वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
६७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । विहिताकरणं प्रमादश्चैतानि दुष्टाभि-
सन्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगादधर्मस्योत्पत्तिः ।
अविदुषो रागद्वेषवतः प्रवर्त्तकाद् धर्मात् प्रकृष्टात् स्वल्पा-
धर्मसहिताद् ब्रह्मेन्द्रप्रजापतिपितृमनुष्यलोकेष्वाशयानुरूपैरिष्टशरीरे-
न्द्रियविषयसुखादिभिर्योगो भवति । तथा प्रकृष्टादधर्मात् स्वल्पधर्म-
एवं धर्म साधन के विरोधी हिंसा, असत्य प्रभृति इसके साधन हैं ।
शास्त्रों में अनुष्ठान के लिए निर्दिष्ट कामों को न करना एवं प्रमाद ये
दोनों भी अधर्म के हेतु हैं । (अधर्म के) ये सभी हेतु एवं कर्ता के दुष्ट
अभिप्राय इन सबों की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा
अधर्म की उत्पत्ति होती है ।
प्रवृत्तिजनक उत्कृष्ट धर्म के द्वारा थोड़े से अधर्म की सहायता से
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक, पितृलोक एवं मनुष्यलोक में उपयुक्त
भोग के अनुरूप इन्द्रिय, विषय एवं सुखादि के साथ तत्त्वज्ञान से रहित एवं
राग और द्वेष से युक्त पुरुष का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से
न्यायकन्दली
भिद्रोहः । अनृतं मिथ्यावचनम् । स्तेयमशास्त्रपूर्वं परस्वग्रहणम् । एवमादीनि
धर्मसाधनविपरीतानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि यानि, तान्यधर्मसाधनानि । विहिताकरणं
विहितस्यावश्यंकरणीयस्याकर्त्तव्यता । प्रमादोऽबुद्धिपूर्वकोऽतिक्रमः, एतदपि द्वयमधर्मसाध-
नम् । यथैतेभ्यो धर्मस्योत्पत्तिस्तद् दर्शयति-एतानीति । यत्र कामनापूर्वकमधर्मसाधनानुष्ठानं
तत्र दुष्टोऽभिसन्धिरधर्मकारणम् । अकामकृते तु प्रमादेनास्य हेतुत्वम् ।
साथ अभिद्रोह करना ही 'हिंसा' है । मिथ्याभाषण ही 'अनृत' शब्द का अर्थ है ।
शास्त्रों में कहे हुए उपायों से विपरीत उपायों के द्वारा दूसरे के धन का ग्रहण
करना ही 'स्तेय' है । धर्म के साधनों के विरुद्ध एवं शास्त्रों से निषिद्ध जो हिंसादि
उपाय हैं, वे ही अधर्म के साधन हैं । शास्त्रों के द्वारा अवश्य करने के लिए
निर्दिष्ट कर्मों का न करना ही 'विहिताकरण' है । अनजान में शास्त्रीय मर्यादा के
अतिक्रम को ही 'प्रमाद' कहते हैं । (विहिताकरण और प्रमाद) ये दोनों भी अधर्म
के साधन हैं । 'एतानि' इस वाक्य के द्वारा इन साधनों के द्वारा किस रीति से
अधर्म की उत्पत्ति होती है ? वह दिखलायी गयी हैं । जहाँ किसी कामना के
वशीभूत होकर अधर्म के साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, वहाँ 'दुष्टाभि-
सन्धि' अधर्म का कारण है । जहाँ अधर्म के साधनों का अनुष्ठान अनजाने होता
है, वहाँ प्रमाद के द्वारा उन साधनों में हेतुता आती है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सहितात् प्रेततिर्यग्योनिस्थानेष्वनिष्टशरीरेन्द्रियविषयदुःखादिभिर्योगो भवति। एवं
प्रवृत्तिलक्षणाद् धर्मादधर्मसहिताद् देवमनुष्यतिर्यङ्नारकेषु पुनः पुनः संसारबन्धो
भवति ।
धर्म से युक्त बड़े अधर्म से प्रेत, तिर्यग्योनि में भोग के उपयुक्त शरीर,
इन्द्रिय, विषय और दुःख के साथ (उक्त पुरुष का) सम्बन्ध होता है।
इसी प्रकार थोड़े से अधर्म से युक्त प्रवृत्तिस्वरूप धर्म के द्वारा देव,
तिर्यग्योनि एवं नारकीय शरीरों के सम्बन्ध से जीव को बार-बार संसार
रूप बन्धन मिलता है।
न्यायकन्दली
एवमधर्मस्य साधनमभिधाय सम्प्रति साध्यं कथयति-अविदुष इत्यादिना। यः
कर्त्ता भोक्तास्तीत्यात्मानमभिमन्यते, परमार्थतो दुःखसाधनं च बाह्याध्यात्मिकविषयं
सुखसाधनमित्यभिमन्यते सोऽविद्वान्। स च स्वोपभोगतृष्णापरिप्लुतः सुखसाधन-यारोपिते
विषये रज्यते, तद्विरोधिनि च द्विष्टो भवति। तस्य प्रवर्त्तकाद् धर्माद् देवो वा स्यां
गन्धर्वो वा स्यामिति पुनर्भवप्रार्थनया कृताद् धर्मात् प्रकृष्टात् फलातिशयहेतोराशयानुरूपैः
कर्मानुरूपैरिष्टशरीरादिभिः सम्बन्धो भवति, ब्रह्मेन्द्रादिस्थानेऽपि मात्रया
दुःखसम्भेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखसंभेदोऽस्ति। न चाधर्मादन्यद् दुःखस्य
कारणमतः स्वल्पाधर्मसहितादित्युक्तम् । यस्य प्रकृष्टो धर्मस्तस्य प्रकृष्टानि
शरीरादीनि भवन्ति, यस्य प्रकृष्टतरो धर्मः, तस्य प्रकृष्टतराणि भवन्ति,
उक्त सन्दर्भ के द्वारा अधर्म के साधनों को कहने के बाद 'अविदुष' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा अधर्म से होनेवाले कार्यों का निरूपण करते हैं। 'अविद्वान्' उस
(मूढ़) पुरुष को कहते हैं, जो अपने को ही कर्त्ता और भोक्ता समझता है एवं
दुःखों के बाह्य एवं आन्तरिक साधनों को सुखों का साधन समझता है। वह
(अविद्वान् पुरुष) अपनी उपभोग की तृष्णा के वशीभूत होकर दुःख के जिन
साधनों को सुख का साधन समझता है, उन विषयों में अनुरक्त हो जाता है और
उसके विरोधी विषयों के साथ द्वेष रखने लगता है। 'प्रवर्त्तकाद्धर्मात्' अर्थात् 'मैं
देव हो जाऊँ, मैं गन्धर्व हो जाऊँ' इस प्रकार की हेतुभूत पुनर्जन्म की वासना से
किये गये प्रवर्त्तक एवं उत्कृष्ट फलों के हेतु उत्कृष्ट धर्म के द्वारा (कुछ अधर्म की
सहायता से) आशय के अनुरूप अर्थात् पहले किए हुए कर्म के अनुरूप अभीष्ट
शरीरादि के साथ वह जीव सम्बद्ध होता है। ब्रह्मा प्रभृति के शरीर धारण करने
पर भी थोड़ा-सा दुःख का सम्बन्ध रहता ही है। बिना अधर्म के दुःख का
अनुभव नहीं होता एवं अधर्म को छोड़कर दुःख का भी कोई दूसरा (असाधारण)
कारण नहीं है, अतः 'स्वल्पाधर्मसहितात्' यह वाक्य जोड़ा गया है। 'आश-
यानुरूपैः' यह वाक्य इस तारतम्य को समझाने के लिए लिखा गया है कि जिसका
धर्म उत्कृष्ट रहता है, उसे उत्कृष्ट शरीर मिलता है, जिसका धर्म उससे उत्कृष्टतर
६८० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ज्ञानपूर्वकात्तु कृतादसङ्कल्पितफलाद् विशुद्धे कुले जातस्य
दुःखविगमोपायजिज्ञासोराचार्यमुपसङ्गम्योत्पन्नषट्पदार्थतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ
विरक्तस्य रागद्वेषाद्यभावात् तज्जयोधर्माधर्मयोरनुत्पत्तौ
ज्ञानपूर्वक किये हुए निष्काम कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न धर्म से
जीव विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । इससे पुरुष को दुःख की आत्यन्तिक
निवृत्ति के उपाय को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है । इस जिज्ञासा से
प्रेरित होकर वह आचार्य के चरणों में बैठकर उनसे षट् पदार्थों के तत्त्व-
ज्ञान का लाभ करता है । जिससे अज्ञान निवृत्ति के द्वारा उसे वैराग्य
न्यायकन्दली
यस्य प्रकृष्टतमो धर्मस्तस्य प्रकृष्टतमानीति प्रतिपादयितुमाशयानुरूपैरित्युक्तम् । इष्टशब्दः
प्रत्येकं शरीरादिषु सम्बद्ध्यते, द्वन्द्धानन्तरं प्रयोगात् । तथा प्रकृष्टादधर्मात् प्रेतयोनीनां
तिर्यग्योनीनां च स्थानेष्वनिष्टैः शरीरादिभिर्योगो भवति । प्रेतादिस्थानेऽपि मनाक् सुख-
मस्ति, तच्च धर्मस्य कार्यम्, अतः स्वल्पधर्मसहितादित्युक्तम् । उपसंहरति-एवमिति ।
एवं धर्मात् संसारं प्रतिपाद्यापवर्गं प्रतिपादयति-ज्ञानपूर्वकात्त्विति । "स्वरूप-
तश्चाहमुदासीनो बाह्याध्यात्मिकाश्च विषयाः सर्व एवैते दुःखसाधनम्" इति यस्य
ज्ञानमभूत्, स दृष्टानुश्रविकविषयसुखवितृष्णः "एवमहं भूयासमिति मे भूयासुः"
होता है, उसे उस शरीर से भी अच्छा शरीर मिलता है एवं जिसका धर्म इन दोनों
प्रकार के धर्मों से उत्कृष्टतम रहता है, उसे तदनुरूप ही शरीर भी उत्कृष्टतम
मिलता है । प्रकृत वाक्य का 'इष्ट' शब्द द्वन्द्वसमास के अन्त में प्रयुक्त है, अतः
