वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
About this granth
The Prashastapada Bhashya (प्रशस्तपादभाष्यम्), also titled Padarthadharmasangraha, is the most influential early work of the Vaisheshika school. Rather than glossing Kanada's sutras one by one, it sets out the system as a whole, examining the shared and distinct properties of the six categories: substance, quality, action, universal, particularity and inherence. Later Vaisheshika and Nyaya-Vaisheshika writing builds on it.
This edition is the first volume of the Ganganatha Jha Granthamala of Sampurnanand Sanskrit University, Varanasi. It prints the Bhashya with Shridhara Bhatta's classic Nyayakandali commentary and an introduction by Vice-Chancellor Dr. Mandan Mishra; Pt. Durgadhar Jha Sharma edited it and added a Hindi commentary. The scanned copy is the second edition of 1997.
The Hindi notes take up questions such as variant sutra numbering, the status of absence as a category, the qualities of earth, atomic combination, and fallacies of reason. It is a standard aid for advanced students of Indian philosophy.
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६१
न्यायकन्दली
इति व्याख्येयम् । न तु कर्तुरेव यः प्रियादिहेतुः स धर्म इति व्याख्या, पुत्रेण कृतस्य
श्राद्धस्य पितृगामित्तिफलश्रवणात् । वृष्टिकामेन कारीर्यां कृतायां तदन्यस्यापि समीप-
देशवर्तिनो वृष्टिफलसम्बन्धदर्शनात् ।
स्वर्गकामो यजेतेत्यादिवाक्ये यागेन स्वर्गं कुर्यादिति कर्मणः श्रेयःसाधनत्वं श्रूयते ।
यश्च निःश्रेयसेन पुरुषं संयुनक्ति स धर्मः, तस्माद् यागादिकमेव धर्मः, न पुरुषगुणः ।
तथा हि, यो यागमनुतिष्ठति तं धार्मिकमित्याचक्षते । एतदयुक्तम् । क्षणिकस्य कर्मणः काला-
न्तरभाविफलसाधनत्वासम्भवात् । अथोच्यते । क्षणिकं कर्म, कालान्तरभावि च स्वर्ग-
फलम्, विनष्टाच्च कारणात् कार्यस्यानुत्पत्तिः, श्रुतं च यागादेः कारणत्वम्, तदेतदन्य-
थानुपपत्त्या फलोत्पत्त्यनुगुणं किमपि कालान्तरावस्थायि कर्मसामर्थ्यं कल्प्यते, यद्द्वारेण
कर्मणां श्रुता फलसाधनता निर्वहति । तच्च प्रमाणान्तरागोचरत्वादपूर्वमिति व्यपदिश्यते ।
प्रियहितमोक्षहेतुः' इस वाक्य की व्याख्या इस रीति से करनी चाहिए कि (धर्मजनक
क्रियाओं के) कर्त्ता के 'प्रियादि' का जो हेतु वही 'धर्म' है । इस प्रकार की
व्याख्या नहीं करनी चाहिए; क्योंकि पुत्र के द्वारा अनुष्ठित श्राद्धरूप क्रिया से पिता
में ही प्रीतिरूप फल का होना शास्त्रों में उपलब्ध होता है । एवं वृष्टि की कामना
से 'कारीरी' नाम के याग के अनुष्ठान से जो वृष्टिरूप फल उत्पन्न होता है, उससे
याग करनेवाले और उनके समीप के और लोग भी प्रीति का लाभ करते हैं ।
(प्र.) 'स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि वाक्यों से 'याग के द्वारा स्वर्ग का सम्पादन
करना चाहिए' इस प्रकार यागादि श्रेय कर्म ही स्वर्गादि इष्टों के साधक के रूप में
सुने जाते हैं । 'धर्म' उसी का नाम है जो पुरुष को श्रेयस् के साथ सम्बद्ध करे ।
तस्मात् यागादि कर्म ही धर्म हैं, धर्म जीव का गुण नहीं है । एवं जो यागादि कर्मों
का अनुष्ठान करता है उसे ही लोग 'धार्मिक' कहते भी हैं ।
(उ.) किन्तु यह कहना ठीक नहीं है; क्योंकि कर्म क्षण भर ही रहते हैं, उनसे
बहुत काल बाद होनेवाले स्वर्गादि का सम्पादन सम्भव नहीं है । यदि यह कहें कि
(प्र.) यागादि क्रियायें क्षणिक हैं । उनके स्वर्गादि फल उनसे बहुत समय बाद होते
हैं । यह भी निर्णीत है कि विनाश को प्राप्त हुए कारणों से कार्य की उत्पत्ति नहीं
होती है । फिर भी यागादि क्रियाओं में स्वर्गादि फलों की हेतुता वेदों से श्रुत है; किन्तु
यह हेतुता तब तक उपपन्न नहीं हो सकती, जब तक कि यागादि के बाद और
स्वर्गादि की उत्पत्ति से पहले तक रहनेवाले किसी व्यापार की कल्पना न कर लें,
जिससे यागादि में वेदों के द्वारा श्रुत स्वर्गादिजनकता का निर्वाह हो सके । वही
व्यापार और किसी प्रमाण के द्वारा गम्य न होने के कारण 'अपूर्व' कहलाता है ।
६६२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
फलाय विहितं कर्म क्षणिकं चिरभाविने ।
तत्सिद्धिर्नान्यथेत्येतदपूर्वमपि कल्प्यते ॥
अत्रोच्यते । न कर्मसामर्थ्यं क्षणिके कर्मणि समवेति, शक्तिमति विनष्टे निराश्रयस्य
सामर्थ्यस्यावस्थानासम्भवात् । स्वर्गादिकं च फलं तदानीमनागतमेव, न शक्तेराश्रयो
भवितुमर्हति । यदि त्यनुष्ठानानन्तरमेव स्वर्गो भवति ? अपूर्वकल्पनावैय्यर्थ्यम्, तदुप-
भोगश्च दुर्निवारः । विशिष्टशरीरेन्द्रियादिविरहादननुभवश्चेत् ? तर्ह्ययं तदानीमनुपजात
एव स्वर्गस्योपभोग्यैकस्वभावत्वात् । अनुपभोग्यमपि सुखस्वरूपमस्तीति अदृष्टकल्पनैव ।
तस्मान्न फलाश्रयमपूर्वम् । न चाकाशादिसमवेतादपूर्वादात्मगामिफलसम्भवः । वस्तुभूतं च
कार्यमनाधारं नोपपद्यते, तस्मादात्मसमवेतस्यैव तस्योत्पत्तिरभ्युपेया । तथा सति न
तत्कर्मसामर्थ्यं स्यात्, अन्यसामर्थ्यस्यान्यत्रासमवायात् । अथान्यत्राप्यन्यसमवेता शक्ति-
रिष्यते, तस्याः कार्यानुमेयत्वादिति चेत् ?
जैसा कहा गया है कि 'बहुत दिनों बाद होनेवाले स्वर्गादि फलों के लिए जो क्षण
मात्र रहनेवाले यागादि का विधान किया गया है, वह विधान तब तक उपपन्न नहीं
हो सकता, जब तक कि 'अपूर्व' की कल्पना न कर ली जाय। अतः 'अपूर्व' की
कल्पना करते हैं ।
(उ.) इस प्रसङ्ग में हम लोगों का कहना है कि यह कर्म का सामर्थ्यरूप अपूर्व
(जिसे स्वर्गसाधन पर्यन्त रहना है) यागादि क्रियाओं में तो रह नहीं सकता;
क्योंकि वे क्षणिक हैं । अतः उनके नाश हो जाने पर बिना आश्रय के अपूर्व
(स्वर्गोत्पादन पर्यन्त) की अवस्थिति ही सम्भव नहीं है । स्वर्गादि फल भी अपूर्व के
आश्रय नहीं हो सकते; क्योंकि अपूर्व की उत्पत्ति के समय स्वर्गादि भविष्य के गर्भ
में ही रहते हैं । यदि यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त बाद ही स्वर्गादि की उत्पत्ति
(आश्रय को उपपन्न करने के लिए) मानें, तो उनका उपयोग भी (उसी समय)
मानना पड़ेगा । यदि ऐसा कहें कि उस समय (यागादि के अनुष्ठान के तुरन्त
बाद) स्वर्गादि भोगों के उपयुक्त शरीर या इन्द्रियाँ नहीं हैं, इसी से स्वर्ग की
उत्पत्ति नहीं होती है, तो फिर यही मानना पड़ेगा कि स्वर्गादि उस समय उत्पन्न ही
नहीं होते, क्योंकि स्वर्गादि उपभोगस्वभाव के ही हैं । यह कल्पना अभूतपूर्व
होगी कि स्वर्ग की सत्ता तो उस समय भी है, किन्तु वह स्वर्ग उपभोग्य नहीं है ।
यह भी सम्भव नहीं है कि (पुरुष से भिन्न) आकाशादि कोई भी वस्तु उसके
आश्रय हों; क्योंकि आकाशादि में रहनेवाले अपूर्व से आत्मा में स्वर्ग की उत्पत्ति
नहीं हो सकती । यह भी सम्भव नहीं है कि अपूर्व रूप कार्य की उत्पत्ति बिना
आश्रय के ही हो; क्योंकि वह भावरूप कार्य है । अतः अपूर्व को यदि मानना है,
तो उसकी उत्पत्ति आत्मा में ही माननी पड़ेगी । यदि ऐसा कहें कि (प्र.) हम यह
भी मान लेंगे कि एक वस्तु की ऐसी भी शक्ति हो सकती है, जो समवाय
सम्बन्ध से दूसरी वस्तु में रहे; क्योंकि शक्ति की सत्ता तो उससे उत्पन्न कार्यरूप
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६६३
न्यायकन्दली
यथोक्तम्-
शक्तिः कार्यानुमेया हि यद्गतैयोपलभ्यते ।
तद्गतैवाभ्युपेतव्या स्वाश्रयान्याश्रयापि च ॥ इति ।
तदयुक्तम् । विनष्टे शक्तिमति तन्निरपेक्षस्य शक्तिमात्रस्य कार्यजनकत्वानुपलम्भादेव ।
