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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

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DevanagariSanskritpublished759 pages

About this granth

The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.

This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.

The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.

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२२ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
चारात् स्पर्शवद्द्रव्यस्य महतः प्रतिघातधर्म्मत्वात् तमसि सञ्चरतः प्रतिबन्धः स्यात्, महा-
न्धकारे च भूगोलकस्येव तदवयवभूतानि खण्डावयविद्रव्याणि प्रतीयेरन्निति । तदयुक्तम्, यथा
प्रदीपाग्निर्गतैरवयवैरदृष्टवशादनुद्भूतस्पर्शमनिबिडावयवमप्रतीयमानखण्डावयविद्रव्यप्रविभाग-
मप्रतिघातिप्रभामण्डलमारभ्यते, तथा तमः परमाणुभिरपि तमो द्रव्यम् । तस्मादन्यथा समाधीयते
तमः परमाणवः स्पर्शवन्तस्तद्रहिता वा ? न तावत् स्पर्शवन्तः, स्पर्शवतस्तत्कार्य्यस्य
क्वचिदनुपलम्भात् । अदृष्टव्यापाराभावात् स्पर्शवद्द्रव्यानारम्भका इति चेत् ? रूपवन्तो वायु-
इन आठ गुणों से युक्त एवं इन नौ द्रव्यों से भिन्न 'तम' (अन्धकार) नाम का द्रव्य
है ? इस प्रश्न का समाधान (१) कोई यह देते हैं कि यह निश्चित है कि जहाँ
रूप रहे वहाँ स्पर्श भी अवश्य रहे । एवं स्पर्शवाले महान् द्रव्य का यह स्वभाव है
कि वह प्रतिघात करे । अगर अन्धकार (रूपयुक्त) द्रव्य है (फिर स्पर्शयुक्त भी
अवश्य ही है), तो उसका प्रतिघातधर्मक होना भी अनिवार्य है । अगर ऐसी
बात है तो अन्धकार में चलते हुए मनुष्य उससे टकरा कर अवश्य ही रुक जाते ।
(तस्मात् अन्धकार कोई द्रव्य नहीं है । अतः 'नवैव द्रव्याणि' यह अवधारण ठीक
है)। (२) (कोई यह दूसरा समाधान करते हैं कि जैसे) किसी महाभूखण्ड की
प्रतीति होने पर उसके अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती है । (वैसे ही)
अन्धकार अगर कोई महान् द्रव्य होता तो (उसकी प्रतीति की तरह) उसके
अवयवों की भी प्रतीति अवश्य होती । (किन्तु अन्धकार के अवयवों की प्रतीति
नहीं होती है), अतः अन्धकार कोई द्रव्य नहीं है और इसीलिए वह महान् भी
नहीं है । किन्तु ये दोनों ही समाधान असङ्गत हैं, क्योंकि जैसे प्रदीप से निकले हुए
तेज के अवयवों से अदृष्टवश अनुद्भूत स्पर्श से युक्त अनिबिड़ (पतले)
प्रभामण्डलरूप प्रकाश नाम के द्रव्य की उत्पत्ति होती है । एवं इस महान् द्रव्य के
अवयवों की उपलब्धि नहीं होती है और उस (आलोक) में चलते हुए मनुष्य की
गति रुकती भी नहीं है । इसी प्रकार अन्धकार के परमाणुओं से अन्धकार की
उत्पत्ति होगी । (इसमें अन्धकार के अवयवों की अनुपलब्धि और उससे मनुष्यों
का न टकराना, ये दोनों बाधक नहीं हो सकते) अतः इसका दूसरी रीति से समाधान
करना चाहिए। (समाधान के लिए यह पूछना है कि) (प्र.) अन्धकार के परमाणुओं
में स्पर्श है या नहीं ? (उ.) नहीं है, क्योंकि उनके किसी भी कार्य्य में स्पर्श की उपलब्धि
नहीं होती । (प्र.) अन्धकार के परमाणुओं में स्पर्श है, किन्तु उससे स्थूल अन्धकार
में अदृष्टरूप कारण के अभाव से स्पर्श की उत्पत्ति नहीं होती । अतः अन्धकार के
परमाणु स्वयं स्पर्शयुक्त होते हुए भी स्पर्शयुक्त स्थूल अन्धकार को उत्पन्न नहीं करते ।
द्रव्यों में से वह किसी में भी अन्तर्भूत नहीं है । क्योंकि गन्ध की उपलब्धि न होने से वह
पृथिवी नहीं है । स्पर्श की प्रतीति न होने के कारण वह जल, तेज और वायु भी नहीं
है । उसमें रूप का प्रत्यक्ष होता है, अतः वह आकाश, काल, दिक्, आत्मा और मन भी
नहीं है । इस प्रकार कथित नौ द्रव्यों में उसका अन्तर्भाव नहीं है (गुण प्रतीति के कारण
द्रव्य अवश्य ही है । तस्मात् 'तम' कोई दशवाँ स्वतन्त्र द्रव्य ही है । किन्तु तब "नवैव
द्रव्याणि" यह अवधारण असङ्गत हो जाता है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २३
न्यायकन्दली
परमाणवोऽदृष्टव्यापारवैगुण्याद्रूपवत्कार्यं नारभन्त इति किं न कल्प्येत । किं वा न कल्पितमेत-
देकजातीयादेव परमाणोरदृष्टोपग्रहाच्चतुर्धा कार्याणि जायन्त इति । कार्यैकसमधिगम्याः
परमाणवो यथाकार्यमुन्नीयन्ते, न तद्विलक्षणाः, प्रमाणाभावादिति चेत् ? एवं तर्हि तामसाः
परमाणवोऽप्यस्पर्शवन्तः कथं तमोद्रव्यमारभेरन् ? अस्पर्शवत्तस्य कार्य्यद्रव्यानारम्भकत्वेना-
व्यभिचारोपलम्भात् । कार्य्यदर्शनात् तदनुगुणं कारणं कल्प्यते, न तु कारणवैगुण्येन दृष्टकार्य्य-
विपर्य्यासो युज्यत इति चेत्, न वयमन्धकारस्य प्रत्यर्थिनः, किन्त्वारम्भकानुपपत्तेर्नीलिममात्र-
प्रतीतेश्च द्रव्यमिदं न भवतीति ब्रूमः। तर्हि भासामभाव एवायं प्रतीयते ? न, तस्य नीलाकारेण
(किन्तु स्पर्शशून्य स्थूल अन्धकार को ही उत्पन्न करते हैं) । (उ.) अगर ऐसी बात
है तो फिर "वायु के परमाणुओं में रूप है, किन्तु अनुकूल अदृष्ट के न रहने से
स्थूल वायु में रूप की उत्पत्ति नहीं होती है" ऐसी कल्पना भी क्यों नहीं कर
लेते ? अथवा यही कल्पना क्यों नहीं करते कि किसी एकजातीय परमाणुओं से
ही पृथ्वी, जल, तेज और वायु ये चारों उत्पन्न होते हैं और अदृष्ट की विचित्रता
से इनमें परस्पर वैचित्र्य है । (प्र.) परमाणु प्रत्यक्ष-सिद्ध वस्तु नहीं हैं, किन्तु
पृथिव्यादि स्थूल कार्यों से ही उनका अनुमान होता है । स्थूल पृथिवी-जलादि द्रव्य
परस्पर भिन्नरूपों से प्रत्यक्ष होते हैं, अतः उनके मूल कारण परमाणुओं को भी
परस्पर विलक्षण मानना पड़ेगा । क्योंकि कार्य से समानजातीय कारण का
अनुमान होता है । (उ.) फिर स्पर्शशून्य रूप से प्रत्यक्ष होनेवाले अन्धकार के
परमाणुओं में स्पर्श की कल्पना कैसी ? तस्मात् (स्पर्शशून्य) अन्धकार का परमाणु
स्थूल अन्धकार को उत्पन्न कर ही नहीं सकता । क्योंकि यह अव्यभिचरित नियम
है कि स्पर्शविशिष्ट द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक होता है । (प्र.) कार्य्य जिस रूप में
देखे जाते हैं उनके अनुरूप कारणों की कल्पना की जाती है । यह तो नहीं होता
कि एक विशेष प्रकार के कारण की कल्पना कर ली जाए और उसके अनुरोध
से कार्य्यों को प्रत्यक्षसिद्ध अपने रूपोंसे भिन्न रूपों से माना जाए¹। (उ.) हम अन्धकार
के विरोधी नहीं हैं । (अर्थात् प्रत्यक्षसिद्ध अन्धकार की सत्ता तो हम मानते हैं) किन्तु
मेरा कहना है कि दृष्ट अन्धकार में स्पर्श की उपलब्धि नहीं होती । एवं कार्य
और कारण दोनों को समान गुण का ही होना उचित है । अतः अन्धकार के
मूलकारण परमाणु में स्पर्श नहीं है । 'एवं स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य का उत्पादक है'
इस नियम में कहीं व्यभिचार भी नहीं है । तस्मात् प्रत्यक्ष से सिद्ध अन्धकार 'द्रव्य'
नहीं है । किन्तु अन्धकार को द्रव्य मानना सम्भव न होने पर भी उसको केवल
तेज का अभाव ही मान लें, यह पक्ष भी ठीक नहीं है । क्योंकि नील रूप से ही अन्ध-

