोड़ शेष जितने भी सस्कृत धर्म हैं, वे सब पैदा होकर अभाव को
प्राप्त होते हैं, अनित्य हैं, क्षय होने वाले हैं, व्यय होने वाले हैं।" फिर राजा
को पच-शील में प्रतिष्ठित किया ।
राजा ने प्रसन्न हो बोधिसत्त्व की राज्य से पूजा की और बड़ा सत्कार
किया । उसने राज्य राजा को ही वापिस लौटा कुछ दिन रह कर राजा को
उपदेश दिया कि महाराज ! अप्रमादी रह ।
फिर आकाश में उड़कर दण्डक हिरण्य नाम के पर्वत को ही चला गया।

शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का

१८२ [ २.१.१६०
राजा भी बोधिसत्त्व के उपदेशानुसार चल दान आदि पुण्य कर्म कर
कर्मानुसार परलोक सिधारा।
शास्ता ने यह धर्मदेशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया।
सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर उद्विग्न-चित्त भिक्षु अर्हत्व में
प्रतिष्ठित हुआ।
उस समय राजा आनन्द था। सुनहरी रंग का मोर तो मैं ही था।

१६०. विनीलक जातक

“एवमेव मून राजान...” यह शास्ता ने वेळुवन में रहते समय देवदत्त
के बुद्ध की नकल करने के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

जब देवदत्त गया-शीर्ष पर गए हुए दोनो प्रधान श्रावको के सामने बुद्ध
का रंग-ढंग बनाकर लेट रहा, तो दोनो स्थविर धर्मोपदेश दे अपने शिष्यो को
लेकर वेळुवन चले आए।
शास्ता ने पूछा-“सारिपुत्त ! तुम्हें देखकर देवदत्त ने क्या किया ?”
“भन्ते ! सुगत का रंग-ढंग दिखाकर महाविनाश को प्राप्त हुआ।”
“सारिपुत्त ! न केवल अभी देवदत्त मेरी नकल करके विनाश को प्राप्त
हुआ है, पहले भी प्राप्त हुआ है”। इतना कह पूर्वजन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पूर्व समय में विदेह राष्ट्र में मिथिला में विदेहराज के राज्य करने के समय
बोधिसत्त्व उसकी पटरानी की कोख से पैदा हुए। बड़े होने पर तक्षशिला

विनीलक ] १८३

जाकर सब विद्याए सीखी । पिता के मरने पर राज्य गद्दी पर बैठे।
उस समय एक स्वर्ण हंसराज का चुगने की जगह पर एक कौवी से सहवास
हो गया । उसे पुत्र हुआ । वह न माता के सदृश था, न पिता के सदृश ।
उसका रूप रंग भद्दा नीला होने से उसका नाम विनीलक ही हो गया ।
हंसराजा सदैव पुत्र को देखने जाता । उसके दो दूसरे हंस-बच्चे पुत्र थे।
उन्होंने पिता को हमेशा बस्ती की ओर जाते हुए देखकर पूछा—"तात !
तुम हमेशा बस्ती की ओर क्यो जाते हो ?"
"तात ! एक कौंवी से सहवास होकर मुझे एक पुत्र हुआ । उसका नाम
विनीलक है । मैं उसे देखने जाता हूँ।"
"वह कहाँ रहते है ?"
'विदेह राष्ट्र में मिथिला के पास अमुक जगह पर एक ताड के वृक्ष पर रहते
हैं।"
"तात ! बस्ती सशंकित जगह है । वहाँ खतरा होता है । तुम न जाओ ।
हम जाकर उसे ले आएगे।"
दोनो हंस-बच्चे पिता के बताए हुए निशान से वहाँ पहुँच उस विनीलक को
एक डण्डे पर बिठा चोच से डण्डे के सिरो को पकड मिथिला नगर के ऊपर से
चले ।
उस समय विदेह राज सर्वश्वेत चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर
की परिक्रमा कर रहे थे । विनीलक ने उसे देख मन में कहा—"मुझ में विदेह-
राज में क्या अन्तर हैं ? यह चार सैन्धव घोडो वाले रथ में बैठकर नगर में
घूमता है । मै हंस जुते रथ में बैठकर जा रहा हूँ।" उसने आकाश से जाते
हुए यह गाथा कही—
एवमेव नून राजान वेदेह मिचिलग्गहं,
अस्सा वहन्ति आजञ्जा यथा हंसा विनीलकं ॥
[ जैसे हंस विनीलक को ढो रहे हैं उसी तरह से श्रेष्ठ घोडे मिथिला के
विदेहराजा (के रथ) को खीचते हैं ।]
एवमेव, इसी तरह, नून, सर्वल्प विकल्प विषयक निपात है । 'निश्चय से'
भी ठीक अर्थ है । वेदेह, विदेह राष्ट्र के स्वामी को । मिथिलग्गह, मिथिलागेह