तेनैतदपि प्रत्युक्तम् । यदुक्तं मण्डनेन विधिविवेके-"तदाहितत्वात् तस्य शक्तिरिति"
यागेनाहितत्वादपूर्व्वं यागस्य कार्यं स्यान्न तु शक्तिः, अपूर्वोपकृतात् कर्मणः फलानु-
त्पत्तेः, तस्माच्चिरनिवृत्ते कर्मणि देशकालावरस्थादिसहकारिणोऽपूर्वादेव फलोत्पत्तेर-
पूर्वमेव श्रेयःसाधनम् । कारणत्वश्रुतिस्तु यागादरपूर्वजननद्वारेण न साक्षादिति
प्रमाणानुरोधादाश्रयणीयम् । तथा सति युक्तं धर्मः पुरुषगुण इति । योऽपि
यागादौ धर्मव्यपदेशः, सोऽप्यपूर्वसाधनतया प्रीतिसाधन इव स्वर्गशब्दप्रयोगः। स्वर्ग-
साधने हि चोदितस्य ज्योतिष्टोमस्य निरन्तरं प्रीतिसाधनतयार्थवादेन स्तुतेश्चन्द-
नादौ च प्रीतियोगे सति प्रयोगात्, तदभावे चाप्रयोगात्, प्रीतिनिबन्धनः स्वर्गशब्दः,
लिङ्ग के द्वारा ही अनुमित हो सकती है। जैसा कहा गया है कि "कार्यरूप हेतु से
अनुमित होनेवाली शक्ति जहाँ जिस आश्रय में उपलब्ध होगी, उसी में उसकी सत्ता
माननी पड़ेगी" अतः उस कारण की शक्ति उसी कारण में ही रहेगी, कभी उससे
भिन्न आश्रय में नहीं रह सकती । (उ.) किन्तु यह भी अयुक्त ही है; क्योंकि शक्ति
के आश्रय का विनाश हो जाने पर उस आश्रय से सर्वथा निरपेक्ष केवल शक्ति से
कार्य की उत्पत्ति की उपलब्धि नहीं होती है । आगे कहे हुए इस समाधान से
आचार्य मण्डन मिश्र की विधिविवेक ग्रन्थ की यह उक्ति भी खण्डित हो जाती है
कि "उससे (याग से) जिस लिए कि 'उसका' अपूर्व का आधान होता है; अतः
'अपूर्व' याग की शक्ति कहलाता है ।" क्योंकि याग से 'आहित' अर्थात् उत्पन्न
होने के कारण अपूर्व याग से उत्पन्न हुआ कार्य है । अपूर्व याग की शक्ति नहीं है,
क्योंकि ऐसी बात नहीं है कि याग से ही स्वर्ग की उत्पत्ति होती है और इस
उत्पादन कार्य में अपूर्व याग का साहाय्य करता है (क्योंकि स्वर्ग की उत्पत्ति के
अव्यवहित पूर्वक्षण में याग की सत्ता ही नहीं है, फिर अपूर्व किसका साहाय्य
करेगा ? ) । तस्मात् यही कहना पड़ेगा कि यागादि कर्मों के नाश हो जाने के बहुत
पीछे उनसे उत्पन्न अपूर्व से ही स्वर्गादि फलों की उत्पत्ति होती है, जिसमें उसे
उपयुक्त देश-कालादि का भी सहयोग प्राप्त होता है । अतः प्रमाण के द्वारा इसी
पक्ष का अवलम्बन करना पड़ेगा कि अपूर्व ही स्वर्गादि श्रेयों का साक्षात् कारण है ।
यागादि क्रियाओं में जो स्वर्गादि फलों के हेतुत्व की चर्चा श्रुतियों में है,वह हेतुता
'अपूर्व' का उत्पादक होने से परम्परया यागादि भी स्वर्गादि के साधन हैं, इसी
अभिप्राय से समझना चाहिए । तस्मात् भाष्य की यह उक्ति ठीक है कि 'धर्म पुरुष का
ही गुण है' । यागादि क्रियाओं में जो 'धर्म' शब्द का व्यवहार होता है, उसे अपूर्व या
धर्म के साधनरूप अर्थ में लाक्षणिक समझना चाहिए । जैसे कि प्रीति के चन्दन-
६६४ न्यायकन्दलीसंवेलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
यस्य यथालक्षणया प्रीतिसाधने प्रयोगः प्रीतिमात्राभिधानेऽपि, तस्मात् प्रीतिसाधन-
प्रतीत्युत्तेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनावैयर्थ्यात् । एवं धर्मशब्दस्यापि लक्षण्या
तत्साधने प्रयोगः, एकाभिधानादेवोभयप्रतीतिसिद्धेरुभयाभिधानशक्तिकल्पनानवकाशादिति
तार्किकाणां प्रक्रिया ।
अतीन्द्रियः केनचिदिन्द्रियेणायोगिभिर्न गृह्यत इत्यतीन्द्रियो धर्मः। अन्त्यसुख-
संविज्ञानविरोधी । धर्मस्तावत् कार्यत्वादवश्यं विनाशी, न च निर्हेतुको
विनाशः कस्यचिद् विद्यते । अन्यतस्ततो विनाशे चास्य नियमेन फलोत्पत्तिकालं
यावदवस्थानं न स्यात् । फलं च धर्मस्य कस्यचिदनेकसंवत्सरसहस्रोपभोग्यम्, तस्य
यदि प्रथमोपभोगादपि नाशः, कालान्तरे फलानुत्पादः । न चैकस्य निर्भागस्य
भागशो नाशः सम्भाव्यते, तस्मादन्त्यस्यैव । सम्यग्विज्ञानेन धर्मो विनाश्यते । ये तु
वनितादि साधनों में 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग किया जाता है । स्वर्ग के साधनीभूत
अपूर्व के लिए विहित ज्योतिष्टोमादि क्रियाओं का जो धर्मशब्द से नियमित
व्यवहार होता है, वह उसका स्तुति रूप अर्थवाद है । एवं चन्दनादि साधनों में
जब प्रीति का सम्बन्ध रहता है, तभी 'स्वर्ग' शब्द का प्रयोग होता है, जब जिसे
उन साधनों से सुख नहीं मिलता है, तब उससे चन्दनादि में स्वर्गशब्द का प्रयोग
नहीं होता । अतः यही समझना चाहिए कि प्रीति के साधनों में स्वर्गशब्द
लाक्षणिक है और प्रीति में ही उसकी अभिधा शक्ति है; क्योंकि प्रीति और उसके
साधन इन दोनों में स्वर्गशब्द की अभिधा की कल्पना व्यर्थ है । इसी प्रकार धर्म
के ज्योतिष्टोमादि साधनों में धर्मशब्द का प्रयोग लक्षणा के द्वारा ही होता है;
क्योंकि धर्म को अपूर्वरूप एक ही अर्थ में अभिधा मान लेने से ही अपूर्वरूप
उसके मुख्यार्थ और ज्योतिष्टोमादि रूप लक्ष्यार्थ दोनों के बोध की उत्पत्ति हो
जाएगी । अपूर्व में और अपूर्व के कारण ज्योतिष्टोमादि, दोनों में धर्म शब्द की
अभिधा शक्ति की कल्पना व्यर्थ है । यही तार्किक लोगों की रीति है ।
'अतीन्द्रियः' अर्थात् योगियों से भिन्न कोई भी साधारण पुरुष धर्म को किसी भी
इन्द्रिय से नहीं देख सकता, अतः 'धर्म अतीन्द्रिय' है । 'अन्त्यसुखसंविज्ञानविरोधी'
धर्म यतः उत्पत्तिशील वस्तु है, अतः वह विनाशशील भी है; किन्तु कोई भी विनाश
बिना किसी कारण के नहीं होता । यदि अन्त्यसुख और संविज्ञान इन दोनों से भिन्न
किसी से धर्म का विनाश मानें तो नियमपूर्वक स्वर्गादि. फलों की उत्पत्ति से पहले तक
उसकी सत्ता नहीं रह सकेगी । (यदि किसी भी उपभोग से धर्म का विनाश मानें
तो) किसी-किसी धर्म के फल का उपभोग हजारों साल चलता है, अतः उनमें
पहले उपभोग से ही उसका विनाश हो जाएगा, आगे उससे उपभोग ही रुक
जाएगा । यह भी सम्भव नहीं है कि एक अखण्ड वस्तु में उसके किसी एक भाग
का विनाश हो (और अवशिष्ट भाग बचा रहे), तस्मात् अन्तिम सुख ही धर्म का नाशक
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६५
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६५
न्यायकन्दली
नित्यं धर्ममाहुस्तेषां प्रायेणानुपपत्तिः, धर्माधर्मक्षयाभावात् । पुरुषान्तःकरणेति ।
आत्मविशेषगुणत्वात् सुखादिवत् । विशुद्धेति । विशुद्धोऽभिसन्धिः दम्भादिरहितः
सङ्कल्पविशेषः, तस्माद्धर्मो जायते । वर्णाश्रमिणामिति । वर्णा ब्राह्मणक्षत्रियविट्शूद्राः ।
आश्रमिणो ब्रह्मचारिगृहस्थवानप्रस्थयतयः । तेषां धर्मः प्रतिवर्णं प्रत्याश्रमं चाधिकृत्य
विहितैः साधनैर्जन्यत इत्यर्थः । अतीन्द्रियस्य धर्मस्य साधनानि कुतः प्रत्येतव्यानि, तत्राह-
तस्य त्विति । विशिष्टेनानुष्ठानेनाचार्यमुखाच्छ्रूयत एव न लिखित्या गृह्यत इति श्रुतिर्वेदः,
स्मृतिर्मन्वादिवाक्यम्, ताभ्यां विहितानि प्रतिपादितानि वर्णाश्रमिणां सामान्यविशेषभावेनाव-
स्थितानि द्रव्यगुणकर्माणि सामान्यानि धर्मसाधनानि । तत्र सर्वेषां वर्णाश्रमिणां च सामान्य-
रूपतया धर्मसाधनानि कथ्यन्ते । धर्मे श्रद्धा धर्मे मनःप्रसादः । अहिंसा भूतानामन-
भिद्रोहसंकल्पः । प्रतिषिद्धस्याभिद्रोहस्य निवृत्तेरधर्मो न भवति, न धर्मो जायते । अनभि-
है (अवान्तर सुख नहीं) । संविज्ञान अर्थात् सम्यग् विज्ञान (तत्त्वज्ञान) से भी धर्म
का नाश होता है । जो कोई धर्म को नित्य मानते हैं, उनके मत में मोक्ष की उत्पत्ति
नहीं हो सकेगी; क्योंकि उसके लिए धर्म और अधर्म दोनों ही का विनाश आवश्यक
है, जो धर्म को नित्य मानने से सम्भव नहीं है । 'पुरुषान्तःकरणेति' (धर्म पुरुष और
अन्तःकरण के संयोग से उत्पन्न होता है क्योंकि) वह भी सुखादि की तरह आत्मा
का विशेष गुण है । 'विशुद्धेति' विशुद्ध जो अभिसन्धि अर्थात् दम्भादि से रहित