  1. अभिप्राय यह है कि अन्धकार के प्रत्यक्ष में नीलरूप का भान होता है, स्पर्श का नहीं ।
    अतः यह मानना पड़ेगा कि दृष्ट अन्धकार के मूलकारण परमाणुओं में रूप है, स्पर्श नहीं ।
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२४ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
प्रतिभासायोगात्, मध्यन्दिनेऽपि दूरगगनाभोगव्यापिनो नीलिम्नश्च प्रतीतेः । किञ्च
गृह्यमाणे प्रतियोगिनि संयुक्तविशेषणतया तदन्यप्रतिषेधमुखेनाभावो गृह्यते, न स्वतन्त्रः ।
तमसि च गृह्यमाणे नान्यस्य ग्रहणमस्ति । न च प्रतिषेधमुखः प्रत्ययः । तस्मान्नाभावोऽयम् ।
न चालोकादर्शनमात्रमेवैतत्, बहिर्मुखतया तम इति, छायेति च कृष्णाकारप्रतिभासनात् ।
तस्माद्रूपविशेषोऽयमत्यन्तं तेजोभावे सति सर्व्वतः समारोपितस्तम इति प्रतीयते । दिवा
चोर्ध्वं नयनगोलकस्य नीलिमावभास इति वक्ष्यामः । यदा तु नियतदेशाधिकरणो भासाम-
भावस्तदा तद्देशसमारोपिते नीलिम्नि छायेत्यवगमः । अत एव दीर्घा, ह्रस्वा, महती, अल्पीयसी
कार का प्रत्यक्ष होता है । (अभाव में किसी भी रूप की मुख्य प्रतीति नहीं हो
सकती) । एवं दिन में दोपहर को (सूर्य्य का पूर्ण प्रकाश रहते हुए भी
गगनमण्डलव्यापी नीलिमा की प्रतीति होती है । धर्म्मो की प्रतीति होने पर
(उस समय या किसी भी समय न रहनेवाले) उससे भिन्न वस्तु की 'स्वसंयुक्त-
विशेषणता' नाम के सम्बन्ध से प्रतिषेधरूप से प्रतीति ही अभाव-प्रतीति है¹ ।
किन्तु अन्धकार-ज्ञान के उत्पन्न होने पर प्रतियोगिरूप से किसी अन्य वस्तु
का ज्ञान नहीं होता । तस्मात् अन्धकार तेज का अभाव ही है । (प्र.) 'तेज'
का न देखना ही अन्धकार की प्रतीति है ? (उ.) नहीं, बाहर की तरफ "यह
अन्धकार है, यह छाया है" इत्यादि नीलाकार की प्रतीतियाँ होती हैं (तस्मात् तेज
की अप्रतीति ही 'तम' नहीं है ), अतः (अन्धकार नाम की) यह वस्तु 'रूप'
विशेष, है, जो तेज का अत्यन्ताभाव रहने पर सभी ओर 'समारोपित'
होकर 'तम' कहलाती है । दिन में भी ऊपर की तरफ (आकाशमण्डल में)
जो नीलिमा की प्रतीति होती है, वह नयनगोलक की ही नीलिमा है, यह हम
आगे कहेंगे । जब जिस नियत देशरूप अधिकरण में तेज का अत्यन्ताभाव
रहता है, उस देश में आरोपित नीलरूपाभिन्न तम 'छाया' कहलाती है । अत
एव "यह छाया बड़ी है या छोटी है, यहाँ अधिक छाया है वहाँ कम"
इत्यादि प्रतीतियाँ होती हैं । क्योंकि उन देशों में आरोपित नीलिमा की प्रतीति ही
परमाणुओं में रूप है, स्पर्श नहीं है । पृथिव्यादि द्रव्यों में रूप और स्पर्श को नियमित रूप
के साथ देखना, या स्पर्शयुक्त द्रव्य ही द्रव्य को उत्पन्न करते हैं, यह नियम स्पर्श से शून्य
अन्धकार के परमाणुओं में द्रव्यारम्भकत्व का बाधक नहीं हो सकता ।

  1. अभिप्राय यह है कि चक्षु के संयोग से जब भूतल का ज्ञान होता है और घट नहीं दिखाई
    देता, तभी भूतल में "यहाँ घट नहीं है" इस आकार की प्रतीति होती है । फलतः निषिद्ध
    रूप से घट की यह प्रतीति ही 'घटाभाव' प्रतीति है । उससे भिन्न स्वतन्त्र घटाभाव की
    कोई प्रतीति नहीं है । प्रत्यक्ष इन्द्रियसम्बन्धमूलक होता है । प्रकृत में वह सम्बन्ध
    'स्वसंयुक्तविशेषणता' नाम का है । 'स्व' शब्द से चक्षु, तत्संयुक्त भूतल, वहाँ विशेषण
    है-निषेधविशिष्ट घट ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २५
न्यायकन्दली
छायेत्यभिमानः, तद्देशव्यापिनो नीलिम्नः प्रतीतेः, अभावपक्षे च भावधर्म्माध्यारोपोऽपि
दुरुपपादः । तदुक्तम्-
न च भासामभावस्य तमस्त्वं वृद्धसम्मतम् ।
छायायाः कार्ष्ण्यमित्येवं पुराणे भृगुणश्रुतेः ॥
दूरासन्नप्रदेशादि महदल्पचलाचला ।
देहानुवर्त्तिनी छाया न वस्तुत्वाद्विना भवेत् ॥ इति ।
दुरुपपादश्च क्वचिच्छायायां कृष्णसर्पभ्रमः, चलतिप्रत्ययोऽपि गच्छत्यावरक-
द्रव्ये यत्र यत्र तेजसोऽभावस्तत्र तत्र रूपोपलब्धिकृतः । एवं परत्वादयोऽप्यन्यथा-
सिद्धाः । तत्र चालोकाभावव्यञ्जनीयरूपविशेषे तमस्यालोकानपेक्षस्यैव
तो अन्धकार की प्रतीति है¹? तम को अभावरूप मान लेने से तो नील 'रूप का
आरोप कठिन होगा, क्योंकि 'रूप' भाव का धर्म है (उसका आरोप भी अभाव में
नहीं हो सकता ।)
जैसा कहा है कि-(१) तेज के अभाव में अन्धकार का व्यवहार वृद्धों से
अनुमोदित नहीं है; क्योंकि पुराणों में कहा गया है कि छाया में पृथ्वी का कृष्ण
वर्ण वर्तमान है।
(२) छाया को भावस्वरूप माने बिना छाया देह के साथ चलती है, छाया
अभी बहुत दूर है, अब समीप आई, यह छाया बहुत बड़ी है, या यह बहुत छोटी
है, यह अब चल रही है और वह अब खड़ी हो गयी, इन प्रतीतियों की उपपत्ति
नहीं हो सकती ।
छाया में काले साँप का भ्रम तो बिलकुल ही असम्भव होगा। (प्र.) अन्धकार
को रूपविशेष मान लेने पर भी "अन्धकार चलता है", अन्धकार में गमन की
यह प्रतीति अनुपपन्न ही रहेगी । (उ.) इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि
गमन की उक्त प्रतीति आलोक को ढँकनेवाले द्रव्य के चलने से जहाँ-जहाँ तेज का
अभाव हो जाता है, उन सभी जगहों में आरोपित रूप की उपलब्धि ही है । इसी
प्रकार अन्धकार में प्रतीत होनेवाले परत्वादि गुणों की प्रतीति की उपपत्ति भी
दूसरे प्रकार से की जा सकती है । (प्र.) रूपों का प्रत्यक्ष आलोक में ही चक्षु से
होता है, अन्धकार की प्रतीति आलोक के न रहने से ही चक्षु से होती है, अतः
अन्धकार 'नीलरूप' नहीं है । (उ.) यह आपत्ति भी व्यर्थ है; क्योंकि वस्तुओं के
स्वभाव के अनुसार ही कार्यकारणभाव की कल्पना की जाती है । अगर
आलोक न रहने से ही अन्धकार का प्रत्यक्ष चक्षु से होता है तो फिर
और रूपों के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को (ही) कारण मानते हुए भी
अन्धकारस्वरूप रूप के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु को ही कारण मानना
पड़ेगा । जैसे कि आप घटाभावादि के प्रत्यक्ष में आलोकसहकृत चक्षु को कारण

  1. जैसे कि चलते हुए मनुष्यादि के शरीर से या स्थावर वृक्षादि से भूतल के जो अंश सौर
    तेज के संयोग से बच जाते हैं, उनमें ही 'छाया' की प्रतीति होती है । एवं शरीरादि
    आवरक द्रव्यों का परिमाण जितना होता है, उतने ही परिमाण के अनुसार वे देशों को
    आवृत करते हैं । तदनुसार ही अन्धकाररूप छाया की प्रतीतियाँ होती हैं ।

सूत्र का विरोध होगा, क्योंकि उसमें कहा है कि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों

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२६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
गुणाश्च रूपरसगन्धस्पर्शसंख्यापरिमाणपृथक्त्वसंयोगविभाग-
प त्वापरत्वबुद्धिसुखदुःखेच्छाद्वेषप्रयत्नाश्चेति कण्ठोक्ताः सप्तदश ।
स्वयं सूत्रकार के द्वारा कथित ये सत्रह गुण हैं-
१. रूप, २. रस, ३. गन्ध, ४. स्पर्श, ५. संख्या, ६. परिमाण,
७. पृथक्त्व, ८. संयोग, ९. विभाग, १०. परत्व, ११. अपरत्व,
१२. बुद्धि, १३. सुख, १४. दुःख, १५. इच्छा, १६. द्वेष और १७. प्रयत्न
न्यायकन्दली
चक्षुषः सामर्थ्यम्, तद्भावभावित्वात्; यथालोकाभाव एव तन्मते । नन्वेवं तर्हि
सूत्रविरोधः "द्रव्यगुणकर्म्मनिष्पत्तिवैधर्म्म्याद्भावाभावस्तमः" इति? न विरोधः, भाऽभावे
सति तमसः प्रतीतेर्भाभावस्तम इत्युक्तम् ।
ईश्वरोऽपि बुद्धिगुणत्वादात्मैव, न तु षड्गुणाधिकरणश्चतुर्दशगुणाधिकरणाद्
गुणभेदेन भिद्यते, मुक्तात्मभिर्व्यभिचारात् ।
गुणा रूपादयः कण्ठोक्ता सूत्रकारेण कथिता रूपरसेत्यादिना ।
मानते हुए भी तेज के अभावरूप अन्धकार के प्रत्यक्ष में आलोक से निरपेक्ष चक्षु
को ही कारण मानते हैं । (प्र.) अन्धकार को अगर तेज का अभाव न मानें तो
सूत्र का विरोध होगा, क्योंकि उसमें कहा है कि द्रव्य, गुण और कर्म्म इन तीनों
के उत्पत्तिक्रम से अन्धकार की उत्पत्ति का क्रम भिन्न है, अतः 'भा' अर्थात् तेज
का अभाव ही 'तम' है । (उ.) तेज का अभाव होने पर ही अन्धकार की प्रतीति
होती है, अतः सूत्रकार ने 'भाभावस्तमः' ऐसा औपचारिक प्रयोग किया है¹ ।
ईश्वर भी बुद्धियुक्त होने के कारण आत्मा ही है । बुद्धि प्रभृति छः गुणों से
युक्त परमात्मा चौदह गुणों से युक्त जीवात्मा से गुणभेद के कारण भिन्नजातीय
द्रव्य नहीं है; क्योंकि ऐसा (नियम) मानने पर मुक्त जीव में व्यभिचार होगा² ।
'गुणाः' अर्थात् रूपादि गुण 'कण्ठोक्ताः' अर्थात् सूत्रकार महर्षि कणाद के द्वारा "रूप-
रसगन्धस्पर्शाः, संख्याः, परिमाणानि, पृथक्त्वम्, संयोगविभागौ, परत्वापरत्वे, बुद्धयः

