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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

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Page 113

४० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ उद्देश-
प्रशस्तपादभाष्यम्
एवं धर्म्मैर्विना धर्म्मिणामुद्देशः कृतः ।
इस प्रकार धर्मों को छोड़कर केवल धर्मियों के नामों का उल्लेख
किया गया है।
न्यायकन्दली
ननु किमर्थं षडेव पदार्था उद्दिष्टा नापरे ? तेषामेव भावात्, तदन्येषामभावाच्च ।
तदभावश्च सर्व्वैः प्रमाणैरनुपलभ्यमानत्वाच्छशविषाणवत् । षण्णां सामान्यलक्षणं
विधिप्रत्ययविषयत्वम् । व्यावृत्तन्तु लक्षणम्-यथा गुणाश्रयो द्रव्यम् । सामान्यवान्गुणः
संयोगविभागयोरनपेक्षो न कारणं गुणः । एकद्रव्यमगुणं संयोगविभागयोरनपेक्षकारणं
कर्म । अनुवृत्तिप्रत्ययकारणं सामान्यम् । अत्यन्तव्यावृत्तिबुद्धिहेतुर्विशेषः । अयुतसिद्ध-
योराश्रयाश्रयिभावः समवाय इति ।
अनुद्दिष्टेषु धर्मिषु धर्म्मा न शक्यन्ते वक्तुम्, अतो धर्म्माणामुद्देशं
प्रक्रमयितुं सङ्गतिं प्रदर्शयति-एवमिति । एवं पूर्वोक्तेन ग्रन्थेन धर्मिर्विना
भी भिन्न-भिन्न हो सकते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड का परस्पर सम्मिलन
बिना संयोग रूप सम्बन्ध के असम्भव है, उसी प्रकार किन्हीं भी विभिन्न दो
पदार्थों का बिना किसी सम्बन्ध के परस्पर सम्मिलन असम्भव है । अन्तर केवल
इतना ही है कि उत्पन्न होने के बाद वह्नि अयःपिण्ड के साथ सम्बद्ध होता है,
किन्तु समवाय का प्रतियोगी अपने कारणों के बल से अपने अनुयोगी में सम्बद्ध
ही उत्पन्न होता है जैसे कि काटने की क्रिया काटी जानेवाली वस्तु के साथ सम्बद्ध
ही उत्पन्न होती है । इस विषय में इतना ही विचार पर्याप्त है ।
(प्र.) छः पदार्थों का ही प्रतिपादन क्यों किया ? और पदार्थों का क्यों
नहीं ? (उ.) इसलिए कि पदार्थ उतने ही हैं, उससे अधिक नहीं, इन छः पदार्थों
से भिन्न पदार्थों का अभाव इसलिए है कि वे किसी भी स्वीकृत प्रमाण से उपलब्ध
नहीं हैं । जैसे कि खरहे की सींग । छः पदार्थों का सामान्य लक्षण यह है कि
किसी प्रतियोगी की अपेक्षा के बिना भावत्वरूप से ज्ञात होना । प्रत्येक पदार्थ का
औरों में न रहनेवाला लक्षण इस प्रकार है-(१) गुणों का आश्रय द्रव्य है ।
(२) जो सामान्य (जाति) से युक्त हो, गुणों से सर्वथा रहित हो, संयोग और
विभाग का स्वतन्त्र कारण न हो वही गुण है । (३) जो एक समय में एक ही
द्रव्य में रहे, गुणों से सर्वथा शून्य हो, एवं संयोग और विभाग का स्वतन्त्र कारण
हो. वही कर्म है । (४) अपने विभिन्न आश्रयों में एकाकारता प्रतीतिरूप
अनुवृत्तिप्रत्यय का कारण 'जाति' है । (५) अपने आश्रय में औरों से भिन्नत्व
बुद्धिरूप व्यावृत्तिप्रत्यय का कारण 'विशेष' है । (६) अयुतसिद्धों के आधाराधेय-
भाव का नियामक सम्बन्ध 'समवाय' है ।
जब तक धर्मी न कहे जायँ तब तक उनके धर्म नहीं कहे जा सकते । अतः पदार्थों
के उद्देश के बाद पदार्थ के धर्म अर्थात् साधर्म्य क्यों कहे गये ? इस प्रश्न का