उसके पहले के ' शरीरादि' प्रत्येक शब्द के साथ उसका अन्वय है । इसी प्रकार
प्रकृष्ट अधर्म से प्रेत-तिर्यग् योनि के अनिष्ट शरीरादि के साथ आत्मा सम्बद्ध
होता है । प्रेतलोक प्रभृति में भी थोड़ा-सा सुख का सम्बन्ध है एवं सुख धर्म से ही
उत्पन्न होता है, अतः 'स्वल्पधर्मसहितात्' ऐसा लिखा गया है । 'एवम्' इत्यादि से
इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
इस प्रकार धर्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन कर 'ज्ञानपूर्वकात्तु' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा धर्म से मोक्ष की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं । "मैं वस्तुतः अपने
यथार्थरूप में उदासीन हूँ एवं बाह्य और आभ्यन्तर जितने भी विषय हैं, वे सभी
दुःख के ही साधन हैं" इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को हो जाता है वह 'दृष्ट'
चन्दनवनितादि जनित सुखों से एवं 'आनुश्रविक' स्वर्गादि सुखों की तृष्णा से निवृत्त
भाषानुवादसहितम् ३८१
न्यायकन्दली
इति फलाकाङ्क्षया विना निवृत्तसाधनतया विहितमपरं चावश्यकरणीयं कर्म करोति ।
तस्मात् कर्मणो ज्ञानपूर्वकात् कृतादस्य विशुद्धे कुले जन्म भवति । अकुलीनस्य श्रद्धा न
भवति । न चाश्रद्दधानस्य जिज्ञासा सम्पद्यते । न चाजिज्ञासोस्तत्त्वज्ञानम् । तद्विकलस्य च
नास्ति मोक्षप्राप्तिः । अतो मोक्षानुगुणमसङ्कल्पितफलं कर्म विशुद्धे कुले जन्म ग्राहयति,
विशुद्धे कुले जातस्य प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य दुःखविगमोपाये जिज्ञासा सम्पद्यते "कुतो
नु खल्वयं मम दुःखोपरमः स्यात्" इति । स चैवमाविर्भूतजिज्ञास आचार्यमुपगच्छति,
तस्य चाचार्योपदेशात् षण्णां पदार्थानां श्रौतं तत्त्वज्ञानं जायते । तदनु श्रवणमनन-
निदिध्यासनादिक्रमेण प्रत्यक्षं भवति । उत्पन्नतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ सवासनविपर्यय-
ज्ञाननिवृत्तौ विरक्तस्य विच्छिन्नरागद्वेषसंस्कारस्य रागद्वेषयोरभावात् तज्जयोर्धर्मा-
धर्मयोरनुत्पादः । क्लेशवासनोपनिबद्धा हि प्रवृत्तयस्तुषावनद्धा इव तण्डुलाः प्ररोहन्ति ।
क्षीणेषु क्लेशेषु निस्तुषा इव तण्डुलाः कार्यं न प्रतिसन्दधते । यथाह भगवान् पतञ्जलिः -
हो जाता है । फिर भी 'अहं भूयासम्', 'मे भूयासुः' (मैं बराबर रहूँ और मेरे इष्ट
विषय बराबर मुझे प्राप्त होते रहें) इस प्रकार की भावना बनी ही रहती है । फला-
काङ्क्षा की इस भावना से प्रेरित होकर वह नैमित्तिक कर्मों का अनुष्ठान करता
ही रहता है; क्योंकि उनको छोड़ने का कोई हेतु तब तक उपस्थित नहीं रहता ।
ये ही कर्म जब उक्त पुरुष के द्वारा ज्ञानपूर्वक किये जाते हैं, तो उस पुरुष को
विशुद्ध कुल में जन्म प्राप्त होता है; क्योंकि अकुलीन पुरुष में श्रद्धा उत्पन्न नहीं
होती एवं बिना श्रद्धा के जिज्ञासा नहीं होती । जिसे जिज्ञासा नहीं, उसे
तत्त्वज्ञान प्राप्त होना असम्भव है । बिना तत्त्वज्ञान के मोक्ष की प्राप्ति सम्भव
नहीं है । अतः निष्काम कर्म मोक्ष का सहायक है । तस्मात् वह पुरुष विशुद्ध
कुल में जन्म लेता है । विशुद्ध कुल में उत्पन्न वह पुरुष जब प्रतिदिन के
दुःख से पीड़ित होने लगता है, तो उसे दुःखनाश के कारणों के प्रसङ्ग में
यह जिज्ञासा उठती है कि 'किन साधनों से इन दुःखों की निवृत्ति होगी' ?
जब पुरुष में इस प्रकार की जिज्ञासा उठती है तो वह आचार्य के पास जाता है ।
आचार्य के उपदेश से उसे वेदवाक्योंके द्वारा आत्मतत्त्व का (परोक्ष) ज्ञान होता है ।
फिर श्रवण के बाद मनन और मनन के बाद निदिध्यासन, इस रीति से
उसे आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होता है । प्रत्यक्षात्मक इस आत्मतत्त्वज्ञान के
उत्पन्न हो जाने पर संसार के निदानभूत विपर्यय (मिथ्याज्ञान) का जड़मूल से
विनाश हो जाता है । जिससे विषयों से वैराग्य उत्पन्न होता है । विरक्त पुरुष
के राग और द्वेष के संस्कार भी छूट जाते हैं । राग और द्वेष के छूट जाने पर
६८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
प्रशस्तपादभाष्यम्
पूर्वसञ्चितयोश्चोपभोगान्निरोधे सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य
रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं
कृत्वा निवर्त्तते । तदा निरोधाद् निर्बीजस्यात्मनः शरीरादि-
निवृत्तिः, पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्ष इति ।
होता है । विरक्त पुरुष में राग और द्वेष की सम्भावना न रहने के
कारण राग और द्वेष से होनेवाले धर्म और अधर्म की आगे उत्पत्ति
रुक जाती है । पहले से सञ्चित धर्म और अधर्म का उपभोग से नाश
हो जाने के बाद सन्तोषात्मक सुख एवं शरीरपरिच्छेद (शरीर के
प्रति घृणा) इन दोनों की उत्पत्ति होती है । इनसे रागादि की
निवृत्ति होती है । इसके बाद निवृत्तिजनक केवल (अधर्म से
सर्वथा असम्बद्ध) धर्म आत्मतत्त्वज्ञान की सहायता से (परम) सुख
को उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है । निवृत्तिलक्षण उस
धर्म की निवृत्ति से उस समय आत्मा संसार के बीज (धर्माधर्मादि)
से रहित हो जाता है, अतः उसके उपभोग के पूर्व-आयतन
(वर्तमान शरीर) की निवृत्ति हो जाती है, एवं आगे शरीर की उत्पत्ति
रुक जाती है । लकड़ी के जल जाने के कारण अग्नि की निवृत्ति
की तरह उस समय शरीर का फिर से उत्पन्न न होना ही मोक्ष है ।
न्यायकन्दली
"सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः" इति । यथाह भगवानक्षपादः - "न
प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य" इति । पूर्वसञ्चितयोश्च धर्माधर्मयोर्निरोध
उपभोगात्, निवृत्तिफलहेतोश्च कर्मान्तरात् । सन्तोषसुखं शरीरपरिच्छेदं
चोत्पाद्य रागादिनिवृत्तौ निवृत्तिलक्षणः केवलो धर्मः परमार्थदर्शनजं सुखं
इन दोनों से उत्पन्न होनेवाले धर्म और अधर्म की उत्पत्ति भी रुक जाती है । जिस
प्रकार छिलके से युक्त धान से ही अङ्कुर उत्पन्न होता है, उसी प्रकार क्लेश और
वासना से युक्त प्रवृत्ति से ही जन्मरूप कार्य की उत्पत्ति होती है । प्रवृत्तियों से जब
वासना और क्लेश का सम्बन्ध छूट जाता है, तब उससे आगे जन्म का कार्य उसी
प्रकार रुक जाता है, जिस प्रकार छिलके के न रहने से धान के द्वारा अङ्कुर का
होना रुक जाता है । जैसा कि 'न प्रवृत्तिः प्रतिसन्धानाय हीनक्लेशस्य' इस सूत्र के
द्वारा भगवान् अक्षपाद ने भी कहा है ।
पूर्वसञ्चितों का अर्थात् पूर्वसञ्चित धर्म और अधर्म का 'निरोध' उपभोग से
होता है । संसारनिवृत्तिरूप फल के कारणीभूत (निवृत्तिरूप) धर्म का विनाश
दूसरे धर्म से होता है । 'सन्तोषसुखम्' इत्यादि वाक्य में प्रयुक्त 'निवृत्ति' शब्द
भाषानुवादसहितम् ६८३
न्यायकन्दली
कृत्वा निवर्त्तते । निवत्र्त्यते संसारोऽनेयेति निवृत्तिः, निवृत्तिर्लक्षणं यस्यासौ निवृत्तिलक्षणो
निवृत्तिस्वभावो धर्मो रागादिनिवृत्तौ भूतायां केवलो व्यवस्थितः सन्तोषसुखं
शरीरपरिच्छेदं चोत्पाद्य परमार्थदर्शनजमात्मदर्शनजं सुखं करोति, तत्कृत्वा निवर्त्तते ।
आभिमानिककार्यविनिरोधात् तदा निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिनिवृत्तौ पुनः शरीराद्यनुत्पत्तौ
दग्धेन्धनानलवदुपशमो मोक्षः । यदा परमार्थदर्शनं कृत्वा निवृत्तो धर्मः, तदा
निर्बीजस्यात्मनः शरीरादिबीजधर्माधर्मरहितस्यात्मन उत्पन्नानां शरीरादीनां कर्मक्षयान्निवृत्तौ
भूतायामनागतानां कारणाभावादनुत्पत्तौ यथा दग्धेन्धनस्यानलस्योपशमः पुनरनुत्पादः, एवं
पुनः शरीरानुत्पादो मोक्षः ।
इदं निरूप्यते । किं ज्ञानमात्रान्मुक्तिः ? उत ज्ञानकर्मसमुच्चयात् ?
