वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
७४०) न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ कर्मनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मुपकारापकारसमर्थं च भवति तदप्यदृष्टकारितम्, यथा सर्गादावणुकर्म, अग्नि
वाय्वोरूर्ध्वतिर्यग्गमने महाभूतानां प्रक्षोभणम् । अभिषिक्तानां मणीनां तस्करं
प्रतिगमनम्, अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं चेति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
भी अदृष्ट ही है । इसी प्रकार जीवों के उपकार या अपकार
करनेवाली महाभूतों की जिन क्रियाओं के कारणों का बोध प्रत्यक्ष या
अनुमान से नहीं होता है, वे सभी क्रियायें अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
जैसे कि सृष्टि के आदि में परमाणुओं की क्रियायें एवं अग्नि और वायु
की ऊर्ध्वतिर्यग्गतिरूप क्रियायें, भूगोलकों की चलन क्रियायें एवं
अभिमन्त्रित मणि जो चोर की ओर जाती है, या सामान्य लोह चुम्बक
की ओर जो जाता है, ये सभी क्रियायें भी अदृष्ट से ही उत्पन्न होती हैं ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में कर्मपदार्थ का निरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य बहिर्निःसारितस्य मनसोऽभिप्रेतदेशगमनं
प्रत्यागमनं च । तथा सर्गकाले प्रत्यग्रेण शरीरेण सम्बन्धार्थं मनःकर्मा-
दृष्टकारितम् । न केवलमेतावत् सर्वमन्यदपि महाभूतेषु यत् प्रत्यक्षानु-
मानाभ्यामनुपलभ्यमानकारणमुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्, यथा
सर्गादावणुकर्म, अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने, महाभूतानां भूगोलकादीनां
'योगिनां च बहिरुद्रेचितस्य' अर्थात् योगी लोग जब अपने मन को पुनः
अपने शरीर में लौट आने के लिए अभिप्रेत देश में जाने के लिए भेजते हैं,
(उस समय) उनके मन की क्रियायें अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं । मन की केवल वे
ही क्रियायें नहीं, "अन्यदपि महाभूतेषु यत्प्रत्यक्षानुमानाभ्यामनुपलभ्यमानकारण-
मुपकारापकारसमर्थं तदप्यदृष्टकारितम्" (अर्थात् पृथिव्यादि महाभूतों की
ही) अन्य उन क्रियाओं की उत्पत्ति भी अदृष्ट से ही माननी पड़ेगी, जिनके
कारणों की उपलब्धि प्रत्यक्ष या अनुमान के द्वारा नहीं होती है एवं जिनसे
जिस किसी का कुछ उपकार या अपकार होता है । "यथा सर्गादावणुकर्म,
अग्निवाय्वोर्यथासंख्यमूर्ध्वतिर्यग्गमने" जैसे सृष्टि के प्रथम क्षण की परमाणु की
क्रिया एवं अग्नि की ऊपर की ओर जलने की क्रिया अथवा वायु की
टेढ़े-मेढ़े चलने की क्रिया (अदृष्ट से उत्पन्न होती हैं) । 'महाभूतानाम्' अर्थात्
भूगोल प्रभृति का 'प्रक्षोभण' अर्थात् चलन, चोरों की परीक्षा के समय 'अभि-
षिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्' अर्थात् उपयुक्त मन्त्र से अभिषिक्त
अथ सामान्यपदार्थनिरूपणम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
सामान्यं द्विविधम्-परमपरं च। स्वविषयसर्वगत-
'पर' और 'अपर' भेद से सामान्य दो प्रकार का है । वह अपने
विषयों (आश्रयों) में रहता है । वह अभिन्न स्वभाव का है । एक, दो
या बहुत सी वस्तुओं में एक आकार की बुद्धि का कारण है अपने एक
न्यायकन्दली
च प्रक्षोभणं चलनम्, परीक्षाकालेऽभिषिक्तानां मणीनां तस्करं प्रति गमनम्,
अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणं च सर्वमेतददृष्टकारितमिति ।
हिताहितफलोपायप्राप्तित्यागनिबन्धनम् ।
कर्मेति परमं तत्त्वं यत्नतः क्रियतां हृदि ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां कर्मपदार्थः समाप्तः ॥
मणियों का चोर की ओर जाना एवं "अयसोऽयस्कान्ताभिसर्पणम्" अर्थात् साधारण
लौह का चुम्बक की ओर जाना, ये भी सभी क्रियायें अदृष्ट से होती हैं ।
सुख और उसके उपाय की प्राप्ति एवं दुःख और उसके उपाय का परिहार,
ये दोनों ही क्रिया से होते हैं, अतः इस क्रियातत्त्व को यल से हृदय में धारण
करना चाहिए ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर की रची हुई पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली टीका का
कर्मनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
जयन्ति जगदुत्पत्ति-स्थिति-संहति-हेतवः ।
विश्वस्य परमात्मानो ब्रह्मविष्णुमहेश्वराः ॥
सामान्यं व्याचष्टे-द्विविधं सामान्यं परमपरं चेति । कृतव्याख्यान-
मेतदुद्देशावसरे । सर्वसर्वगतं सामान्यमिति केचित् । तन्निषेधार्थमाह-
स्वविषयसर्वगतमिति । यत् सामान्यं यत्र पिण्डे प्रतीयते स तस्य स्वो विषयः ,
जगत् की उत्पत्ति के हेतु ब्रह्मा एवं स्थिति के हेतु विष्णु और संहार के हेतु
महेश्वर, विश्व के परमात्मस्वरूप इन तीनों की जय हो ।
'द्विविधं सामान्यं परमपरञ्च' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा सामान्य का निरूपण- करते
हैं । इस पङ्क्ति की व्याख्या पदार्थोद्देश प्रकरण में (पृ. २९ पं. ११) कर चुके हैं ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि 'सभी सामान्य सभी वस्तुओं में रहते हैं' इस मत के
खण्डन के लिए ही 'स्वविषयसर्वगतम्' यह वाक्य लिखा गया है । जिस सामान्य की
७४२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
मभिन्नात्मकमनेकवृत्ति एकाद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारि स्वरूपाभेदे-
नाधारेषु प्रबन्धेन वर्तमानमनुवृत्तिप्रत्ययकारणम् । कथम् ?