जो विशेष प्रकार का संकल्प, उससे धर्म की उत्पत्ति होती है । 'वर्णाश्रमिणामिति'
'वर्ण' शब्द से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र अभिप्रेत हैं । 'आश्रमी' - ब्रह्मचारी,
गृहस्थ, वानप्रस्थी और संन्यासी चार हैं । अर्थात् इन सबों के तथ्यतः प्रत्येक वर्ण
के मनुष्यों के लिए एवं प्रत्येक आश्रम के मनुष्यों के लिए शास्त्रों में विहित जो
साधन हैं, उनसे धर्म की उत्पत्ति होती है । धर्म तो अतीन्द्रिय है, फिर उसके
कारणों का ज्ञान कैसे होगा ? इसी प्रश्न का उत्तर 'तस्य तु' इत्यादि से दिया गया
है । विहित विशेष प्रकार के अनुष्ठान से आचार्य के मुख से जिसे सुना ही जाता
है, अर्थात् जिसका लिप्यादि से ज्ञान नहीं होता, वही है 'श्रुति' अर्थात् वेद ।
'स्मृति' शब्द से मन्वादि ऋषियों के वाक्य अभिप्रेत हैं । श्रुति और स्मृति इन दोनों
से 'विहित' अर्थात् प्रतिपादित जो सभी वर्णों और सभी आश्रम वाले पुरुषों के लिए
सामान्यभाव और विशेषभाव से स्थित द्रव्य, गुण और क्रिया, वे सभी धर्म के
सामान्य साधन हैं । इनमें सभी वर्णों और सभी आश्रमियों के लिए समान रूप से
जो धर्म के साधन हैं, उनका निरूपण 'धर्मे श्रद्धा' इत्यादि से करते हैं । धर्म के
प्रसङ्ग में चित्त की प्रसन्नता ही धर्म में श्रद्धा है । सभी प्राणियों के प्रति द्रोह न
करने का संकल्प अहिंसा है । जो द्रोह निषिद्ध है, उस द्रोह के न करने से इतना
ही होता है कि 'अधर्म' नहीं होता; किन्तु उससे धर्म की उत्पत्ति नहीं होती ।
६६६ न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्र सामान्यानि—धर्मे श्रद्धा, अहिंसा, भूतहितत्वम्, सत्यवचनम्,
अस्तेयम्, ब्रह्मचर्यम्, अनुपधा, क्रोधवर्जनमभिषेचनम्, शुचिद्रव्यसेवनम्,
विशिष्टदेवताभक्तिरुपवासोऽप्रमादश्च ।
उन (सामान्य धर्मों के और विशेष धर्मों के साधनों) में धर्म में
श्रद्धा, अहिंसा, प्राणियों का उपकार, सत्यवचन, अस्तेय (दूसरे की वस्तु
को विना उसकी आज्ञा के न लेना), ब्रह्मचर्य, दूसरे को ठगने की
अनिच्छा (अनुपधा), अक्रोध, स्नान, पवित्र वस्तुओं का सेवन, इष्ट
देवता में भक्ति, उपवास और अप्रमाद ये (१३) सभी वर्णों और सभी
आश्रमियों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं ।
न्याय्कन्दली
द्रोहसङ्कल्पस्य विहितत्वात् स्यादेव धर्मसाधनम् । भूतहितत्वं भूतानामनुग्रहः । सत्य-
वचनं यथार्थवचनम् । अस्तेयमशास्त्रपूर्वकं परस्वग्रहणं मया न कर्तव्यमिति सङ्कल्पः, न
तु परस्यादाननिवृत्तिमात्रमभावरूपम् । ब्रह्मचर्यम् स्त्रीसेवापरिवर्जनम् । एतदपि संकल्प-
रूपम् । अनुपधा भावशुद्धिः, विशुद्धेनाभिप्रायेण कृतानां कर्मणां धर्मसाधनत्वात् । क्रोध-
वर्जनं क्रोधपरित्यागः, सोऽपि सङ्कल्पात्मक एव । अभिषेचनं स्नानम् । शुचिद्रव्यसेवनं
शुचीनां तिलादिद्रव्याणां क्वचित् पर्वणि नियमेन सेवनं धर्मसाधनम् । विशिष्टदेवताभक्तिः
त्रयीसम्मतायां देवतायां भक्तिरित्यर्थः । उपवास एकादश्यादिभोजननिवृत्तिसङ्कल्पः ।
अप्रमादो नित्यनैमित्तिकानां कर्मणामवश्यम्भावेन करणम् । एतानि सर्वेषामेव समानानि
द्रोह न करने का कथित जो संकल्प है, उससे अवश्य ही धर्म उत्पन्न होगा; क्योंकि
उसका विधान किया गया है । 'भूतहितत्व' शब्द से प्राणियों के प्रति अनुग्रह
अभीष्ट है । 'सत्यवचन' शब्द का अर्थ है सच बोलना । 'दूसरे व्यक्ति के जिस
धन का लेना शास्त्र में विहित नहीं है, वह धन मुझे नहीं लेना चाहिए' इस प्रकार
का संकल्प ही 'अस्तेय' है । अस्तेय शब्द से 'दूसरे के धन का न लेना' केवल
यह अभावरूप अर्थ नहीं है । 'ब्रह्मचर्य्य' शब्द का अर्थ है, 'स्त्री से उपभोगसम्बन्ध
का परित्याग' यह भी संकल्प रूप ही है । 'अनुपधा' शब्द से 'अभिप्रायशुद्धि'
अभीष्ट है, यतः विशुद्ध बुद्धि के द्वारा अनुष्ठित कर्म ही धर्म के कारण है ।
'क्रोधवर्जन' है क्रोध का परित्याग, यह भी संकल्परूप ही है । 'अभिषेचन' है
स्नान । 'शुचिद्रव्य का सेवन' अर्थात् किसी विशेष पर्व में तिल प्रभृति पवित्र द्रव्यों
का सेवन धर्म का कारण है । 'विशिष्टदेवता में भक्ति' अर्थात् तीनों वेदों के द्वारा
प्रतिपादित किसी देवता में भक्ति । 'उपवास' शब्द से एकादशी प्रभृति
विशेष तिथियों में भोजन न करने का संकल्प अभिप्रेत है । 'अप्रमाद' शब्द
का अर्थ है, 'नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों का अवश्य अनुष्ठान करना' । ये सभी
वर्णों और सभी आश्रमों के व्यक्तियों के लिए धर्म के साधन हैं । 'इज्या' शब्द
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६७
प्रशस्तपादभाष्यम्
ब्राह्मणक्षत्रियवैश्यानामिज्याध्ययनदानानि ।
ब्राह्मणस्य विशिष्टानि प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि, स्ववर्णविहिताश्च संस्काराः ।
यज्ञ, वेदों का अध्ययन और दान ये तीन ब्राह्मण, क्षत्रिय और
वैश्य (द्विजों) इन तीनों वर्णों के लिए समान रूप से धर्म के साधन हैं ।
प्रतिग्रह, अध्यापन (वेदों का पढ़ना), यज्ञ कराना (याजन) अपने
वर्ण (ब्राह्मण) के लिए विहित संस्कार, ये सभी ब्राह्मणों के लिए विशेष
धर्म के साधन हैं ।
न्यायकन्दली
धर्मसाधनानि । इज्या यागहोमानुष्ठानम् । अध्ययनं वेदपाठः । दानं स्वद्रव्यस्य
परस्वत्वापत्तिसङ्कल्पविशेषः । शूद्रस्यापि दानमस्त्येव, तेन यज्ञादिषु यद्दानं तदभिप्रायेणेदं
त्रैवर्णिकानां विशिष्टं धर्मसाधनमुक्तम् ।
ब्राह्मणस्य विशिष्टान्यसाधारणानि धर्मसाधनानि प्रतिपादयति-प्रतिग्रहाध्यापन-
याजनानि । प्रतिग्रहो विशिष्टाद् द्रव्यग्रहणम् । अध्यापनं तु प्रसिद्धमेव । याजनमर्त्वि-
ज्यम् । एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभिरेवोपायैरर्जितानां द्रव्याणां धर्माधि-
कारात् । स्ववर्णविहिताश्चाष्टचत्वारिंशत् संस्कारा वैदिककर्मानुष्ठानयोग्यतापादनद्वारेण
ब्राह्मणस्य धर्मसाधनम् ।।
से याग एवं होम का अनुष्ठान समझना चाहिए । 'अध्ययन' शब्द का अर्थ है वेदों
का पाठ । 'दान' शब्द से वह विशेष प्रकार का संकल्प अभीष्ट है, जिससे अपने
स्वत्ववाले धन में दूसरे के स्वत्व की उत्पत्ति हो सके । यज्ञादि में जो दान किये
जाते हैं, यहाँ उन्हीं दानों को समझना चाहिए, यदि ऐसी बात न हो; किन्तु दान
शब्द से सामान्यतः सभी दान अभीष्ट हों (तो फिर) त्रैवर्णिकों के लिए निर्दिष्ट
विशेष धर्मों में इसकी गणना असङ्गत हो जाएगी; क्योंकि केवल दान तो शूद्रों के
लिए भी धर्म का साधन है ही ।
ब्राह्मणों के 'विशिष्ट' अर्थात् असाधारण धर्म के जो साधन हैं (अर्थात् जो
साधन केवल ब्राह्मणों में ही धर्म का उत्पादन कर सकते हैं) उनका प्रतिपादन
'प्रतिग्रहाध्यापनयाजनानि' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विहित एवं विशेष
व्यक्ति से दान का ग्रहण ही 'प्रतिग्रह' शब्द से लेना चाहिए । 'अध्यापन' शब्द का
अर्थ प्रसिद्ध ही है । 'याजन' शब्द का अर्थ है- ऋत्विक् का कार्य करना ।
'एतानि ब्राह्मणस्य धर्मसाधनानि' ब्राह्मणों को इन्हीं उपायों से प्राप्त धन के द्वारा
धर्म सम्पादन का अधिकार है । 'स्ववर्णविहिताश्च संस्काराः' अर्थात् ब्राह्मणों के
लिए विहित अड़तालिस प्रकार के संस्कार भी उनमें वेदों से निर्दिष्ट अनुष्ठान
करने की योग्यता सम्पादन के द्वारा धर्म के साधन हैं ।
६६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
क्षत्रियस्य सम्यक् प्रजापालनमसाधुनिग्रहो युद्धेष्वनिवर्त्तनं स्वकीयाश्च
संस्काराः ।
वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि स्वकीयाश्च संस्काराः ।
अच्छी तरह प्रजा का पालन करना, दुष्टों का दमन, युद्ध से न
लौटना (अनिवृत्ति) और अपने (क्षत्रियों) के लिए शास्त्रों में विहित
