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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

पृष्ठ 192, कुल 479 में से

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१७४ [ २-१.१५८
राजा को उससे संतोप न होता था। इस लिए उसने दूसरे धामात्य को बुलाकर
कहा—"तात ! तू घोडो की कीमत लगा । लेकिन कीमत लगाने से पहले
महासोण को ऐसा कर कि वह इन घोडो में जाकर उन्हें काट कर जख्मी कर
दे । जब ये दुर्बल हो जायें और उनका मूल्य घट जाए, तब उनकी कीमत
लगाना।"
उसने 'अच्छा' कह स्वीकार कर वैसा ही किया । घोड़ो के व्यापारियो ने,
असन्तुष्ट हो, उसने जो किया वह बोधिसत्त्व से कहा ।
बोधिसत्त्व ने पूछा—"क्या तुम्हारे नगर में दुष्ट घोड़ा नही है ?"
"स्वामी ! सुहनु नाम का दुष्ट, चण्ड, कडे स्वभाव का घोड़ा है।"
"अच्छा तो फिर आते समय उस घोड़े को लेते आना।"
उन्होने 'अच्छा' कह स्वीकार किया । फिर आते समय उस घोड़े को
साथ लिवाकर आए ।
राजा ने सुना कि घोडो के व्यापारी आए । उसने खिडकी खोलकर
घोड़ो को देखा और महासोण को छुड़वा दिया । घोड़ो के व्यापारियो ने भी
महासोण को आते देख सुहनु को छोड़ा । वे दोनो पास आने पर एक दूसरे का
शरीर चाटने लगे । राजा ने बोधिसत्त्व से पूछा—"मित्र ! यह दो घोड़े
दूसरों के प्रति चण्ड हैं, कडे स्वभाव के हैं, दुस्साहसी हैं । दूसरे घोड़ो को
काट कर रोगी कर देते हैं। लेकिन एक दूसरे के शरीर को चाटते हुए आनन्द-
पूर्वक खड़े हैं। यह क्या बात है ?"
बोधिसत्त्व ने उत्तर दिया, "महाराज ! यह परस्पर विरोधी स्वभाव
के नही हैं, समान स्वभाव के हैं, समान धातु के हैं" और यह दो गाथाएँ कहीँ—
नयिदं विसमसीलेन सोणेन सुहनुस्सह,
सुहनूंपि सादिसोयेव यो सोणस्स स गोचरो ॥
पक्खन्दिना पलब्भेन निच्चं सन्दान खादिना,
समेति पापं पापेन समेति असत्ता अस ॥
[ सुहनु और सोण का स्वभाव विरोधी नही है । जैसा सुहनु है, वैसा ही
सोण । उछल-कूद करने वाले, प्रगल्भ तथा हमेशा लगाम खा जाने वाले
इस घोड़े का पापकर्म और असत्कर्म दूसरे के बराबर हैं] ।