प्रतिपिण्डं सामान्यापेक्षं प्रबन्धेन ज्ञानोत्पत्तावभ्यासप्रत्यय-
ही स्वरूप से अपने सभी आश्रयों में बराबर (बिना विराम के) रहता हुआ
'अनुवृत्तिप्रत्यय' का, अर्थात् अपने आश्रयरूप विभिन्न व्यक्तियों में एक
न्यायकन्दली
तत्र सर्वस्मिन् गतं समवेतम्, सर्वत्र तत्प्रत्ययात् । सर्वसर्वगतत्वाभावे त्वनुपलब्धिरेव
प्रमाणम् । अभिन्नात्मकम्, अभिन्नस्वभावम् । येन स्वभावेनैकत्र पिण्डे वर्तते सामान्यं
तेनैव स्वभावेन पिण्डान्तरेऽपि वर्तते, तत्प्रत्ययाविशेषादित्यर्थः । अनेकेषु पिण्डेषु
वृत्तिर्यस्य तदनेकवृत्ति । अभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तत इति च प्रतीतिसामर्थ्यात् समर्थनीयम् ।
न हि प्रमाणावगतेऽर्थे काचिदनुपपत्तिर्नाम । द्वित्वादिकमप्यभिन्नस्वभावमनेकत्र वर्तते,
तस्मात् सामान्यस्य विशेषो न लभ्यते तत्राह-एकद्विबहुष्विति । सामान्यमेकस्मिन्
पिण्डे द्वयोः पिण्डयोर्बहुषु वा पिण्डेष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययं करोति । एकस्य
पिण्डस्य द्वयोर्बहूनां वोपलम्भे सति गौरिति प्रत्ययस्य भावात्, द्वित्वादिकं त्वेवं न
प्रतीति जिस आश्रय में हो, वही उसका 'स्वविषय' है । वह सभी विषयों में
'गत' अर्थात् समवाय सम्बन्ध से रहता है; क्योंकि उन सभी विषयों में उस
(सामान्य) की प्रतीति होती है । 'सामान्यं सर्वसर्वगत' (अर्थात् सभी सामान्य सभी
सामान्य के विषयों में) क्यों नहीं हैं ? इस प्रश्न का यही उत्तर है कि सर्वत्र सभी
सामान्यों की प्रतीति नहीं होती है । 'अभिन्नात्मकम्' शब्द का अर्थ है
'अभिन्नस्वभाव', अर्थात् जिस स्वरूप से वह अपने एक आश्रय में रहता है, उसी
स्वरूप से वह अपने और आश्रयों में भी रहता है; क्योंकि एक आश्रय में सामान्य
की प्रतीति में एवं दूसरे आश्रयों में उसी सामान्य की प्रतीति में कोई अन्तर
उपलब्ध नहीं होता । 'अनेकवृत्ति' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है 'अनेकेषु
वृत्तिर्यस्य' अर्थात् अनेक आश्रयों में जो रहे, वही 'अनेकवृत्ति' है । सामान्य
'अभिन्नस्वभाव' का है और 'अनेक आश्रयों में रहता है' इन दोनों बातों का
समर्थन तदनुकूल प्रामाणिक प्रतीतियों से करना चाहिए; क्योंकि प्रमाण के द्वारा
निर्णीत अर्थ में किसी प्रकार की अनुपपत्ति की शङ्का नहीं की जा सकती ।
द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति गुण) भी अनेकवृत्ति हैं और अभिन्न स्वभाव के भी हैं,
अतः द्वित्वादि में सामान्य लक्षण की अतिव्याप्ति का निवारण उन दोनों विशेषणों
से नहीं हो सकता, अतः 'एकद्विबहुषु' इत्यादि वाक्य लिखा गया है । अर्थात्
(द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है कि) 'सामान्य' अपने एक आश्रय में, दो
आश्रयों में अथवा बहुत से आश्रयों में प्रतीत होता है । अभिप्राय यह है कि जिस
प्रकार एक ही गोपिण्ड में 'अयं गौः' इस प्रकार से 'सामान्य' की प्रतीति होती है,
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम्] भाषाअनुवादसहितम् ७४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं
आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं
(कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः
अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान
जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे
(दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का
स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के
विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है ।
इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दली
भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुलक्ष्यात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य-
मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा-
न्तरेऽपि । तस्माद्भेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डपरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु
पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं
उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे
गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति
गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती
है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
(सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी
अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो
व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत
एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव'
इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु
का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने
सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने
आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं
में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से
प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते
हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु
द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्तादिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा
'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस
रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में
परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में
'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर
विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक
न्यायकन्दली
प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो
जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति
तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य
प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष-
विरोधादपास्यन्ते ।
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य
कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण
प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे-
इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस
रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति'
अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की
उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह
का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में)
जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष
क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में
उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य
अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले
सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का
है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार-
पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य
(ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में
एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४३
प्रशस्तपादभाष्यम्
जनिताच्च संस्कारादतीतज्ञानप्रबन्धप्रत्यवेक्षणाद् यदनुगतमस्ति तत् सामान्यमिति ।
तत्र सत्तासामान्यं परमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यथा
परस्परविशिष्टेषु चर्मवस्त्रकम्बलादिष्वेकस्मान्नीलद्रव्याभिसम्बन्धानीलं
आकार की बुद्धि का कारण है । (प्र.) यह किस प्रकार समझते हैं
(कि अनेक वस्तुओं में एक ही सामान्य रहता है ) । (उ. ) प्रथमतः
अनेक पिण्डों में से प्रत्येक में सामान्य का ज्ञान होता है । यही ज्ञान
जब बार-बार होता है (जिसे अभ्यासप्रत्यय कहते हैं), तब उससे
(दृढ़तर) संस्कार उत्पन्न होता है । इस संस्कार से उन ज्ञान-समूहों का
स्मरण होता है । इस स्मरण से ही समझते हैं कि इस स्मरण के
विषयीभूत सभी पिण्डों में अनुगत जो धर्म है, वही 'सामान्य' है ।