संस्कार ये सभी क्षत्रियों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।
खरीद, बिक्री, खेती करना, पशुओं का पालन, अपने (वैश्यों के)
लिए शास्त्रों के द्वारा विहित संस्कार ये सभी वैश्यों के लिए विशेष धर्म
के साधन हैं ।
न्यायकन्दली
क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि । सम्यक् प्रजापालनं न्यायवृत्तीनां प्रजानां
परिरक्षणम् । असाधुनिग्रहः, दुष्टानां यथाशास्त्रं शासनम् । युद्धेष्वनिवर्त्तनं युद्धेषु
विजयावधिः प्राणावधिर्वा आयुधव्यापारः । स्वकीयाश्च संस्काराः ।
वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि । मूल्यं दत्त्वा परस्माद् द्रव्यग्रहणं क्रयः,
मूल्यमादाय परस्य स्वद्रव्यदानं विक्रयः । कृषिः परिकर्षितायां भूमौ बीजस्य वपनं रोपणं
च, पशुपालनं गोऽजादिकादिपरिरक्षणम् । एतानि वैश्यस्य धर्मसाधनानि, तस्यामीभि-
रेवोपायैरर्जितानां धनानां धर्माङ्गत्वात् ।
शूद्रस्य पूर्वेषु वर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रिया धर्मसाधनम् ।
'क्षत्रियस्य विशिष्टानि धर्मसाधनानि' । 'सम्यक् प्रजापालन' अर्थात् उचित
न्याय की रीति से चलनेवाली प्रजाओं का पालन करना, 'असाधुनिग्रह' अर्थात्
शास्त्रों में कही गयी रीति के अनुसार दुष्टों को दण्ड देना, 'युद्धेष्वनिवर्त्तनम्'
अर्थात् जब तक विजय प्राप्त न हो जाय या जब तक प्राण रहें तब तक अस्त्र-
शस्त्रों को चलाते रहना एवं क्षत्रियों के लिए विहित संस्कार, ये सभी क्षत्रियों के
लिए धर्म के साधन हैं ।
'वैश्यस्य क्रयविक्रयकृषिपशुपालनानि' । मूल्य देकर दूसरों से द्रव्य लेना 'क्रय'
कहलाता है । मूल्य लेकर दूसरे को अपना द्रव्य देना ही 'विक्रय' है । जोती हुई
भूमि में बीजों को बोना या रोपना ही 'कृषि' है । गाय, बकरी प्रभृति को पालना
ही 'पशुपालन' है । ये सभी और वैश्यों के लिए कहे गये संस्कार, ये ही वैश्यों के
लिए ही धर्म के साधन हैं । इन्हीं उपायों से प्राप्त धन वैश्यों के धर्म के साधक हैं ।
'शूद्रस्य पूर्ववर्णेषु पारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रियाः' अर्थात् पहले कहे हुए
ब्राह्मणादि वर्णों की अधीनता, बिना मन्त्र के ही विवाहादि क्रियाओं के अनुष्ठान
प्रभृति ही शूद्रों के धर्म के साधन हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६६९
प्रशस्तपादभाष्यम्
शूद्रस्य पूर्ववर्णपारतन्त्र्यममन्त्रिकाश्च क्रियाः ।
आश्रमिणां तु ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः स्वशास्त्रविहितानि गुरुशुश्रूषा-
ऽग्नीन्धनभैक्ष्याचरणानि मधुमांसदिवास्वप्नाञ्जनाभ्यञ्जनादिवर्जनं च ।
कथित तीनों वर्णों की पराधीनता एवं बिना मन्त्र की क्रिया, ये शूद्रों
के विशेष धर्म के साधन हैं ।
आश्रमियों में गुरुकुलनिवासी ब्रह्मचारियों के लिए शास्त्रों में विहित
गुरु और अग्नि की सेवा, (होम के लिए) लकड़ी लाना, भिक्षा माँगना
एवं मधु, मांस, दिन की निद्रा, अञ्जन और अभ्यङ्ग (मालिश), इन सबों
को छोड़ना (ये सभी) उनके विशेष (असाधारण) धर्म के साधन हैं ।
न्यायकन्दली
आश्रमिणां तु धर्मसाधनमुच्यते । ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिन इति । उपनीय यः
शिष्यं साङ्गं सरहस्यं च वेदमध्यापयति स गुरुः, तस्य कुले गृहे वसनशीलस्य
ब्रह्मचारिणः स्वशास्त्रविहितानि ब्रह्मचारिणमधिकृत्य शास्त्रेण विहितानि । गुरुशुश्रूषा
गुरोः परिचर्या, गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्धनं च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि । गुरुशुश्रूषा-
भैक्ष्ययोः करणमेवाचरणम् । अग्नेराचरणम्, प्रत्यहमग्नौ होमः, इन्धनस्याचरणमग्न्यर्थं
वनादिन्धनस्याहरणमिति विवेकः ।
गृहस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-विद्याव्रतस्नातकस्येति । यो वेदा-
'ब्रह्मचारिणो गुरुकुलनिवासिनः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा अब आश्रमियों के
धर्म का साधन कहते हैं । यहाँ 'गुरु' शब्द से उस विशिष्ट पुरुष को समझना
चाहिए जो शिष्य का उपनयन संस्कार कराकर अङ्गों सहित वेदों के रहस्य को
समझावे । ऐसे 'गुरु' के गृह में सम्पूर्ण अध्ययनकाल तक नियमतः निवास कर
अध्ययन करनेवाले 'ब्रह्मचारी' के लिए 'स्वशास्त्रविहितानि' अर्थात् विशेषकर
ब्रह्मचारी के लिए ही शास्त्रों में विहित (जो 'गुरुशुश्रूषादि' उनका) आचरण करना
चाहिए । 'गुरुशुश्रूषाग्नीन्धनभैक्ष्याचरणानि' यह वाक्य 'गुरुशुश्रूषा च अग्निश्चेन्ध-
नञ्च भैक्ष्यं च तेषामाचरणानि' इस प्रकार की व्युत्पत्ति से सिद्ध है । गुरु की शुश्रूषा
(सेवा) करना ही गुरुशुश्रूषा का आचरण है । भिक्षा माँगना ही भिक्षाचरण है ।
प्रतिदिन अग्नि में होम करना ही अग्नि का आचरण है । होम के लिए वन से
लकड़ी लाना ही इन्धनाचरण है । इस प्रकार का विभाग प्रकृत में जानना चाहिए ।
'विद्याव्रतस्नातकस्य' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा गृहस्थाश्रमी के लिए जो धर्म के
साधन हैं, वे कहे गये हैं । 'विद्याव्रतस्नातक' शब्द से वे पुरुष अभिप्रेत हैं, जिन्होंने
६७० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विद्याव्रतस्नातकस्य कृतदारस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरथैँ-
र्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्माख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायम्प्रातरनुष्ठानम्, एकाग्नि-
विधानेन पाकयज्ञसंस्थानां च नित्यानां शक्तौ विद्यमानायामग्न्याधेयादीनां च
हविर्यज्ञसंस्थानामग्निष्टोमादीनां सोमयज्ञसंस्थानां च । ऋत्वन्तरेषु ब्रह्मचर्य-
मपत्योत्पादनं च ।
शालीनवृत्ति एवं यायावरवृत्ति के द्वारा उपार्जित धन से प्रातःकाल
और सायंकाल भूतयज्ञ (काकादि प्राणियों के लिए अन्न उत्सर्ग करना),
मनुष्ययज्ञ (अतिथिसेवा), देवयज्ञ (होम), पितृयज्ञ (नित्यश्राद्ध),
ब्रह्मयज्ञ (वेदपाठ) एवं सामर्थ्य के रहने पर एकाग्निविधान (विवाह के
समय गृहीत अग्नि) से पाकयज्ञसंस्थाओं (अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य,
आश्वयुज्य प्रभृति) का अनुष्ठान, अग्निहोत्र एवं विशेष प्रकार के
हविर्यज्ञ संस्था के (दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य एवं आग्रायण प्रभृति)
इष्टियों का, सोमयज्ञ संस्था के (अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय,
अतिरात्र एवं आप्तोर्याम) यज्ञों का अनुष्ठान एवं (पत्नी के) ऋतुकाल
से भिन्न समय में ब्रह्मचर्य का पालन एवं पुत्र का उत्पादन, ये सभी
विद्याव्रतस्नातक (वेदाध्ययन के लिए स्वीकार किये गये व्रतों को
अध्ययन के समाप्त हो जाने के कारण छोड़ देनेवाले) विवाहित गृहस्यों
के विशेष धर्म के साधन हैं ।
न्यायकन्दली
ध्ययनार्थं गृहीतं व्रतमधीते वेदे विसर्जितवान् स विद्याव्रतस्नातकः, तस्य कृतदारस्य
कृतपत्नीपरिग्रहस्य गृहस्थस्य शालीनयायावरवृत्त्युपार्जितैरर्थैर्भूतमनुष्यदेवपितृब्रह्मा-
ख्यानां पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरनुष्ठानम् । यावता धान्येन कुशूलपात्रं
कुम्भीपात्रं वा परिपूर्यते, त्र्यहमेकाहं वा वर्तनं भवति, तावन्मात्रस्य परेण
स्वयमानीयमानस्य श्रद्धया दीयमानस्य यः परिग्रहः सा शालीना वृत्तिः ।
परस्मादप्रतिग्रहगतश्चक्रमादाय यत् प्रत्यहं भिक्षाटनं सा यायावरवृत्तिः ।
ताभ्यामुपार्जितैरथैँः पञ्चानां महायज्ञानां सायं प्रातरपराह्णे चानुष्ठानं
वेदाध्ययन का व्रत लिया हो एवं वेदाध्ययन के सम्पन्न हो जाने पर ही उसकी
समाप्ति की हो । वे ही जब 'कृतदार' हो जाँय अर्थात् विवाह कर लें,
