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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages
Page 361Permalink

३१६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
दिक्प्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः । विप्रकृष्टं चावधिं कृत्वा एतस्मात्
सन्निकृष्टोऽयमित्यपरत्वाधारे इतरस्मिन् सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्ताम-
पेक्ष्यापरेण दिक्प्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिः ।
प्रदेशों के संयोग के द्वारा (दिक्कृत) परत्वविषयक बुद्धि की उत्पत्ति
होती है । इसके बाद इसी परत्वविषयक को अवलम्बन बनाकर दूर के
दिक् प्रदेशों के संयोग से दिक्कृत परत्व (गुण) की उत्पत्ति होती है ।
इसी प्रकार दूर दिशा के द्रव्य को अवधि मानकर 'इससे यह समीप है'
इस प्रकार की बुद्धि अपरत्व गुण के आधारभूत द्रव्य में उत्पन्न होती है ।
इसके बाद इस बुद्धि को अवलम्बन मानकर 'अपर' अर्थात् समीपवाले
प्रदेशों के संयोग से दिक्कृत अपरत्व गुण की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
विप्रकृष्टबुद्ध्युत्पत्त्यनन्तरं विप्रकृष्टं बुद्धिमपेक्ष्य परेण संयोगभूयस्त्ववता दिक्प्रदेशेन
संयोगादसमवायिकारणाद् विप्रकृष्टे पिण्डे समवायिकारणभूते परत्वस्योत्पत्तिः । द्रष्टुः
स्वशरीरापेक्षया संयुक्तसंयोगभूयस्त्ववन्तं विप्रकृष्टं चावधिं कृत्वेतरस्मिन् संयुक्तसंयोगा-
ल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टा बुद्धिरुदेति । तां सन्निकृष्टां बुद्धिं निमित्तकारणीकृत्यापरेण
संयुक्तसंयोगाल्पीयस्त्वविशिष्टेन दिक्प्रदेशेन सह संयोगादसमवायिकारणात् सन्निकृष्टे पिण्डे
समवायिकारणे परत्वस्योत्पत्तिः ।
सन्निकृष्टविप्रकृष्टबुद्ध्योः परस्परापेक्षित्वेनाुभयाभावप्रसङ्ग इति चेत् ?
न, अनभ्युपगमात् । न सन्निकृष्टोऽयमित्येवं प्रतीत्यैव तदपेक्षया विप्रकृष्टबुद्धिः,
अवधि मानकर बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे देश की अपेक्षा परत्व की उत्पत्ति
उस पिण्ड (द्रव्य) में होती है । इस परत्व का उक्त द्रव्य समवायिकारण है, पिण्ड
में रहनेवाले कथित संयोग उसके असमवायिकारण हैं । अर्थात् देखनेवाले को
अपने शरीर की अपेक्षा अधिक संयोगवाले दूर देश के द्रव्य को अवधि मानकर
उससे भिन्न एवं उससे अल्प संयोगवाले देश के द्रव्य में 'सन्निकृष्ट बुद्धि' अर्थात्
'इससे यह समीप है' इस आकार की बुद्धि उत्पन्न होती है । इस प्रकार समीप के
पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति का उक्त पिण्ड समवायिकारण है, अल्प संयोग से युक्त
दिक् प्रदेशों के साथ उक्त पिण्ड का संयोग निमित्तकारण है । एवं उक्त
सन्निकृष्टबुद्धि निमित्तकारण है ।
(प्र.) किसी के सन्निकृष्ट समझे जाने पर उसकी अपेक्षा कोई विप्रकृष्ट समझा
जाता है । एवं किसी के विप्रकृष्ट समझे जाने पर ही उसकी अपेक्षा कोई सन्निकृष्ट
समझा जाता है । इस प्रकार दोनों बुद्धियाँ अगर परस्पर सापेक्ष हैं, तो फिर