१८४ [ २.१.१६०
मिथिला में घर लेकर रहने वाला। आज्ञञ्जा, कारण, अकारण जानने वाले,
यथा हंसा विनीलकं, जैसे यह हंस मुझ विनीलक को ढो रहे हैं, उसी प्रकार
खींच रहे हैं।
हंस-बच्चों ने उसकी बात सुनी तो उन्हें क्रोध आया। उन्होंने सोचा
इसे यही गिरा जायें। लेकिन फिर सोचा ऐसा करने से हमारा पिता हमें क्या
कहेगा ? उसकी निन्दा के डर से वे उसे पिता के पास ले गए और उसकी
करतूत पिता से कही।
पिता को क्रोध आया। वह बोला—'क्या तू मेरे पुत्रों से बढ़कर है जो
उनको नीचा दिखा रथ में जुतने वाले घोडो के समान बनाता है ? अपनी
बिसात नही जानता ? यह स्थान तेरे योग्य नही है। जहाँ तेरी माँ रहती है,
वहीं जा।' इस प्रकार धमका कर दूसरी गाथा कही—
विनील ! दुग्गं भजसि अभूमिं तात ! सेवसि,
गामन्तिकानि सेवस्सु एतं मातालयं तव ॥
[विनील ! तू दुर्ग में रहता है ) तात ! तू अयोग्य स्थान में रहता है।
तू ग्राम के आसपास रह। वह तेरा मातृ-गृह है।]
विनील उसे नाम से बुलाता है। दुग्गं भजसि, इनके साथ गिरि-दुर्ग
में रहता है। अभूमिं तात ! सेवसि तात ! गिरि विषम स्थान, तेरे लिए
अयोग्य स्थान है। तू अभूमि में वास करता है। एतं मातालयं तव, यह
ग्राम के सिरे पर जो कूड़ा फेंकने की जगह है तथा कच्चा श्मशान है वही तेरी
माता का निवास-स्थान है। तू वहीं जा।
इस प्रकार उसे धमका कर पुत्रों को आज्ञा दी—जाओ, इसे मिथिला
नगर की कूड़ा डालने की जगह पर ही उतार आओ। उन्होने वैसा ही किया।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय विनीलक देवदत्त था। दो हंस-बच्चे दो अग्र-श्रावक थे।
पिता आनन्द था। विदेहराज तो मैं ही था।