इन (पर और अपर सामान्यों) में सत्ता नाम का सामान्य केवल
न्यायकन्दली
भवतीति विशेषः । अनेकवृत्तित्वे सति यदेकद्विबहुष्वात्मस्वरूपानुगमप्रत्ययकारणं तत् सामान्य-
मिति लक्षणार्थः । एतदेव विवृणोति-स्वरूपाभेदेनेति । एकस्मिन् पिण्डे यत् स्वरूपं तत् पिण्डा-
न्तरेऽपि । तस्मादभेदेनाधारेषु प्रबन्धेनानुपरमेण पूर्वपूर्वपिण्डापरित्यागेन वर्तमानं सदनुवृत्ति-
प्रत्ययकारणं स्वरूपानुगमप्रतीतिकारणं सामान्यम् । कथमिति परस्य प्रश्नः । कथमनेकेषु
पिण्डेषु सामान्यस्य वृत्तिरवगम्यत इत्यर्थः । उत्तरमाह-प्रतिपिण्डमिति । पिण्डं पिण्डं
उसी प्रकार दो गोपिण्डों में भी 'इमौ गावौ' या बहुत से गोपिण्डों में भी 'इमे
गावः' इत्यादि आकार से 'सामान्य' की प्रतीतियाँ होती हैं । द्वित्वादि (व्यासज्यवृत्ति
गुणों) में ऐसी बात नहीं है (उनकी प्रतीति उनके सभी आश्रयों में ही हो सकती
है, तद्घटक किसी एक आश्रय में नहीं) । द्वित्वादि से सामान्य में यही अन्तर है ।
(सामान्य के लक्षणवाक्य का सार या मर्म यह है कि) जो स्वयं एक होकर भी
अनेक वस्तुओं में विद्यमान रहे एवं (अपने आश्रयीभूत) एक व्यक्ति में, दो
व्यक्तियों में अथवा बहुत से व्यक्तियों में अपने स्वरूप के द्वारा समान एवं अनुगत
एक आकार के प्रत्यय का कारण हो, वही 'सामान्य' है । यही बात 'एतदेव'
इत्यादि से कही गयी है । एक वस्तु का जो स्वरूप है, उस जाति की दूसरी वस्तु
का भी वही स्वरूप है, सभी आश्रयों में अनुगत वह एक ही स्वरूप से अपने
सभी आश्रयों में 'प्रबन्ध से' अर्थात् बिना विराम के फलतः पहले-पहले के अपने
आश्रयरूप पिण्डों को बिना छोड़े हुए ही जो 'अनुवृत्तिप्रत्यय' का अर्थात् अनेक वस्तुओं
में एक आकार की प्रतीति का कारण हो, वही 'सामान्य' है । 'कथम्' इत्यादि से
प्रतिवादी का प्रश्न सूचित किया गया है । जिसका अभिप्राय है कि यह कैसे समझते
हैं कि समान रूप के सभी पिण्डों में एक ही जाति है ? 'प्रतिपिण्डम्' इत्यादि से
७४४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नीलमिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तथा परस्परविशिष्टेषु
द्रव्यगुणकर्मस्वविशिष्टा सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः । सा
'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप कारण है । सत्ता नाम के परसामान्य की सिद्धि इस
रीति से होती है कि जिस प्रकार नील चर्म, नील वस्त्र और नील कम्बलों में
परस्पर विभिन्नता रहते हुए भी नील रङ्ग के सम्बन्ध से उनमें से प्रत्येक में
'यह नील है' इस एक आकार की प्रतीति होती है, उसी प्रकार परस्पर
विभिन्न द्रव्यों, गुणों और कर्मों में से प्रत्येक में 'यह सत् है' इस एक
न्यायकन्दली
प्रति सामान्यापेक्षं यथा भवति, तथा ज्ञानोत्पत्तौ सत्यां योऽभ्यासप्रत्ययस्तेन यः संस्कारो
जनितः, तस्मादतीतस्य ज्ञानप्रबन्धस्य ज्ञानप्रवाहस्य प्रत्यवेक्षणात् स्मरणाद् यदनुगतमस्ति
तत् सामान्यम् । किमुक्तं स्यात् ? एकस्मिन् पिण्डे सामान्यमुपलभ्य पिण्डान्तरे तस्य
प्रत्यभिज्ञानादेकस्यानेकवृत्तित्वमवगम्यते । अत एव तत्र बाधकहेतवः प्रत्यक्ष-
विरोधादपास्यन्ते ।
यत् पूर्वमुक्तं परमपरं च द्विविधं सामान्यमिति तदिदानीं विविच्य
कथयति-तत्र परं सत्तासामान्यमनुवृत्तिप्रत्ययकारणमेव । यद्यपि प्रत्यक्षेण
प्रतीयते सत्ता, तथापि विप्रतिपन्नं प्रत्यनुमानमाह-यथा परस्परविशिष्टे-
इसी प्रश्न का समाधान किया गया है । 'पिण्डं पिण्डं यथा स्यात्' इस व्युत्पत्ति के
अनुसार प्रकृत 'प्रतिपिण्ड' शब्द प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् प्रत्येक पिण्ड में जिस
रीति से सामान्य का ज्ञान होता है,उसी रीति से जब सामान्य की 'अभ्यासप्रतीति'
अर्थात् बार-बार प्रतीति होती है, तब उससे सामान्यविषयक दृढ़ संस्कार की
उत्पत्ति होती है । इस दृढ़ संस्कार से अतीत 'ज्ञानप्रबन्ध' का अर्थात् ज्ञानसमूह
का 'प्रत्यवेक्षण' अर्थात् स्मृति होती है, इस स्मृति के द्वारा (विभिन्न व्यक्तियों में)
जो अनुगत अर्थात् एक रूप से प्रतीत होता है, वही 'सामान्य' है । इससे निष्कर्ष
क्या निकला ? (यही कि) एक वस्तु में सामान्य के प्रतीत होने पर दूसरी वस्तु में
उसकी प्रत्यभिज्ञा होती है । इस प्रत्यभिज्ञा से ही समझते हैं कि एक ही सामान्य
अनेक वस्तुओं में रहता है । अतएव सामान्य के इस स्वरूप को बाधित करनेवाले
सभी हेतु प्रत्यक्षविरोधी होने के कारण स्वयं निरस्त हो जाते हैं ।
पहले कह चुके हैं कि पर और अपर भेद से सामान्य दो प्रकार का
है । 'तत्र परं सत्ता' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब उसी को विचार-
पूर्वक और विस्तारपूर्वक समझाते हैं कि उनमें 'सत्ता' पर सामान्य
(ही) है । अर्थात् केवल 'अनुवृत्तिप्रत्यय' अर्थात् विभिन्न व्यक्तियों में
एकाकार प्रतीति का ही प्रयोजक है । सत्ता यद्यपि प्रत्यक्ष प्रमाण से ही सिद्ध है,
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४५
प्रशस्तपादभाष्यम्
चार्थान्तराद् भवितुमर्हतीति यत् तदर्थान्तरं सा सत्तेति सिद्धा। सत्तानुसम्बन्धात्
सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः, तस्मात् सा सामान्यमेव ।
आकार की प्रतीति होती है। यह प्रतीति द्रव्य, गुण और कर्म इनसे
भिन्न किसी वस्तु से ही होनी चाहिए। वही वस्तु है 'सत्ता'। इस सत्ता
जाति के सम्बन्ध से 'यह सत् है यह सत् है' इत्यादि आकारों के
अनुवृत्तिप्रत्यय ही हो सकते हैं (कोई भी व्यावृत्तिप्रत्यय नहीं), अतः
सत्ता सामान्य ही है, विशेष नहीं ।
न्यायकन्दली
ष्यिति। तद् व्यक्तम् । द्रव्यादिषु सत्सदिति प्रत्ययानुवृत्तिः व्यतिरिक्तप्रत्ययनिबन्धना, भिन्नेषु
प्रत्ययानुवृत्तित्वात्, चर्मवस्त्रादिषु नीलप्रत्ययानुवृत्तिवत् । यस्मात् सत्ता त्रिषु द्रव्यादिषु
प्रत्ययानुवृत्तिं करोति न व्यावृत्तिम्, तस्मात् सामान्यमेव, न विशेष इत्युपसंहारार्थः ।
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च भवति । द्रव्यत्वं
द्रव्येष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । गुणत्वं
गुणेष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिप्रत्ययहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
फिर भी जो कोई उसे प्रत्यक्षवेद्य नहीं मानते, उनके सन्तोष के लिए 'परस्पर- विशिष्टेषु'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अनुमान भी उपस्थित करते हैं। इस अनुमान प्रयोग का
अर्थ स्पष्ट है । जिस प्रकार नीलवस्त्र के नीलधर्म प्रभृति में एक नीलवर्ण के ही
कारण 'यह नील' है, इस एक आकार की प्रतीतियाँ 'अनुवृत्तिप्रत्यय' रूप होती
हैं, उसी प्रकार द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों में 'यह सत् है' इस एक आकार की
प्रतीति भी होती है, इन तीनों से भिन्न किसी वस्तु का ज्ञान उक्त प्रतीतियों का
कारण है; क्योंकि उक्त सदाकारक प्रतीतियाँ भी अनुवृत्तिप्रत्यय हैं । (जिसका ज्ञान
उक्त अनुवृत्तिप्रत्ययों का कारण है वही 'सत्ता' है) प्रकृत उपसंहार ग्रन्थ का यह
अभिप्राय है कि यतः सत्ता द्रव्यादि तीनों पदार्थों में 'यह सत् है' इस आकार के
अनुवृत्तिप्रत्यय का ही कारण है, किसी भी व्यावृत्ति (प्रत्यय) का नहीं, अतः
'सत्ता' सामान्य ही है, विशेष नहीं । द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अनुवृत्तिप्रत्यय
और व्यावृत्तिप्रत्यय दोनों की ही कारण हैं, अतः वे 'सामान्य' और 'विशेष' दोनों
ही हैं । जैसे कि द्रव्यत्व जाति सभी द्रव्यों में 'यह द्रव्य है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय का
कारण है, अतः 'सामान्य' है । उसी प्रकार द्रव्य में ही 'यह गुण और कर्म से
भिन्न है' (क्योंकि इसमें द्रव्यत्व है) इस व्यावृत्तिप्रत्यय का भी कारण है,
अतः 'विशेष' भी है । एवं गुणत्व जाति सभी गुणों में 'यह गुण है' इस प्रकार की
३४६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अपरं द्रव्यत्वगुणत्वकर्मत्वादि अनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यं विशेषश्च