  1. 'आयुर्वै घृतम्,' 'लाङ्गलम्' 'जीवनम्' इत्यादि प्रयोग जैसे कारण और कार्य्य को एक
    समझकर लक्षणा के द्वारा होते हैं, वैसे ही प्रकृत में भी तेज के अभाव की प्रतीति के
    कारण में अन्धकार के अभेद का आरोप कर अन्धकार पद की 'भाभाव'में लक्षणा के
    द्वारा सूत्रकार ने 'भाभाव' अर्थात् तेज के अभाव को 'तम' कहा है ।
  2. अभिप्राय यह है कि पहले "नवैव द्रव्याणि" ऐसा अवधारणात्मक प्रयोग है ।
    किन्तु जीव और ईश्वर के परस्पर भिन्न द्रव्य होने के कारण द्रव्य दश हो

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २७
प्रशस्तपादभाष्यम्
चशब्दसमुच्चिताश्च गुरुत्वद्रवत्वस्नेहसंस्कारादृष्टशब्दाः सप्तैवेत्येवं चतु-
र्विंशतिर्गुणाः ।
एवं १. गुरुत्व, २. द्रवत्व, ३. स्नेह, ४. संस्कार, अदृष्ट- ५. धर्म्म
एवं ६. अधर्म्म और ७. शब्द, ये सात गुण सूत्रस्थ 'च' शब्द से
संग्राह्य हैं । इस प्रकार सब मिलाकर गुण चौबीस प्रकार के हैं ।
न्यायकन्दली
'च'शब्देनात्रानुक्ता गुणत्वेन लोके प्रसिद्धा गुरुत्वादयः सप्त समुच्चिताः ।
एवं चतुर्विंशतिरेव गुणाः । ये तु शौर्यौदार्यकारुण्यदाक्षिण्योौग्र्यादयः, तेऽत्रैवान्त-
र्भवन्ति । शौर्यं बलवतोऽपि परस्य पराजयाय प्रत्युत्साहः । स च प्रयत्नविशेष
एव । सततं सन्मार्गवर्तिनी बुद्धिरौदार्यम् । परदुःखप्रहाणेच्छा कारुण्यम् ।
सुखदुःखे, इच्छाद्वेषौ, प्रयत्नाश्च गुणाः " (१/१/६) इस सूत्र की रचना के द्वारा
रूपादि सत्रह गुण ही 'रूपादि' शब्दों के द्वारा स्पष्ट रूप से कहे गये हैं। जो गुण इस
सूत्र के द्वारा साक्षात् नहीं कहे गये हैं और लोक से गुणत्व के नाम से व्यवहृत
हैं, वे सूत्र के 'च' शब्द से सूचित किये गये हैं । इस प्रकार कण्ठोक्त १७ और
'च' शब्द से समुच्चित सात, दोनों को मिलाकर गुण चौबीस हैं । शौर्य, औदार्य,
कारुण्य, दाक्षिण्य, औग्र्य प्रभृति जितने भी गुणशब्द से लोक में व्यवहृत हैं, वे सभी
इन्हीं गुणों में अन्तर्भूत हो जाते हैं । अपने से अधिक बलशाली शत्रु को पराजित
करने के उत्साह को 'शौर्य' कहते हैं, जो वस्तुतः प्रयत्नविशेष ही है । बराबर
सन्मार्ग में रहनेवाली 'बुद्धि' ही औदार्य कही जाती है । दूसरों के दुःख को नाश
जाते हैं । आत्मस्वरूप से जीव और ईश्वर को एक द्रव्य नहीं मान सकते, क्योंकि जीव
में चौदह गुण हैं एवं ईश्वर में केवल छः । तस्मात् द्रव्यविभागवाक्य का 'आत्मा' शब्द
जीव या ईश्वर किसी एक का ही बोधक हो सकता है । जिससे कि उक्त अवधारण का
प्रयोग असङ्गत हो जाता है । इसी आक्षेप का समाधान "ईश्वरेऽपि" इत्यादि सन्दर्भ से
देते हैं ! समाधान ग्रन्थ का अभिप्राय है कि चौदह गुण जीव के लक्षण नहीं हैं, क्योंकि
इतने गुण मुक्त आत्माओं में नहीं रहते । आत्मा के सभी विशेष गुणों का अत्यन्त विनाश
ही मुक्ति है । तस्मात् मुक्त जीवों में संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व
और अपरत्व ये सात सामान्य गुण ही रहेंगे, क्योंकि मुक्ति के समय बुद्धि, सुख, दुःख,
इच्छा, द्वेष, प्रयत्न और भावनाख्य संस्कार जीव के ये सात विशेष गुण नष्ट हो जाते
हैं । अतः द्रव्यविभागवाक्य का 'आत्मा' शब्द चौदह गुणों से युक्त केवल जीव का ही
बोधक नहीं है । किन्तु आत्मत्वजाति से युक्त द्रव्य का बोधक है । यह जाति बुद्धि से युक्त
जीव और ईश्वर दोनों में है, क्योंकि आत्मत्वरूप से दोनों अभिन्न हैं । अतः "नवैव
द्रव्याणि" यह अवधारण ठीक है ।

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२८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
उत्क्षेपणापक्षेपणाकुञ्चनप्रसारणगमनानि पञ्चैव कर्माणि । गमनग्रहणाद्
भ्रमणरेचनस्यन्दनोर्ध्वज्वलनतिर्य्यक्पतननमनोन्नमनादयो गमनविशेषा न
जात्यन्तराणि ।
१. उत्क्षेपण, २. अपक्षेपण, ३. आकुञ्चन, ४. प्रसारण और
५. गमन ये पाँच ही कर्म हैं । गमन पद से यह कहना है कि भ्रमण,
रेचन, स्यन्दन, ऊर्ध्वज्वलन, तिर्य्यक्पतन, नमन और उन्नमन प्रभृति
कर्म्म भी गमनविशेष ही हैं, दूसरी जाति के नहीं ।
न्यायकन्दली
तत्त्वाभिनिवेशिनी बुद्धिर्दाक्षिण्यम् । औग्रयमात्मन्युत्कर्षप्रत्यय इत्येवमादिः । अदृष्टशब्देन
च धर्म्माधर्म्मयोरुपसङ्ग्रहः । संस्कार इति । स च वेगस्य भावनायाः स्थितिस्थापकस्य
चाभिधानम् । नन्वेवं तर्ह्याधिक्यम् ? न, संस्कारत्वजात्यपेक्षया वेगभावनास्थितिस्थापका-
नामेकत्वात् । एवं तर्हि न चतुर्विंशतित्वम् ? अदृष्टत्वजात्यपेक्षया धर्म्माधर्म्मयोरेकत्वात् । न,
अदृष्टत्वजात्यभावात् । निर्गुणेष्वपि गुणेष्वसाधारणधर्म्मयोगित्येनोपचाराच्चतुर्विंशतिरिति
व्यवहारः ।
कर्माणि विभजते-उत्क्षेपणेति । कियन्ति तानि ? तत्राह-पञ्चैवेति । ननु
भ्रमणादयोऽपि सन्ति ? कथं पञ्चैवेत्यवधारणमत आह-गमनग्रहणादिति ।
करने की 'इच्छा' ही कारुण्य है । यथार्थ वस्तु को ग्रहण करनेवाली 'बुद्धि' ही
दाक्षिण्य है । अपने में उत्कर्ष की बुद्धि ही औग्र्य है । 'अदृष्ट' शब्द से धर्म
और अधर्म-दोनों अभिप्रेत हैं । 'संस्कार' शब्द से वेग, भावना और
स्थितिस्थापक तीनों संग्राह्य हैं । (प्र.) इस प्रकार गुण तो चौबीस से अधिक हो
जायेंगे ? (उ.) नहीं, संस्कारत्व जाति है और इस रूप से वेगादि तीनों संस्कार
एक ही हैं । (प्र.) इस प्रकार भी गुण चौबीस ही नहीं होंगे, क्योंकि (वेगादि
की तरह) अदृष्टत्वजाति रूप से धर्म और अधर्म ये दोनों भी एक हो जाएँगे ?
(उ.) नहीं, क्योंकि अदृष्टत्व नाम की कोई जाति नहीं है । गुणों में गुण के न
रहने पर भी 'गुण चौबीस हैं' यह गौण व्यवहार होता है । जैसे कि पृथिवीत्वादि
नौ धर्मों के सम्बन्ध से "द्रव्य पृथिव्यादि भेद से नौ हैं" यह व्यवहार होता है,
उसी प्रकार रूपादिगत असाधारण धर्मस्वरूप रूपत्वादि चौबीस धर्मों के सम्बन्ध
से रूपादि गुणों में चौबीस संख्या का गौण व्यवहार होता है । (इससे रूपादि गुणों
में संख्या गुण की सत्ता की सम्भावना नहीं है ।)
"उत्क्षेपण" इत्यादि से कर्म पदार्थ का विभाग किया गया है । वे कितने हैं ?
इस प्रश्न का उत्तर है 'पञ्चैव', अर्थात् कर्म पाँच ही हैं । (प्र.) भ्रमणादि और