१६१. इन्दसमानगोत्त जातक

दूसरा परिच्छेद
२. सन्थव वर्ग
१६१. इन्दसमानगोत्त जातक
“न सन्थयं कापुरिसेन कयिरा ००” यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते
समय एक ऐसे भिक्षु के बारे में कही जो किसी की बात न मानता था।
क. वर्तमान कथा
उसकी कथा नौवें परिच्छेद में गिज्झ जातक¹ में आएगी। शास्ता ने
उस भिक्षु को कहा—हे भिक्षु ! तूने पहले भी किसी की बात न मानने वाला
होने से पण्डितों का कहना न माना और मस्त हाथी के पैरो से रौंदा जाकर
चूर चूर हुआ। इतना कह पूर्व जन्म की कथा कही—
ख. अतीत कथा
पूर्व समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्त्व
ब्राह्मणकुल में पैदा हुए। बड़े होने पर घर बार छोड़ ऋषियों के ढंग की प्रव्रज्या
ग्रहण कर पाँच सौ ऋषियों के दल का नेता बन हिमालय प्रदेश में रहने लगे।
उन तपस्वियों में एक इन्दसगोत्त नाम का तपस्वी था—किसी की बात न
मानता था, किसी का कहना न करता था।
उसने एक हाथी-बच्चा पाल रक्खा था। बोधिसत्त्व ने सुना तो उसे
बुलाकर पूछा—‘सचमुच ! तू हाथी-बच्चे को पाल-पोस रहा है ?’


¹ गिज्झ जातक (४२७)

१८६ [ २.२.१६१
'सचमुच आचार्य ! एक हाथी-बच्चा है, जिसकी माँ मर गई है, उसे '
पोस रहा हूँ।'
'हाथी बड़े होने पर पालन-पोषण करने वाले को ही मारते हैं, तू उसे
मत पोस।'
'आचार्य ! उसके बिना नहीं रह सकता।'
'अच्छा ! तो पता लगेगा।'
उससे पोसा जाकर वह हाथी-बच्चा आगे चलकर बड़े भारी शरीर वाला
हो गया।
एक समय वे ऋषिगण जंगल से फल-मूल लाने के लिए दूर चले गए
और कुछ दिन वहीं रहे। हाथी को श्रेष्ठ दक्षिण हवा लगी तो उसका मद
फूट पड़ा। उसने उस तपस्वी की पर्णकुटी नष्ट कर डाली। पानी का घड़ा
फोड़ दिया। पत्थर का तख्ता फेंक दिया। आलम्बन-तख्ता' नोच डाला।
फिर उस तापस्वी को मार डालकर ही जाने के विचार से एक घनी जगह में
छिपकर उसके आने के रास्ते की ओर देखता हुआ खड़ा रहा।
इन्दसगोत्त अपना फल-मूल ले, सबके आगे आगे आ रहा था। उसे देख
वह साधारण स्वभाव से ही उसके पास गया।
हाथी ने घनी जगह से निकल, उसे सूण्ड से पकड़, जमीन पर गिरा, सिर
पैर से दबा मार डाला। फिर उसे मसलता हुआ क्रौञ्चनाद करके जंगल में
चला गया। शेष तपस्वियो ने बोधिसत्व से यह समाचार कहा। बोधिसत्त्व
ने यह कहते हुए कि बुरे आदमी से दोस्ती नहीं करनी चाहिए, यह गाथा कही—
न सन्थवं पापपुरिसेन कयिरा
अरियो अनरियेन पजानमत्थं
चिरानुवुत्थो पि करोति पापं
गजो यथा इन्दसमानगोत्तं ॥
यं ह्येव जञ्जा सदिसो मर्म
सीलेन पञ्ञाय सुतेन चापि