भवति । तत्र द्रव्यत्वं परस्परविशिष्टेषु पृथिव्यादिष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्,
गुणकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा गुणत्वं परस्परविशिष्टेषु रूपादि-
ष्ष्वनुवृत्तिहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यकर्मभ्यो व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । तथा
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यम्, द्रव्यगुणेभ्यो
द्रव्यत्व, गुणत्व, कर्मत्वादि जातियाँ अपर हैं । ये अनुवृत्तिप्रत्यय के
कारण होने से 'सामान्य' और व्यावृत्तिप्रत्यय के कारण होने से
'विशेष' दोनों ही हैं । इनमें द्रव्यत्व परस्पर विभिन्न पृथिवी प्रभृति
नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह द्रव्य है' इस एक आकार की प्रतीति
के हेतु होने से 'सामान्य' है एवं उन्हीं नौ द्रव्यों में से प्रत्येक में 'यह
गुण और कर्म से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि के हेतु होने से 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार गुणत्व भी रूपादि चौबीस गुणों में से प्रत्येक में
'यह गुण है' इस एक आकार के प्रत्ययों का हेतु होने से 'सामान्य' है
एवं 'ये रूपादि द्रव्य और कर्म से भिन्न हैं' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार कर्मत्व जाति भी उत्क्षेपणादि
विभिन्न क्रियाओं में से प्रत्येक में 'यह क्रिया है' इस अनुवृत्तिप्रत्यय
का कारण होने से सामान्य है एवं उत्क्षेपणादि क्रियाओं में से
प्रत्येक में 'यह द्रव्य और गुण से भिन्न है' इस व्यावृत्तिबुद्धि का कारण
न्यायकन्दली
कर्मत्वं परस्परविशिष्टेषूत्क्षेपणादिष्वनुवृत्तिप्रत्ययहेतुत्वात् सामान्यं द्रव्यगुणेभ्यो
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । द्रव्यत्वादिवत् पृथिवीत्वादीनामप्यनुवृत्तिव्यावृत्तिप्रत्यय-
हेतुत्वात् सामान्यविशेषभावोऽस्तीत्याह—एवमिति । प्राणिगतानि सामान्यानि
गोत्वाश्वत्वादीनि, अप्राणिगतानि घटत्वपटत्वादीनि । किं द्रव्यत्वादीनां सामान्य-
अनुवृत्तिप्रतीति का कारण है, अतः सामान्य है । एवं द्रव्य और कर्म इन दोनों से 'गुण
भिन्न है' (क्योंकि वह गुण है) इस व्यावृत्तिबुद्धि का भी कारण है, अतः 'विशेष'
भी है । इसी प्रकार परस्पर विभिन्न उत्क्षेपणादि क्रियाओं में 'ये कर्म हैं' इस समान
आकार की प्रतीति (अनुवृत्तिप्रत्यय) कर्मत्व से होती है, अतः वह सामान्य है और
उन्हीं कर्मों में 'ये द्रव्य और गुण से भिन्न हैं' इस व्यावृत्ति बुद्धि की हेतु होने से
'विशेष' भी है । 'एवम्' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा द्रव्यत्वादि जातियों की तरह पृथिवीत्वादि
जातियों में भी कथित सामान्य-विशेषभाव का अतिदेश करते हैं । गोत्व, अश्वत्व प्रभृति
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४७
प्रशस्तपादभाष्यम्
व्यावृत्तिहेतुत्वाद् विशेषः । एवं पृथिवीत्वरूपत्वोत्क्षेपणत्वगोत्वघटत्वपटत्वादीना-
मपि प्राण्यप्राणिगतानामनुवृत्तिव्यावृत्तिहेतुत्वात् सामान्यविशेषभावः सिद्धः ।
एतानि तु द्रव्यत्वादीनि प्रभूतविषयत्वात् प्राधान्येन सामान्यानि, स्वाश्रय-
विशेषकत्वाद् भक्त्या विशेषाख्यानीति ।
होने से 'विशेष' भी है । इसी प्रकार प्राणियों में रहनेवाले और
अप्राणियों में रहनेवाले पृथिवीत्व, रूपत्व, उत्क्षेपणत्व, गोत्व, घटत्व, पटत्व
प्रभृति जातियों में भी अनुवृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से सामान्यत्व और
व्यावृत्तिप्रत्ययजनकत्व हेतु से विशेषत्व की सिद्धि समझनी चाहिए ।
द्रव्यत्वादि जातियाँ सामान्य के पूर्णलक्षण से युक्त होने के कारण वस्तुतः
सामान्य ही हैं; किन्तु अपने आश्रयों को अपने से भिन्न वस्तुओं से
पृथक् रूप में समझाने की योग्यता भी उनमें किसी अंश में संघटित
होती है, अतः उनमें 'विशेष' शब्द का भी गौणप्रयोग होता है ।
न्यायकन्दली
स्वरूपं वास्तवम् ? किं वा विशेषस्वरूपता ? आहोस्विदुभयस्वरूपता ? अत्राह-
एतानीति । समानानां भावः सामान्यमिति सामान्यलक्षणं द्रव्यत्वादिषु विद्यते, स्वाश्रयं
सर्वतो विशिनष्टीति विशेष इति तु लक्षणं नास्ति । अत एतानि मुख्यया वृत्त्या
सामान्यान्येव न विशेषाः, विशेषसंज्ञां तूपचारेण लभन्ते । विशेषो हि स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टि, द्रव्यत्वादिकमपि विजातीयेभ्यः स्वाश्रयस्य विशेषणमित्येतावता साधर्म्येणोप-
चारप्रवृत्तिः ।
प्राणियों में रहनेवाली जातियाँ हैं एवं घटत्व, पटत्व प्रभृति अप्राणियों में रहनेवाली
जातियाँ हैं । (प्र.) (द्रव्यत्वादि सामान्य और विशेष दोनों कहे गये हैं) इस प्रसङ्ग में
प्रश्न उठता है कि वे वास्तव में 'सामान्य' रूप हैं ? या वास्तव में वे 'विशेष' रूप
ही हैं ? अथवा उनके दोनों ही स्वरूप वास्तव हैं ? इन्हीं विकल्पों का समाधान
'एतानि' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । अर्थात् 'समानानां भावः सामान्यम्'
सामान्य का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में पूर्ण रूप से है; किन्तु 'स्वाश्रयं सर्वतो
विशिनष्टीति विशेषः' (जो अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से अलग करे,
वहीं 'विशेष' है) विशेष का यह लक्षण द्रव्यत्वादि में नहीं है (क्योंकि द्रव्यत्वादि
अपने आश्रयीभूत एक द्रव्य व्यक्ति से अपने आश्रयीभूत दूसरे द्रव्य व्यक्ति को
अलग नहीं समझा सकता), अतः द्रव्यत्वादि जातियाँ 'सामान्य' शब्द के ही
मुख्यर्थ हैं । उनमें 'विशेष' शब्द का लक्षणावृत्ति से ही प्रयोग होता है । अभिप्राय
यह है कि जिस प्रकार 'विशेष' पदार्थ अपने आश्रय को इतर सभी पदार्थों से
अलग रूप में रखता है, उसी प्रकार द्रव्यत्वादि सामान्य भी अन्ततः अपने आश्रय
७४८ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लक्षणभेदादेषां द्रव्यगुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वं सिद्धम् । अत एव च नित्यत्वम् ।
द्रव्य, गुण और कर्म इन तीनों से इसका स्वरूप (लक्षण) भिन्न है,
अतः सिद्ध होता है कि यह सामान्य (द्रव्यादि की तरह) दूसरा ही
(स्वतन्त्र) पदार्थ है । यतः लक्षणभेद के कारण द्रव्यादि से यह भिन्न है,
अतः यह सिद्ध होता है कि सामान्य नित्य है ।
न्यायकन्दली
द्रव्यत्वादीनि द्रव्यादिव्यतिरिक्तानि न भवन्ति, अतस्तेषां पृथक् कार्यनिरूपण-
मन्याय्यमित्याह-लक्षणभेदादिति । अनुगताकारबुद्धिवेद्यानि द्रव्यत्वादीनि, व्यावृत्तिबुद्धि-
वेद्याश्च द्रव्यादिव्यक्तयः, तस्मादेषां द्रव्यत्वादीनां लक्षणभेदात् प्रतीतिभेदाद् द्रव्य-
गुणकर्मभ्यः पदार्थान्तरत्वम् । अत एव च नित्यत्वम् । यत एव सामान्यस्य द्रव्यादिभ्यो
भेदः, अत एव नित्यत्वम् । द्रव्याद्यभेदे सामान्यस्य द्रव्यादिविनाशे विनाशास्तदुत्पादे
चोत्पादः स्यात्, भेदे तु नायं विधिरवतिष्ठत इति ।
अत्रैके वदन्ति । भिन्नेष्वनुगता बुद्धिः सामान्यं व्यवस्थापयति ।
सा च प्रतिपिण्डं दण्डपुरुषादिव न स्वातन्त्र्येण सामान्यविशेषलक्षणे
को दूसरी जाति के आश्रयीभूत पदार्थों से तो अलग करते ही हैं, केवल इतने ही
सादृश्य के कारण द्रव्यत्वादि सामान्यों में भी 'विशेष' शब्द का लाक्षणिक प्रयोग होता है ।
किसी सम्प्रदाय का मत है कि द्रव्यत्वादि जातियाँ आश्रयीभूत द्रव्यादि व्यक्तियों
से भिन्न नहीं हैं, अतः उनका अलग से निरूपण करना उचित नहीं है । इसी
आक्षेप का समाधान 'लक्षणभेदात्' इत्यादि से किया गया है । अनुगत आकार की
प्रतीति के द्वारा ही द्रव्यत्वादि सामान्य समझे जाते हैं । द्रव्यादि व्यक्तियों का बोध
व्यावृत्तिबुद्धि से होता है । तस्मात् 'एषाम्' अर्थात् द्रव्यत्वादि सामान्यों के लक्षण
(द्रव्यादि व्यक्तियों के लक्षण से) भिन्न हैं, अतएव द्रव्यत्वादि सामान्य द्रव्यादि
व्यक्तियों से अलग स्वतन्त्र पदार्थ हैं । "अत एव च नित्यत्वम्" अर्थात् द्रव्यत्वादि