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् २९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधं परमपरञ्चानुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । तत्र परं
सत्ता, महाविषयत्वात् । सा चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव ।
१. पर और २. अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का है ।
वे 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न वस्तुओं में एक आकार की
प्रतीति के कारण हैं । उनमें 'सत्ता' पर सामान्य ही है, क्योंकि
वह 'महाविषय' अर्थात् और सभी सामान्यों से अधिक आश्रयों में
विद्यमान है । सत्ता केवल सामान्य ही है (विशेष नहीं), क्योंकि
वह केवल अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, अर्थात् परस्पर भिन्न अपने
न्यायकन्दली
गमनग्रहणात् पञ्चैव कर्म्माणि । अत्रोपपत्तिमाह-भ्रमणरेचनस्यन्दनेत्यादि । यस्माद्
भ्रमणादयोऽपि गमनविशेषा गमनप्रभेदा न जात्यन्तराणि, तस्माद् गमनग्रहणेनैतेषामपि
ग्रहणात् पञ्चैवेत्यवधारणं सिद्ध्यतीत्यर्थः ।
सामान्यं कथयति-सामान्यं द्विविधमिति । द्वैविध्यमेव कथयति-परमपरं
चेति । चोऽवधारणे, परमपरमेवेत्यर्थः । तस्य रूपं कथयति- अनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणमिति । अत्यन्तव्यावृत्तानां पिण्डानां यतः कारणादन्योन्यस्वरूपानु-
गमः प्रतीयते तत्सामान्यम् । किं तत्परं सामान्यमित्याह-परं सत्तेति ।
भी तो हैं ? फिर 'कर्म पाँच ही हैं' यह अवधारण असङ्गत है । इसी प्रश्न का
समाधान 'गमनग्रहणात्' इत्यादि से करते हैं । अर्थात् चूँकि गमनरूप कर्म का
ग्रहण किया गया है, इसलिए कर्म पाँच ही हैं । 'भ्रमणरेचन' इत्यादि से इसी में
युक्ति देते हैं । चूँकि भ्रमणादि गमनत्व जाति के ही हैं, दूसरी जाति के कर्म्म नहीं
हैं, अतः 'गमन' पद से भ्रमणादि कर्मों का भी संग्रह हो जाने से 'कर्म पाँच ही
हैं, यह अवधारणा ठीक है ।
"सामन्यं द्विविधम्" इत्यादि पङ्क्तियों से अब (अवसरप्राप्त) सामान्य का
निरूपण 'परमपरञ्च' इस वाक्य से करते हैं । (१) पर और (२) अपर, ये दो
प्रकार सामान्य के कहे गये हैं । इस वाक्य के 'च' शब्द से इस 'अवधारण' का
बोध होता है कि सामान्य के पर और अपर भेद से दो ही प्रकार हैं ।
'अनुवृत्तिप्रत्ययकारणम्' इत्यादि से सामान्य पदार्थ का लक्षण कहते हैं (अर्थात्)
अत्यन्त विभिन्न दो वस्तुओं में जिस एक वस्तु के रहने से एक आकार की प्रतीति
होती है, उसी को 'सामान्य' कहते हैं । वह 'पर' सामान्य कौन-सा है ?
१. जैसे कि एक घट दूसरे घट से भिन्न है, फिर भी उन दोनों में 'ये घट हैं'
एक आकार की प्रतीति होती है और पट में यह प्रतीति नहीं होती । इसका
कारण सभी घटों में घटत्व नाम के सामान्य का रहना ही है । एवं घट और

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३० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यत्वाद्यपरम्, अल्पविषयत्वात् । तच्च व्यावृत्तेरपि हेतुत्वात् सामान्यं
सद्विशेषाख्यामपि लभते ।
आश्रयों में एकाकारप्रतीति को उत्पन्न करती है । किसी भी प्रकार की
व्यावृत्तिबुद्धि अर्थात् अपने विभिन्न आश्रयों में परस्पर भेदबुद्धि को
उत्पन्न नहीं करती । द्रव्यत्वादे सामान्य सत्ता की अपेक्षा थोड़े आश्रयों
में रहने के कारण 'अपर सामान्य' है । ये द्रव्यत्वादि अनुवृत्तिप्रत्यय
की तरह व्यावृत्तिप्रत्यय के भी कारण हैं, अतः वे सामान्य होते हुए
'विशेष' भी कहलाते हैं ।
न्यायकन्दली
अत्र युक्तिमाह-महाविषयत्वादिति । द्रव्यत्वाद्यपेक्षया बहुविषयत्वादित्यर्थः । सा
चानुवृत्तेरेव हेतुत्वात् सामान्यमेव । द्रव्यत्वादिकं तु स्वाश्रयस्य विजातीयेभ्योऽपि
व्यावृत्तेरपि हेतुत्वादिशेषोऽपि भवति । सत्ता तु स्वाश्रयस्यानुवृत्तेरेव हेतुस्तेन
सामान्यमेव । यद्यप्येषा सामान्यादिभ्यो व्यावर्तते तथापि न तेभ्यः
इस प्रश्न का समाधान 'परं सत्ता' इस वाक्य से देते हैं । सत्ता 'पर' सामान्य ही
क्यों है ? इसका हेतु 'महाविषयत्वात्' इस (पञ्चम्यन्त) पद से दिखलाया है ।
अर्थात् 'सत्ता' जाति द्रव्यत्वादि और जातियों से अधिक आश्रयों में रहती है ।
यह (सत्तारूप सामान्य) केवल अनुवृत्ति-बुद्धि (अनेक वस्तुओं में एकाकारता की
बुद्धि) का ही कारण है, अतः यह केवल 'सामान्य' ही है (विशेष नहीं) ।
द्रव्यत्वादिरूप सामान्य (विभिन्न द्रव्यों में एकाकारतारूप अनुवृत्तिबुद्धि की तरह)
अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में गुणादि से व्यावृत्तिबुद्धि, अर्थात् द्रव्य गुणादि से
भिन्न हैं, इस प्रकार की विभिन्नाकारता प्रतीति का भी कारण है, अतः द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'विशेष'भी हैं । सत्ता तो अपने आश्रयीभूत द्रव्य, गुण और कर्म में "ये
सत् हैं" इस प्रकार के अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है (किसी भी व्यावृत्तिबुद्धि
का नहीं), अतः वह 'सामान्य' ही है । (प्र.) यद्यपि यह कह सकते हैं कि सत्ता
जाति सामान्यादि पदार्थों में नहीं है (क्योंकि उनमें कोई भी सामान्य नहीं है),
अतः 'सत्ता जाति' द्रव्य, गुण, और कर्म, इन तीनों में 'ये सत् हैं' इस
अनुवृत्तिबुद्धि की तरह (सत्ताजातियुक्त) द्रव्यादि पदार्थ (सत्ताशून्य) सामान्यादि
पदार्थों से भिन्न हैं, इस व्यावृत्तिबुद्धि के भी करण है । (इस युक्ति से सत्ता भी
द्रव्यत्वादि सामान्य की तरह 'विशेष' कहला सकती है) तथापि सामान्यादि पदार्थों
में भी भावत्व, अस्तित्वादि रूप सत्ता तो है ही, जिससे सामान्यादि पदार्थों में भी
"ये सत् हैं" इस प्रकार की प्रतीति होती है । अतः सामान्यादि में जातिरूप सत्ता
का सम्बन्ध न भी रहे, तथापि द्रव्यादि से सामान्यादि पदार्थों से भिन्नत्व प्रतीति का
पट दोनों परस्पर भिन्न होते हुए भी दोनों में 'ये द्रव्य हैं' । इस एक आकार की प्रतीति
होती है । इसका भी कारण घट और पट में द्रव्यत्व नामक सामान्य का रहना ही है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१
न्यायकन्दली
स्वाश्रयं व्यावर्तयितुं शक्नोति । तेषामपि स्वरूपसत्तासम्बुद्धिसंवेद्यत्वात् । वस्त्वपेक्षया
चानुवृत्तिहेतुत्वं विवक्षितम्, तेनाभावाद् व्याववृत्तिहेतुत्वेऽपि न दोषः ।
यत्प्रमाणेन प्रतीयते तन्नास्ति व्यवहारो लोकानां विपर्य्यये तु नास्तीति । तेन प्रमाणगम्यैव
सत्तेति केचित् । तदयुक्तम्, प्रमाणोत्पत्तेः प्राग् वस्तुनोऽसत्त्वप्रसङ्गादसत्तश्च खरविषाण-
स्येव ग्राह्यत्वाभावादन्योन्यसंश्रयापत्तेश्च । सतः प्रमाणस्य ग्राहकत्वे सत्तायाः प्रमाण-
ग्राह्यतालक्षणत्वे च ग्राहकस्य प्रमाणस्यापि ग्राहकान्तरानुसरणेनानवस्थापाताच्च ।
वह कारण नहीं हो सकती, (क्योंकि सत्ता के सम्बन्ध से जिस प्रकार द्रव्य, गुण
और कर्म्म में 'ये सत् हैं' यह प्रतीति होती है, उसी प्रकार सामान्यादि भावपदार्थों
से 'भावत्व' रूप सत्ता के बल से 'ये सत् हैं' इस प्रकार की भी प्रतीति होती है ।
अतः द्रव्यादिधर्मिक सत्त्व की प्रतीति में और सामान्यादिधर्मिक सत्त्व की प्रतीति
में आकारगत कोई भेद नहीं है) । (प्र.) अभावों में किसी भी प्रकार की 'सत्त्व'
बुद्धि (सत्ताजातिमूलक या भावत्वमूलक) नहीं होती है, अतः सत्ता जाति और
किसी को न सही अपने आश्रयीभूत द्रव्यादि में अभावभिन्नत्वरूप व्यावृत्ति के बोध
को तो उत्पन्न कर ही सकती है । अतः सत्ता जाति भी द्रव्यत्वादि जातियों की
तरह सामान्य और विशेष दोनों हो सकती है । (उ.) नहीं, उक्त 'अनुवृत्तिप्रत्यय'
शब्द का अर्थ है अनेक विभिन्न भावपदार्थों में एकाकारता की प्रतीति, एवं
'व्यावृत्तिबुद्धि' शब्द का अर्थ है एक या अनेक भावों में दूसरे भावपदार्थ से
भिन्नत्व की बुद्धि । इसी व्यावृत्तिबुद्धि का कारण है 'विशेष' । विशेष का
यह लक्षण सत्ता जाति में नहीं है । अतः द्रव्यादि में अभावभिन्नत्व बुद्धि की
प्रयोजक होने पर भी सत्ता सामान्य ही है, 'विशेष' नहीं ।
(प्र.) कोई कहते हैं कि वस्तुतः 'अस्तित्व' ही 'सत्ता' है । प्रमाण के द्वारा
ज्ञात अर्थ में ही अस्तित्व की प्रतीति होती है । जिस वस्तु की प्रतीति प्रमाण के
द्वारा नहीं होती, उसमें अस्तित्व की बुद्धि भी नहीं होती है । अतः 'प्रमाणगम्यत्व'
(अर्थात् प्रमाण से ज्ञात होना ) ही 'सत्ता' है । इस नाम की कोई अतिरिक्त जाति
नहीं है । (उ.) यह उक्ति असङ्गत है, क्योंकि इससे तो प्रमाण की प्रवृत्ति से पहले
गदहे के सींग की तरह वस्तुओं की असत्ता माननी पड़ेगी । दूसरी बात यह है कि
गदहे की सींग प्रभृति असत् वस्तुओं में प्रमाणों की प्रवृत्ति नहीं होती है । 'सत्'
घटादि वस्तुओं में ही प्रमाणों की प्रवृत्ति होती है । (इससे यह निष्कर्ष निकलता है
कि) वस्तु 'सत्' तभी होगी, जब उसमें प्रमाण की प्रवृत्ति होगी । एवं प्रमाणों की प्रवृत्ति
सद्विषयों में ही होगी । अतः सत्त्व को प्रमाणगम्यत्वमूलक और प्रमाणों की प्रवृत्ति
को सत्त्वमूलक मानना पड़ेगा, जिससे कि परस्पराश्रयत्व होगा। तीसरी बात है कि 'सत्'
प्रमाण ही वस्तुओं का ज्ञापक है, 'असत्' प्रमाण नहीं । एवं 'सत्त्व' को आपने

