Skip to content
SarvaKosh
वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 721 of 759

Read in context
Page 721

७५४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ सामान्यनिरूपण-
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषयसर्वगतानि । अन्तराले च संयोगसमवाय-
वृत्त्यभावादव्यपदेश्यानीति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये सामान्यपदार्थः समाप्तः ॥
नियमित रूप से समान कारणों से उत्पन्न होना, इन दोनों से समझते हैं
कि सामान्य अपने सभी आश्रयों में समानरूप से रहता है । (कार्योत्पत्ति
के) बीच के द्रव्यों में उस कार्य में रहनेवाले सामान्य का न संयोग
सम्बन्ध है, न समवाय सम्बन्ध, अतः उनमें सामान्य का व्यवहार नहीं
होता । (अतः सन्निहित होने पर भी उनमें वह नहीं रहता है ।)
॥ प्रशस्तपादभाष्य का सामान्यनिरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
तथाप्युपलक्षणस्याभिव्यञ्जकस्यावयवसंस्थानविशेषस्य नियमाश्रितत्वात् पिण्डोत्पादक-
कारणसामग्रीनियमाच्च स्वविषये सर्वत्र समवयन्ति नान्यत्रेति ।
एतदुक्तं भवति-सास्नादिसंस्थानविशेषो गोत्वस्य व्यञ्जकः, केसरादिसंस्थानविशेषोऽ-
श्वत्वस्य, विशिष्टग्रीवादिसंस्थानविशेषो घटत्वस्य, प्रतीतिनियमात् । एते च संस्थानविशेषा
न सर्वेषु पिण्डेषु साधारणाः; अपि तु प्रतिनियतेषु भवन्ति । तत्र यद्यपि सर्वं सामान्यं
सर्वत्रोपजायमानेन स्वविषयेणैव¹ पिण्डान्तरेणापि सम्बद्धं क्षमते, तथापि यस्याभिव्यञ्जकं यत्र
यद्यपि सामान्य जहाँ तहाँ उत्पन्न पिण्डों के साथ सम्बद्ध होने के कारण
'अपरिच्छिन्न देश' में अर्थात् अनियत देशों में रहनेवाले हैं । फिर भी उसके
'उपलक्षण' अर्थात् अभिव्यञ्जक जो अवयवों के विशेष प्रकार के संयोग हैं, वे
नियमित हैं । इस नियम के कारण और आश्रयीभूत पिण्डों के कारणों के
नियमित होने से वे अपने ही विषयों में समवाय सम्बन्ध से सम्बद्ध होते हैं ।
इससे यह अभिप्राय निकला कि सास्ना प्रभृति अवयवों का विशेष प्रकार का
संयोग (संस्थान) ही गोत्व जाति की अभिव्यक्ति का कारण है । एवं केसर
प्रभृति संस्थान अश्वत्व जाति की अभिव्यक्ति का हेतु है । इसी प्रकार विशेष
प्रकार के ग्रीवादि संस्थान घटत्व के ज्ञापक हैं; क्योंकि नियमित रूप से तत्तत्
संस्थान से युक्त पिण्डों में ही तत्तत् सामान्य का प्रतिभास होता है । ये
कथित संस्थान सभी पिण्डों में समान रूप से नहीं रहते; किन्तु अपने नियमित
पिण्डों में ही रहते हैं । इस प्रकार सभी सामान्य जिस प्रकार सभी जगह उत्पन्न
होनेवाले अपने व्यक्तियों के साथ सम्बद्ध होंगे, उसी प्रकार दूसरे पिण्डों के साथ

  1. यहाँ 'स्वविषयेणैव' के स्थान में 'स्वविषयेणेव' ऐसा 'इवकार' घटित पाठ ही उचित जान
    पड़ता है । अतः तदनुसार ही अनुवाद किया गया है ।