ज्ञानकर्मसमुच्चयादिति वदामः । निवृत्तेतराभिलाषस्य काम्यकर्मभ्यो निवृ-
त्तस्यापि नित्यनैमित्तिककर्माधिकारो न निवर्त्तते, तानि ह्युपनीतं ब्राह्मण-
मात्रमधिकृत्य विहितानि । मुमुक्षुरपि ब्राह्मण एव, जातेरनुच्छेदात् । स यद्यधिका-
'निवर्त्त्यते संसारोऽनया' इस व्युत्पत्ति के द्वारा निष्पन्न है (जिसका अर्थ है कि
संसार की निवृत्ति जिससे हो) । इस प्रकार से निष्पन्न निवृत्ति शब्द के साथ
'लक्षण' शब्द का 'निवृत्तिर्लक्षणं यस्य असौ निवृत्तिलक्षणः' इस प्रकार का समास
है, अर्थात् निवृत्तिस्वभाव का जो धर्म वह रागादि की निवृत्ति होने पर 'केवल'
अर्थात् व्यवस्थित हो जाता है । वह (केवल धर्म) सन्तोषसुख और शरीरसञ्चालन
इन दोनों का उत्पादन कर 'परमार्थदर्शनजम्' अर्थात् आत्मज्ञानजनित सुख को
उत्पन्न कर स्वयं भी निवृत्त हो जाता है; क्योंकि आभिमानिक सभी कार्यों का वह
विरोधी है । 'तदा' इत्यादि सन्दर्भ से कहते हैं कि यह निवृत्तिस्वभाव का धर्म जब
आत्मज्ञानजनित धर्म को उत्पन्न कर स्वयं निवृत्त हो जाता है, 'तदा निर्बीजस्य'
अर्थात् तब शरीरादि के उत्पादन के बीज प्रवृत्तिलक्षण धर्माधर्मादि से रहित आत्मा
के शरीरादि का कर्मक्षय से नाश हो जाता है और कारणों के न रहने से आगे
होनेवाले शरीरादि की उत्पत्ति रुक जाती है । जिस प्रकार लकड़ी के जल जाने के
बाद अग्नि का भी नाश हो जाता है और पुनः उत्पत्ति भी नहीं होती है, उसी
प्रकार शरीर का पुनः उत्पन्न न होना ही 'मुक्ति' है ।
अब इस विषय का विचार करते हैं कि केवल ज्ञान से ही मुक्ति
होती है ? अथवा ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर मोक्ष का सम्पादन करते
हैं ? हम लोग तो कहते हैं कि ज्ञान और कर्म दोनों मिलकर ही मोक्ष
का सम्पादन करते हैं; क्योंकि जिन्हें सांसारिक विषयों की अभिलाषा नहीं है,
वे यद्यपि काम्य कर्म से निवृत्त हो जाते हैं, फिर भी वे अपने नित्य और
नैमित्तिक कर्मों की अवश्यकर्तव्यता से मुक्त नहीं हो सकते; क्योंकि नित्य
और नैमित्तिक कर्मों का विधान उपनीत सभी ब्राह्मणों के लिए किया गया
है । मोक्ष के इच्छुक भी ब्राह्मण ही हैं; क्योंकि जाति का कभी नाश नहीं
६८४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
रित्वे सत्यवश्यकरणीयान्यतिक्रमेत् प्रत्यवायोऽस्य प्रत्यहमुपचीयेत, तदुपचयाच्च बद्धो न
मुच्यते । यथोक्तम्-
यानि काम्यानि कर्माणि प्रतिषिद्धानि यान्यपि ।
तानि बध्नन्त्यकुर्वन्तं नित्यनैमित्तिकान्यपि ॥ इति ।
विहिताकरणमभावः, न चाभावो भावस्य हेतुरपि, अतो नास्मात्
प्रत्यवायोत्पत्तिरिति चेत् ? न, विहिताकरणेऽन्यकरणात् प्रत्यवायस्य सम्भवात् । अभावस्य
हि स्वातन्त्र्येण हेतुत्वं नेष्यते, न तु भावोपसर्जनतया । न च शरीरी सन्ध्यादिकाले कायेन
वाचा मनसा वा किञ्चिन्न करोति, शरीरधारणादीनामपि करणात् । यथोक्तम्-
कर्मणां प्रागभावो यो विहिताकरणादिषु ।
न चानर्थकरत्वेन वस्तुत्यानापनीयते ॥
स्वकाले यदकुर्वंस्तत् करोत्यन्यदचेतनः ।
प्रत्यवायोऽस्य तेनैव नाभावेन स जन्यते ॥ इति ।
अभावेन केवलेन नासौ जन्यत इत्यर्थः । प्रतिषिद्धाचरणात् प्रत्यवायः,
होता । यदि अधिकार रहने पर भी अपने अवश्यकर्तव्य (नित्य-नैमित्तिक) कर्मों का
अनुष्ठान वे नहीं करते, फिर उनका प्रत्यवाय बढ़ता ही जाएगा । प्रत्यवाय की
इस वृद्धि के कारण बद्ध पुरुष कभी मुक्त नहीं होगा । जैसा आचार्यों ने कहा है
कि-
जितने भी काम्य, निषिद्ध, नित्य और नैमित्तिक कर्म हैं, सभी अनुष्ठान न
करनेवाले अधिकारी को संसार में बाँधते हैं ।
(प्र.) विहित कर्मों का न करना अभाव पदार्थ है, अभाव किसी का कारण
नहीं हो सकता, अतः विहित कर्मों के न करने से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं हो
सकती । (उ.) यह कोई बात नहीं है, जिस समय अधिकारी विहित कर्म का
अनुष्ठान नहीं करेगा, उस समय कोई दूसरा कर्म तो करेगा ही, इस दूसरे कर्म
(रूप भाव पदार्थ) से ही प्रत्यवाय की उत्पत्ति होगी । अभाव स्वतन्त्र होकर ही
किसी का कारण नहीं होता; किन्तु भाव पदार्थ रूप कारण का उपसर्जन तो होता
ही है । जितने भी शरीरी हैं, वे सन्ध्यावन्दनादि के समय (उसके न करने पर
भी) शरीर से, वचन से या मन से कोई न कोई काम अवश्य ही करते हैं;
क्योंकि शरीर को धारण करना भी तो कर्म ही है, जैसा कि आचार्यों ने कहा है-
विहित कर्म का न करना यतः कर्मों का प्राग्भाव है, अतः भाव पदार्थ न
होने के कारण वह प्रत्यवाय के उत्पादन से सर्वथा विरत नहीं हो सकता; क्योंकि
मूढ़ भी विहित कर्म के काल में उसे न करने पर भी अन्य कोई कर्म अवश्य ही
करता है, उस दूसरे कर्म से प्रत्यवाय की उत्पत्ति होती है, विहिताकरणरूप
प्रागभाव से ही नहीं ।
अर्थात् केवल उक्त प्रागभाव से प्रत्यवाय की उत्पत्ति नहीं होती है । (प्र.) निषिद्ध
कर्मों के आचरण से प्रत्यवाय होता है, शरीर धारणरूप कर्म तो निषिद्ध नहीं है,
भाषानुवादसहितम् ६८५
न्यायकन्दली
शरीरधारणादिकं च न प्रतिषिद्धम् । तत्कुर्वन्नपि यदि सन्ध्यया योगमभ्यस्यति को दोष
इति चेत् ? न, तत्काले विहितस्यावश्यकर्तव्यताविधेरर्थात् केवलस्य शरीरधारणादेः
करणं प्रतिषिद्धमिति । तदाचरतो भवत्येव प्रतिषिद्धाचरणनिमित्तः प्रत्यवायः । अथोच्यते ।
दीर्घकालादरनैरन्तर्यसेवितभावनावितविशदभावमात्मज्ञानमेव रागद्वेषौ मोहं च समूलकाषं
कर्षद्विहिताकरणनिमित्तं प्रत्यवायमपि कषतीति चेत् ? तदयुक्तम् । यत्र ह्यभ्यासः
प्रसीदति, तत्र तत्त्वग्रहो जातः संशयविपर्ययौ व्युदस्यति, न तस्य वस्त्वन्तरनिर्वहणे
सामर्थ्यं दृष्टपूर्वम् । यदि पुनरात्मज्ञानं कर्माणि निरुणद्धि उपारूढफलभोगमपि कर्म
निरुन्ध्यात्, ततः सुदूरं गता जीवन्मुक्तिः ? तत्त्वदर्शनानन्तरमेव विलीनाखिलकर्मणो
देहपातात् । अस्ति चायं परमार्थदृष्टिनिरुद्धाखिलाविद्योऽपि चित्रलिखितमिवाभासमात्रेण
सर्वं जगत् पश्यन्नेकत्राप्यनारूढाभिनिवेशः प्रारब्धफलं कर्मविशेषमुपभुञ्जानः कुलाल-
व्यापारविगमे चक्रभ्रान्तिवत् संस्कारवशादनुवर्तमानस्य देहपातमुदीक्षमाणः । तथा च श्रुतिः-
फिर विहिताकरण के समय शरीर धारण से प्रत्यवाय की उत्पत्ति क्यों कर
होगी ? शरीरधारण करते हुए यदि सन्ध्या-वन्दन के समय कोई योग का ही
अभ्यास करता है,तो उसे प्रत्यवाय क्यों होगा ? (प्र.) 'सन्ध्या-वन्दन अवश्य करें'
यह विधान है, इस विधान से ही इस प्रतिषेध का भी आक्षेप होता है कि उस
समय केवल-शरीर का धारण न करे (सन्ध्या-वन्दन से युक्त शरीर का ही धारण
करे), अतः उस समय केवल-शरीर का धारण प्रतिषिद्ध है । सुतराम् उससे
प्रत्यवाय होना उचित है । यदि यह कहें कि (प्र.) दीर्घकाल से आदरपूर्वक किये
गये अभ्यास के कारण आत्मा का विशद तत्त्वज्ञान जिस प्रकार राग, द्वेष, मोह
प्रभृति को मूल सहित विनष्ट कर देता है, उसी प्रकार वही आत्मतत्त्वज्ञान विहित
सन्ध्यावन्दनादि के न करने से होनेवाले प्रत्यवाय को भी विनष्ट कर देगा । (उ.)