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३२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
अथ मतं न ब्रूमः प्रमाणसम्बन्धः सत्तेति, किन्तु प्रमाणसम्बन्धयोग्यं वस्तुस्वरूपमेव
सत्ता । योऽपि सत्तासामान्यमिच्छति, तेनापि पदार्थस्वरूपमभ्युपेयम्, निःस्वभावे
शशविषाणादौ सत्ताया असमवायात् । एवं चेत् तदेवास्तु, किं सत्तयेति ।
अत्रोच्यते, प्रत्येकं पदार्थस्वरूपाणि भिन्नानि, कथं तेष्वेकाकारप्रतीतिः ?
एकशब्दप्रवृत्तिश्च ? अनन्तेषु सम्बन्धग्रहणाभावात् । अथ तेष्वेकं निमित्तमस्ति ?
सिद्धं नः समीहितम् । यथा दृष्टैकगोपिण्डस्य पिण्डान्तरे पूर्वरूपानु-
कारिणीबुद्धिरुदेति, नैवं महीधरमुपलभ्य सर्षपमुपलभमानस्य पूर्वाकारा-
प्रमाणगम्यत्वरूप माना है, अतः ग्राहकीभूत प्रमाणों में सत्त्वसम्पादन के लिए दूसरे
प्रमाण का अवलम्बन करना पड़ेगा । इस पक्ष में अनवस्था दोष भी अनिवार्य
होगा ।
(प्र.) प्रमाणों के सम्बन्ध को ही हम सत्ता नहीं कहते, किन्तु प्रमाणसम्बन्ध के
योग्य वस्तु के 'स्वरूप' अर्थात् असाधारण धर्म को ही उस वस्तु की 'सत्ता'
कहते हैं । जो कोई 'सत्ता' नाम की अतिरिक्त जाति मानने की इच्छा रखते हैं, वे
भी वस्तुओं के असाधारणस्वभावरूप सत्त्व से शून्य खरगोश के सींग प्रभृति
वस्तुओं में सत्ता जाति का समवाय नहीं मानते । अतः उस असाधारण धर्म को
छोड़कर सत्ता नाम की कोई जाति ही नहीं है ।
(उ.) यह कहना भी कुछ ठीक नहीं है, क्योंकि द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों
के परस्पर भिन्न होते हुए भी तीनों में जो 'ये सत् हैं' इस एक आकार की प्रतीति
होती है, वह अनुपपन्न हो जाएगी, चूँकि द्रव्यादि तीनों व्यक्तियों के 'स्वरूप' अर्थात्
असाधारण धर्म भिन्न-भिन्न हैं । यह सत्त्व अपने-अपने आश्रय को छोड़कर किसी
दूसरे में नहीं रह सकते । फिर द्रव्यादि तीनों में रहनेवाली किसी एक वस्तु से उक्त
एक आकार की प्रतीति होगी, एवं द्रव्यादि तीनों को समझाने के लिए जिस एक ही
'सत्' शब्द की प्रवृत्ति होती है, वह भी अनुपपन्न हो जाएगी, क्योंकि व्यक्ति अनन्त
हैं, उन सभी व्यक्तियों में शक्ति का ग्रहण ही असम्भव है । अगर उक्त अनुवृत्ति-
प्रत्यय के लिए अथवा शब्द के उक्त प्रयोग के लिए द्रव्यादि तीनों में रहनेवाले किसी एक
कारण की कल्पना की जाय तो फिर इससे हमारा ही अभीष्ट सिद्ध होगा (फलतः
सत्ता जाति माननी ही पड़ेगी )। (प्र.) जिस प्रकार एक गाय को देखने के बाद दूसरी
गाय को देखने पर इस दूसरी गाय में भी 'यह गाय है' इस प्रकार की बुद्धि होती
है, अतः सभी गायों में रहनेवाली एक गोत्व जाति की कल्पना करते हैं, उसी प्रकार
से पर्वत को देखने के बाद सरसो को देखने पर दोनों में किसी एक आकार की
बुद्धि नहीं होती, अतः इन दोनों में से किसी एक का धर्म दूसरे में नहीं है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३

Page 106Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३३
न्यायकन्दली
थभासोऽस्तीति कुतोऽत्र सामान्यकल्पनेति चेत्? किं महीधरादिषु निखिलरूपानुगमो
नास्ति ? उत मात्रयाऽपि न विद्यते ? यदि निखिलरूपानुगमाभावात् तेषु सामान्य-
प्रत्याख्यानम् ? तर्हि गोत्वमपि प्रत्याख्येयम्, तयोः शाबलेयबाहुलेययोः सर्वथा साधर्म्या-
भावात् । अथ मात्रयाऽपि स्वरूपानुगमो नास्ति ? तदसिद्धम्, सर्वेषामपि तेषामभाव-
विलक्षणेन रूपेण तुल्यताप्रतिभासनात् । इयांस्तु विशेषः-गोपिण्डेषु झटिति तज्जातीयता-
बुद्धिः, भूयोऽवयवसामान्यनुगमात् । महीधरादिषु तु विलम्बिनी, स्तोकावयवसामान्यानु-
गमेन जातेरनुद्भूतत्वात्, यथा मणिकदर्शनाच्छरावे मृज्जातिबुद्धिः ।
एतेनार्थक्रियाकारित्वमपि सत्त्वं प्रत्युक्तम्, असतोऽर्थक्रियाया अभावात्, अर्थक्रिया-
याञ्च सत्यां तस्य सत्त्वात्, अर्थक्रियायाश्चार्थक्रियापेक्षया सत्त्वेनानवस्थाने सर्वस्यासत्त्व-
प्रसङ्गाच्च ।
(उ.) (इस आक्षेप के समाधानार्थ यह पूछना है कि) (१) क्या पर्वतादि के सभी
धर्म एक दूसरे में नहीं हैं ? (२) या पर्वतादि के कुछ धर्म एक दूसरे में नहीं
हैं ? अगर पहला पक्ष मानें तो फिर गायों में भी "ये गायें हैं" इस प्रकार का
अनुवृत्तिप्रत्यय नहीं होगा, क्योंकि प्रत्येक गाय में रहनेवाले शाबलेयत्वादि धर्म
दूसरी गायों में नहीं हैं। अगर दूसरा पक्ष मानें तो हम कहेंगे कि यह असत्य है,
क्योंकि अन्ततः भावभिन्नत्वरूप धर्म तो पर्वत और सरसो दोनों में अवश्य ही
प्रतीत होता है । इतना अन्तर अवश्य है कि एक गाय को देखने के बाद दूसरी
गाय को देखने पर सादृश्य की बुद्धि शीघ्र उत्पन्न होती है । क्योंकि दोनों गायों के
अवयवों में बहुत से सादृश्य हैं । किन्तु पर्वत और सर्षप के अवयवों में उतने
सादृश्य नहीं हैं । अतः पर्वत को देखने के बाद सर्षप में सादृश्य की बुद्धि देर से
उत्पन्न होती है । इससे इतना ही सिद्ध होता है कि पर्वत और सर्षप दोनों में
रहनेवाली जाति परिस्फुट नहीं है । जैसे हड़िया को देखने के बाद पुरवे में
मिट्टी में रहनेवाली पृथिवीत्व जाति की उपलब्धि होती है ।
कोई (बौद्ध) कहते हैं कि 'अर्थक्रियाकारित्व' ही 'सत्त्व' है । किन्तु
'परस्पराश्रयत्व' दोष से ग्रसित होने के कारण यह पक्ष भी असङ्गत ही है ।
शशविषाणादि असत् पदार्थों में सत्त्व इसलिए नहीं है कि उनमें अर्थक्रियाकारित्व
नहीं है और उनमें अर्थक्रियाकारित्व इसलिए नहीं है कि वे 'सत्' नहीं हैं । दूसरी
बात है कि घटादि पदार्थों की सत्ता जिस अर्थक्रिया के अधीन है, उस अर्थक्रिया
के सत्त्व की प्रयोजिका कोई दूसरी अर्थक्रिया नहीं है । (घटादि वस्तुओं के सत्त्व
की प्रयोजिका) अर्थक्रिया के असत् होने के कारण घटादि वस्तुओं की सत्ता ही
उठ जाएगी ।