ऐसे गृहस्थों के लिए ही जो धर्म के साधन हैं, वे 'शालीनयायावर' इत्यादि
सन्दर्भ से गिनाये गये हैं । जितने अन्न से एक कुशूलपात्र (कच्ची मिट्टी की कोठी)
या एक घड़ा भर जाय, अथवा तीन दिनों तक या एक ही दिन का भोजन
चल सके, उतने ही अन्न को स्वयं ले आने पर या श्रद्धापूर्वक दूसरों के देने
पर जो ग्रहण किया जाता है, उस वृत्ति को 'शालीना वृत्ति' कहते हैं ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७१
न्यायकन्दली
गृहस्थस्य धर्मसाधनम् । भूतेभ्यो बलिप्रदानं भूतयज्ञः । अतिथिपूजनं मनुष्ययज्ञः । होमो
देवयज्ञः । श्राद्धं पितृयज्ञः । ब्रह्मयज्ञो वेदपाठः । एकाग्निविधानेन पाकयज्ञ-
संस्थानामिति । अनुष्ठानम् । एकाग्निरिति औपासनिकः । तस्य विधानं विवाहकाले
परिग्रहः । तेन पाकयज्ञसंस्थानां पाकयज्ञविशेषाणामष्टकापार्वणीचैत्र्याश्वयुज्यादीनां
नित्यानामवश्यकरणीयानां सति सामर्थ्येऽनुष्ठानम् । अग्न्याधेयादीनामिति । अनुष्ठानं
धर्मसाधनम्, अग्न्याधेयशब्देनाग्न्याधानस्याभिधानम्, यद् ब्राह्मणेन वसन्ते क्रियते ।
हविर्यज्ञसंस्था हविर्यज्ञविशेषा दर्शपूर्णमासचातुर्मास्याग्रायणादिका इष्टयः कथ्यन्ते ।
अग्निष्टोमादीति अग्निष्टोमोक्थ्यषोडशीवाजपेयातिरात्राप्तोर्यामाः सप्तसोमयज्ञविशेषाः
सोमयज्ञसंस्था उच्यन्ते । ऋत्वन्तरेष्विति । ऋतुकालादन्यकालेषु ब्रह्मचर्यं व्रतरूपेण स्त्री-
सेवापरिवर्जनं धर्मसाधनम् । अपत्योत्पादनमपि धर्मसाधनम्, पुत्रेण लोकाञ्जयतीति श्रुतेः ।
दूसरों से प्रतिग्रह न लेकर बारी-बारी से प्रत्येक आँगन में भिक्षा माँगने को
'यायावरवृत्ति' कहते हैं। इन दोनों वृत्तियों से ही उपार्जित धन के द्वारा सायङ्काल,
प्रातःकाल और अपराह्नकाल में पञ्चमहायज्ञों का अनुष्ठान गृहस्थों के लिए धर्म
का साधन है । काकादि प्राणियों के लिए बलि देने को 'भूतयज्ञ' कहते हैं ।
अतिथियों की पूजा को ही 'मनुष्ययज्ञ' कहते हैं। होम ही 'देवयज्ञ' है । श्राद्ध को
'पितृयज्ञ' कहते हैं । वेदों का पाठ ही 'ब्रह्मयज्ञ' है । 'एकाग्निविधानेन
पाकयज्ञसंस्थानाम्' अर्थात् इनके अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के साधन हैं ।
'एकाग्नि' शब्द से औपासनिक अग्नि को समझना चाहिए, जिसका ग्रहण विवाह
के समय किया जाता है । उस अग्नि के द्वारा 'पाकयज्ञसंस्था' के होमों का अर्थात्
अष्टका, पार्वणी, चैत्र्य एवं आश्वयुज्य प्रभृति नित्यकर्मों का अर्थात् अवश्य-
करणीय कर्मों का सामर्थ्य रहने पर जो अनुष्ठान (वे भी धर्म के साधन हैं),
'अग्न्याधेयादीनाम्' अर्थात् अग्न्याधेयादि के अनुष्ठान भी गृहस्थों के धर्म के
साधन हैं । 'अग्न्याधेय' शब्द से अग्नि का आधान समझना चाहिए, जो वसन्त के
समय ब्राह्मणों के द्वारा अनुष्ठित होता है । 'हविर्यज्ञसंस्था' शब्द से विशेष प्रकार
के दर्श, पौर्णमास, चातुर्मास्य, आग्रायण प्रभृति इष्टियाँ कही जाती हैं । 'अग्नि
ष्टोमादीति' अग्निष्टोम, उक्थ्य, षोडशी, वाजपेय, अतिरात्र और आप्तोर्याम ये
विशेष प्रकार के सात सोमयज्ञ ही 'सोमयज्ञसंस्था' कहलाते हैं । 'ऋत्वन्तरेषु' स्त्री
के ऋतुकाल से भिन्न समय में व्रतरूप से 'ब्रह्मचर्य' का अर्थात् स्त्रीसङ्ग का त्याग
भी धर्म का साधन है । पुत्र को उत्पन्न करना भी धर्म का साधन है; क्योंकि
'पुत्रेण लोकान् जयति' यह श्रुति है ।
६७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ग्रामान्निर्गतस्य वनवासो वल्कलाजिनकेशश्मश्रु-
नखरोमधारणं च, वन्यहुतातिथिशेषभोजनानि वानप्रस्थस्य ।
त्रयाणामन्यतमस्य श्रद्धावतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा, संन्यस्य स्वानि
कर्माणि, यमनियमेष्वप्रमत्तस्य षट्पदार्थप्रसंख्यानाद् योगप्रसाधनं प्रव्रजितस्येति ।
दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्यैतानि साधनानि भावप्रसादं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद्
धर्मोत्पत्तिरिति ।
ग्रामों को छोड़कर वनों में रहना, वल्कल, अजिन, केश, दाढ़ी-मूँछ,
नख और रोम इन सबों को धारण करना (कभी त्याग न करना) एवं वनों
के कन्द-मूल फलों एवं होम से और अतिथियों से अवशिष्ट अन्नों का
भोजन करना, ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम दोनों में से किसी भी आश्रम
से वानप्रस्थ लिए हुए सभी जनों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।
ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इन तीनों में से किसी
भी आश्रम से कोई भी श्रद्धाशील पुरुष (जब) सभी प्राणियों को सदा
के लिए अपनी ओर से अभय देकर अपने (और) सभी कर्मों से छूट
जाते हैं, फिर भी यमनियमादि का बिना प्रमाद के पालन करते रहते
हैं, (वे ही) परिव्राजक (कहलाते हैं) उनके लिए (इस शास्त्र में वर्णित)
षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अनुष्ठान ही विशेष धर्म का
साधन है । धर्म के ये साधन (लाभ-पूजादि) दृष्ट प्रयोजनों के बिना
अनुष्ठित होने के बाद विशुद्ध अभिप्राय की सहायता से आत्मा और
मन के संयोग के द्वारा धर्म को उत्पन्न करते हैं ।
न्यायकन्दली
वानप्रस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वेति । "यदहरे-
वास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्" इति श्रवणात् सति श्रद्धोपनये ब्रह्म-
चारिणो वनवासो भवति । गृहस्थस्य वा तस्य वानप्रस्थव्रतमाचरतो वल्क-
लाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्, वन्यस्य फलमूलस्य भोजनं हुतशेषभोजनम्,
'ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वानप्रस्थाश्रमियों के
धर्म के साधन कहे गये हैं । 'यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्'
ऐसी श्रुति है, तदनुसार उपयुक्त श्रद्धा के उत्पन्न होने पर ब्रह्मचर्याश्रम से भी
सीधे वानप्रस्थाश्रम में जा सकता है, इसी अभिप्राय से 'ब्रह्मचारिणः' ऐसा
कहा गया है । 'गृहस्थस्य वा' अर्थात् यदि गृहस्थ वानप्रस्थाश्रमी हो जाय
तो 'वल्कलाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्' अर्थात् वल्कल और अजिन का
परिधान एवं केश और दाढ़ी-मूंछों का रखना ये सभी गृहस्थ-वानप्रस्थाश्रमियों
के धर्म के समान हैं । एवं 'वन्य' जो फल-मूल उसका भोजन, होम से बचे हुए
हवि का भोजन एवं अतिथि को देकर उससे बचे हुए अन्न का भोजन (वान-
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७३
न्यायकन्दली
अतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्। यः प्राजापत्यामिष्टिं निरूप्य सर्वस्वं दक्षिणां दत्वात्मन्यग्निं
समाधाय पुत्रे भार्या निक्षिप्य प्रव्रजितः, न तस्य होमो न तस्यातिथिपरिग्रहः। यस्तु सह
पत्न्या सहैवाग्निना वनं प्रस्थितः, तस्य हुतशेषभोजनमतिथिशेषभोजनं च धर्मसाधनम्।
यतिधर्मं निरूपयति-त्रयाणामिति। यत्याश्रमपरिग्रहेऽपि नियमो नास्ति, श्रद्धोपगमे
सति ब्रह्मचार्येव यतिर्भवति, गृहस्थो वा भवति, वानप्रस्थो वेत्यनेनाभिप्रायेणोक्तं
त्रयाणामन्यतमस्येति । श्रद्धावतः चित्तप्रसादवतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा भूतानि
मया न जातु हिंसितव्यानीति अद्रोहसङ्कल्पं गृहीत्वा, स्वानि कर्माणि काम्यानि संन्यस्य
परित्यज्य यमनियमेष्वप्रमत्तस्य। अहिंसा-सत्यादयो यमाः। यथाह भगवान् पतञ्जलिः-
"अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः" इति। तपःशौचादयस्तु नियमाः। यथाह स एव
भगवान्-"शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः" इति । न्यायभाष्यकारस्तु
प्रत्याश्रमं विशिष्टं धर्मसाधननियममाह। तेष्वप्रमत्तस्य ताननतिक्रमतः। षट्पदार्थ-