तो उक्त कथन भी सङ्गत नहीं होगा; क्योंकि उपयुक्त अभ्यास केवल विषयों के
तत्त्व को ही पूर्ण रूप में समझ सकता है, जिससे उसमें जो संशय या विपर्यय
रहता है, उसका विनाश हो जाय । अभ्यासजनित तत्त्वग्रह में यह सामर्थ्य कहीं
उपलब्ध नहीं है कि किसी दूसरी वस्तु को भी वह उत्पन्न करे । यदि यह मान भी
लें कि आत्मज्ञान से कर्मों का नाश होता है, तो फिर उससे सारे प्रारब्ध कर्मों का
भी नाश हो जाएगा, जिससे जीवन्मुक्ति की बात ही छोड़ देनी पड़ेगी; क्योंकि
तत्त्वज्ञान के बाद ही प्रारब्धसहित सभी कर्मों का नाश हो जाएगा, जिससे कि
आत्मज्ञानवाले पुरुष के शरीर का भी नाश हो जाएगा; किन्तु ऐसे महापुरुषों की
सत्ता अवश्य है, जिनकी सभी अविद्यायें आत्मतत्त्वज्ञान से नष्ट हो चुकी हैं, जो
सम्पूर्ण विश्व को चित्रलिखित आभासमात्र की तरह देखते हैं, किसी भी एक
विषय में अभिनिवेश न रखकर, अपने प्रारब्ध को भोगते हुए संस्कार के कारण
कुम्हार के चाक के भ्रमण की तरह देहपात की प्रतीक्षा करते हैं । जैसा श्रुति
६८६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
"जीवन्नेव हि विद्वान् संहर्षायासाभ्यां विप्रमुच्यते" इति । तथा चाहुः कापिलाः -
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमवद् धृतशरीरः ॥ इति ।
धर्मादीनामकारणप्राप्ताविति तत्त्वज्ञानेनोच्छिन्नेषु सवासनक्लेशेषु धर्मादीनां सहकारि-
कारणप्राप्त्यभावे सतीत्यर्थः । अलब्धवृत्तीनि कर्माणि तत्त्वज्ञानाद् विलीयन्त इति चेत् ?
न, तेषामपि कर्मत्वादप्रारब्धफलकर्मवज् ज्ञानेन विनाशाभावात् । योऽपि 'क्षीयन्ते चास्य
कर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे' इत्युपदेशः, तस्याप्ययमर्थः - ज्ञाने सति अनागतानि कर्माणि
न क्रियन्त इति । न पुनरयमस्यार्थः-उत्पन्नानि कर्माणि ज्ञानेन विनाश्यन्त इति । तथा
चागमान्तरम् 'नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि' इत्यादि । ज्ञानं यदि न क्षिणोति
कर्माणि ? अनेकजन्मसहस्रसञ्चितानां कर्मणां कुतः परिक्षयः ? भोगात् कर्मभिश्च । तदर्थं
कहती है कि "आत्मज्ञानी पुरुष शरीर को धारण करते हुए भी हर्ष और शोक
से विमुक्त रहते हैं" । इसी प्रसङ्ग में सांख्यदर्शन के आचार्य ने भी कहा है कि-
'सम्यग्ज्ञान (आत्मतत्त्व ज्ञान) की प्राप्ति से धर्मादि से संसार के उत्पादक
सहकारी (वासनादि) नष्ट हो जाते हैं, फिर भी संस्कार के कारण कुम्हार के
चाक के भ्रमण की तरह तत्त्वज्ञानी शरीर को धारण किये ही रहते हैं ।
उक्त आर्या में प्रयुक्त 'धर्मादीनामकारणप्राप्तौ' इस वाक्य का अर्थ है कि
'तत्त्वज्ञान से जब वासनासहित सभी क्लेशों का नाश हो जाता है, जब संस्कार के
कारणीभूत धर्मादि भावों के सहकारी नष्ट हो जाते हैं, उस समय' । (प्र.)
तत्त्वज्ञान के द्वारा प्रारब्ध से भिन्न सभी कर्मों का विनाश हो जाता है । (उ.) यह
भी ठीक नहीं है; क्योंकि प्रारब्ध कर्म की तरह वे भी कर्म ही हैं, अतः तत्त्वज्ञान
से उनका भी नाश नहीं हो सकता । 'क्षीयन्ते चास्य कर्माणि' इत्यादि वाक्य का
जो यह उपदेश है कि "आत्मतत्त्वज्ञान के हो जाने पर उसके सभी कर्म नष्ट
हो जाते हैं," उसका इतना ही अभिप्राय है कि ज्ञान हो जाने के बाद कर्म
की धारा रुक जाती है । फिर भविष्य में कर्म अनुष्ठित नहीं होते । उसका
यह अर्थ नहीं है कि जो कर्म उत्पन्न हो गये हैं, तत्त्वज्ञान से उनका भी विनाश
होता है । जैसा कि दूसरे आगम के द्वारा कहा गया है कि बिना भोग के कर्मों
का नाश नहीं होता है, चाहे सौ करोड़ कल्प ही क्यों न बीत जाय । (प्र.) ज्ञान
से यदि कर्मों का नाश नहीं होता है, तो फिर कई हजार वर्षों से सञ्चित कर्मों
का नाश किससे होता है ? (उ.) भोग से और नाशक दूसरे कर्मों से ही (उन
सञ्चित कर्मों का) नाश होता है । (प्र.) कर्मनाश के लिए विहित कर्मों से अनन्त
जन्मों से सञ्चित कर्मों का एक ही जन्म में विनाश किस प्रकार होगा ? (उ.)
ऐसी कोई बात नहीं है, कर्मक्षय के लिए काल का कोई नियम नहीं है । जिस
भाषानुवादसहितम् ६८७
न्यायकन्दली
चोदितेरनन्तानां कथमेकस्मिन् जन्मनि परिक्षय इति चेत् ? न, कालानियमात् । यथैव
तावत् प्रतिजन्म कर्माणि चीयन्ते, तथैव भोगात् क्षीयन्ते च । यानि त्यपरिक्षीणानि
तान्यात्मज्ञेनापूर्व सञ्चिन्चता च क्रमेणोपभोगात् कर्मभिश्च नाश्यन्ते । यथोक्तम्-
कुर्वन्नात्मस्वरूपज्ञो भोगात् कर्मपरिक्षयम् ।
युगकोटिसहस्रेण कश्चिदेको विमुच्यते ॥ इति।
तदेवं विहितमकुर्वतः प्रत्यवायोत्पत्तेस्तस्य च बन्धहेतुत्वादन्धतो विरामाभावात्, प्रत्य-
वायनिरोधार्थं मुक्तिमिच्छता योगाभ्यासाविरोधेन भिक्षाभोजनादिवद् यथाकालं विहितान्य-
नुष्ठेयानि, यावदस्यात्मतत्त्वं न स्फुटीभवति । स्फुटीकृतात्मतत्त्वस्यापि जीवन्मुक्तस्य
तावत्कर्माणि भवन्ति, यावद्यात्रानुवर्तते । आत्मैकप्रतिष्ठस्य त्याभ्यर्णमोक्षस्य परिक्षीणप्राय-
कर्मणस्तानी नश्यन्त्येव, बहिः संवित्तिविरहात् । परिणतसमाधिसामर्थ्यविशदीकृत-
मुपचितवैराग्यहितपरिपक्वपर्यन्तमापादितविषयाद्वैतमुन्मूलितनिखिलविपर्ययवासनमेकाग्री-
कृतान्तःकरणकारणमात्मतत्त्वज्ञानमेव केवलं तदानीं सञ्जायते, न बहिःसंवेदनम्,
प्रकार प्रत्येक जन्म में कर्म का सञ्चय होता है, उसी प्रकार भोग से उनका विनाश
भी होता रहता है । उनमें जितने कर्म भोग से बच जाते हैं, उन कर्मों को आगे
आत्मज्ञ पुरुष अपूर्व कर्मों का सञ्चय करते हुए ही भोग से और (प्रतिरोधक)
कर्म से क्रमशः नष्ट कर देते हैं । जैसा कहा गया है कि-
आत्मज्ञान से भोग के द्वारा कर्मों का नाश करते हुये हजारों कोटियुगों में
कोई एक पुरुष मुक्त होता है ।
इन सब कारणों से यह मानना पड़ता है कि यतः विहित कर्मों को न करने
से प्रत्यवाय होता है एवं प्रत्यवाय बन्ध का कारण है, इस प्रत्यवाय की निवृत्ति
विहित कर्मों के अनुष्ठान के बिना सम्भव नहीं है, अतः जिन्हें मुक्ति पाने की
अभिलाषा हो, उन्हें योगाभ्यास को क्षति पहुँचाये बिना विहित कर्मों का अनुष्ठान
तब तक करते रहना चाहिए, जब तक आत्मतत्त्व पूर्ण रूप से अवगत न हो
जाय । जैसे कि ज्ञान न हो जाने तक भिक्षा, भोजन प्रभृति कर्मों का अनुष्ठान
अन्त तक करना पड़ता है । आत्मा का परिस्फुट ज्ञान हो जाने पर भी यदि वे
जीवन्मुक्त हैं, तो जब तक यह शरीर है, तब तक नित्य-नैमित्तिक कर्मों का
अनुष्ठान उन्हें भी करना पड़ेगा । जिस महापुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान
रह जाता है और इस कारण जो परममुक्ति के समीप पहुँच जाते हैं, उनसे कर्म
स्वयं छूट जाते हैं; क्योंकि उन्हें बाह्य विषयों का ज्ञान ही नहीं रह जाता । उन्हें
तो केवल आत्मा का ही विशिष्ट ज्ञान रह जाता है । परिणत समाधि के द्वारा
उत्पन्न होने के कारण जिस आत्मज्ञान में पूरी स्वच्छता आ गयी है, तीव्र वैराग्य
से जिसमें पूरी परिपक्वता आ गयी है । एवं जिस आत्मज्ञान में दूसरे सभी विषयों
का सम्बन्ध पूर्णतः समाप्त हो गया है । जिससे सभी विपर्ययरूप मिथ्या ज्ञान का
६८८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
बाह्येन्द्रियव्यापारोपरमात् । तत्र कः सम्भवः कर्मणाम् ? तथा च श्रुतिः-"न
शृणोतीत्याहुरेकीभवति न पश्यतीत्याहुरेकीभवतीत्यादि" । तदा चाकरणनिमित्तः
प्रत्यवायोऽपि नास्ति सन्ध्येयमुपस्थितेत्यादिकमजानतो ब्राह्मणोऽस्मीति प्रतीतिरहितस्य
कर्माधिकारपरिभ्रंशात् । यथोक्तम्-
ब्राह्मण्यानहंमानी कथं कर्माणि संसृजेत् ॥ इति ।
न चास्योपरतसमस्तव्यापारस्य काष्ठवदवस्थितस्यापि प्राणिहिंसापि सम्भवति । यत्
पुनरस्य दृष्टद्रष्टव्यस्य क्षीणक्षेतव्यस्य वशीकृतमनसो विषयावबोधस्मरणसङ्कल्पसुखदुःख-
बहिष्कृतस्य ब्रह्मलग्नसमाधेरपि शरीरं कियन्तञ्चित् (कालमनुवर्तते) तच्छरीरस्थितिमात्र-
हेतोरायुर्विपाकस्य कर्मग्रन्थेरनुच्छेदात् । यदा तु यावन्तं कालमायुर्विपाकेन कर्मणा शरीरं
धारयितव्यं तावत्कालप्राप्तिरभूत्, तदा स्वकार्यकरणात् कर्मसमुच्छेदे तत्कार्यस्य शरीरस्य
निवृत्तिः ।
विनाश हो गया है । जिस आत्मज्ञान की उत्पत्ति एकाग्र अन्तःकरण से होती है,
ऐसे आत्मज्ञानवाले पुरुष को केवल आत्मा का ही ज्ञान उस समय होता है । बाह्य
किसी विषय का भान उन्हें नहीं रह जाता; क्योंकि बाह्य विषयों के साथ उनकी
इन्द्रियों का सम्बन्ध ही नहीं रह जाता है । ऐसी स्थिति में उनसे कर्म सम्पादन की
कौन-सी आशा की जा सकती है ? इसी स्थिति को श्रुति ने 'न शृणोतीत्या-
हुरेकीभवति' इत्यादि वाक्यों से कहा है । उस समय उनसे विहित कर्मों का
अनुष्ठान न होने पर भी उन्हें प्रत्यवाय नहीं होता; क्योंकि जिन्हें कर्माधिकार का
सूचक 'अभी सन्ध्या उपस्थित हो गयी, मैं ब्राह्मण हूँ' इत्यादि ज्ञान नहीं है, उनका
कर्म करने का अधिकार भी छूट जाता है । जैसा कहा गया है कि-
'मैं ब्राह्मण हूँ' जिनको इस प्रकार का अहङ्कार नहीं है, वे ब्राह्मणोचित कर्म के
साथ कैसे सम्बद्ध हो सकते हैं ?