सामान्य यदि द्रव्यादि व्यक्तियों से अभिन्न होते, तो फिर द्रव्यादि के विनाश से उनका
भी विनाश होता एवं उनकी उत्पत्ति से उनकी भी उत्पत्ति होती । यदि द्रव्यत्वादि
सामान्य और द्रव्यादि व्यक्ति इन दोनों को भिन्न पदार्थ मान लेते हैं, तो यह स्थिति
नहीं उत्पन्न होती (अतः उनको नित्य मानते हैं) ।
इसी प्रसङ्ग में किसी सम्प्रदाय के लोगों का कहना है कि (प्र.) विभिन्न व्यक्तियों
में एक आकार की बुद्धि (अनुवृत्तिप्रत्यय) से ही सामान्य की सिद्धि की जाती है; किन्तु
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७४९
न्यायकन्दली
द्वे वस्तुनी प्रतिभासयति । नापि तयोर्विशेषण-विशेष्यभावः ,गोत्वा 1गोत्ववानित्येयमनुदयात्;
किन्तु तादात्म्यग्राहिणी प्रतीतिरियम्, गौरयमित्येकात्मतापरामर्शात्, उभयोरन्योन्यप्रहाणेन
स्वरूपान्तराभावाच्च । अनुवृत्तता हि गोत्वस्यैव सामान्यान्तरस्यापि स्वरूपम्, व्यावृत्ततापि
गोव्यक्तेर्व्यक्त्यन्तराणामपि स्वभावः । सामान्यान्तरव्यावृत्तं तु गोत्वस्य स्वरूपम्,
व्यक्त्यन्तरव्यावृत्तिश्च गोव्यक्तेः स्वभावः परस्परान्यतामन्तरेणान्यो न शक्यते निर्देष्टुम् ।
जिस प्रकार 'दण्डी पुरुषः' इत्यादि विशिष्टबुद्धियों में दण्ड और पुरुष दोनों में
से एक सामान्यविधया और दूसरा व्यक्तिविधया स्पष्ट रूप से प्रतिभासित होता है,
उस प्रकार से 'अयं गौः, अयं गौः' इत्यादि आकार के अनुवृत्तिप्रत्ययों में गोत्वादि
सामान्य रूप से और गोप्रभृति विशेष (व्यक्ति) रूप से प्रतिभासित नहीं होते ।
एवं उक्त प्रतीतियों में गो विशेष्य रूप से और गोत्व विशेषण रूप से भी
प्रतिभासित नहीं होते; क्योंकि ऐसी बात होती तो प्रतीति का अभिलाप 'गौः1
गोत्वन्' इस आकार का होता ('अयं गौः' इस आकार का नहीं) । तस्मात् 'अयं
गौः' यह प्रतीति तादात्म्यविषयक है; क्योंकि 'अयम्' पदार्थ और 'गौः' पदार्थ
दोनों के एकरूपत्व का ही उससे परामर्श होता है । दूसरी युक्ति यह भी है कि गो
को छोड़कर गोत्व का कोई अपना स्वरूप नहीं है एवं गोत्व को छोड़कर गो
का भी कोई स्वरूप नहीं है; क्योंकि केवल अनुवृत्तत्व जैसे गोत्व जाति में है,
वैस ही अश्वत्वादि जातियों में भी है । एवं केवल व्यावृत्तत्व (अर्थात् स्वभिन्न-
भिन्नत्व) जैसे गो व्यक्ति में है, वैसे ही अश्वादि व्यक्तियों में भी है, अतः गोत्व
का ऐसा ही स्वरूप मानना पड़ेगा जो दूसरे सामान्यों में न रहे एवं गोव्यक्ति
- मुद्रित न्यायकन्दली में 'गोत्वा गोत्ववान्' ऐसा पाठ है । यह तो स्पष्ट है कि इसमें एक 'ए'
का चिह्न छूट गया है । अतः 'गोत्वो गोत्ववान्' ऐसा पाठ संशोधक को अभिप्रेत मालूम
होता है । किन्तु सो भी ठीक नहीं जँचता; क्योंकि प्रथम विकल्प में कहा गया है कि 'अयं
गौः' इस आकार की प्रतीति में गो का व्यक्तिविधया और गोत्व का जातिविधया भान नहीं
होता है । इसके बाद 'नापि तयोः' इत्यादि से जो विकल्प किया गया है, उसमें द्विवचनान्त
'तयोः' पद से गो और गोत्व इन्हीं दोनों का ग्रहण समुचित जान पड़ता है । 'किन्तु
तादात्म्यग्राहिणी' इत्यादि से इस विकल्प का खण्डन किया गया है कि 'अयं गौः' यह
प्रतीति 'इदम्' पदार्थ में गो के तादात्म्यविषयक ही है । इससे भी इसी प्रतिषेध का आक्षेप
होता है कि 'अयं गौः' यह प्रतीति गोविशेष्यक एवं गोत्वविशेषणक नहीं है । यदि ऐसी
बात है तो फिर 'गौः गोत्ववान्' ऐसा ही पाठ उचित है । अतः तदनुसार ही अनुवाद
किया गया है ।
७५० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
न च तस्य स एव स्वभावः सं एव च सम्बन्धीत्युपपद्यते, निःस्वभावस्य सम्बन्धाभावात् ।
तस्माज्जातिव्यक्त्योः परस्परात्मकतैव तत्त्वम् । एवं सति भेदाभेदवादोऽपि सिद्धयति । यथा
हि शाबलेयो गौरित्येवं प्रतीयते तथा बाहुलेयोऽपि । न चास्ति कस्यचिद् बाधः शाबलेय
एव गौर्न बाहुलेय इति; किन्तु सर्वेषामेकमतित्त्वमेव 'स गौरयमपि गौरिति' । तत्र
प्रतीतिबलेन शाबलेयात्मकस्य गोत्वस्य बाहुलेयात्मकत्वे सिद्धे शाबलेयाद् भेदोऽपि
सिद्धयति । अयमेव हि सामान्यस्य पूर्वपिण्डाद् भेदो यत् पिण्डान्तरात्मकत्वम् । इदमेव
च सामान्यरूपत्वं यदुभयात्मकत्वम् । भेदाभेदावेकस्य विरुद्धाविति चेत् ? न, युक्तिज्ञस्य
भवतः साम्प्रतमेतदभिधातुम् । तद्विरुद्धं यत्र बुद्धिर्विपर्य्येति । यत्तु सर्वदा प्रमाणेन तथैव
प्रतीयते, तत्र विरोधाभिधानमेव विरुद्धम् ।
अन्यत्रैवं न दृष्टमिति चेत् ? किं वै प्रत्यक्षमपि अनुमानमिव दृष्टमनु-
का स्वरूप भी ऐसा ही मानना पड़ेगा जो अश्वादि व्यक्तियों में न रहे । अतः इन
दोनों स्वरूपों का उपयुक्त निर्णय तभी हो पायेगा, जब कि गोव्यक्ति और गोत्व
जाति दोनों में तादात्म्य मान लें । अर्थात् ऐसा मान लें कि गोत्वाभिन्नत्व ही
गोव्यक्ति का स्वभाव है एवं गोव्यक्तियों से अभिन्न रहना ही गोत्व जाति का स्वभाव
है । ऐसा तो हो नहीं सकता कि वही उसका स्वभाव भी हो और वही उसका सम्बन्धी
भी हो; क्योंकि किसी स्वभाव से युक्त वस्तु में ही किसी का सम्बन्ध होता है । बिना
स्वभाव के वस्तु में किसी का सम्बन्ध सम्भव नहीं है । तस्मात् 'जाति व्यक्तिस्वरूप है
और व्यक्ति भी जातिस्वरूप ही है' यही सिद्धान्त ठीक है । ऐसा मान लेने पर जाति
और व्यक्ति में परस्पर भेद और अभेद दोनों की ही सिद्धि (प्रतीतियों के भेद से) हो
सकती है । जिस प्रकार शाबलेय गो में 'यह गो है' इस आकार की प्रतीति होती है,
उसी प्रकार बाहुलेय नाम के गो में भी 'यह गो है' इस प्रकार की प्रतीति होती है ।
ऐसी कोई बाधबुद्धि भी नहीं है कि शाबलेय ही गो है बाहुलेय नहीं; किन्तु यही सबों
का अनुभव है कि 'शाबलेय' भी गो है एवं 'बाहुलेय' भी गो है । इस स्थिति में
शाबलेय गो के स्वरूप गोत्व में बाहुलेय गो की स्वरूपता जिस प्रकार सिद्ध होती है,
उसी प्रकार गोत्व में शाबलेय गो के भेद की भी सिद्धि होती है । (गोत्व रूप)
सामान्य में पूर्वपिण्ड (शाबलेय गोरूप पिण्ड) का भेद इसीलिए है कि सामान्य
(गोत्व) पिण्डान्तर (बाहुलेय गोरूप दूसरा पिण्ड) स्वरूप है । सामान्यरूपता
इसलिए है कि वह उभयात्मक है । (उ.) एक ही वस्तु में एक ही वस्तु का भेद
और अभेद दोनों का रहना परस्पर 'विरुद्ध' है ? (प्र) युक्तियों से अभिज्ञ
आप जैसे व्यक्ति का ऐसा कहना उचित नहीं है; क्योंकि 'विरुद्ध' वही कहलाता
है जिसमें कि बुद्धि का विपर्यास हो । जो बराबर प्रमाण के द्वारा उसी प्रकार
का प्रतीत होता है, उसको विरुद्ध कहना ही 'विरुद्ध' है । यदि यह
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५१
न्यायकदली
सरति ? हतं तर्हीदमनवस्थया । अथेयं स्वसामर्थ्यात् प्रवर्तते ? तदा यथा यद् वस्तु यद्
दर्शयति तथैव तत्, न त्येतदन्यत्रादर्शनेन प्रत्याख्यानमर्हति सर्वभावप्रत्याख्यानप्रसङ्गात् ।
तस्मात् सामान्यं व्यक्त्युत्पादविनाशयोरुत्पादविनाशवत्त्वाद् व्यक्त्यन्तरावस्थाने चावस्थाना-
न्नित्यमनित्यं च, न पुनर्नित्यमेव ।
एवं प्राप्तेऽभिधीयते किं जातिव्यक्त्योर्विलक्षणमाकारं गृह्णाति तत्प्रतीतिः ? उत
तयोरभेदं गृह्णाति ? आहोस्वित् परस्परविलक्षणावाकारौ ? आद्ये कल्पे तावदेकमेव वस्तु
स्यात्, नोभयोरेकात्मकत्वम्, अविलक्षणाकारबुद्धिर्वेद्यत्वस्याभेदलक्षणत्वात् । द्वितीये तु
कल्पे व्याहतिरेव, विलक्षणाकारसंवित्तिरेव हि भेदसंवितिः । तस्याः सम्भवे सति
तयोरभेदप्रतिपत्तिरेव नास्ति, कथं भिन्नयोरभेदो व्यवस्थाप्यते ? कथं तर्हि तादात्म्य-
प्रतीतिः ? न कथञ्चिदिति वदामः ।
यदि तावदेक आकारोऽनुभूयते, एकस्यैव वस्तुनः प्रतीतिरियं नोभयोः ।
अथ द्वावाकारावनुभूयेते तदास्याः प्रतीतेरसम्भव एव । यत् पुनर्गौरित्यय-
कहें कि (उ.) एक ही वस्तु के भेद और अभेद इन दोनों की अवस्थिति एक ही
वस्तु में कहीं नहीं देखी जाती है । अतः उक्त भेदाभेद पक्ष अयुक्त है । (प्र.) तो
इसके उत्तर के लिए यह पूछना है कि क्या अनुमान की तरह प्रत्यक्ष प्रमाण को
भी अपने विषय की सिद्धि के लिए उसका अन्यत्र देखा जाना आवश्यक है ?
