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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 657 of 759

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Page 657

६९२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे शब्द-
प्रशस्तपादभाष्यम्
शब्दोऽम्बरगुणः श्रोत्रग्राह्यः, क्षणिकः, कार्यकारणोभय-
विरोधी, संयोगविभागशब्दजः, प्रदेशवृत्तिः, समानासमानजातीय-
आकाश का गुण ही शब्द है । उसका प्रत्यक्ष श्रोत्र से होता है । वह
क्षणिक है एवं उसके कार्य और उसके कारण दोनों ही उसके विनाशक हैं ।
न्यायकन्दली
सुखं तदभावान्न तदनुभयो मोक्षावस्था; किन्तु समस्तात्मविशेषगुणोच्छेदोपलक्षिता
स्वरूपस्थितिरवे । यथा चायं पुरुषार्थस्तथोपादितम् ।
शब्दोऽम्बरगुणः आकाशगुणः । ननु संख्यादयोऽप्याकाशगुणाः सन्ति, कथमिदं
शब्दस्य लक्षणं स्यादत आह-श्रोत्रग्राह्य इति । श्रोत्रग्राह्यत्वे सत्यम्बरगुणो यः स शब्द
इत्यर्थः । परस्य विप्रतिपत्तिनिराकरणार्थमाह-क्षणिक इति । आशुतरविनाशी शब्दो न
तु नित्यः, उच्चारणादूर्ध्वमनुपलम्भात् । सद्भावे प्रमाणाभावेन व्यञ्जकत्यकल्पनानव-
काशात् । प्रत्यभिज्ञानस्य ज्वालादिवत् सामान्यविषयत्वेनोपपत्तेस्तीव्रमन्दतादिभेदस्य च
व्यक्तिभेदप्रसाधकत्वात् । कार्यकारणोभयविरोधी आद्यः शब्दः स्वकार्येण विरुध्यते ।
अन्त्यः स्वकारणेनोपान्त्यशब्देन विरुध्यते, अन्त्यस्य विनाशकारणास्याभावात् । मध्य-
गुणों के आत्यन्तिक विनाश से युक्त आत्मा की स्वरूपस्थिति ही 'मोक्ष' है । यह
अवस्था पुरुष के लिए काम्य क्यों है? इसका उपपादन (मङ्गलश्लोक की व्याख्या
में) कर चुके हैं।
'शब्दोऽम्बरगुणः' अर्थात् आकाश का गुण ही शब्द है । संख्यादि भी तो
आकाश के गुण हैं, फिर आकाश का गुण होना शब्द का लक्षण कैसे हो सकता
हैं? इसी आक्षेप के समाधान के लिए 'श्रोत्रग्राह्य' पद का उपादान किया गया है ।
अर्थात् जो श्रोत्र के द्वारा ग्रहण के योग्य हो और आकाश का गुण भी हो, वही
'शब्द' है । शब्द में नित्यत्व पक्ष के निराकरण के लिए ही 'क्षणिकः' यह पद
प्रयुक्त हुआ है । अर्थात् उत्पत्ति के बाद शब्द अतिशीघ्र विनष्ट हो जाता है,
अतः वह नित्य नहीं है; क्योंकि उच्चारण के बाद फिर उसकी उपलब्धि नहीं
होती है । (प्र.) उच्चारण के बाद शब्द की अभिव्यक्ति का कोई साधन नहीं
रहता, अतः शब्द की उपलब्धि नहीं होती; किन्तु उस समय भी शब्द है ही ।
(उ.) उच्चारण के बाद शब्द की सत्ता में कोई प्रमाण नहीं है, अतः शब्द के
व्यञ्जक की कल्पना करने का कोई अवकाश नहीं है । 'सोऽयं गकारः' इत्यादि
प्रत्यभिज्ञा को सादृश्यमूलक मान लेने से भी काम चल सकता है । एवं शब्दों में
एक-दूसरे में तीव्र और मन्द का व्यवहार होता है (वह भी नित्यत्व पक्ष में
उपपन्न नहीं होता) । इससे अनेक शब्दों की कल्पना आवश्यक होती है । 'कार्यकारणो-
भयविरोधी' अर्थात् प्रथम शब्द अपने द्वारा उत्पन्न द्वितीय शब्द से विनष्ट होता है,