प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९७

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३९७
प्रशस्तपादभाष्यम्
कालकृतयोरपि कथम् ? वर्त्तमानकालयोरनियतदिग्देश-
संयुक्तयोर्युवस्थविरयो रूढमश्रुकारकश्यवलिपलितादिसन्निध्ये सत्येकस्य
(प्र.) कालिक (कालकृत) परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति किस
प्रकार होती है ? (उ.) वर्त्तमानकाल में अवस्थित किसी भी दिक्प्रदेश के
साथ संयुक्त युवा पुरुष में कड़ी मूँछ और गठित शरीर (प्रभृति
असाधारण) स्थिति और किसी भी दिक् प्रदेश से संयुक्त वृद्ध पुरुष में पके
न्यायकन्दली
नापि विप्रकृष्टोऽयमिति प्रतीत्यैव तदपेक्षया सन्निकृष्टबुद्ध्युदयः; किन्तु संयोगाल्पी-
यस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगभूयस्त्ववति विप्रकृष्टबुद्धिः । एवं
संयोगभूयस्त्वसहचरितं पिण्डं प्रतीत्यैव तदपेक्षया संयोगाल्पीयस्त्ववति सन्निकृष्टबुद्ध्यु-
त्पत्तिरिति न परस्परापेक्षित्त्वमनयोः ।
कालकृतयोरपि कथम् ? दिक्कृतयोस्तावत्परत्वापरत्वयोरुत्पत्तिः
दोनों बुद्धियों के कारणीभूत परत्व और अपरत्व इन दोनों की सत्ता ही उठ
जाएगी। (उ.) दोनों की सत्ता के उठ जाने की आपत्ति नहीं है; क्योंकि हम ऐसा
नहीं मानते; क्योंकि 'ततः' अर्थात् इस विप्रकृष्ट बुद्धि के बाद उसी के साहाय्य से
बहुत से संयोगों से युक्त दूसरे उस पिण्ड में परत्व की उत्पत्ति होती है। इस परत्व का
समवायिकारण उक्त पिण्ड ही है एवं उन दिशाओं के साथ उस पिण्ड का संयोग ही
उसका असमवायिकारण है । अभिप्राय यह है कि द्रष्टा पुरुष के शरीर के
मध्यवर्त्ती बहुत से दिग्देशों के संयोग से युक्त होने के कारण 'विप्रकृष्ट' अर्थात्
दूर देश को अवधि मानकर, उससे अल्प संयोग से युक्त मध्यवर्त्ती देश में
'सन्निकृष्ट बुद्धि' अर्थात् 'उससे यह समीप है' इस आकार की बुद्धि उक्त द्रष्टा
पुरुष को होती है । इस सन्निकृष्ट बुद्धिरूप निमित्तकारण से उक्त पिण्डरूप
समवायिकारण में परत्व की उत्पत्ति होती है, जिसका अल्प संयोग से युक्त दिक्प्रदेश
और पिण्ड का संयोग असमवायिकारण है । 'सन्निकृष्टोऽयम्' अर्थात् 'यह समीप
है' इस प्रकार की सन्निकृष्ट बुद्धि से ही उसकी अपेक्षा 'यह दूर है' इस आकार
की विप्रकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है एवं 'विप्रकृष्टोऽयम्' इस बुद्धि से ही इसकी
अपेक्षा 'यह समीप है' इस आकार की सन्निकृष्ट बुद्धि उत्पन्न होती है; किन्तु
उक्त प्रदेशों के संयोगों की अल्पता के साथ ज्ञात द्रव्य (पिण्ड) की प्रतीति से ही
(इस पिण्ड की) अपेक्षा अधिक दिक्प्रदेशों के संयोगों से युक्त पिण्ड में विप्रकृष्ट
बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी प्रकार दिक्प्रदेशों के अधिक संयोगों के साथ ज्ञात द्रव्य
की प्रतीति से ही उसकी अपेक्षा अल्प दिक्प्रदेशों के संयोगवाले पिण्ड में सन्निकृष्ट
बुद्धि उत्पन्न होती है । अतः परस्परापेक्ष होने के कारण परत्व और अपरत्व दोनों
की असत्ता की आपत्ति नहीं है ।
'कालकृतयोरपि कथम्' ? अर्थात् 'कथम्' इत्यादि सन्दर्भ से प्रश्न करते हैं कि
दिक्कृत परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति तो उपपादित हुई; किन्तु कालिक परत्व और