यदि ऐसी बात मानें तो अनवस्थादोष के कारण प्रत्यक्ष प्रमाण का ही लोप हो
जायगा । यदि प्रत्यक्ष (अन्यत्र दर्शन की अपेक्षा न करके) केवल अपने बल से ही
अपने विषय को दिखाने के लिए प्रवृत्त होता है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि
अपने जिस वस्तु को वह जिस रूप में दिखलाता है, वह वस्तु उसी रूप का है ।
इस वस्तुस्थिति का केवल इस हेतु से निरादर नहीं किया जा सकता कि 'अन्यत्र
इस प्रकार से देखा नहीं जाता' । प्रत्यक्ष का यदि यह स्वभाव न मानें तो संसार से
सभी वस्तुओं की सत्ता ही उठ जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि सामान्य
यतः अपने आश्रयरूप व्यक्तियों के उत्पन्न होने पर ही उत्पन्न होता है और उनके
विनष्ट होने पर विनष्ट भी होता है, अतः 'अनित्य' है । एवं उस व्यक्ति के नाश
के बाद भी उसी जाति की दूसरी व्यक्ति में रहता है, अतः वह 'नित्य' भी है ।
तस्मात् सामान्य नित्य एवं अनित्य दोनों ही है, केवल नित्य ही नहीं है।
(उ.) ऐसी स्थिति में हम (तार्किक) लोग पूछते हैं कि (१) 'अयं गौः' यह
प्रतीति जाति और व्यक्ति दोनों को एक ही आकार में ग्रहण करती है । (२)
अथवा दोनों के अभेद का ग्रहण करती है ? (३) अथवा जाति और व्यक्ति दोनों
को परस्पर विभिन्न आकारों में ग्रहण करती है ? इनमें यदि पहला पक्ष मानें तो
७५२ न्यायकन्दलीसंतलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
मविभागेन संवेदनं तत् समवायसामर्थ्यात् । संयोगे हि द्वयोः संसर्गावभासः, समवायस्य
पुनरेष महिमा यदत्र सम्बन्धिनावयःपिण्डवह्नियत् पिण्डीभूतावेव प्रतीयेते जातिरेव न च
व्यक्तेः स्वरूपम् । तेन सत्यपि भेदे बदरादिवत् कुण्डस्य जातितो व्यक्तेः स्वरूपं पृथग् न
निष्कृष्यते । परस्परपरिहारेण तूपलम्भोऽस्त्येव, दूरे गोत्वाग्रहणेऽपि पिण्डस्य ग्रहणात् ।
पूर्वपिण्डाग्रहणेऽपि पिण्डान्तरे गोत्वग्रहणात् । तस्माद् व्यक्तेरत्यन्तं भिन्नमेव सामान्यमिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम्, द्रव्यत्वादयः
फिर जाती या व्यक्ति इन दोनों में से किसी एक का मानना ही सम्भव होगा, दूसरे
का नहीं, जाति और व्यक्ति एतदुभयात्मक किसी वस्तु की कल्पना सम्भव नहीं होगी;
क्योंकि अभिन्नता का यही लक्षण है कि जो अविलक्षण आकार की बुद्धि के द्वारा
ज्ञात हो । यदि दूसरा पक्ष मानें तो परस्पर विरोध ही उपस्थित होगा; क्योंकि
किन्हीं दो वस्तुओं का परस्पर विभिन्न आकारों से गृहीत होना ही उन दोनों के
भेद का ज्ञान है । भेद का यह ज्ञान यदि सम्भव है, तो फिर उन दोनों में
तादात्म्य की प्रतीति कैसी ? अतः हम लोग कहते हैं कि जाति और व्यक्ति इन
दोनों के तादात्म्य की प्रतीति किसी भी प्रकार से नहीं होती; क्योंकि यदि एक ही
आकार का अनुभव होता है तो फिर वह अनुभव एक ही वस्तु की प्रतीति होगी,
दो वस्तुओं की नहीं । यदि दो आकारों का अनुभव होता है, तो फिर उस एक
आकार की प्रतीति की सम्भावना ही मिट जाती है । 'गौरयम्' इत्यादि प्रतीतियों
में जो गोत्वजाति और गोव्यक्ति विना अलग हुए से प्रतीत होते हैं, वह तो दोनों
के समवाय का सामर्थ्य है । संयोग की प्रतीति में उसके प्रतियोगी और अनुयोगी
दोनों के सम्बन्धियों का भान होता है । समवाय की ही यह विशेष महत्ता है कि
इसमें उसके दोनों सम्बन्धी (प्रतियोगी और अनुयोगी) परस्पर एक होकर ही
प्रतीत होते हैं । जैसे कि वह्नि और अयःपिण्ड वस्तुतः पृथक् होते हुए भी एक
होकर ही ज्ञान में भासित होते हैं । सुतराम् (व्यक्ति-सम्बद्ध) जाति की ही प्रतीति
होती है, केवल व्यक्ति के स्वरूप की नहीं । अतः जाति और व्यक्ति में वस्तुतः
भेद रहते हुए भी जैसे कि (संयोगयुक्त) कुण्ड और बेर को अलग कर दिखलाया
जा सकता है, उस प्रकार जाति से व्यक्ति के स्वरूप को अलग नहीं किया जा
सकता । कुछ स्थानों में जाति और व्यक्ति की प्रतीति एक-दूसरे को छोड़कर भी
होती है । जैसे दूर में गोपिण्ड (व्यक्ति) की प्रतीति तो होती है, (किन्तु 'यह गो है'
इस प्रकार से) गोत्व की प्रतीति वहाँ नहीं होती । एवं पूर्वपिण्ड का ग्रहण न रहने पर भी
दूसरे पिण्ड में गोत्व का ग्रहण होता है । तस्मात् तार्किकों की रीति के अनुसार
जाति और व्यक्ति अत्यन्त भिन्न हैं । (किसी भी प्रकार वास्तव में अभिन्न नहीं हैं) ।
द्रव्यादि सामान्य यतः नियमित रूप से द्रव्यादि तत्तत् आश्रयों में ही रहते हैं,
एवं प्रत्येक सामान्य की प्रतीति भिन्न-भिन्न आकार की होती है, अतः समझते हैं कि
द्रव्यत्व व गुणत्वादि सामान्य परस्पर भिन्न हैं । अभिप्राय यह है कि द्रव्यादि सामान्यों
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५३
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात् प्रत्ययभेदाच्च परस्परतश्चान्यत्वम् ।
प्रत्येकं स्वाश्रयेषु लक्षणाविशेषाद् विशेषलक्षणाभावाच्चैकत्वम् । यद्यप्य-
परिच्छिन्नदेशानि सामान्यानि भवन्ति, तथाप्युपलक्षणनियमात्
द्रव्यत्वादि कोई भी सामान्य द्रव्यादि कुछ आश्रयों में ही नियत रूप
से रहते हैं एवं भिन्न रूप से प्रतीत भी होते हैं, अतः (द्रव्यत्व-
गुणत्वादि) सामान्य परस्पर विभिन्न हैं । एवं प्रत्येक सामान्य अपने
आश्रयों में समान रूप से प्रतीत होता है एवं उसको अनेक मानने में
कोई प्रमाण भी नहीं है इससे सिद्ध होता है कि द्रव्यादि नियत आश्रयों
में रहनेवाले द्रव्यत्वादि सामान्यों में से प्रत्येक सामान्य एक-एक ही हैं ।
यद्यपि सामान्य अनन्त (प्रकार के) आश्रयों में रहता है, फिर भी
उसकी अभिव्यक्ति के कारणों की एकरूपता और उसके आश्रयों का
न्यायकन्दली
प्रत्येकं द्रव्यादिव्येव नियताः । प्रत्ययभेदश्चैतेषु दृश्यते, तस्माद् द्रव्यादिषु वृत्तिनियमात्