इस प्रकार सभी कर्म छूट जाने के कारण जो काठ की तरह हो गये हैं, उनसे
किसी भी प्राणी की हिंसा सम्भव नहीं है । जिन्होंने जानने योग्य सभी विषयों को
जान लिया है, छोड़ने योग्य सभी विषयों को छोड़ दिया है । जिन्होंने मन को
वशीभूत कर विषयों के अनुभव, स्मरण, संकल्प, सुख एवं दुःख सभी से
छुटकारा पा लिया है, वे यदि ब्रह्म के ध्यान में समाधिस्थ भी हैं, तथापि उनकी
शरीर की अनुवृत्ति जो थोड़े समय के लिए भी चलती है, उसका कारण वह
कर्मग्रन्थिरूप विपाक है जो केवल शरीर स्थिति का ही कारण है । जितने समय
के आयु तक उक्त कर्मविपाक से शरीर की स्थिति आवश्यक है, वह समय जब
समाप्त हो जाता है, तब अपना कर्त्तव्य होने के कारण कर्म भी समाप्त हो
जाता है । कर्म की समाप्ति से शरीर की समाप्ति और शरीर की समाप्ति से
तत्त्वज्ञान की भी समाप्ति हो जाती है, जिससे आत्मा को कैवल्य प्राप्त होता है ।
भाषानुवादसहितम् ६८९
न्यायकन्दली
तन्निवृत्तौ तत्कार्यस्य तत्त्वज्ञानस्यापि विनाशादात्मा कैवल्यमापद्यते । तत्रात्मतत्त्व-
ज्ञानस्य विहितानां च कर्मणां बन्धहेतुकर्मप्रतिबन्धव्यापारदस्ति सम्भूयकारिता । शरीरादि-
विविक्तमात्मानं जानतश्च तदुपकारापकारावात्मन्यप्रतिसन्दधानस्याहङ्कारममकारयोरु- परमे
सत्युपकारिण्यपकारिणि च रागद्वेषयोरभावादुदासीनस्याप्रवृत्तावनागतयोः कुशलेतर-
कर्मणोरसञ्चयात्, सञ्चितयोश्चोपभोगेन कर्मभिश्च परिक्षयाद् विहिताकरणनिमित्तस्य
प्रत्यवायस्य च विहितानुष्ठानेनैव प्रतिबन्धात् । क्षीणे कर्मण्यैहिकस्य देहस्य निवृत्तौ
कारणान्तराभावादानुष्मिकस्य देहस्य पुनरुत्पत्त्यभावे सत्यात्मनः स्वरूपेणावस्थानम् ।
यथोक्तम्-
नित्यनैमित्तिकैरेव कुर्वाणो दुरितक्षयम् ।
ज्ञानं च विमलीकुर्वन्नभ्यासेन तु पाचयेत् ॥
अभ्यासात् पक्वविज्ञानः केवल्यं लभते नरः ॥ इति ।
तथा परैरप्ययं गृहीतो मार्गः-
कर्मणा सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानेनात्मविनिश्चयः ।
भवेद् विमुक्तिरभ्यासात् तयोरेव समुच्चयात् ॥ इति ।
इस प्रकार आत्मतत्त्वज्ञान और विहित कर्मों का अनुष्ठान ये दोनों मिलकर
(ज्ञानकर्मसमुच्चय) ही बन्ध के कारणीभूत कर्मों का प्रतिरोध करने की क्षमता
रखते हैं । जिस पुरुष को 'शरीरादि से आत्मा भिन्न है' इस प्रकार का ज्ञान और
शरीरादि में किये गये उपकार और अपकार को आत्मा का उपकार और
अपकार न समझने की बुद्धि है, उस पुरुष के अहङ्कार और ममकार का विलोप
हो जाता है । फिर उपकारी के प्रति राग और अपकारी के प्रति द्वेष ये दोनों भी
स्वतः निवृत्त हो जाते हैं । जिससे आत्मा की प्रवृत्ति रुक जाती है और वह
उदासीन हो जाता है । जिससे आगे पाप और पुण्य का प्रवाह रुक जाता है और
पहले किये गये (सञ्चित) पाप-पुण्य का भोग और दूसरे कर्मों से विनाश हो जाता
है । एवं विहित कर्मों के न करने से जो प्रत्यवाय होगा, उसका प्रतिरोध विहित
कर्मों के अनुष्ठान से ही हो जाएगा । इस प्रकार सभी कर्मों का विनाश हो जाने
पर इहलोक का शरीर तो नष्ट हो ही जायेगा और कारणों के न रहने पर
पारलौकिक शरीर भी उत्पन्न नहीं होगा । ऐसी स्थिति में आत्मा अपने स्वरूप में
स्थित हो जाएगा । जैसा कहा गया है कि-
नित्य और नैमित्तिक कर्म के अनुष्ठान से सभी पापों को नष्ट करते हुए ज्ञान
को स्वच्छ कर लेना चाहिए । इसके बाद अभ्यास के द्वारा उक्त स्वच्छ ज्ञान को
परिपक्व कर लेना चाहिए । इस प्रकार अभ्यास से परिपक्व ज्ञान वाले पुरुष को
ही कैवल्य प्राप्त होता है ।
अन्य सम्प्रदाय के लोगों ने भी इस मार्ग को अपनाया है, जैसा कि इस श्लोक
से स्पष्ट है-
कर्म से अन्तःकरण की शुद्धि होती है और ज्ञान से आत्मा का
(साक्षात्कारत्मक) विनिश्चय होता है । इस प्रकार ज्ञान और कर्म दोनों के ही
अभ्यास से मुक्ति प्राप्त होती है ।
६१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे मोक्ष-
न्यायकन्दली
किं पुनरात्मनः स्वरूपं येनावस्थितिर्मुक्तिरुच्यते? आनन्दात्मतेति केचित् । तदयुक्तम् ।
विकल्पासहत्वात् । स किमानन्दो मुक्तावनुभूयते वा ? न वा ? यदि नानुभूयते ?
स्थितोऽप्यस्थितान्न विशिष्यते, अनुपभोग्यत्वात् । अनुभूयते चेत् ? अनुभवस्य कारणं
वाच्यम् । न च कायकरणाद्विगमे तदुत्पत्तिकारणतां पश्यामः । अन्तःकरणसंयोगः
कारणमिति चेत् ? न, धर्माधर्मोपगृहीतस्य हि मनसः सहायत्वात्, तदखिल-
शुभाशुभबीजनाशोपगतं नात्मानुकूल्येन वर्त्तते । योगजधर्मानुग्रहादात्मानमनुकूलयति चेत् ?
