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जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद)

भगवान बुद्ध / पालि त्रिपिटक द्वारा

स्रोत: जातक कथाएँ (पालि से प्रामाणिक हिन्दी अनुवाद) · हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग · 1956 (उद्गम)

DevanagariHindipublished479 पृष्ठ

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१८० [ २.१.१५६
"महाराज ! हाँ । दण्डक हिरण्य नाम का पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का
मोर रहता है ।"
"तो उसे बिना मारे, जीवित ही बांध कर लाओ ।"
शिकारी ने जाकर उसके घूमने की भूमि पर जाल फैलाया । मोर के
आने की जगह पर भी जाल न फसा । शिकारी उसे न पकड़ सका । सात साल
घूमते रह कर वह वही मर गया ।
खेमा देवी की भी इच्छा पूरी न हुई । वह भी मर गई ।
राजा को क्रोध आया कि मोर के कारण मेरी रानी की जान गई । उसने
एक सोने के पट्टे पर लिखाया—"हिमालय प्रदेश मे दण्डक-हिरण्य नाम का
पर्वत है । वहाँ सुनहरी रंग का मोर रहता है । जो उसका मांस खाते हैं वह
अजर अमर हो जाते हैं।" उस सोने के पट्टे को उसने एक सन्दूकची में रखवा
दिया ।
उसके मरने पर दूसरे राजा ने उस स्वर्ण-पट्टे को पढकर अजर अमर होने
को इच्छा से दूसरे शिकारी को भेजा । वह भी जाकर बोधिसत्व को न पकड़
सका । वही मर गया । इस प्रकार छह राज-पीडियां गई ।
सातवें राजा ने राज्य पाकर एक शिकारी को भेजा । उसने जाकर देखा
कि बोधिसत्त्व की चलने फिरन की जगह पर भी फंदा नही लगता । वह
समझ गया कि अपनी रक्षा करके ही मोर चरने आता है । वह देहात में आया
और वहाँ से एक मोरनी ले, उसे ऐसी शिक्षा दी कि वह ताली बजाने पर
नाचने लगती और चुटकी बजाने पर आवाज लगाती । ऐसा सिखा कर वह
मोरनी को लेकर गया । प्रात काल ही जब अभी मोर ने परित्राण द्वारा अपने
को रक्षित नही किया था उसने फंदे के खूंटे गाड फंदा फैला मोरनी से आवाज
लगवाई । मोर ने जब मोरनी का असाधारण शब्द सुना तो कामासक्त हो
परित्राण न कर सकने के कारण जाकर फंदे में फँस गया ।
शिकारी ने उसे पकड ले जाकर वाराणसी के राजा को दिया । राजा ने
उसका सौंदर्य देख प्रसन्न हो उसे आसन दिलाया ।
बोधिसत्व ने बिछे आसन पर बैठ, पूछा—"महाराज ! मुझे क्यो
पकड़वाया ?"
"जो तेरा मांस खाते हैं, वह अजर अमर हो जाते है । मैंने तेरा मांस