प्रस्थियों के) धर्म के साधन हैं। जो गृहस्थ प्राजापत्य नाम की इष्टि करके अपने
सर्वस्व को दक्षिणा रूप में देकर एवं पत्नी का भार पुत्र को सौंप कर वानप्रस्थ
को ग्रहण करते हैं, उनके लिए होम और अतिथि की सेवा निर्दिष्ट नहीं है (अतः
उनके लिए ये दोनों धर्म के साधन नहीं हैं)। जो पत्नी और अग्नि को साथ
लेकर ही वानप्रस्थाश्रम को ग्रहण करते हैं, उनके लिए ही होम से बचे हुए हवि
का भोजन और अतिथि से बचे हुए अन्न का भोजन ये दोनों धर्म के साधन हैं।
'त्रयाणाम्' इत्यादि ग्रन्थ से यतियों (संन्यासियों) के धर्म का निरूपण करते हैं ।
संन्यासाश्रम ग्रहण करने का भी कोई नियम नहीं है (कि किस आश्रम से संन्यास
ग्रहण करे); क्योंकि उपयुक्त श्रद्धा के रहने पर ब्रह्मचारी, गृहस्थ ये दोनों ही
संन्यास ले सकते हैं । वानप्रस्थाश्रमी तो ले ही सकते हैं, इसी नियम को दृष्टि में
रखकर लिखा गया है कि 'त्रयाणामन्यतमस्य' । 'श्रद्धावतः' चित्त प्रसाद से युक्त
पुरुष के लिए 'सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा' अर्थात् 'मुझसे किसी प्राणी की हिंसा
न हो' इस प्रकार से अद्रोह का संकल्प करके 'स्वानि कर्माणि' अर्थात् अपने काम्य
कर्मों को 'संन्यस्य' अर्थात् छोड़कर 'यमनियमेष्वप्रमत्तस्य' इनमें अहिंसा, सत्य
प्रभृति 'यम' कहलाते हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि-अहिंसा, सत्य,
अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (ये पाँच) 'यम' हैं। प्रकृत में 'नियम' शब्द से तपस्या,
शौच प्रभृति इष्ट हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा है कि-शौच, सन्तोष,
तपस्या, स्वाध्याय और ईश्वर का प्रणिधान (ये पाँच) 'नियम' हैं । न्यायभाष्यकार
ने प्रत्येक आश्रम के लिए निर्दिष्ट धर्म के नियमित अनुष्ठान को ही नियम बतलाया
है । 'तेष्वप्रमत्तस्य' अर्थात् यम और नियम के विरुद्ध आचरण न करनेवाले
६७४ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
प्रसंख्यानात् षष्णां पदार्थानां तत्त्वज्ञानाद् योगस्यात्मज्ञानोत्पादनसमर्थस्य समाधिविशेषस्य
प्रसाधनमुत्पादनं प्रव्रजितस्य धर्मसाधनम् । यथैतानि धर्मं साधयन्ति, तथा कथयति-दृष्टं
चेति । लाभपूजादिप्रयोजनमनुद्दिश्यानभिसन्धाय यदैतानि साधनानि क्रियन्ते, तदैतानि
साधनानि भावप्रसादं चाभिप्रायविशुद्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद् धर्मोत्पत्तिरिति ।
प्रत्यहं दुःखैरभिहन्यमानस्य तत्त्वतो विज्ञातेषु दुःखनिदानेषु विषयेषु विरक्तस्यात्यन्तिकं
दुःखवियोगमिच्छतः "आत्मख्यातिर्विप्लवा हानोपायः", "तस्याश्च समाधिविशेषो
निबन्धनम्" इति श्रुतवतः "संन्यस्य सर्वकाम्यकर्माणि समाधिमनुतिष्ठामः"
तत्प्रत्यनीकभूयिष्ठं ग्रामं परित्यज्य वनमाश्रितस्य यमनियमाभ्यां कृतात्मसंस्कारस्य
समाध्यभ्यासान्निवर्तको धर्मो जायते । तस्मादस्य प्रकृष्टः समाधिस्ततोऽन्यः प्रकृष्टतरो
धर्मः, तस्मादप्यन्यः प्रकृष्टतमः समाधिरित्यनेन क्रमेणान्ये जन्मनि स तादृशः समाधिविशेषः
पुरुषों के लिए ये आचरण धर्म के साधन हैं । 'षट्पदार्थप्रसंख्यानात्' द्रव्यादि छः
पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अर्थात् आत्मज्ञान में पूर्ण क्षम विशेष प्रकार
के समाधि का जो उत्पादन वह 'प्रव्रजितों' के लिए धर्म का साधन है । 'दृष्टञ्च'
इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा यह उपपादन करते हैं कि ये साधन किस प्रकार धर्म का
सम्पादन करते हैं । अर्थात् 'दृष्ट' लाभ पूजादि प्रयोजनों का उद्देश्य न रखकर
जब यम-नियमादि साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, उस समय ये साधन
'भावशुद्धि' अर्थात् अभिप्राय की विशुद्धि के साहाय्य से आत्मा और मन के
संयोग के द्वारा धर्म का उत्पादन करते हैं ।
जिस पुरुष का चित्त दुःखों से प्रतिदिन अभिहत होता रहता है, उसे यदि
दुःखों के कारणीभूत विषय यथार्थ रूप से ज्ञात हो जाते हैं, तो फिर उन विषयों
से उसे वैराग्य हो जाता है । ऐसा पुरुष दुःखों से सदा के लिए छूटने की इच्छा
करता है । (अन्वेषण करने पर) उसे यह ज्ञात होता है कि 'आत्मा का तत्त्वज्ञान
ही दुःख के आत्यन्तिक निवृत्ति का अव्यर्थ साधन है एवं वह तत्त्वज्ञान विशेष
प्रकार की 'समाधि' से ही प्राप्त हो सकता है । तो फिर सभी काम्य कर्मों का
त्याग कर 'मैं समाधि का ही अनुष्ठान करूँ' वह ऐसा संकल्प करता है । फिर
समाधि के अधिकतर विघ्नों से युक्त होने के कारण वह ग्राम को छोड़ देता है
और वन का आश्रय ले लेता है । ऐसा पुरुष यम और नियम से आत्मा को
सुसंस्कृत कर लेता है । ऐसी स्थिति में जब वह समाधि का अभ्यास करता है, तो
उससे (संसार को निवृत्त करनेवाले) निवर्तक धर्म की उत्पत्ति होती है । इस
निवर्तक धर्म के द्वारा पहले की समाधि से उत्कृष्ट समाधि की उत्पत्ति होती है ।
इस उत्कृष्ट समाधि से उत्पन्न निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतर निवर्तक धर्म की उत्पत्ति
होती है । इस उत्कृष्ट निवर्तक धर्म से उत्कृष्टतम समाधि की उत्पत्ति होती है, इस
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७५
प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ६७५
न्यायकन्दली
परिणमति, यो द्वन्द्वैर्नाप्यभिभवितुं न शक्यते । दृष्टो हि कश्चिदभिमतं विषय-
मादरेणानुचिन्तयतस्तदेकाग्रीभूतचित्तस्य सन्निहितेषु प्रबलेष्वपि विषयेषु सम्बाधः, यथेषु-
कार इषौ लब्धलक्ष्याभ्यासो गच्छन्तमपि राजानं न बुद्धयते । तथा च भगवान् पतञ्जलिः -
'अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः' इति । एवं परिणते समाधावात्मस्वरूपसाक्षात्कारि-
विज्ञानमुदेति । यदाहुः कापिलाः -
एवं तत्त्वाभ्यासान्नास्मि न मे नाहमित्यपरिशेषम् ।
अविपर्ययाद् विशुद्धं केवलमुत्पद्यते ज्ञानम् ॥ इति ।
.अत आत्मज्ञानार्थिना यतिना योगसाधनमनुष्ठीयते । ज्ञानं ज्ञेयादि-
प्राप्तिमात्रफलम्, श्रौतात्मज्ञानेनाप्यात्मस्वरूपं प्राप्यते; किमस्य ध्यानाभ्यासात्
प्रत्यक्षीकरणेनेति चेत् ? न, परोक्षस्य प्रत्यक्षसाधने सामर्थ्याभावात् ।
स्वरूपतस्तावदात्मा न कर्त्ता, न भोक्ता, किन्तुदासीन एव । तत्र देहे-
प्रकार अन्तिम जन्म में वह समाधि इतनी उत्कृष्टता को प्राप्त कर लेती है कि वह
पुरुष (शीतोष्ण रूप) द्वन्द्व से भी अभिभूत नहीं होता । यह तो सांसारिक इष्ट
विषय को आदर के साथ चिन्तन करते हुए पुरुषों में भी देखा जाता है कि
अत्यन्त समीप के प्रबल विषयों को भी वे नहीं देख पाते हैं । जैसे कि तीर का
अभ्यास करता हुआ पुरुष आगे से जाते हुए राजा को भी नहीं देख पाता है ।
जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने कहा है कि 'अभ्यास और वैराग्य इन दोनों से
चित्तवृत्तिरूप योग निष्पन्न होता है ।' इस प्रकार जब समाधि का परिपाक हो
जाता है, तब उससे आत्मा का साक्षात्काररूप विज्ञान उदित होता है । जैसा कि
सांख्य शास्त्र के आचार्यों ने कहा है कि-
"इस तत्त्व के अभ्यास से 'ये विषय मेरे नहीं हैं, मैं इन विषयों से सम्बद्ध
नहीं हूँ' इस आकार का विपर्ययरहित केवल (प्राकृत विषयों से असम्बद्ध) आत्मा
का ज्ञान होता है ।" यही कारण है कि आत्मज्ञान की इच्छा से यति लोग योग
का अभ्यास करते हैं । (प्र.) ज्ञान का तो एकमात्र यही फल है कि उससे ज्ञेय
विषय की प्राप्ति हो । श्रुति के द्वारा जो आत्मा का ज्ञान होता है, उससे भी
उसके विषय आत्मा के स्वरूप की प्राप्ति तो होगी ही, फिर ध्यान और अभ्यास
के द्वारा आत्मा को प्रत्यक्ष करने की क्या आवश्यकता है ? (उ.) यतः
प्रत्यक्षात्मक ज्ञान से ही सांसारिक विषयों का प्रत्यक्षरूप मिथ्याज्ञान निवृत्त हो