योगजोऽपि धर्मः कृतकत्वादवश्यं विनाशीति तत्क्षये मनसः कोऽनुग्रहीता ? अथ मतम्-
अचेतनस्यात्मनो मुक्तस्यापि पाषाणादविशेषः, सोऽपि हि न सुखायते न दुःखायते ।
मुक्तोऽपि यदि तथैव, कोऽनयोर्विशेषः ? तस्मादस्यात्मनः स्वाभाविकी चितिः, सा
यदेन्द्रियैर्बहिराकृष्यते, तदा बहिर्मुखीभवति । यदा त्विन्द्रियाण्युपरतानि भवन्ति, तदा
स्वात्मन्येवानन्दस्वभावे निमज्जति ।
आत्मा का वह कौन-सा स्वरूप है जिस स्वरूप से आत्मा की स्थिति मुक्ति
कहलाती है? (इस प्रश्न का उत्तर) कुछ लोग इस प्रकार देते हैं कि वह स्थिति
आत्मा की आनन्दस्वरूपता ही है; किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि इस पक्ष
के सम्भावित कोई भी विकल्प युक्त नहीं ठहरते । (पहला विकल्प यह है कि)
मुक्तावस्था में इस आनन्द का अनुभव होता है? अथवा नहीं? यदि अनुभव नहीं
होता है, तो फिर उस आनन्द का रहना और न रहना दोनों बराबर हैं; क्योंकि
उस आनन्द का उपभोग नहीं किया जा सकता । यदि कहें कि उस आनन्द का अनु-
भव होता है? तो फिर उस अनुभव का कारण कौन है- यह कहना पड़ेगा । शरीर
एवं इन्द्रियादि के नष्ट हो जाने पर और किसी को उस अनुभव का कारण मानना
सम्भव नहीं है । (प्र.) अन्तःकरण (मन) का संयोग उसका कारण होगा ? (उ.) सो
भी सम्भव नहीं है; क्योंकि धर्म और अधर्म से प्रेरित मन ही अनुभव का सहायक
है । जिसके सभी धर्म और अधर्म नष्ट हो चुके हैं, उसके मन से आत्मा को दुःख
का अनुभव नहीं हो सकता । (प्र.) योगज धर्म के साहाय्य से वह मन आत्मा के
अनुकूल होता है (अर्थात् आत्मा के सुखानुभव का उत्पादन करता है) । (उ.) किन्तु
योगज धर्म भी तो उत्पत्तिशील ही है, अतः उसका भी अवश्य नाश होगा, फिर
उसके नष्ट हो जाने पर मन का सहायक कौन होगा? यदि यह कहें कि (प्र.) मुक्त
भी हो यदि उसमें चैतन्य न रहे, तो फिर पत्थर के समान ही होगा; क्योंकि पत्थर
में भी सुख-दुःख की चेतनायें नहीं होतीं । यदि मुक्त पुरुष को भी सुख और दुःख
की चेतनाओं से रहित मान लिया जाय, तो पत्थर और मुक्त आत्मा में क्या अन्तर
रहेगा? अतः यह मानना पड़ेगा कि आत्मा में एक स्वाभाविक चैतन्य होता है । वह
चैतन्य जब इन्द्रियों के द्वारा बाह्य विषयों की तरफ खींचा जाता है, तब वह चैतन्य
बहिर्मुख होता है (अर्थात् बाह्यविषयक ज्ञान में परिणत होता है) । जब इन्द्रियाँ
भाषानुवादसहितम् ६९१
न्यायकन्दली
अयं हि चितेरात्मा यदि यं कञ्चिदवभासयति, यदि पुनरियं मुक्तावस्थायामुदास्ते,
तर्हि स्थितोऽप्यस्थित एव । वरमात्मा जड एव कल्प्यतामिति चेत्? अत्रोच्यते-किं
चितेरानन्दात्मता स्वाभाविकी? कारणान्तरजन्या वा? न तावदवभासकारणं मुक्तावस्ति,
कायकरणादीनां तत्कारणानां विलयादित्युक्तम् । स्वाभाविकी चेत्? संसारावस्था-
यामप्यानन्दोऽनुभूयेत, चितिचैत्ययोरुभयोरपि सम्भवात् । अविद्याप्रतिबन्धान्नानुभव
इति चेत् ? न, नित्यायाश्चितेरानन्दानुभवस्वभावायाः स्वरूपस्याप्रच्युतेः कः
प्रतिबन्धार्थः? प्रच्युतौ वा स्वरूपस्य का नित्यता? तस्माश्रित्य आनन्दो नित्यया
चित्या चेत्यमानो द्वयोरप्यवस्थयोरविशेषेण चेत्यते । न चैवमस्ति संसारावस्था-
यामुत्पन्नापवर्गिणो विषयेन्द्रियाधीनज्ञानस्य सुखस्यानुभवात् । अतो नास्त्यात्मनो नित्यं
अपने व्यापार से निवृत्त हो जाती हैं, उस समय वह (चैतन्य) अपने आनन्द
स्वभाव में ही निमग्न रहता है । चित्स्वरूप इस आत्मा का यह स्वभाव है कि
किसी को भासित करे । यदि मुक्तावस्था में वह इस काम से उदासीन हो जाता है,
तो फिर उस समय चैतन्य का उसमें रहना और न रहना बराबर है । इससे
अच्छा है कि आत्मा को जड़ ही मान लिया जाय । इस प्रसङ्ग में हम लोगों
(सिद्धान्तियों) का कहना है कि आत्मा में जो आनन्द की अभिन्नता है वह
स्वाभाविक है? या किसी दूसरे कारण से उत्पन्न होती है? (यदि कारणान्तरजन्य
मानें तो) मुक्तावस्था में वे कारण नहीं हैं; क्योंकि कह चुके हैं कि अवभास के
कारण शरीर इन्द्रियादि का उस समय विलय हो जाता है । यदि उसको
स्वाभाविक मानें तो फिर संसारावस्था में भी उसका अवभास होना चाहिए;
क्योंकि उस समय भी अवभास्य और अवभासक दोनों विद्यमान हैं । (प्र.)
संसारावस्था में अविद्यारूप प्रतिबन्धक के कारण उस आनन्द का भान नहीं होता
है । (उ.) यह कहना भी ठीक नहीं है; क्योंकि चिति नित्य है एवं आनन्द उसका
स्वरूप है, अतः चिति अपने उस आनन्द स्वरूप से विच्युत हो ही नहीं सकती ।
फिर उक्त प्रतिबन्ध के लिए कोई अवसर ही नहीं रह जाता । यदि चिति कभी
(संसारावस्था में) अपनी आनन्दस्वरूपता से प्रच्युत हो सकती है, तो फिर वह
नित्य ही नहीं रह जाएगी । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि आनन्द भी नित्य है एवं
नित्य चिति के द्वारा ही उसका अनुभव होता है । यदि ऐसी बात है, तो फिर
संसार और अपवर्ग दोनों ही अवस्थाओं में समान रूप से नित्य आनन्द का
अनुभव होना चाहिए; किन्तु सो नहीं होता; क्योंकि संसारावस्था में जब तक
अपवर्ग की प्राप्ति नहीं होती, तब तक विषय एवं इन्द्रिय से उत्पन्न ज्ञान और सुख
का ही अनुभव होता है । तस्मात् आत्मा का नित्य सुख नाम का कोई गुण ही
अनुभव में नहीं आता । अतः आत्मा का नित्य सुख नाम का कोई गुण नहीं है ।
सुतरां नित्य सुख के अनुभव की अवस्था मुक्ति नहीं है । आत्मा के सभी विशेष
६९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-
प्रशस्तपादभाष्यम्
शब्दोऽम्बरगुणः श्रोत्रग्राह्यः, क्षणिकः, कार्यकारणोभय-
विरोधी, संयोगविभागशब्दजः, प्रदेशवृत्तिः, समानासमानजातीय-
आकाश का गुण ही शब्द है । उसका प्रत्यक्ष श्रोत्र से होता है । वह
क्षणिक है एवं उसके कार्य और उसके कारण दोनों ही उसके विनाशक हैं ।
न्यायकन्दली
सुखं तदभावान्न तदनुभयो मोक्षावस्था; किन्तु समस्तात्मविशेषगुणोच्छेदोपलक्षिता
स्वरूपस्थितिरवे । यथा चायं पुरुषार्थस्तथोपादितम् ।
शब्दोऽम्बरगुणः आकाशगुणः । ननु संख्यादयोऽप्याकाशगुणाः सन्ति, कथमिदं
शब्दस्य लक्षणं स्यादत आह-श्रोत्रग्राह्य इति । श्रोत्रग्राह्यत्वे सत्यम्बरगुणो यः स शब्द
इत्यर्थः । परस्य विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थमाह-क्षणिक इति । आशुतरविनाशी शब्दो न
तु नित्यः, उच्चारणादूर्ध्वमनुपलम्भात् । सद्भावे प्रमाणाभावेन व्यञ्जकत्यकल्पनानव-
काशात् । प्रत्यभिज्ञानस्य ज्वालादिवत् सामान्यविषयत्वेनोपपत्तेस्तीव्रमन्दतादिभेदस्य च
व्यक्तिभेदप्रसाधकत्वात् । कार्यकारणोभयविरोधी आद्यः शब्दः स्वकार्येण विरुध्यते ।
अन्त्यः स्वकारणेनोपान्त्यशब्देन विरुध्यते, अन्त्यस्य विनाशकारणास्याभावात् । मध्य-
गुणों के आत्यन्तिक विनाश से युक्त आत्मा की स्वरूपस्थिति ही 'मोक्ष' है । यह
अवस्था पुरुष के लिए काम्य क्यों है? इसका उपपादन (मङ्गलश्लोक की व्याख्या
में) कर चुके हैं।
'शब्दोऽम्बरगुणः' अर्थात् आकाश का गुण ही शब्द है । संख्यादि भी तो
आकाश के गुण हैं, फिर आकाश का गुण होना शब्द का लक्षण कैसे हो सकता
हैं? इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'श्रोत्रग्राह्य' पद का उपादान किया गया है ।
अर्थात् जो श्रोत्र के द्वारा ग्रहण के योग्य हो और आकाश का गुण भी हो, वही
'शब्द' है । शब्द में नित्यत्व पक्ष के निराकरण के लिए ही 'क्षणिकः' यह पद
प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् उत्पत्ति के बाद शब्द अतिशीघ्र विनष्ट हो जाता है,
अतः वह नित्य नहीं है; क्योंकि उच्चारण के बाद फिर उसकी उपलब्धि नहीं