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३४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
द्रव्यत्वाद्यपरम्, द्रव्यत्वं गुणत्वं कर्म्मत्वञ्चापरम्, सत्तापेक्षयाल्पविषयत्वादित्यर्थः,
तथा द्रव्यत्वाद्यपेक्षया पृथिवीत्वादिकमपरम्, तदपेक्षया घटत्वादिकमपरम्, गुणत्वाद्यपेक्षया
रूपत्वादिकमपरम्, कर्म्मत्वाद्यपेक्षया चोत्क्षेपणत्वादिकं व्याख्येयम् ।
जलमुपलभ्य वह्निमुपलभमानस्य तदित्यनुगमाभावाद् द्रव्यत्वं नास्तीति केचित् ।
तदसारम्, द्वयोरपि तयोः स्वप्राधान्येन प्रतीतिसम्भवात् । स्वप्राधान्यप्रतीतिरेव द्रव्यत्व-
प्रतीतिः । उत्क्षेपणादिष्वपि चलनात्मकताप्रतीतिरस्ति, सैव च कर्म्मप्रतीतिः । रूपादिषु तु
कृतसमयस्यानुवृत्तिप्रत्ययसम्भवाद् गुणत्वस्याप्रत्याख्यानम् । व्यक्तिग्रहणमिव समयग्रहणमपि
तस्य प्रतीतिकारणम्, ब्राह्मणत्वस्येव योनिसम्बन्धज्ञानम् । तत्रापि विशुद्धब्राह्मण-
सन्ततिज्योत्पत्तिमात्रानुबद्धमपि ब्राह्मणत्वमिन्द्रियपातमात्रेण क्षत्रियादिविलक्षणतया न
गृह्यते, अत्यन्तव्यक्तिसौसादृश्येनानुद्भूतत्वात् । यदा तु मातापित्रोस्तत्पूर्वेषाञ्च
वृद्धपरम्परया विशुद्धब्राह्मणत्वमवसितम्, तदा ब्राह्मणोऽयमिति प्रत्यक्षेणैव प्रतीयते ।
"द्रव्यत्वाद्यपरम्" द्रव्यत्वादि जातियाँ अपर हैं । अर्थात् द्रव्यत्व, गुणत्व,
कर्म्मत्व इत्यादि जातियाँ सत्ता की अपेक्षा 'अपर' हैं । इसी प्रकार यह व्याख्या भी
करनी चाहिए कि द्रव्यत्वादि जातियों की अपेक्षा पृथिवीत्वादि जातियाँ 'अपर' हैं ।
पृथिवीत्वादि की अपेक्षा घटत्वादि जातियाँ अपर हैं । एवं गुणत्वादि सामान्यों की
की अपेक्षा रूपत्वादि सामान्य अपर हैं ।
कोई कहते हैं कि जल की उपलब्धि के बाद वह्नि की उपलब्धि होने पर
"यह वही है" इस प्रकार की (प्रत्यभिज्ञात्मक) प्रतीति नहीं होती है । अतः
जलवह्न्यादि साधारण द्रव्यत्व नाम की कोई जाति नहीं है । किन्तु यह असङ्गत है,
क्योंकि स्वतन्त्ररूप से प्रतीति का विषय ही द्रव्य है । जल एवं वह्नि दोनों की ही
स्वतन्त्ररूप से प्रतीति होती है । अतः अवश्य ही दोनों में रहनेवाली एक द्रव्यत्व
जाति है । उत्क्षेपणादि सभी क्रियाओं में चलनारूपत्व की प्रतीति होती है ।
चलनारूपत्व की प्रतीति ही वस्तुतः कर्म्मत्व की प्रतीति है । (अतः कर्म्मत्व
जाति भी अवश्य है) । रूपादि चौबीस गुणों में जिस व्यक्ति को 'गुण' पद की
शक्ति गृहीत है, उस व्यक्ति को रूपादि में भी अवश्य ही गुणत्व की प्रतीति होती
है । अतः गुणत्व जाति का भी खण्डन नहीं कर सकते । सामान्य (जाति) की
प्रतीति के लिए व्यक्ति के ज्ञान की तरह सामान्यवाचक शब्द की (व्यक्ति में)
शक्ति का ज्ञान भी कारण है । जैसे ब्राह्मणत्व जाति के ज्ञान में योनिसम्बन्ध का
ज्ञान कारण है । ब्राह्मणत्व जाति भी ब्राह्मणजातीय माता-पिता से उत्पन्न व्यक्ति
में उत्पत्ति के समय से ही सम्बद्ध रहती है, किन्तु क्षत्रियादि व्यक्तियों के अवयवों
के साथ ब्राह्मणजातीय व्यक्तियों के अवयवों का अत्यन्त सादृश्य होने के कारण

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३५
न्यायकन्दली
यथा हि सुविदितरत्नपरीक्षाशास्त्रो रत्नजातिभेदं प्रत्यक्षतः प्रत्येति, नापरः । न च तावता
रत्नजातिभेदो नास्ति, न च तत्प्रत्यक्षमप्रत्यक्षम् । यच्चोक्तम्-स्त्रीणां स्वभावचपलानां
विशुद्धिर्दुरवबोधैवेति । तदसत्, अभियुक्तैः सुरक्षितानां सुकरस्तद्वयबोधः, कथितश्च
तासां बहुविधो रक्षणोपाय इत्यास्तां तावदसक्तानुप्रसङ्गः ।
तच्च द्रव्यादिकं स्वविषयस्य विजातीयेभ्यो व्यावृत्तेरपि हेतुत्वाद्बिशेषाख्यां
विशेषसंज्ञामपि लभते, न केवलमनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यसंज्ञां लभते, व्यावृत्तेरपि
हेतुत्वाद्विशेषसंज्ञामपि लभत इत्यपिशब्दयोरर्थः । किमुक्तं स्यात् ? द्रव्यत्वादिषु
सामान्यशब्दो मुख्यः, अनुवृत्तिहेतुत्वस्य सामान्यलक्षणस्य सम्भवात्, विशेषशब्दश्च
भाक्तः, स्वाश्रयो विशिष्यते सर्वतो व्यवच्छिद्यते येन स विशेष इति लक्षणस्यात्राभावात् ।
इदन्तु लक्षणमन्यविशेषेष्वस्ति ।
केवल प्रथम दर्शन में ही क्षत्रियादि व्यक्तियों से विलक्षण रूप से ब्राह्मणों की
प्रतीति नहीं होती है । क्योंकि ब्राह्मणत्व जाति व्यक्ति में सम्बद्ध रहने पर भी
उद्भूत नहीं है । जब यह ज्ञान हो जाता है कि यह व्यक्ति ब्राह्मण माता-पिता से
उत्पन्न है, तब उस व्यक्ति के प्रत्यक्ष के साथ ही ब्राह्मणत्व जाति का भी प्रत्यक्ष हो
जाता है । जैसे कि रत्नों की परीक्षा में निपुण व्यक्ति रत्नों की जातियों को प्रत्यक्ष
ही देखता है । एवं उस परीक्षा से अनभिज्ञ व्यक्ति रत्नों की जातियों को समझाने
पर भी नहीं समझ पाता है । किन्तु इससे यह सिद्ध नहीं हो सकता कि रत्नों की
भिन्न जातियाँ ही नहीं हैं या उस निपुण पुरुष का प्रत्यक्ष प्रत्यक्ष ही नहीं है । (प्र.)
कोई कहते हैं कि स्त्रियाँ चञ्चल होती हैं, अतः तन्मूलक वंशविशुद्धि का ज्ञान
दुर्लभ है । (उ.) किन्तु यह सर्वथा असङ्गत है, क्योंकि आर्यों से सुरक्षित स्त्रियों
की सन्तानों में विशुद्धि का बोध कठिन नहीं है । स्त्रियों की रक्षा के बहुत से उपाय
शास्त्रों में कहे गये हैं । अब इस प्रसङ्ग से आये विषय को यहीं छोड़ देना चाहिये ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ अपने आश्रयों को भिन्नजातीय वस्तुओं से पृथक् रूप से
भी समझाती हैं, अतः वे 'विशेष' नाम से भी कही जाती हैं । अपने विभिन्न
आश्रयों में एकाकारप्रतीतिरूप अनुवृत्तिप्रत्ययजनक होने से केवल 'सामान्य' शब्द
से ही व्यवहृत नहीं होती हैं । यही दोनों (व्यावृत्तेरपि विशेषाख्यामपि) 'अपि'
शब्दों का अभिप्राय है । इससे निष्कर्ष क्या निकला ? यही कि द्रव्यत्वादि
जातियाँ 'सामान्य' शब्द के मुख्य अर्थ हैं । क्योंकि "अनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्व" रूप
सामान्य का सम्पूर्ण लक्षण उनमें है । 'विशेष' शब्द का उनमें लाक्षणिक प्रयोग
होता है, क्योंकि "जो अपने आश्रय व्यक्ति को और सभी पदार्थों से भिन्न रूप से
समझावे वही 'विशेष' है"। विशेष का यह सम्पूर्ण लक्षण उनमें नहीं है, किन्तु
वह अन्य विशेषों में (ही) है ।

