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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 637 of 759

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Page 637

६७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणनिरूपणे धर्म-
प्रशस्तपादभाष्यम्
ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा ग्रामान्निर्गतस्य वनवासो वल्कलाजिनकेशश्मश्रु-
नखरोमधारणं च, वन्यहुतातिथिशेषभोजनानि वानप्रस्थस्य ।
त्रयाणामन्यतमस्य श्रद्धावतः सर्वभूतेभ्यो नित्यमभयं दत्त्वा, संन्यस्य स्वानि
कर्माणि, यमनियमेष्वप्रमत्तस्य षट्पदार्थप्रसंख्यानाद् योगप्रसाधनं प्रव्रजितस्येति ।
दृष्टं प्रयोजनमनुद्दिश्यैतानि साधनानि भावप्रसादं चापेक्ष्यात्ममनसोः संयोगाद्
धर्मोत्पत्तिरिति ।
ग्रामों को छोड़कर वनों में रहना, वल्कल, अजिन, केश, दाढ़ी-मूँछ,
नख और रोम इन सबों को धारण करना (कभी त्याग न करना) एवं वनों
के कन्द-मूल फलों एवं होम से और अतिथियों से अवशिष्ट अन्नों का
भोजन करना, ब्रह्मचर्याश्रम और गृहस्थाश्रम दोनों में से किसी भी आश्रम
से वानप्रस्थ लिए हुए सभी जनों के लिए विशेष धर्म के साधन हैं ।
ब्रह्मचर्याश्रम, गृहस्थाश्रम और वानप्रस्थाश्रम इन तीनों में से किसी
भी आश्रम से कोई भी श्रद्धाशील पुरुष (जब) सभी प्राणियों को सदा
के लिए अपनी ओर से अभय देकर अपने (और) सभी कर्मों से छूट
जाते हैं, फिर भी यमनियमादि का बिना प्रमाद के पालन करते रहते
हैं, (वे ही) परिव्राजक (कहलाते हैं) उनके लिए (इस शास्त्र में वर्णित)
षट् पदार्थों के तत्त्वज्ञान के द्वारा योग का अनुष्ठान ही विशेष धर्म का
साधन है । धर्म के ये साधन (लाभ-पूजादि) दृष्ट प्रयोजनों के बिना
अनुष्ठित होने के बाद विशुद्ध अभिप्राय की सहायता से आत्मा और
मन के संयोग के द्वारा धर्म को उत्पन्न करते हैं ।
न्यायकन्दली
वानप्रस्थस्य धर्मसाधनं कथयति-ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वेति । "यदहरे-
वास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्" इति श्रवणात् सति श्रद्धोपनये ब्रह्म-
चारिणो वनवासो भवति । गृहस्थस्य वा तस्य वानप्रस्थव्रतमाचरतो वल्क-
लाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्, वन्यस्य फलमूलस्य भोजनं हुतशेषभोजनम्,
'ब्रह्मचारिणो गृहस्थस्य वा' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा वानप्रस्थाश्रमियों के
धर्म के साधन कहे गये हैं । 'यदहरेवास्य श्रद्धा भवति तदहरेवार्यं प्रव्रजेत्'
ऐसी श्रुति है, तदनुसार उपयुक्त श्रद्धा के उत्पन्न होने पर ब्रह्मचर्याश्रम से भी
सीधे वानप्रस्थाश्रम में जा सकता है, इसी अभिप्राय से 'ब्रह्मचारिणः' ऐसा
कहा गया है । 'गृहस्थस्य वा' अर्थात् यदि गृहस्थ वानप्रस्थाश्रमी हो जाय
तो 'वल्कलाजिनकेशश्मश्रुनखरोमधारणम्' अर्थात् वल्कल और अजिन का
परिधान एवं केश और दाढ़ी-मूंछों का रखना ये सभी गृहस्थ-वानप्रस्थाश्रमियों
के धर्म के समान हैं । एवं 'वन्य' जो फल-मूल उसका भोजन, होम से बचे हुए
हवि का भोजन एवं अतिथि को देकर उससे बचे हुए अन्न का भोजन (वान-