होती है । (प्र.) उच्चारण के बाद शब्द की अभिव्यक्ति का कोई साधन नहीं
रहता, अतः शब्द की उपलब्धि नहीं होती; किन्तु उस समय भी शब्द है ही ।
(उ.) उच्चारण के बाद शब्द की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, अतः शब्द के
व्यञ्जक की कल्पना करने का कोई अवकाश नहीं है । 'सोऽयं गकारः' इत्यादि
प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक मान लेने से भी काम चल सकता है । एवं शब्दों में
एक-दूसरे में तीव्र और मन्द का व्यवहार होता है (वह भी नित्यत्व पक्ष में
उपपन्न नहीं होता) । इससे अनेक शब्दों की कल्पना आवश्यक होती है । 'कार्यकारणो-
भयविरोधी' अर्थात् प्रथम शब्द अपने द्वारा उत्पन्न द्वितीय शब्द से विनष्ट होता है,
भाषानुवादसहितम् ६९३
प्रशस्तपादभाष्यम्
कारणः । स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र अका-
रादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनिलक्षणश्च । तत्र वर्ण-
संयोग, विभाग और शब्द (इन तीनों में से किसी) से उसकी उत्पत्ति
होती है । वह अपने आश्रयद्रव्य के किसी एकदेश में ही रहता है । वह
अपने समानजातीय (शब्द) और विजातीय (संयोग और विभाग इन दोनों) से
उत्पन्न होता है । यह १. वर्ण और २. ध्वनि भेद से दो प्रकार का है । उनमें
अकारादि शब्द वर्णरूप हैं और शङ्खादि से उत्पन्न शब्द ध्वनिरूप हैं ।
न्यायकन्दली
वर्तिनस्तूभयथा विरुध्यन्ते । संयोगविभागशब्दजः । आद्यः शब्दः संयोगाद्
विभागाच्च जायते, तत्पूर्ववस्तु शब्दादिति विवेकः ।
प्रदेशवृत्तिः अव्याप्यवृत्तिरित्यर्थः । एतच्चोपपादितम् । समानासमानजातीयेति ।
शब्दजः शब्दः समानजातीयकारणः । संयोगजविभागजश्च असमानजातीयकारणः । स
द्विविधो वर्णलक्षणः, ध्वनिलक्षणश्च । अकारादिर्वर्णलक्षणः, शङ्खादिनिमित्तो ध्वनि-
लक्षणः । तत्र तयोर्मध्ये, वर्णलक्षणस्योत्पत्तिरुच्यते । आत्ममनसोः संयोगात् पूर्वानुभूत-
वर्णस्मृत्यपेक्षात् तत्सदृशवर्णोच्चारणे कर्तव्ये इच्छा भवति । ततः प्रयत्नस्तं प्रयत्नं
निमित्तकारणमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगादसमवायिकारणात् कोष्ठ्यवायौ कर्म जायते । स
च वायुरूर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति हृत्कण्ठताल्वादीन् प्रदेशानभिहन्ति । ततोऽ-
एवं अन्तिम शब्द अपने कारणीभूत अपने से अव्यवहितपूर्व के शब्द से विनष्ट
होता है; क्योंकि अन्तिम शब्द के विनाश का कोई और कारण नहीं हो सकता ।
बीच के जो शब्द हैं, कार्यशब्द और कारणीभूत शब्द दोनों ही उनके विरोधी हैं ।
'संयोगविभागशब्दजः' अर्थात् प्रथम शब्द (कभी संयोग से और कभी) विभाग से
उत्पन्न होता है, अतः उनके दोनों ही कारण हैं । मध्य के सभी शब्द शब्द से ही
जन्म लेते हैं । 'प्रदेशवृत्तिः' अर्थात् शब्द अव्याप्यवृत्ति है (अपने आश्रय के सभी
देशों में नहीं रहता) । 'शब्द किस प्रकार अव्याप्यवृत्ति है' इसका उपपादन (शब्द
के साधर्म्यप्रकरण में) कर चुके हैं । 'समानासमानजातीयेति' शब्द से जिस शब्द
की उत्पत्ति होती है, वह समानजातीयकारणक है । संयोग और विभाग से जिन
शब्दों की उत्पत्ति होती है, उनके कारण शब्द के असमानजातीय हैं ।
'स द्विविधो वर्णलक्षणो ध्वनिलक्षणश्च' अकारादि वर्णलक्षण शब्द हैं एवं शङ्ख
प्रभृति से जो शब्द उत्पन्न होते हैं, वे ध्वनिलक्षण शब्द हैं । 'तत्र' अर्थात् उन दोनों
प्रकार के शब्दों में वर्णलक्षण शब्द की उत्पत्ति (की रीति) कहते हैं । अनुभूत वर्ण
की स्मृति के साहाय्य से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा सर्वप्रथम उस वर्ण के
६९४ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-
प्रशस्तपादभाष्यम्
लक्षणस्योत्पत्तिरात्ममनसोः संयोगात् स्मृत्यपेक्षाद् वर्णोच्चारणेच्छा,
तदनन्तरं प्रयत्नः, तमपेक्षमाणादात्मवायुसंयोगाद् वायौ कर्म जायते ।
वर्णात्मक शब्द की उत्पत्ति इस प्रकार होती है कि स्मृतिसहकृत आत्मा
और मन के संयोग के द्वारा वर्ण के उच्चारण की इच्छा उत्पन्न होती
है । इसके बाद तदनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । इस प्रयत्न के
द्वारा आत्मा एवं वायु के संयोग से वायु में क्रिया उत्पन्न होती है ।
न्यायकन्दली
भिघातानन्तरं स्थानस्य कण्ठादेः कौष्ठयवायुना सह यः संयोगस्तन्निमित्तकारण-
भूतमपेक्षमाणात् स्थानाकाशसंयोगात् समवायिकारणाद् वर्णोत्पत्तिः ।
अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगाद् दण्डगतं वेगमपेक्षमाणाद् भेर्याकाशसंयोगा-
दुपजायते । भेर्याकाशसंयोगोऽसमवायिकारणम्, भेरीदण्डसंयोगो दण्डगतश्च वेगो
निमित्तकारणम् । वेणुपर्वविभागाद् वेण्वाकाशविभागाच्च शब्दो जायते । शब्दाच्च
शब्दनिष्पत्तिं कथयति-शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद् वीचीसंतानवच्छब्द-
सन्तानः, यथा जलवीच्या तदव्यवहिते देशे वीच्यन्तरमुपजायते, ततोऽप्यन्यत्,
ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण वीचीसन्तानो भवति, तथा शब्दादुत्पन्नात् तदव्यवहिते देशे
समान वर्ण के उच्चारण की इच्छा होती है । इसके बाद 'प्रयत्न' अर्थात् समान
वर्ण के उच्चारण के अनुकूल प्रयत्न की उत्पत्ति होती है । उस प्रयत्नरूप निमित्तकारण
के साहाय्य से आत्मा और वायु के संयोगरूप असमवायिकारण के द्वारा पुरुष के
कोष्ठगत वायु में क्रिया उत्पन्न होती है । वह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ आते
हुए कण्ठादि स्थानों में आघात उत्पन्न करता है, अर्थात् हृदय, कण्ठ, तालु प्रभृति
वर्णों के जो उच्चारणस्थान हैं, वहाँ आघात करता है । इस अभिघात के बाद
कौष्ठ्य वायु के साथ कण्ठादि स्थानों का जो संयोग होता है, उस संयोग रूप
निमित्तकारण के साहाय्य से कण्ठादि स्थान और आकाश इन दोनों के संयोग-
रूप असमवायिकारण के द्वारा वर्णरूप शब्द की उत्पत्ति होती है ।
अवर्णरूप शब्द (ध्वनि) भी दण्ड में उत्पन्न वेग के साहाय्य से भेरी और आकाश
के संयोग के द्वारा उत्पन्न होता है । (अर्थात् इस ध्वनिरूप शब्द के प्रति) भेरी और
आकाश का संयोग असमवायिकारण है एवं भेरी और दण्ड का संयोग और दण्ड
में रहनेवाला वेग, ये दोनों निमित्तकारण हैं । बाँस और उसके गाँठ इन दोनों के
विभाग एवं बाँस और आकाश के विभाग, इन दोनों से भी शब्द की उत्पत्ति होती है ।
"शब्दात् संयोगविभागनिष्पन्नाद्वीचीसन्तानवच्छब्दसन्तानः' इस सन्दर्भ से शब्द-
जनित शब्द का निरूपण करते हैं । अर्थात् जिस प्रकार जल के एक तरङ्ग से उसके
अतिनिकट के जल प्रदेश में दूसरा तरङ्ग उत्पन्न होता है, उसी प्रकार (संयोग और
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६९५
प्रशस्तपादभाष्यम्
स चोर्ध्वं गच्छन् कण्ठादीनभिहन्ति, ततः स्थानवायुसंयोगापेक्षमाणात् स्थाना-
काशसंयोगाद् वर्णोत्पत्तिः ।
अवर्णलक्षणोऽपि भेरीदण्डसंयोगापेक्षाद् भेर्याकाशसंयोगादुत्पद्यते ।
वेणुपर्वविभागाद् वेण्याकाशविभागाच्च शब्दाच्च संयोगविभागनिष्पन्नाद्
वीचीसन्तानवच्छब्दसन्तान इत्येवं सन्तानेन श्रोत्रप्रदेशमागतस्य
यह सक्रिय वायु ऊपर की तरफ जाते समय कण्ठ में अभिघात को उत्पन्न
करता है । इसके बाद (कण्ठादि) स्थान और वायु का संयोग एवं (कण्ठादि)
स्थान और आकाश के संयोग इन दोनों संयोगों से वर्णात्मक शब्द की
उत्पत्ति होती है ।
भेरी (प्रभृति) और दण्ड (प्रभृति) का संयोग एवं भेरी (प्रभृति) और
