जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)
भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा
स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)
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सप्ताह तक वही निराहार खडा रहना पडा।
एक सियार शिकार खोज रहा था। उसे देख भय से भागा। सिंह ने
उसे बुलाकर कहा—"भो ! सियार ! भाग मत। मै दलदल में फँसा हूँ।
मेरे जीवन की रक्षा कर।" सियार उस के पास जाकर बोला—"मै तो तुझे
निकालूँ, लेकिन डर लगता है कि तू निकलकर मुझे खा न जाए।
"डर मत। मै तुझे नही खाऊँगा। तेरा बडा उपकार करूँगा। मुझे
किसी उपाय से निकाल।"
सियार ने उससे प्रतिज्ञा करवा चारो पैरो के इर्द-गिर्द से दलदल हटा
चारो पैरो से चार नालियाँ पानी की ओर बना दीं। पानी ने घुस कर गारे को
नरम कर दिया।
उसी समय सियार ने सिंह के पेट के नीचे घुस कर चिल्लाया—
स्वामी ! जोर लगाएँ। स्वय सिंह के पेट में सिर से टक्कर लगाई।
सिंह जोर लगाने से गारे के ऊपर आया और कूद कर स्थल पर जा खडा
हुआ।
थोडी देर विश्राम कर, तालाब में उतर गारे को धो, स्नान कर सिंह ने
एक भैंसे का वध किया। उसे दाढो से चीर उसका मास उधेड सियार के आगे
रख कहा—'सौम्य ! ले खा। सियार के खा चुकने पर अपने खाया। सियार
ने एक मास-पेशी मुंह में ली।
शेर ने पूछा—"सौम्य ! यह किसके लिए ?"
सियार बोला—"तुम्हारी दासी है। यह उसके लिए।"
सिंह बोला—'ले ले।' स्वय भी सिंहनी के लिए मास लेकर उसने सियार
से कहा—"सौम्य ! आ अपने पर्वत के शिखर पर जाकर वहाँ से सखि
के निवास स्थान पर जाएँगे।" वहाँ पहुँच, मास खिला चुकने पर उसने सियार
और सियारनी को आश्वासन दिया—अब से मैं तुम्हारी देख-भाल करूँगा।
वह उन्हें अपन निवास स्थान पर ले गया। वहाँ गुफा के द्वार पर ही दूसरी
गुफा में बसाया।
उसके बाद से सिंह सिंहनी और सियारनी को छोड सियार के साथ शिकार
के लिए जाता। वहाँ नाना पशुओ को मार कर दोनो वही खाते। सिंहनी
और सियारनी को भी ला कर देते। इस प्रकार समय व्यतीत होता रहा।