प्रत्ययभेदाच्च द्रव्यत्वादीनां परस्परतो भेदः ।
अभेदात्मकं सामान्यमिति पूर्वं प्रतिज्ञामात्रेणोक्तं तदिदानीं प्रमाणसिद्धं
तस्य करोति-प्रत्येकं स्वाश्रयेष्विति । लक्ष्यतेऽनेनेति लक्षणमनुगताकारज्ञानम् ।
प्रत्येकं प्रतिपिण्डमविशेषाद् वैलक्षण्याभावाद् विशेषे भेदे लक्षणस्य प्रमाणस्याभावाच्च
सामान्यस्य स्वाश्रयेष्वेकत्वमभिन्नस्वभावमित्यर्थः । स्वविषये सर्वत्र सामान्यं
समवैति नान्यत्रेति यत् पूर्वमुक्तं तस्य कारणमाह-यद्यपीति । यद्यपि
सामान्यानि यत्र तत्रोत्पद्यमानेन पिण्डेन सम्बन्धादपरिच्छिन्नदेशान्यनियतदेशानि,
में से प्रत्येक सामान्य यतः द्रव्यादि व्यक्तियों में ही नियमित रूप से रहता है एवं
इनमें इनकी प्रतीतियाँ भी विभिन्न आकार की होती हैं । तस्मात् द्रव्यादि में ही
नियमित रूप से रहने के कारण और उक्त प्रतीति भेद के कारण समझते हैं कि
द्रव्यत्वादि जातियाँ परस्पर भिन्न हैं ।
'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा पहले केवल प्रतिज्ञावाक्य के द्वारा
सिद्धवत् कही हुई सामान्य की अभिन्नता को प्रमाण के द्वारा 'प्रत्येकं स्वाश्रयेषु'
इत्यादि वाक्य से सिद्ध करते हैं । 'लक्ष्यते अनेन' इस व्युत्पत्ति के अनुसार प्रकृत
में 'लक्षण' शब्द का अर्थ है, अनुगत एक आकार का ज्ञान । उसका 'प्रत्येक में'
अर्थात् गोप्रभृति प्रत्येक व्यक्ति में 'अविशेष से' अर्थात् विभिन्नता के न रहने से,
एवं 'विशेष में' अर्थात् द्रव्यत्वादि प्रत्येक जाति के भेद में अर्थात् अनेकत्व में 'लक्षण'
अर्थात् किसी प्रमाण के न रहने से समझते हैं कि एक सामान्य अपने सभी आश्रयों
में एक ही है, अर्थात् अभिन्न स्वभाव का है । पहले जो यह कहा गया है कि
"सामान्य अपने विषयों अर्थात् आश्रयों में ही समवाय सम्बन्ध से रहता है, अन्यत्र
नहीं" उसी के हेतु का प्रतिपादन 'यद्यपि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है ।
७५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषयसर्वगतानि । अन्तराले च संयोगसमवाय-
वृत्त्यभावादव्यपदेश्यानीति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥
नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना, इन दोनों से समझते हैं
कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । (कार्योत्पत्ति
के) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग
सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध, अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं
होता । (अतः सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ।)
॥ प्रशस्तपादभाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमाश्रितत्वात् पिण्डोत्पादक-
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति ।
एतदुक्तं भवति-सास्नादिसंस्थानविशेषो गोत्वस्य व्यञ्जकः, केसरादिसंस्थानविशेषोऽ-
श्वत्वस्य, विशिष्टग्रीवादिसंस्थानविशेषो घटत्वस्य, प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा
न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः; अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं
सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव¹ पिण्डान्तरेणापि सम्बद्धं क्षमते, तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र
यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण
'अपरिच्छिन्न देश' में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके
'उपलक्षण' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं, वे
नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के
नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं ।
इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ना प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का
संयोग (संस्थान) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर
प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु है । इसी प्रकार विशेष
प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं; क्योंकि नियमित रूप से तत्तत्
संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये
कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते; किन्तु अपने नियमित
पिण्डों में ही रहते हैं । इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न
होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे, उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ
- यहाँ 'स्वविषयेणैव' के स्थान में 'स्वविषयेणेव' ऐसा 'इवकार' घटित पाठ ही उचित जान
पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ७५५
न्यायकन्दली
पिण्डे सम्भवति तस्य तत्रैव समवायो नान्यत्र । एवं सामग्रया नियमादपि
सामान्यसम्बन्धनियमः । एष हि तन्त्वादीनां कारणानां स्वभावो यदेतैरुपद्यमाने द्रव्ये
पटत्वमेव समवैति, नान्यत् । एष हि मृत्पिण्डादीनां महिमा यत् तैः क्रियमाणे द्रव्ये
घटत्वमेव समवैति, नान्यत् ।
न तावत् सामान्यमन्यतो गत्यान्यत्र सम्बध्यते, निष्क्रियत्वात् । तत्रापि यदि
पूर्वं नासीत् ? तत्रोपजायमानेन पिण्डेनास्य सम्बन्धो न स्यात् । दृश्यते च सर्वत्रोपजाय-
मानेन पिण्डेन सम्बन्धः, तस्मात् सर्वं सर्वत्रास्तीति कस्यचिन्मतं तन्निराकुर्वन्नाह-
अन्तराले संयोगसमवायवृत्त्यभावान्नाव्यपदेश्यानीति । अन्तरालमिति आकाशं वा
दिग्द्रव्यं वा स्तिमितवेगमूर्त्तद्रव्याभावो वा, तेषु गोत्वादिसामान्यानां न संयोगो
नापि समवायः । न चासम्बद्धानामेव तेषामवस्थाने प्रमाणस्ति । अतोऽन्तराले न
सामान्यानि व्यपदिश्यन्ते न सन्तीत्यर्थः । कथं तर्हि तत्रोपजायमानेन पिण्डेन सम्बध्यन्ते ?