सकता है । श्रुति से उत्पन्न आत्मा का ज्ञान परोक्ष है, अतः आत्मा के प्रत्यक्ष की
आवश्यकता होती है; जिसके लिए ध्यान और अभ्यास की पूरी आवश्यकता है ।
आत्मा तो स्वयं उदासीन है, न वह कर्त्ता है, न भोक्ता । उसमें जब शरीर, इन्द्रिय
प्रभृति विषयों का सम्बन्ध होता है, तभी उसे 'अहं कर्त्ता, अहं भोक्ता' इत्यादि
ज्ञान होने लगते हैं, वे 'जो जहाँ नहीं है वहीं तद्विशेषणक' होने के कारण
मिथ्याज्ञान होते हैं । इस मिथ्याज्ञान से ही अनुकूल विषयों में राग और प्रतिकूल
विषयों में द्वेष उत्पन्न होता है । राग और द्वेष इन दोनों से ही क्रमशः प्रवृत्ति और
निवृत्ति उत्पन्न होती है ।
६७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
न्यायकन्दली
न्द्रियसम्बन्ध्याद्युपाधिकृतोऽहं ममेति-कर्तृत्वभोक्तृत्वप्रत्ययो मिथ्याऽतस्मिंस्तदिति भावात् ।
एतत्कृतश्चानुकूलेषु रागः प्रतिकूलेषु द्वेषः, ताभ्यां प्रवृत्तिनिवृत्ती, ततो धर्माधर्मौ, ततश्च
संसारः । यथोक्तं सौगतैः -
आत्मनि सति परसंज्ञा स्वपरविभागात् परिग्रहद्वेषौ ।
अनयोः सम्प्रतिबद्धाः सर्वे भावाः प्रजायन्ते ॥
अनादिवासनावासित इति प्रबलो निसर्गबद्धः सर्वः सांव्यवहारिकः प्रत्यक्षेणैवैष
प्रत्ययः । श्रौतमात्मतत्त्वज्ञानं क्षणिकमनुपलब्धसंवादं परोक्षं च । न च दृढतरः प्रत्यक्षाव-
भासः परोक्षाभासेन शक्यते निषेद्धुम् । न हि शतशोऽपि प्रमाणान्तरावगते गुडस्य माधुर्ये
दुष्टेन्द्रियजः तिक्तप्रतिभासस्तत्कृतश्च दुःखावगमो निवर्तते, तस्मात् प्रत्यक्षज्ञानार्थं समाधि-
रुपासितव्यः । प्रचिते समाधौ तत्सामर्थ्यात् कर्तृत्वभोक्तृत्वपरिपन्थिन्यात्मतत्त्वे स्फुटीभूते
समाने विषये विद्याविद्ययोर्विरोधादहङ्कारममकारवासनानोच्छेदे सन्नपि प्रपञ्चो नात्मानं
स्पृशति । तथा च कापिलैरुक्तम्-
तेन निवृत्तप्रसवामर्थवशात् सप्तरूपविनिवृत्ताम् ।
प्रकृतिं पश्यति पुरुषः प्रेक्षकवदवस्थितः स्वस्थः ॥
विहित विषयों में प्रवृत्ति से धर्म और निषिद्ध विषयों में प्रवृत्ति से अधर्म एवं
विहित विषयों की निवृत्ति से अधर्म और निषिद्ध विषयों की निवृत्ति से धर्म की
उत्पत्ति होती है । धर्म और अधर्म इन्हीं दोनों से संसार की उत्पत्ति होती है ।
जैसा बौद्धों ने भी कहा है कि-
आत्मा को सत्ता मान लेने पर ही 'पर' इस नाम का व्यवहार होता है ।
'स्व' और 'पर' का जो यह व्यवहार है, उसी से राग और द्वेष उत्पन्न होता है ।
धर्माधर्मादि सभी भाव राग और द्वेष इन्हीं दोनों के साथ सम्बद्ध हैं ।
अनादि वासना से वासित होने के कारण ये सभी स्वाभाविक मिथ्याप्रत्यय
संवृति (अविद्या) से उत्पन्न होते हैं एवं वे प्रत्यक्षात्मक हैं । श्रुति से जो आत्मा
का क्षणिक ज्ञान होता है, उसका प्रमात्व निर्णीत नहीं है एवं वह परोक्ष भी
है । अतः उससे दृढ़तर एवं प्रत्यक्षात्मक मिथ्याज्ञान की निवृत्ति नहीं हो
सकती । जिस पुरुष की जिह्वा में दोष आ गया है, उसे यदि सैकड़ों प्रमाणों
से गुड़ की मधुरता को समझावें, उससे उसे जो गुड़ में तिक्तता का भान है
एवं इस भान से जो दुःख होता है, इन दोनों से वह छूट नहीं सकता । तस्मात्
आत्मा के प्रत्यक्ष के लिए समाधि की पूरी आवश्यकता है । इस प्रकार समाधि
की वृद्धि हो जाने पर, उसके सामर्थ्य से (बन्धन के प्रयोजक) कर्त्तृत्व
और भोक्तृत्व के विरोधी आत्मतत्त्व का स्फुट प्रतिभास होता है । तद्विषयक
मिथ्या-ज्ञान (अविद्या) और तद्विषयक यथार्थज्ञान (विद्या) ये दोनों परस्पर विरोधी
हैं, अतः आत्मविषयक तत्त्वज्ञानरूप विद्या की उत्पत्ति हो जाने पर आत्मा
के कर्त्तृत्व-भोक्तृत्वादि रूप से जितने भी मिथ्याज्ञान एवं तज्जनित वासनायें
रहती हैं, वे सभी नष्ट हो जाती हैं, जिससे प्रपञ्च की (किसी प्रकार की) सत्ता
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७७
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७७
प्रशस्तपादभाष्यम्
अधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरहितप्रत्यवायहेतुरतीन्द्रियोऽ-
न्त्यदुःखसंविज्ञानविरोधी । तस्य तु साधनानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि
अधर्म भी आत्मा का ही गुण है । वह (अधर्माचरण करनेवाले) कर्त्ता
के दुःख और दुःख के साधनों का कारण है। वह अतीन्द्रिय है। एवं अन्तिम
दुःख और तत्त्वज्ञान इन दोनों से उसका नाश होता है । शास्त्रों में निषिद्ध
न्यायकन्दली
तेन तत्त्वज्ञानेन सता निवृत्तप्रसवां निवृत्तोपभोगजननसामर्थ्याज् ज्ञानधर्मवैराग्यैश्वर्याधर्मा-
ज्ञानावैराग्यानैश्वर्येभ्यः सप्तरूपेभ्यो विनिवृत्तां प्रकृतिं पुरुषः प्रेक्षकवदुदासीनः स्वस्थो
रजस्तमोवृत्तिकलुषतया बुद्ध्या असम्भिन्नः पश्यतीत्यर्थः । यद्यप्यनादिरियं मोहवासना
आदिमांश्च तत्त्वसाक्षात्कारः, तथाप्यनेन सा निरुद्ध्यते, तत्त्वावग्रहो हि धियां परमं
बलम् ।
अधर्मोऽप्यात्मगुणः । न केवलं धर्मोऽधर्मोऽप्यात्मगुणः । कर्तुरिति । कर्तुरहितं
दुःखसाधनम्, प्रत्यवायो दुःखम्, तयोरधर्मो हेतुः । अन्त्यदुःखसंविज्ञानेति ।
अन्त्यस्य दुःखस्य सम्यग् विज्ञानं तेन विनाश्यते । तस्य साधनानि
शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । हिंसा परा-
रहने पर भी आत्मा को वे छू नहीं सकते । जैसा सांख्यशास्त्र के आचार्यों ने 'तेन
निवृत्तप्रसवाम्' इत्यादि आर्या के द्वारा कहा है कि-'तेन' अर्थात् उस तत्त्वज्ञान से
'निवृत्तप्रसवाम्' उपभोग के सामर्थ्य से रहित प्रकृति 'अर्थवशात्' पुरुष के अपवर्ग
रूप प्रयोजन से वशीभूत होकर 'सप्तरूप विनिवृत्ति' को प्राप्त होती है, अर्थात्
ज्ञान, अज्ञान, धर्म, अधर्म, वैराग्य, अवैराग्य, ऐश्वर्य और अनैश्वर्य इन
अष्टविध भावों में से ज्ञान को छोड़कर सृष्टिजनक अज्ञानादि सातों प्रकार के
भावों से निवृत्त हो जाती है । इसी प्रकार की प्रकृति को 'पुरुष' प्रेक्षक की तरह
अर्थात् उदासीन की तरह 'स्वस्थ' होकर अर्थात् रजोगुण और तमोगुण की कलुषित
वृत्तियों से सर्वथा असम्बद्ध रहकर देखता है । यद्यपि यह ठीक-सा लगता है कि
मिथ्याज्ञानरूप मोहरूप वासना अनादि है और तत्त्वज्ञान उत्पत्तिशील है (अतः
वासना ही बलवती है), फिर भी सादि भी तत्त्वज्ञान से अनादि मिथ्याज्ञान का
नाश होता है; क्योंकि तत्त्व का ग्रहण करना ही ज्ञानों का सबसे बड़ा बल है ।
'अधर्मोऽप्यात्मगुणः' अर्थात् केवल धर्म ही आत्मा का गुण नहीं है, किन्तु अधर्म
भी आत्मा का गुण है (इसी अर्थ की अभिव्यक्ति प्रकृत वाक्य के 'अपि' शब्द
से हुई है) । 'कर्तुरिति' कर्त्ता का जो 'अहित' अर्थात् दुःख का साधन एवं
प्रत्यवाय अर्थात् दुःख, अधर्म इन दोनों का 'हेतु' है । 'अन्त्यदुःखसंविज्ञानेति'
अन्त्य अर्थात् अन्तिम दुःख और 'संविज्ञान' अर्थात् सम्यग्विज्ञान अर्थात्
तत्त्वज्ञान इन दोनों से अधर्म का विनाश होता है । 'तस्य तु साधनानि
शास्त्रे प्रतिषिद्धानि धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि' दूसरों के
६७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
धर्मसाधनविपरीतानि हिंसानृतस्तेयादीनि । विहिताकरणं प्रमादश्चैतानि दुष्टाभि-
सन्धिं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगादधर्मस्योत्पत्तिः ।
अविदुषो रागद्वेषवतः प्रवर्त्तकाद् धर्मात् प्रकृष्टात् स्वल्पा-
धर्मसहिताद् ब्रह्मेन्द्रप्रजापतिपितृमनुष्यलोकेष्वाशयानुरूपैरिष्टशरीरे-
न्द्रियविषयसुखादिभिर्योगो भवति । तथा प्रकृष्टादधर्मात् स्वल्पधर्म-
एवं धर्म साधन के विरोधी हिंसा, असत्य प्रभृति इसके साधन हैं ।
शास्त्रों में अनुष्ठान के लिए निर्दिष्ट कामों को न करना एवं प्रमाद ये