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३६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषाः । ते खल्व्यत्यन्तव्यावृत्तिहेतुत्वाद्विशेषा एव ।
सभी नित्य द्रव्यों में रहनेवाले 'अन्त्य' ही 'विशेष' हैं । वे (अपने
आश्रय की और पदार्थों से भिन्नत्व बुद्धिरूप) व्यावृत्ति के ही कारण
हैं । अतः वे 'विशेष' ही हैं (अपने आश्रयों को परस्पर समानरूप से
न समझाने के कारण 'सामान्य' शब्द के गौण अर्थ भी नहीं हैं) ।
न्यायकन्दली
नित्यद्रव्यवृत्तयोऽन्त्या विशेषा इति । नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तन्त एव ये ते विशेषा इति ।
नित्यद्रव्येष्वेवेति द्रव्यगुणकर्म्मसामान्यानां व्यवच्छेदः । द्रव्यगुणकर्माणि द्रव्येष्वेव वर्त्तन्ते,
न नित्येष्वेवेति । सामान्यानि तु न द्रव्येष्वेव । न नित्येष्वेव वर्त्तन्त एवेति बुद्धिशब्दादीनां
व्यवच्छेदः, तेषां समस्तनित्यद्रव्यप्राप्त्यभावात् । ननु किं विशेषा एव किं वा
द्रव्यत्वादिवदुभयरूपाः ? इति । तत्राह-ते खल्विति । खलुशब्दो निश्चये, नित्यद्रव्यवृत्तयो
ये विशेषास्ते विशेषा एव निश्चिता न तु सामान्यान्यपि भवन्तीत्यर्थः । अत्यन्तं सर्वदा,
व्यावृत्तेरेव स्वाश्रयस्येतरस्माद्व्यवच्छेदस्यैव, हेतुत्वात् कारणत्वादिति । यथा चेदं
तथोपरिष्टादुपपादनीयम् ।
जो (पदार्थ) केवल सभी नित्यद्रव्यों में रहें और अवश्य ही रहें वे ही 'विशेष'
हैं । 'नित्य द्रव्यों में ही रहें' (नित्यद्रव्येष्वेव) इस अंश से द्रव्य, गुण और कर्म्म
इन तीनों में विशेष के लक्षण की अतिव्याप्ति की शङ्का मिट जाती है, क्योंकि वे
यद्यपि द्रव्यों में ही रहते हैं, तथापि नित्य द्रव्यों में ही नहीं रहते (किन्तु अनित्य
द्रव्यों में भी रहते हैं) । सामान्य पदार्थ केवल द्रव्य में ही नहीं रहता है (गुणादि में
भी रहता है, अतः सामान्य में विशेष लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं है) ।
'नित्यद्रव्येष्वेव वर्त्तत एव' इस वाक्य से शब्द और बुद्धि इन दोनों में विशेष
लक्षण की अतिव्याप्ति वारित होती है; क्योंकि शब्दादि यद्यपि नित्य द्रव्यों में
ही रहते हैं, किन्तु सभी नित्य द्रव्यों में नहीं रहते । क्या ये 'विशेष' ही हैं ?
या द्रव्यत्वादि की तरह सामान्य और विशेष दोनों ही हैं ? इस संशय को 'ते
खलु' इत्यादि वाक्य से हटाते हैं । यहाँ 'खलु' शब्द 'निश्चय' अर्थ का
बोधक है । अभिप्राय यह है कि नित्य द्रव्यों में रहनेवाले ये 'विशेष' निश्चित रूप
से केवल 'विशेष' ही हैं, ये कभी सामान्य नहीं होते । क्योंकि ये बराबर अपने
आश्रय को और पदार्थों से भिन्न रूप में ही समझाते हैं। यह जिस प्रकार उत्पन्न
होता है, वह आगे दिखाया जाएगा ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अयुतसिद्धानामाधार्याधारभूतानां यः सम्बन्ध इह प्रत्ययहेतुः स समवायः ।
आधार और आधेयरूप अयुतसिद्धों का 'इह प्रत्यय.' अर्थात् इस
आधार में यह आधेय है, इस बुद्धि का कारण जो सम्बन्ध वही
समवाय है ।
न्यायकन्दली
समवायस्वरूपं निरूपयति-अयुतसिद्धानामिति । युतसिद्धिः पृथक्सिद्धिः,
पृथगवस्थितिरुभयोरपि सम्बन्धिनोः परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वम्, सा ययोर्नास्ति
तावयुतसिद्धौ, तयोः सम्बन्धः समवायः । यथा तन्तुपटयोः ।
यद्यपि तन्तवः पटव्यतिरिक्ताश्रये समवयन्ति, तथाप्युभयोः परस्पर-
परिहारेण पृथगाश्रयाश्रयित्वं नास्ति, पटस्य तन्तुष्वेवाश्रयित्वात् । यत्र तु द्वयोरपि
सम्बन्धिनोः परस्परपरिहारेण व्यतिरिक्ताश्रयाश्रयित्वम्, तत्र युतसिद्धिः, यथा
त्वगिन्द्रियशरीरयोः । शरीरं हि त्वगिन्द्रियपरिहारेण पृथगाश्रये स्वावयवे
समाश्रितम्, तेनानयोः संयोगो न समवायः । नित्यानान्तु युतसिद्धिः पृथग-
'अयुतसिद्धानाम्' इत्यादि पङ्क्तियों से 'समवाय' के स्वरूप का निरूपण करते
हैं । 'युतसिद्धि' शब्द से पृथक्सिद्धि अर्थात् अलग-अलग स्वतन्तरूप से रहना
अभिप्रेत है । कहने का तात्पर्य है कि जिन दो सम्बन्धियों का आश्रयत्व या
आश्रितत्व एक-दूसरे को छोड़कर किसी तीसरी वस्तु में भी रहे उन दो वस्तुओं
की स्वतन्तरूप से विद्यमानता ही "युतसिद्धि" है । इस प्रकार की युतसिद्धि जिन
दो वस्तुओं की न रहे वे दोनों वस्तु 'अयुतसिद्ध' हैं । इसी प्रकार की
(अयुतसिद्धि) दो वस्तुओं का सम्बन्ध समवाय है । जैसे सूत और कपड़े का ।
यद्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवयवों के साथ भी सम्बद्ध है । फिर
भी परस्पर एक-दूसरे को छोड़कर वे न कहीं आश्रित हैं एवं न कोई उनमें आश्रित
है 1 । जिन दो वस्तुओं में परस्पर एक-दूसरे से असम्बद्ध होकर स्वतन्त्र रीति से
किसी तीसरी वस्तु का आश्रयत्व या आश्रितत्व है, उन दो वस्तुओं की स्वतन्त्र रूप से
विद्यमानता ही 'युतसिद्धि' है, जैसे कि त्वगिन्द्रिय और शरीर की विद्यमानता । शरीर
त्वगिन्द्रिय को छोड़कर स्वतन्त्र रूप से अपने अवयवों में रहता है, अतः त्वगिन्द्रिय
और शरीर का सम्बन्ध संयोग ही है, समवाय नहीं । नित्य दो पदार्थों की 'युतसिद्धि'

  1. अभिप्राय यह है कि यद्यपि तन्तु पट से भिन्न अपने अंशु नाम के अवयवों में भी सम्बद्ध
    है, अतः तन्तु और पट में युतसिद्धि की शङ्का ठीक है । किन्तु पट चूँकि तन्तुओं में ही
    आश्रित है । अतः पट के आश्रयरूप तन्तु अंशु प्रभृति अन्य पदार्थों में सम्बद्ध भी हों
    तथापि पट को छोड़कर कहीं सम्बद्ध नहीं हो सकते । अतः पट समवाय से युत तन्तुओं
    की स्वतन्त्र सिद्धि सम्भव नहीं है ।
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३८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
न्यायकन्दली
वस्थितिः, पृथग्गमनयोग्यता, सा ययोर्नास्ति तावयुतसिद्धौ, तयोर्यः सम्बन्धः स समवायः,
यथाकाशद्रव्यत्वयोरिति । अयुतसिद्धयोः सम्बन्ध इत्युच्यमाने धर्मस्य सुखस्य च यः
कार्यकारणभावलक्षणः सम्बन्धः, सोऽपि समवायः प्रप्नोति, तयोरात्मैकाश्रितयोर्युतसिद्धय-
भावात् । तदर्थमाधार्याधारभूतानामिति पदम्, न त्वाकाशशकुनिसम्बन्धिनिवृत्त्यर्थम्,
अयुतसिद्धपदेनैव तस्य निवर्त्तितत्वात् । एवमप्याकाशस्याकाशपदस्य च वाच्यवाचकभावः
समवायः स्यात्, तन्निवृत्त्यर्थमिहप्रत्ययहेतुरिति । वाच्यवाचकभावे हि तस्माच्छब्दात् तदर्थो
ज्ञायते न त्विहेदमिति । आधार्याधारभूतानामिह प्रत्ययहेतुरिति कुण्डबदरसम्बन्धो न
व्यवच्छिद्यते, तदर्थमयुतसिद्धानामिति ।
अत्र केचिदयुतसिद्धिपदं विकल्पयन्ति-किं युतौ न सिद्धौ ? आहो-
स्विदयुतौ सिद्धौ ? यदि युतौ न सिद्धौ, कस्तयोः सम्बन्धः, धर्मिणोरभावात् ।
अर्थात् पृथक् सिद्धि का अर्थ है दोनों में परस्पर एक-दूसरे को छोड़कर जाने की
यह 'योग्यता' । यह जिन नित्य दो वस्तुओं में नहीं है, उनका सम्बन्ध भी
समवाय है, जैसे आकाश और द्रव्यत्व का अगर इतना ही कहें कि "अयुतसिद्ध
दो वस्तुओं का सम्बन्ध ही समवाय है" तो पुण्य और सुख इन दोनों का जो
कार्यकारणभाव सम्बन्ध है, उसमें समवाय लक्षण की अतिव्याप्ति होगी; क्योंकि वे
दोनों केवल आत्मा में ही रहने के कारण युतसिद्ध नहीं हैं, अतः समवाय के
लक्षणवाक्य में "आधार्याधारभूतानाम्" यह पद देना आवश्यक है; किन्तु बाज
पक्षी और आकाश के संयोग में अतिव्याप्ति वारण के लिए "आधार्याधार-
भूतानाम्" यह पद नहीं है; क्योंकि इस अतिव्याप्ति का वारण 'अयुतसिद्ध' पद
से ही हो जाता है । इसी प्रकार आकाश पद और आकाशरूप अर्थ इन दोनों के
वाच्यवाचकभाव सम्बन्ध में अतिव्याप्ति वारण के लिए प्रकृत समवाय लक्षण में
'इहप्रत्ययहेतुः' यह पद दिया गया है; क्योंकि आकाश पद से आकाशरूप अर्थ
की ही प्रतीति होती है । इससे यह प्रतीति नहीं होती कि 'आकाशरूप अर्थ में
आकाश पद है' या 'आकाशपद में आकाशरूप अर्थ है' । (प्रकृत समवाय लक्षण
में) 'आधार्याधारभूतानाम्' एवं 'इहप्रत्ययहेतुः' इन दोनों पदों का प्रयोग करने
पर भी कुण्ड और बदर के संयोग सम्बन्ध में अतिव्याप्ति नहीं हटती है, अतः
'अयुतसिद्धानाम्' यह पद है ।
यहाँ कुछ लोग अयुतसिद्ध पद के अर्थ के प्रसङ्ग में इन विरुद्ध पक्षों को
उठाते हैं कि अयुतसिद्ध पद का (१) 'युतौ न सिद्धौ' एवं 'अयुतौ सिद्धौ' इन दोनों
में कौन-सा विग्रह प्रकृत में इष्ट है ? इनमें प्रथम पक्ष तो इसलिए ठीक नहीं है
कि प्रतियोगी और अनुयोगी दोनों अगर असिद्ध हैं तो फिर यह समवाय सम्बन्ध