आकाश का संयोग, इन दोनों संयोगों से अवर्ण (ध्वनि) रूप शब्द की उत्पत्ति
होती है । बाँस और उसकी सन्धि (गाँठ) के विभाग एवं बाँस और आकाश
का विभाग इन दोनों विभागों से शब्द की उत्पत्ति होती है । संयोग और
विभाग से निष्पन्न जलतरंगों के समूह की तरह शब्द से भी शब्द
के तरंगों के समूहों की उत्पत्ति होती है । इस प्रकार शब्द के
न्यायकन्दली
शब्दान्तरम्, ततोऽप्यनयोर्गमनागमनाभावात् प्राप्तस्यैवोपलब्धिरिति, ततोऽप्यन्यत्,
ततोऽप्यन्यदित्यनेन क्रमेण शब्दसन्तानो भवति । एवं सन्तानेन श्रोत्रदेशे समागतस्यान्य-
शब्दस्य ग्रहणम् ।
नन्वेषा कल्पना कुतः सिद्धयतीत्यत आह- श्रोत्रशब्दयोरिति । न श्रोत्रं शब्ददेशमुप-
गच्छति, नापि शब्दः श्रोत्रदेशम्, तयोर्निष्क्रियत्वात् । अप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, इन्द्रियाणां
प्राप्यकारित्वात् । प्रकारान्तरेण चोपलब्धिर्न घटते । दृष्टा च वीचीसन्ताने स्वोत्पत्तिदेशे
विनश्यतामपि स्वप्रत्यासत्तिमपेक्ष्य तदव्यवहिते देशे सदृशकार्यारम्भपरम्परया देशान्तर-
प्राप्तिः, तेन शब्दसन्तानः कल्प्यते । न चानवस्था, यावद्दूरं निमित्तकारणभूतः कौक्ष्य-
वायुरनुवर्त्तते, तावद्दूरं शब्दसन्तानानुवृत्तिः । अत एव प्रतिवातं शब्दानुपलम्भः, कौक्ष्य-
विभाग से उत्पन्न) शब्द के द्वारा उसके अतिसमीप के आकाश प्रदेश में दूसरे
तत्सदृश शब्द की उत्पत्ति होती है । (यह इसलिए मानना पड़ता है कि) श्रोत्र
और शब्द दोनों ही (यतः द्रव्य नहीं हैं अतः) अन्यत्र नहीं जा सकते एवं जब
तक इन्द्रिय के साथ विषय का सम्बन्ध नहीं होगा, तब तक विषय का ग्रहण
सम्भव नहीं है । अतः दूसरे शब्द से तीसरे शब्द की उत्पत्ति, तीसरे
शब्द से चौथे शब्द की उत्पत्ति, इस प्रकार शब्दसन्तान (समूह) की उत्पत्ति
होती है । इस सन्तान का अन्तिम शब्द श्रोत्र प्रदेश में जब उत्पन्न होता है, तब
उस सन्तान के उसी अन्तिम शब्द का ग्रहण होता है । इस प्रकार के शब्दसन्तान
की कल्पना क्यों आवश्यक होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'श्रोत्रशब्दयोः'
६१६ न्यायकन्दलीसंवल्लितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ग्रहणम् । श्रोत्रशब्दयोर्गमनागमनाभावादप्राप्तस्य ग्रहणं नास्ति, परिशेषात्
सन्तानसिद्धिरिति ।
॥ इति प्रशस्तपादभाष्ये गुणपदार्थः समाप्तः ॥
(उक्त समूहों के द्वारा) श्रोत्रप्रदेश में पहुँचने के बाद श्रोत्र के द्वारा उसका
प्रत्यक्ष होता है । यतः श्रोत्रेन्द्रिय और शब्द इन दोनों में से कोई भी गतिशील
नहीं है और श्रोत्र से असम्बद्ध शब्द का प्रत्यक्ष सम्भव नहीं है, अतः
परिशेषानुमान से (शब्दजनित) शब्दसन्तान (समूह) की सिद्धि होती है ।
॥ प्रशस्तपादभाष्य में गुणों का निरूपण समाप्त हुआ ॥
न्यायकन्दली
वायुप्रतिघातात् । अतीवायं मार्गस्तार्किकैः क्षुण्णस्तेनास्माभिरिह भाष्यतात्पर्यमात्रं
व्याख्यातम्, नापरा युक्तिरुक्ता ।
गुणोपबद्धसिद्धान्तो युक्तिशुक्तिप्रभावितः ।
मुक्ताहार इव स्वच्छो हृदि धिन्यस्यतामयम् ॥
॥ इति भट्टश्रीश्रीधरकृतायां पदार्थप्रवेशन्यायकन्दलीटीकायां गुणपदार्थः
समाप्तः ॥
इत्यादि से किया गया है । अर्थात् न शब्द ही श्रोत्र प्रदेश में जा सकता है और न
श्रोत्र ही शब्द प्रदेश में आ सकता है; क्योंकि दोनों ही क्रिया से सर्वथा रहित हैं ।
यतः इन्द्रियाँ विषय के साथ सम्बद्ध होकर ही विषय को ग्रहण करती हैं (यही
इन्द्रियों का प्राप्यकारित्व है) । अतः शब्दसन्तान की कल्पना के बिना शब्द की
उपलब्धि उपपन्न नहीं हो सकती । जल के तरङ्ग अपनी उत्पत्ति के प्रदेश में विनाश-
प्राप्त होने पर भी उससे अव्यवहित उत्तर प्रदेश में अपने सदृश ही दूसरे तरङ्ग
व्यक्ति को उत्पन्न करते हुए देखे जाते हैं । इसी दृष्टान्त के बल से शब्दसन्तान की
कल्पना करते हैं । इसमें अनवस्था दोष भी नहीं है; क्योंकि शब्द के निमित्तकारण
कोष्ठ सम्बन्धी वायु की अनुवृत्ति जितनी दूर तक रहेगी, उतनी ही दूर तक शब्दसन्तान
की अनुवृत्ति की कल्पना करेंगे । यही कारण है कि प्रतिकूल वायु के रहने पर
शब्द की उपलब्धि नहीं होती है; क्योंकि कोष्ठ सम्बन्धी वायु उससे प्रतिहत हो
जाता है । इस मार्ग को तार्किकों ने अनेक प्रकार से रौंद डाला है, अतः हम
लोगों ने भाष्य का तात्पर्य मात्र ही लिखा, कोई दूसरी युक्ति नहीं दिखलायी ।
मोती के माला की तरह (गुणनिरूपण रूप) यह स्वच्छ हार विद्वान् लोग हृदय
में धारण करें । यह हार युक्तिस्वरूप शुक्तिका में उत्पन्न मोतियों से बना है एवं
सिद्धान्त सिद्धगुण (डोरी) में गुँथा हुआ है ।
॥ भट्ट श्री श्रीधर के द्वारा रची गयी एवं पदार्थों को समझानेवाली न्यायकन्दली
टीका का गुणपदार्थों का विवेचन समाप्त हुआ ॥
अथ कर्मपदार्थनिरूपणम्
प्रशस्तपादभाष्यम्
उत्क्षेपणादीनां पञ्चानामपि कर्मत्वसम्बन्धः ।
एकद्रव्यवत्त्वं क्षणिकत्वं मूर्तद्रव्यवृत्तित्वमगुणवत्त्वं गुरुत्व-
द्रवत्वप्रयत्नसंयोगवत्त्वं स्वकार्यसंयोगविरोधिृत्वं संयोगविभागानिरपेक्ष-
१. कर्मत्व जाति के साथ सम्बन्ध, २. एक समय एक ही द्रव्य में रहना,
३. क्षणिकत्व, ४. मूर्त द्रव्यों में ही रहना, ५. गुणरहितत्व, ६. गुरुत्व,
द्रवत्व, प्रयत्न और संयोग इन चार गुणों से उत्पन्न होना, ७. अपने
द्वारा उत्पन्न संयोग से नष्ट होना, ८. किसी और के साहाय्य के बिना
संयोग और विभाग को उत्पन्न करना, ९. असमवायिकारणत्व,
१०. अपने आश्रयरूप द्रव्य एवं उससे भिन्न द्रव्य इन दोनों में
न्यायकन्दली
जगदङ्कुरबीजाय संसारार्णवसेतवे ।
नमो ज्ञानामृतस्यन्दिचन्द्रायार्धेन्दुमौलये ॥
उत्क्षेपणादीनां च परस्परं साधर्म्यमितरपदार्थवैधर्म्यं च प्रतिपादयन्नाह-
उत्क्षेपणादीनामिति । कर्मत्वं नाम सामान्यम्, तेन सह सम्बन्ध उत्क्षेपणा-
दीनामेव । एकद्रव्यवत्त्वम् एकदा एकस्मिन् द्रव्ये एकमेव कर्म वर्तते, एकं कर्म
एकत्रैव द्रव्ये वर्त्तत इत्येकद्रव्यवत्त्वम् । यद्येकस्मिन् द्रव्ये युगपद् विरुद्धोभयकर्म-
समवायः स्यात्, तदा तयोः परस्परप्रतिबन्धाद् दिग्विशेषसंयोगविभागानुपपत्तौ
संयोगविभागयोरनपेक्षं कारणं कर्मेति लक्षणहानिः स्यात् । अथाविरुद्धकर्मद्वयसमा-
उन अर्द्धचन्द्रशेखर शिव जी को मैं नमस्कार करता हूँ, जो जगत् रूप अङ्कुर
के बीज, संसार समुद्र से पार उतरने के सेतु एवं ऐसे चन्द्रमा के स्वरूप हैं जिनसे
ज्ञानरूप अमृत अनवरत स्रवित होता रहता है ।
उत्क्षेपणादि कर्मों के परस्पर साधर्म्य और द्रव्यादि पदार्थों के वैधर्म्य का
प्रतिपादन करते हुए 'उत्क्षेपणादीनाम्' यह वाक्य लिखा गया है । अर्थात् कर्मत्व
नाम की जो जाति है, उसके साथ उत्क्षेपणादि सभी कर्मों का सम्बन्ध है ।
'एकद्रव्यवत्त्व' शब्द से यह अभिप्रेत है कि एक समय तक द्रव्य में एक ही क्रिया
रहती है एवं एक क्रिया एक ही द्रव्य में रहती है (इसलिए एकद्रव्यवत्त्व
सभी कर्मों का साधर्म्य है) एक ही समय यदि विरुद्ध दो कर्मों की सत्ता
एक द्रव्य में मानें, तो 'संयोग और विभाग का इतर निरपेक्ष कारण ही कर्म है'
कर्म का यह लक्षण न हो सकेगा; क्योंकि (दो क्रियाओं के परस्पर
प्रतिरोध के कारण) किसी विशेष दिशा के साथ उस क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग
नहीं हो सकता । यदि (विरुद्ध दो क्रियायें न मानकर) अविरुद्ध दो क्रियाओं
की सत्ता एक ही समय एक द्रव्य में मानें, तो उनमें से एक ही क्रिया से
अभिमत देश के साथ क्रियाश्रय द्रव्य का संयोग या विभाग उत्पन्न हो ही जाएगा,