' जिसके सहारे से बैठ सकें।

इन्दसमानगोत्त ] १८७
तेनेव मेत्तिं कयिराथ सद्धिं
सुखावहो सप्पुरिसेन सङ्गमो ॥
[ श्रेष्ठ आदमी अर्थ-अनर्थ को जानता हुआ बुरे आदमी से दोस्ती न करे।
चिरकाल तक साथ रह कर भी बुरा आदमी बुराई करता है, जैसे हाथी ने
इन्द्रसमान गोत्र की बुराई की।
जिसके सदाचार, प्रज्ञा तथा ज्ञान को अपने बराबर का समझे, उसीके
साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के साथ की गई मैत्री सुख को देने वाली होती है।]
न मन्थय कापुरिसेन कयिरा, घृणित क्रोधी आदमी के साथ आसक्ति
वा मैत्री न करे। अरियो अनरियेन पजानमत्थ; आर्य चार प्रकार के होते
हे (१) आचार आर्य, (२) लिङ्ग-आर्य, (३) दर्शन आर्य, (४) प्रतिवेध-
आर्य। इनमें यहाँ आचार्यार्य आर्य से मतलब है। जो अर्थ को जानता है
अर्थ को पहचानता है, आचार में स्थित है—ऐसा आर्य-पुद्गल, अनार्य,
निर्लज्ज, दुश्शील के साथ मैत्री न कर। क्या ? चिरानुवुत्थोपि करोति पापं,
क्योंकि अनार्य चिरकाल तक एक साथ रहकर भी, उस एक साथ रहने का
ख्याल न कर पाप, पाप-कर्म, बुरा-कर्म करता है। जैसे क्या ? गजो यथा
इन्दसमामगोत्त जैसे उस हाथी ने इन्द्रसमानगोत्र को मार कर पाप किया।
यं त्वेव जञ्जा सदिसो मम, इत्यादि में जिस आदमी को जाने कि यह
आदमी शील आदि में मेरे समान है, उसीके साथ मैत्री करे। सत्पुरुष के
साथ मेल जोल सुखदायी होता है।
इस प्रकार बोधिसत्त्व ने उपदेश दिया कि बात न मानने वाला नही होना
चाहिए, कहना मानने वाला होना चाहिए। यूँ ऋषिगण को उपदेश दे इन्द्र
समान गोत्र का शरीर-कृत्य करवा ब्रह्म विहारों की भावना करते हुए वह
ब्रह्म लोकगामी हुए।
शास्ता ने यह धर्म-देशना ला जातक का मेल बैठाया।
उस समय इन्दसमानगोत्त यह बात न मानने वाला भिक्षु था। ऋषि-
गण का शास्ता मे ही था।

१६२. सन्थव जातक

१८८
[ २.२.१६२

१६२. सन्थव जातक

“न सन्थवस्मा परमत्थि पापियो. .” यह शास्ता ने जेतवन में रहते
समय अग्नि-हवन करने के बारे में कही।

क. वर्तमान कथा

इसकी कथा वैसी ही है जैसी नङ्गुट्ठ जातक¹ में है। भिक्षुओ न उन्ह
अग्नि-हवन करते देख भगवान् से पूछा—"भन्ते ! जटिल-साधु नाना प्रकार
के मिथ्या-तप करते हैं। इनसे कुछ उन्नति होती है ?" शास्ता ने उत्तर दिया—
“भिक्षुओ, इससे कुछ लाभ नहीं। पुराने पण्डितों ने अग्नि-हवन करने से
उन्नति होगी समझ चिरकाल तक अग्नि-हवन किया। लेकिन जब उससे
हानि ही होनी देखी, तो उन्होंने उसे पानी डालकर बुझा दिया और शाखा
आदि से पीटकर चले गए। फिर मुड़कर उस तरफ देखा तक नहीं।" इतना
कह पूर्व-जन्म की कथा कही—

ख. अतीत कथा

पुराने समय में बाराणसी में ब्रह्मदत्त के राज्य करने के समय बोधिसत्व
ब्राह्मण कुल में पैदा हुए। माता पिता ने उसके पैदा होने के दिन से अग्नि
सभाल कर रख, उसके सोलह वर्ष का होने पर पूछा—'तात ! जन्म दिन
से रखी हुई अग्नि लेकर जंगल में जा अग्नि की परिचर्या करोगे ? अथवा
तीनों वेद सीखकर कुटुम्ब का पालन करते हुए घर पर रहोगे ?’


¹ नङ्गुट्ठ जातक (१४४)