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३१
न्यायकन्दली
अथायुतौ सिद्धौ, तथापि कः सम्बन्धोऽपृथक्सिद्धत्वादेव । भिन्नयोर्हि सम्बन्धो यथा
कुण्डबदरयोरिति ।
तदपरे न मृषन्ति । न ह्यास्यायमर्थो युतौ न सिद्धौ न निष्पन्नाविति, असतोः समवा-
यानभ्युपगमात् । नाप्यस्यायमर्थः - अयुतौ सिद्धाविति, एकात्मकत्ये ह्येकमेव वस्तु स्यान्नो-
भयम्, परस्परात्मकत्वाभावलक्षणत्वादुभयरूपतायाः । न च तदेकं वस्तु परमार्थतः, पर-
स्परविलक्षणेन रूपेण तयोराकारयोः प्रतिभासनात् । विलक्षणाकारबुद्धिवेद्यत्वस्यैव भेद-
लक्षणत्वात्, अन्यथा भेदाभेदव्यवस्थानुपपत्तेः । तस्मान्न स्वरूपाभेदोऽप्युतसिद्धिः, किन्तु
अयुतसिद्धानामिति परस्परपरिहारेण पृथगाश्रयानाश्रितानामित्यर्थः । तथा च सति सम्बन्धो
नानुपपन्नः, स्वरूपभेदस्य सम्भवात्, भिन्नयोश्च परस्परोपश्लेषस्य दहनायस्पिण्डयोरिव विना
सम्बन्धेनासम्भवात् । इयांस्तु विशेषः - वह्निरुत्पत्तेः पश्चादयस्पिण्डेन सह सम्बध्यते, इह
तु स्वकारणसामर्थ्यादुपजायमानमेव तत्र सम्बद्ध्यते, यथा छिदिक्रिया छेद्येनेत्यलम् ।
किसके साथ किसका होगा ? (क्योंकि सम्बन्ध से पहले सम्बन्धियों की सिद्धि
आवश्यक है), अगर 'जिन दोनों की पृथक् सिद्धि न हो वे अयुतसिद्ध हैं' यह
दूसरा पक्ष मानें तो भी असङ्गति है ही, क्योंकि जिन दो वस्तुओं की अलग-अलग
सिद्धि न हो, पृथक् सत्ता न रहे, उन दोनों का सम्बन्ध कैसा ? दो भिन्न वस्तुओं
का ही सम्बन्ध होता है, जैसे कुण्ड और बेर का ।
इन दोनों ही आक्षेपों को दूसरे सम्प्रद ही मानते । इन लोगों का कहना है
कि 'युतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य का अर्थ नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं
की (पृथक्) सत्ता न रहे, वे अयुतसिद्ध हैं", क्योंकि हम लोग असत् वस्तुओं का
समवाय नहीं मानते । "अयुतौ न सिद्धौ" इस विग्रह वाक्य के अनुसार यह अर्थ
भी नहीं है कि "जिन दो वस्तुओं की अभिन्नरूप से सिद्धि हो वे अयुतसिद्ध हैं",
क्योंकि एक स्वरूप की वस्तु एक ही होगी, दो नहीं । दो वस्तुओं के दोनों असाधारण
धम्मों का एक-दूसरे में अभाव ही 'उभयरूपत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
के अनुयोगी और प्रतियोगीरूप वे दोनों अयुतसिद्ध अभिन्न भी नहीं हैं, क्योंकि
परस्पर विलक्षण रूप से दोनों की यथार्थ प्रतीति होती है । विलक्षण रूप से ज्ञात
होना ही वस्तुओं का (परस्पर) भेद है । अगर विलक्षण रूप से ज्ञात होने पर भी
वस्तुओं में भेद न मानें तो संसार से भेद और अभेद की बात ही उठ जाएगी ।
अयुतसिद्ध शब्द का अर्थ यह है कि जो अनेक वस्तुएँ परस्पर एक-दूसरे को
छोड़कर न रहें वे 'अयुतसिद्ध' हैं । (अयुतसिद्ध शब्द के) इस प्रकार के अर्थ में
सम्बन्ध की कोई अनुपपत्ति नहीं है । क्योंकि इस प्रकार के अयुतसिद्धों के स्वरूप

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४० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एवं धर्म्मैर्विना धर्म्मिणामुद्देशः कृतः ।
इस प्रकार धर्मों को छोड़कर केवल धर्मियों के नामों का उल्लेख
किया गया है।
न्यायकन्दली
ननु किमर्थं षडेव पदार्था उद्दिष्टा नापरे ? तेषामेव भावात्, तदन्येषामभावाच्च ।
तदभावश्च सर्व्वैः प्रमाणैरनुपलभ्यमानत्वाच्छशविषाणवत् । षण्णां सामान्यलक्षणं
विधिप्रत्ययविषयत्वम् । व्यावृत्तन्तु लक्षणम्-यथा गुणाश्रयो द्रव्यम् । सामान्यवान्गुणः
संयोगविभागयोरनपेक्षो न कारणं गुणः । एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं
कर्म । अनुवृत्तिप्रत्ययकारणं सामान्यम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतुर्विशेषः । अयुतसिद्ध-
योराश्रयाश्रयिभावः समवाय इति ।
अनुद्दिष्टेषु धर्मिषु धर्म्मा न शक्यन्ते वक्तुम्, अतो धर्म्माणामुद्देशं
प्रक्रमयितुं सङ्गतिं प्रदर्शयति-एवमिति । एवं पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन धर्मिर्विना
भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड का परस्पर सम्मिलन
बिना संयोग रूप सम्बन्ध के असम्भव है, उसी प्रकार किन्हीं भी विभिन्न दो
पदार्थों का बिना किसी सम्बन्ध के परस्पर सम्मिलन असम्भव है । अन्तर केवल
इतना ही है कि उत्पन्न होने के बाद वह्नि अयःपिण्ड के साथ सम्बद्ध होता है,
किन्तु समवाय का प्रतियोगी अपने कारणों के बल से अपने अनुयोगी में सम्बद्ध
ही उत्पन्न होता है जैसे कि काटने की क्रिया काटी जानेवाली वस्तु के साथ सम्बद्ध
ही उत्पन्न होती है । इस विषय में इतना ही विचार पर्याप्त है ।
(प्र.) छः पदार्थों का ही प्रतिपादन क्यों किया ? और पदार्थों का क्यों
नहीं ? (उ.) इसलिए कि पदार्थ उतने ही हैं, उससे अधिक नहीं, इन छः पदार्थों
से भिन्न पदार्थों का अभाव इसलिए है कि वे किसी भी स्वीकृत प्रमाण से उपलब्ध
नहीं हैं । जैसे कि खरहे की सींग । छः पदार्थों का सामान्य लक्षण यह है कि
किसी प्रतियोगी की अपेक्षा के बिना भावत्वरूप से ज्ञात होना । प्रत्येक पदार्थ का
औरों में न रहनेवाला लक्षण इस प्रकार है-(१) गुणों का आश्रय द्रव्य है ।
(२) जो सामान्य (जाति) से युक्त हो, गुणों से सर्वथा रहित हो, संयोग और
विभाग का स्वतन्त्र कारण न हो वही गुण है । (३) जो एक समय में एक ही
द्रव्य में रहे, गुणों से सर्वथा शून्य हो, एवं संयोग और विभाग का स्वतन्त्र कारण
हो. वही कर्म है । (४) अपने विभिन्न आश्रयों में एकाकारता प्रतीतिरूप
अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण 'जाति' है । (५) अपने आश्रय में औरों से भिन्नत्व
बुद्धिरूप व्यावृत्तिप्रत्यय का कारण 'विशेष' है । (६) अयुतसिद्धों के आधाराधेय-
भाव का नियामक सम्बन्ध 'समवाय' है ।
जब तक धर्मी न कहे जायँ तब तक उनके धर्म नहीं कहे जा सकते । अतः पदार्थों
के उद्देश के बाद पदार्थ के धर्म अर्थात् साधर्म्य क्यों कहे गये ? इस प्रश्न का

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१
प्रशस्तपादभाष्यम्
षण्णामपि पदार्थानामस्तित्वमभिधेयत्वञ्ज्ञेयत्वानि ।
(द्रव्यादि) छहों पदार्थों के १. अस्तित्व, २. अभिधेयत्व और
३. ज्ञेयत्व, ये तीन साधर्म्य हैं ।
न्यायकन्दली
धर्म्मान् परित्यज्य धर्म्मिणामुद्देशः कृतः, धर्म्मिणां संज्ञामात्रेण सङ्कीर्तनं कृतमिदानीं धर्म्मा
उद्दिश्यन्त इति भावः । यद्यपि पूर्वं द्रव्यादीनां विभागः कृतस्तथाप्युद्देशः कृत इत्युक्तम्,
विभागस्य नामधेयसङ्कीर्तनमात्रेणोद्देशेऽन्तर्भावात् ।
यद्यपि धर्म्माः षट्पदार्थेभ्यो न व्यतिरिच्यन्ते, किन्तु त एव अन्योन्यापेक्षया धर्म्मा
धम्मिणश्च भवन्तीति । तथापि तेषां धर्मिरूपतया परिज्ञानार्थं पृथगुद्देशं करोति-
षण्णामपीति । अस्तित्वं स्वरूपवत्त्वम्, षण्णामपि साधर्म्यम्, यस्य वस्तुनो यत् स्वरूपं
तदेव तस्यास्तित्वम् । अभिधेयत्वमप्यभिधानप्रतिपादनयोग्यत्वम्, तच्च वस्तुनः स्वरूप-
मेव । भावस्वरूपमेवावस्थाभेदेन ज्ञेयत्वमभिधेयत्वञ्चोच्यते ।
आश्रितत्वञ्च परतन्त्रतयोपलब्धिः, न समवायलक्षणा वृत्तिः, समवाये
तदभावात् । इदञ्चाश्रितत्वं चतुर्विधेषु परमाणुषु आकाश-काल-
समाधान सङ्गति प्रदर्शन के द्वारा 'एवम्' इत्यादि पङ्क्ति से दिखलाते हैं । 'एवम्'
पहले कहे हुये सन्दर्भ से, 'धर्म्मार्थिना' धर्मों को छोड़कर 'धर्म्मिणामुद्देशः कृतः'
अर्थात् धर्म्मियों को ही केवल उनके नाम के द्वारा कहा है, अब उनके धर्मों को
उनके नाम से कहते हैं । यद्यपि पहले के ग्रन्थों से पदार्थों का विभाग भी किया
है, फिर भी 'उद्देशः कृतः' यही वाक्य कहा है, क्योंकि नामों के द्वारा पदार्थों के
कथन रूप उद्देश में ही विभाग का भी अन्तर्भाव हो जाता है ।
यद्यपि ये धर्म भी इन छः पदार्थों के ही अन्तर्गत हैं, तथापि वे ही
यथासम्भव अपने में एक-दूसरे के धर्म और धर्मी कहलाते हैं, फिर भी धर्मी
रूप से उनको समझाने के लिए 'षण्णाम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अलग से उनको
कहते हैं । 'अस्तित्व' शब्द का अर्थ 'स्वरूप' है, अर्थात् वस्तुओं का अपना
असाधारण रूप ही अस्तित्व है । यह 'अस्तित्व' द्रव्यादि छहों पदार्थों में रहनेवाला
धर्म है । 'अभिधेयत्व' शब्द का अर्थ है अभिधान, अर्थात् शब्द से कहे जाने की
क्षमता, वह भी वस्तुओं का स्वरूप ही है । वस्तुओं का यह स्वरूप ही अवस्थाओं
के भेद से अभिधेयत्व, ज्ञेयत्व प्रभृति शब्दों से कहा जाता है ।
परतन्त्र रूप से ज्ञात होना ही 'आश्रितत्व' शब्द का अर्थ है । समवाय सम्बन्ध
से कहीं रहना (आश्रितत्व शब्द का अर्थ) नहीं है, क्योंकि समवाय कहीं पर भी समवाय
सम्बन्ध से नहीं रहता है । पृथिवी, जल, तेज और वायु इन चारों पदार्थों के परमाणुओं