भी जिस किसी सम्बन्ध से सम्बद्ध हो सकते हैं । फिर भी जिस सामान्य का ज्ञापक
जो संस्थान है, उस संस्थान से युक्त पिण्ड में ही उस सामान्य का समवाय है, अन्य
पिण्डों में नहीं । इसी प्रकार आश्रयीभूत किसी व्यक्ति के उत्पादक कारणसमूह के
नियमन से ही सामान्य के समवायरूप सम्बन्ध का भी नियमन हो सकता है, जैसे
कि (पट के उत्पादक) तन्तु प्रभृति कारणों का ही यह स्वभाव है कि इनसे उत्पन्न
द्रव्य में पटत्व समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होता है, अन्य सामान्य नहीं । एवं मिट्टी
प्रभृति कारणों की ही यह महिमा है कि इनसे उत्पन्न द्रव्य में घटत्व का ही
समवाय हो, किसी दूसरे सामान्य का नहीं ।
'सामान्य' यतः क्रियारहित है, अतः एक जगह से दूसरी जगह जाकर
अपने विषय के साथ सम्बद्ध नहीं हो सकता । (व्यक्ति की उत्पत्ति के देश में
उसके रहने पर भी उस व्यक्ति के साथ सम्बन्ध के प्रसङ्ग में यह प्रश्न उठता
है कि) सामान्य यदि उस देश में पहले से नहीं था, तो फिर इस समय उत्पन्न
हुए अश्वादि के साथ उसका सम्बन्ध नहीं हो सकता; किन्तु सभी देशों में
उत्पन्न व्यक्तियों के साथ उसका सम्बन्ध होता है । तस्मात् यह मानना पड़ेगा कि
सामान्य सभी स्थानों में है । किसी सम्प्रदाय के इसी सिद्धान्त का निराकरण
करने के लिए 'अन्तराले' इत्यादि सन्दर्भ लिखा गया है । प्रकृत में 'अन्तराल'
शब्द आकाशादि का, स्तिमित वायु का अथवा अमूर्त्त द्रव्य प्रभृति का बोधक है ।
इनमें से किसी में भी गोत्वादि सामान्यों का न समवाय सम्बन्ध है और न
संयोग सम्बन्ध है । 'गोत्वादि जातियाँ बिना किसी सम्बन्ध के ही रहती हैं' इस
प्रसङ्ग में भी कोई प्रमाण नहीं है । अतः कथित 'अन्तराल' में गोत्वादि सामान्य
का व्यवहार नहीं होता है । फलतः वह अन्तराल में नहीं है । (प्र.) तो फिर
उन देशों में अपने गवादि विषयों (व्यक्तियों) के साथ वे किस प्रकार सम्बद्ध होते
७५६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
न्यायकन्दली
कारणसामर्थ्यात् । संयोगो ह्यन्यतः समागतस्य भवति, तत्रैवावस्थितस्य वा भवति ।
तस्माद् विलक्षणस्तु समवायो यत्र यत्रैव पिण्डोत्पत्तौ कारणानि व्याप्रियन्ते, तत्र तत्रैव
कारणानां सामर्थ्यात् पिण्डेऽन्यतोऽनागतस्य तत्र स्थितस्यापि सामान्यस्य भवति,
वस्तुशक्तेरपर्य्यनुयोज्यत्वात् ।
अत्राहुः सौगताः-प्रतीयमानेषु भेदेषु मणिसूत्रवदेकस्याकारस्यानुपलम्भात् सामान्यं
नास्त्येवेति । तदयुक्तम्, अनेकासु गोव्यक्तिष्वनुभूयमानास्त्वश्वादिव्यक्तिवैलक्षणतया
सामान्याकारप्रतीतिसम्भवात् । यदि शाबलेयादिषु परस्परभिन्नेष्वेकमनुवृत्तं न किञ्चि-
दस्ति, यथा गवाश्वव्यक्तयः परस्परविलक्षणाः संवेद्यन्ते तथा गोव्यक्तयोऽपि संवेद्याः
स्युः । यथा वा गोव्यक्तयः सरूपाः प्रतीयन्ते तथा गवाश्वव्यक्तयोऽपि प्रतीयेरन्,
विशेषाभावात् । नियमेन तु गोव्यक्तयः प्रतीयमानाः सरूपाः स्ववर्गसाधारण-
हैं ? इसका यह उत्तर है कि व्यक्ति के उत्पादक कारणों के विशेष सामर्थ्य के
द्वारा ही गोत्वादि सामान्य अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होते हैं । संयोग दूसरे
देश से आये हुए व्यक्ति का, अथवा उसी स्थान में पहले से विद्यमान वस्तु का
होता है; किन्तु समवाय में संयोग से यह अन्तर है कि जिन-जिन देशों में उसके
विषयों के उत्पादक कारण अपने कार्य को करने के लिए क्रियाशील होते हैं, उन्हीं-
उन्हीं देशों में उन्हीं कारणों के विशेष सामर्थ्य के द्वारा उस सामान्य का सम्बन्ध हो
जाता है, जो किसी दूसरी जगह से नहीं आता, उसी देश में विद्यमान रहता है;
क्योंकि वस्तुओं की स्वाभाविक शक्तियाँ सभी अभियोगों के बाहर हैं ।
इस प्रसङ्ग में बौद्ध लोगों का कहना है कि (प्र.) सामान्य नाम की कोई वस्तु
नहीं है; क्योंकि जिस प्रकार मणियों के विभिन्न होते हुए भी उन सबों में एक
माला का व्यवहार इसलिए होता है कि सबों को एक व्यवहार में लानेवाला सूत्र
नाम का एक पदार्थ है, उस प्रकार विभिन्न गोव्यक्तियों में एक प्रकार के व्यवहार के
कारण गौओं से भिन्न किसी वस्तु की उपलब्धि नहीं होती । (उ.) किन्तु उन लोगों
का यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि सभी गोव्यक्ति में 'ये गो हैं' इस एक प्रकार
की प्रतीति होती है, जो अश्वादि व्यक्तियों में नहीं होती है । यदि परस्पर विभिन्न
शाबलेय (बाहुलेय) प्रभृति सभी गोव्यक्ति में समान रूप से रहनेवाली कोई वस्तु नहीं
हैं, तो फिर जिस प्रकार गो और अश्व दोनों परस्पर विभिन्न रूप में प्रतीत होते
हैं, उसी प्रकार सभी गोव्यक्ति भी परस्पर विभिन्न रूप में ही प्रतीत होंगी । अथवा
जिस प्रकार सभी गोव्यक्ति की प्रतीति एक रूप से होती है, उसी प्रकार गोव्यक्तियों
और अश्वव्यक्तियों की प्रतीतियाँ भी एक रूप से होंगी; क्योंकि स्थितियों में अन्तर
का कोई कारण नहीं है; किन्तु नियमतः सभी गोव्यक्ति एक ही आकार से प्रतीत
होती हैं, अतः अश्वादि सभी व्यक्तियों में न रहनेवाले एवं सभी गोव्यक्तियों
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ७५७
न्यायकन्दली
मह्यादिव्यावृत्तं किञ्चिदेकं रूपमाक्षिपति, १ एकार्थक्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च । गोव्यक्ती-
नामेकत्वमिति चेत् ? नासति सामान्ये व्यक्तीनामिव व्यक्तिहेतूनां व्यक्तिकार्याणामपि परस्पर-
व्यावृत्तानामेकत्वात् २ । किञ्च, यद्येकहेतुत्वादेकत्वम्, भिन्नकारणप्रभवाणां व्यक्तीनामेकत्वं
न स्यात् । दृश्यते चाभिन्नस्वभावानामपि कारणभेदो यथा वह्नेर्दारुनिर्मथनाद् विद्युत् आदित्य-
गभस्तिक्षोभितात् सूर्यकान्तादपि मणेरुत्पत्तिः । एककार्यत्वादेकत्वे च विजातीयाना-
में रहनेवाले किसी एक धर्म की कल्पना आवश्यक हो जाती है । (प्र.) सभी
व्यक्ति यतः एक ही प्रकार के कार्यों के सम्पादक हैं एवं एक ही प्रकार की
सामग्रियों से उत्पन्न होती हैं, अतः सभी गोव्यक्ति एक ही हैं (इसी एकत्व के
कारण एकाकार की प्रतीतियाँ होती हैं) । (उ.) जिस प्रकार सामान्य के न रहने
पर व्यक्तियों की एकता सम्भव नहीं है, उसी प्रकार व्यक्तिरूप कार्यों और व्यक्ति
के कारणों की एकता भी सम्भव नहीं है; क्योंकि व्यक्तियों की तरह उनके कार्य
और उनके कारण भी तो परस्पर विभिन्न हैं, उनमें रहनेवाले सामान्यों के बिना
उनमें भी एकत्व का सम्पादक कौन होगा ? दूसरी बात यह है कि यदि एक
प्रकार की सामग्री से उत्पन्न होना ही व्यक्तियों में एकरूपता का कारण हो तो
फिर भिन्न प्रकार की सामग्री से एक प्रकार के कार्य की उत्पत्ति न हो सकेगी;
किन्तु सभी अग्नियों का एक प्रकार का स्वभाव होते हुए भी उनके कारण भिन्न-
भिन्न हैं, यतः कभी काष्ठों के मन्थन से, कभी विद्युत् से और कभी सूर्य की
किरणों से क्षुभित सूर्यकान्त मणि से वह्नि की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार यदि
एक प्रकार के कार्यों के उत्पादक होने से ही व्यक्तियों में एकता मानी जाय तो
कुछ विजातीय वस्तुओं में भी एकता माननी पड़ेगी; क्योंकि दोहन, वाहनादि
क्रियायें समान रूप से गोप्रभृति व्यक्तियों से और महिषादि व्यक्तियों से भी उत्पन्न
होती हैं । (एवं एककार्यकारित्व को यदि एकता का प्रयोजक मानें तो फिर)
जिन गोव्यक्तियों से दोहन, भारवाहनादि क्रियायें सम्पादित ही नहीं होतीं, उनमें
- मुद्रित पुस्तक में 'रूपमाक्षिपति' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम नहीं है । 'एकार्थ-
क्रियाकारित्वादेकहेतुत्वाच्च' इस वाक्य के आगे पूर्ण विराम है, जिससे सङ्गति ठीक नहीं
बैठती है । अतः 'रूपमाक्षिपति' इसी वाक्य के आगे पूर्णविराम देकर और आगे के वाक्य
को पूर्वपक्षियों के साधक हेतुओं का बोधक मानकर अनुवाद किया गया है । - इस सन्दर्भ में 'परस्परव्यावृत्तानामेकत्वात्' यह मुद्रित पाठ उचित नहीं जान पड़ता,
इसे प्रथमान्त होना चाहिए । आगे के 'भिन्नकारणप्रभवाणामेकत्वम्' इस प्रथमान्त पाठ से
यह और स्पष्ट हो जाता है । अतः उक्त पाठ को प्रथमान्त मानकर ही अनुवाद किया
गया है ।