दोनों भी अधर्म के हेतु हैं । (अधर्म के) ये सभी हेतु एवं कर्ता के दुष्ट
अभिप्राय इन सबों की सहायता से आत्मा और मन के संयोग के द्वारा
अधर्म की उत्पत्ति होती है ।
प्रवृत्तिजनक उत्कृष्ट धर्म के द्वारा थोड़े से अधर्म की सहायता से
ब्रह्मलोक, इन्द्रलोक, प्रजापतिलोक, पितृलोक एवं मनुष्यलोक में उपयुक्त
भोग के अनुरूप इन्द्रिय, विषय एवं सुखादि के साथ तत्त्वज्ञान से रहित एवं
राग और द्वेष से युक्त पुरुष का सम्बन्ध होता है । इसी प्रकार थोड़े से
न्यायकन्दली
भिद्रोहः । अनृतं मिथ्यावचनम् । स्तेयमशास्त्रपूर्वं परस्वग्रहणम् । एवमादीनि
धर्मसाधनविपरीतानि शास्त्रे प्रतिषिद्धानि यानि, तान्यधर्मसाधनानि । विहिताकरणं
विहितस्यावश्यंकरणीयस्याकर्त्तव्यता । प्रमादोऽबुद्धिपूर्वकोऽतिक्रमः, एतदपि द्वयमधर्मसाध-
नम् । यथैतेभ्यो धर्मस्योत्पत्तिस्तद् दर्शयति-एतानीति । यत्र कामनापूर्वकमधर्मसाधनानुष्ठानं
तत्र दुष्टोऽभिसन्धिरधर्मकारणम् । अकामकृते तु प्रमादेनास्य हेतुत्वम् ।
साथ अभिद्रोह करना ही 'हिंसा' है । मिथ्याभाषण ही 'अनृत' शब्द का अर्थ है ।
शास्त्रों में कहे हुए उपायों से विपरीत उपायों के द्वारा दूसरे के धन का ग्रहण
करना ही 'स्तेय' है । धर्म के साधनों के विरुद्ध एवं शास्त्रों से निषिद्ध जो हिंसादि
उपाय हैं, वे ही अधर्म के साधन हैं । शास्त्रों के द्वारा अवश्य करने के लिए
निर्दिष्ट कर्मों का न करना ही 'विहिताकरण' है । अनजान में शास्त्रीय मर्यादा के
अतिक्रम को ही 'प्रमाद' कहते हैं । (विहिताकरण और प्रमाद) ये दोनों भी अधर्म
के साधन हैं । 'एतानि' इस वाक्य के द्वारा इन साधनों के द्वारा किस रीति से
अधर्म की उत्पत्ति होती है ? वह दिखलायी गयी हैं । जहाँ किसी कामना के
वशीभूत होकर अधर्म के साधनों का अनुष्ठान किया जाता है, वहाँ 'दुष्टाभि-
सन्धि' अधर्म का कारण है । जहाँ अधर्म के साधनों का अनुष्ठान अनजाने होता
है, वहाँ प्रमाद के द्वारा उन साधनों में हेतुता आती है ।
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ६७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
सहितात् प्रेततिर्यग्योनिस्थानेष्वनिष्टशरीरेन्द्रियविषयदुःखादिभिर्योगो भवति। एवं
प्रवृत्तिलक्षणाद् धर्मादधर्मसहिताद् देवमनुष्यतिर्यङ्नारकेषु पुनः पुनः संसारबन्धो
भवति ।
धर्म से युक्त बड़े अधर्म से प्रेत, तिर्यग्योनि में भोग के उपयुक्त शरीर,
इन्द्रिय, विषय और दुःख के साथ (उक्त पुरुष का) सम्बन्ध होता है।
इसी प्रकार थोड़े से अधर्म से युक्त प्रवृत्तिस्वरूप धर्म के द्वारा देव,
तिर्यग्योनि एवं नारकीय शरीरों के सम्बन्ध से जीव को बार-बार संसार
रूप बन्धन मिलता है।
न्यायकन्दली
एवमधर्मस्य साधनमभिधाय सम्प्रति साध्यं कथयति-अविदुष इत्यादिना। यः
कर्त्ता भोक्तास्तीत्यात्मानमभिमन्यते, परमार्थतो दुःखसाधनं च बाह्याध्यात्मिकविषयं
सुखसाधनमित्यभिमन्यते सोऽविद्वान्। स च स्वोपभोगतृष्णापरिप्लुतः सुखसाधन-यारोपिते
विषये रज्यते, तद्विरोधिनि च द्विष्टो भवति। तस्य प्रवर्त्तकाद् धर्माद् देवो वा स्यां
गन्धर्वो वा स्यामिति पुनर्भवप्रार्थनया कृताद् धर्मात् प्रकृष्टात् फलातिशयहेतोराशयानुरूपैः
कर्मानुरूपैरिष्टशरीरादिभिः सम्बन्धो भवति, ब्रह्मेन्द्रादिस्थानेऽपि मात्रया
दुःखसम्भेदोऽस्ति । न चाधर्मादन्यद् दुःखसंभेदोऽस्ति। न चाधर्मादन्यद् दुःखस्य
कारणमतः स्वल्पाधर्मसहितादित्युक्तम् । यस्य प्रकृष्टो धर्मस्तस्य प्रकृष्टानि
शरीरादीनि भवन्ति, यस्य प्रकृष्टतरो धर्मः, तस्य प्रकृष्टतराणि भवन्ति,
उक्त सन्दर्भ के द्वारा अधर्म के साधनों को कहने के बाद 'अविदुष' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा अधर्म से होनेवाले कार्यों का निरूपण करते हैं। 'अविद्वान्' उस
(मूढ़) पुरुष को कहते हैं, जो अपने को ही कर्त्ता और भोक्ता समझता है एवं
दुःखों के बाह्य एवं आन्तरिक साधनों को सुखों का साधन समझता है। वह
(अविद्वान् पुरुष) अपनी उपभोग की तृष्णा के वशीभूत होकर दुःख के जिन
साधनों को सुख का साधन समझता है, उन विषयों में अनुरक्त हो जाता है और
उसके विरोधी विषयों के साथ द्वेष रखने लगता है। 'प्रवर्त्तकाद्धर्मात्' अर्थात् 'मैं
देव हो जाऊँ, मैं गन्धर्व हो जाऊँ' इस प्रकार की हेतुभूत पुनर्जन्म की वासना से
किये गये प्रवर्त्तक एवं उत्कृष्ट फलों के हेतु उत्कृष्ट धर्म के द्वारा (कुछ अधर्म की
सहायता से) आशय के अनुरूप अर्थात् पहले किए हुए कर्म के अनुरूप अभीष्ट
शरीरादि के साथ वह जीव सम्बद्ध होता है। ब्रह्मा प्रभृति के शरीर धारण करने
पर भी थोड़ा-सा दुःख का सम्बन्ध रहता ही है। बिना अधर्म के दुःख का
अनुभव नहीं होता एवं अधर्म को छोड़कर दुःख का भी कोई दूसरा (असाधारण)
कारण नहीं है, अतः 'स्वल्पाधर्मसहितात्' यह वाक्य जोड़ा गया है। 'आश-
यानुरूपैः' यह वाक्य इस तारतम्य को समझाने के लिए लिखा गया है कि जिसका
धर्म उत्कृष्ट रहता है, उसे उत्कृष्ट शरीर मिलता है, जिसका धर्म उससे उत्कृष्टतर
६८० न्याय्कन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ज्ञानपूर्वकात्तु कृतादसङ्कल्पितफलाद् विशुद्धे कुले जातस्य
दुःखविगमोपायजिज्ञासोराचार्यमुपसङ्गम्योत्पन्नषट्पदार्थतत्त्वज्ञानस्याज्ञाननिवृत्तौ
विरक्तस्य रागद्वेषाद्यभावात् तज्जयोधर्माधर्मयोरनुत्पत्तौ
ज्ञानपूर्वक किये हुए निष्काम कर्मों के अनुष्ठान के द्वारा उत्पन्न धर्म से
जीव विशुद्ध कुल में जन्म लेता है । इससे पुरुष को दुःख की आत्यन्तिक
निवृत्ति के उपाय को जानने की इच्छा उत्पन्न होती है । इस जिज्ञासा से
प्रेरित होकर वह आचार्य के चरणों में बैठकर उनसे षट् पदार्थों के तत्त्व-
ज्ञान का लाभ करता है । जिससे अज्ञान निवृत्ति के द्वारा उसे वैराग्य
न्यायकन्दली
यस्य प्रकृष्टतमो धर्मस्तस्य प्रकृष्टतमानीति प्रतिपादयितुमाशयानुरूपैरित्युक्तम् । इष्टशब्दः
प्रत्येकं शरीरादिषु सम्बद्ध्यते, द्वन्द्धानन्तरं प्रयोगात् । तथा प्रकृष्टादधर्मात् प्रेतयोनीनां
तिर्यग्योनीनां च स्थानेष्वनिष्टैः शरीरादिभिर्योगो भवति । प्रेतादिस्थानेऽपि मनाक् सुख-
मस्ति, तच्च धर्मस्य कार्यम्, अतः स्वल्पधर्मसहितादित्युक्तम् । उपसंहरति-एवमिति ।
एवं धर्मात् संसारं प्रतिपाद्यापवर्गं प्रतिपादयति-ज्ञानपूर्वकात्त्विति । "स्वरूप-
तश्चाहमुदासीनो बाह्याध्यात्मिकाश्च विषयाः सर्व एवैते दुःखसाधनम्" इति यस्य
ज्ञानमभूत्, स दृष्टानुश्रविकविषयसुखवितृष्णः "एवमहं भूयासमिति मे भूयासुः"
होता है, उसे उस शरीर से भी अच्छा शरीर मिलता है एवं जिसका धर्म इन दोनों
प्रकार के धर्मों से उत्कृष्टतम रहता है, उसे तदनुरूप ही शरीर भी उत्कृष्टतम
मिलता है । प्रकृत वाक्य का 'इष्ट' शब्द द्वन्द्वसमास के अन्त में प्रयुक्त है, अतः
उसके पहले के ' शरीरादि' प्रत्येक शब्द के साथ उसका अन्वय है । इसी प्रकार
प्रकृष्ट अधर्म से प्रेत-तिर्यग् योनि के अनिष्ट शरीरादि के साथ आत्मा सम्बद्ध
होता है । प्रेतलोक प्रभृति में भी थोड़ा-सा सुख का सम्बन्ध है एवं सुख धर्म से ही
उत्पन्न होता है, अतः 'स्वल्पधर्मसहितात्' ऐसा लिखा गया है । 'एवम्' इत्यादि से
इस प्रसङ्ग का उपसंहार करते हैं ।
इस प्रकार धर्म से संसार की उत्पत्ति का वर्णन कर 'ज्ञानपूर्वकात्तु' इत्यादि
सन्दर्भ के द्वारा धर्म से मोक्ष की उत्पत्ति का वर्णन करते हैं । "मैं वस्तुतः अपने
यथार्थरूप में उदासीन हूँ एवं बाह्य और आभ्यन्तर जितने भी विषय हैं, वे सभी
दुःख के ही साधन हैं" इस प्रकार का ज्ञान जिस पुरुष को हो जाता है वह 'दृष्ट'
चन्दनवनितादि जनित सुखों से एवं 'आनुश्रविक' स्वर्गादि सुखों की तृष्णा से निवृत्त