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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१७२ [ २-१-१५८
[ यदि मित्र दुर्बल है, लेकिन वह मित्र के कर्तव्य को पूरा करता है तो वही
रिश्तेदार है, बन्धु है, मित्र है, सखा है । सिंहनी ! अपमान मत कर । सियार
मेरे प्राणो की रक्षा करने वाला है । ]
अपि चेपि, एक 'अपि' जोर डालने के लिए है, दूसरा 'अपि' सम्भावना
प्रकट करता है । अन्वय इस प्रकार है—दुब्बलो चेपि मित्तो मित्तधम्मेसु
अपि तिट्ठति, यदि स्थित रह सकता है । सो जातको च बन्धु च सो, मैत्री
चित्त होने से मित्तो । सो च मे सहायक होने से सखा । दाठिनि ! माति-
मञ्ञित्थो, भद्रे ! दाढ वाली ! सिंहनी ! मेर मित्र अथवा मेरी सखी
का अपमान न कर । यहु सिगालो मम पाजदो ।
उसने सिंह की बात सुन सियारनी से क्षमा माँगी । फिर उसके तथा उसके
बच्चो के साथ मिल जुल कर रहने लगी । सिंह-बच्चे भी सियार के बच्चो के
साथ खेलते हुए मौज करते हुए रहने लगे । माता पिता के मरने पर भी मैत्री
बनाए रख मिलजुल कर रहे । सात पीढ़ी तक उनकी मैत्री बराबर बनी रही ।
शास्ता ने यह धर्म देशना ला आर्य-सत्यों को प्रकाशित कर जातक का
मेल बैठाया । सत्यों का प्रकाशन समाप्त होने पर कोई श्रोतापन्न, कोई
सकृदागामी कोई अनागामी तथा कोई अर्हत हुए ।
उस समय सियार आनन्द था । सिंह तो मै ही था ।
१५८. सुहनु जातक
“नयिदं विसमसीलेन ”यह शास्ता ने जेतवन में विहार करते समय दो
भिक्षुओ के बारे में जिनका स्वभाव बडा उद्दण्ड था, कही ।