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३९८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
द्रष्टुर्युवानमवधिं कृत्वा स्थविरे विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्य परेण
कालप्रदेशेन संयोगात् परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि सन्निकृष्टा
बुद्धिरुत्पद्यते । ततस्तामपेक्ष्यापरेण कालप्रदेशेन संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिरिति ।
हुए केश और शरीर की शिथिलता (प्रभृति) की स्थिति, इन दोनों
स्थितियों के रहते हुए दोनों को देखनेवाले पुरुष को उक्त युवा पुरुष
की अपेक्षा उक्त वृद्ध पुरुष में 'विप्रकृष्ट' बुद्धि अर्थात् कालकृत परत्व
(ज्येष्ठत्व) की बुद्धि उत्पन्न होती है । इसके बाद इसी बुद्धि के साहाय्य
से दूसरे कालप्रदेश के साथ के संयोग से (वृद्ध पुरुष) में कालकृत
परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है । एवं इसी वृद्ध पुरुष की अपेक्षा
युवा पुरुष में 'सन्निकृष्ट' बुद्धि उत्पन्न होती है । इसी बुद्धि के साहाय्य
से दूसरे कालप्रदेश के साथ (युवा) पुरुष के संयोग से कालकृत अपरत्व
(कनिष्ठत्व) की उत्पत्ति होती है ।
न्यायकन्दली
कथिता, कालकृतयोरपि तयोरुत्पत्तिः कथमिति प्रश्नः । समाधानं वर्तमानकालयोरिति ।
द्वयोरेकस्मिन् वा पिण्डेऽविद्यमाने परत्वापरत्वे न भवतः, तदर्थं वर्तमानकालयोरित्युक्तम् ।
अनियतदिग्देशयोरित्येकदिश्यवस्थितयोर्भिन्नदिगवस्थितयोर्वा युवस्थविरयो रूढश्मश्रु च कार्क-
श्यं च वलिश्च पलितं च येषां कालविप्रकर्षलिङ्गानां सान्निध्ये सत्येकस्य द्रष्टुर्युवानं रूढ-
अपरत्व की उत्पत्ति किस प्रकार होती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'वर्तमान-
कालयोः' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा किया गया है । इस समाधान वाक्य में
'वर्त्तमानकालयोः' यह पद इसलिए दिया गया है कि चूँकि दोनों ही पिण्डों के न
रहने पर या दोनों में से किसी एक के न रहने पर भी (उनमें से किसी में) परत्व
या अपरत्व की उत्पत्ति नहीं होती है । 'अनियतदिग्देशयोः' अर्थात् एक दिशा में
अथवा विभिन्न दिशाओं में स्थित युवक और वृद्ध पुरुष में (से युवा पुरुष में
रहनेवाले) मूँछों का कड़ापन और देह का कड़ा गठन एवं (वृद्ध पुरुष की) झुर्री
और पके केश प्रभृति काल के ज्ञापक हेतुओं का सामीप्य रहने पर दोनों को
देखनेवाले किसी एक पुरुष को मूँछों की कड़ाई और देह के काठिन्य से युवा
पुरुष में अल्पकाल सम्बन्धरूप कनिष्ठत्व या सन्निकृष्ट बुद्धिरूप ज्येष्ठत्व की
अनुमिति होती है । इस अल्पकाल को अवधि मानकर झुर्री और पके केश वाले
वृद्ध पुरुष में अधिककाल सम्बन्धरूप ज्येष्ठत्व या कालविप्रकृष्टत्व की बुद्धि उत्पन्न
होती है । इस प्रकार उस वृद्ध पुरुष में कालिक परत्व (ज्येष्ठत्व) की उत्पत्ति

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३९९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३९९
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशस्त्वपेक्षाबुद्धिसंयोगद्रव्यविनाशात् ।
अपेक्षाबुद्धिविनाशात् तावदुत्पन्ने परत्वे यस्मिन् काले सामान्य-
बुद्धिरुत्पन्ना भवति, ततोऽपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता, सामान्यज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः
(परत्व और अपरत्व इन दोनों का) विनाश (इन सात) रीतियों में
से किसी रीति से होता है—१. अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से, २. संयोग के
विनाश से, ३. द्रव्य के विनाश से, ४. द्रव्य और अपेक्षा-बुद्धि इन
दोनों के विनाश से, ५. द्रव्य और संयोग इन दोनों के विनाश से,
६.संयोग और अपेक्षा-बुद्धि इन दोनों के विनाश से एवं ७. अपेक्षा-
बुद्धि, द्रव्य एवं संयोग इन तीनों के विनाश से ।
१. अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश इस
प्रकार होता है कि परत्व (या अपरत्व) की उत्पत्ति के बाद जिस समय
(परत्व या अपरत्व में रहनेवाले) सामान्य (परत्वत्वादि जातियों) की
न्यायकन्दली
श्मश्रुकार्कशाद्यभावानुमितमल्पोत्पत्तिकालमवधिं कृत्वा रूढश्मश्रुवलिपलितादिमति स्थविरे
विप्रकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धिमपेक्ष्य परेणादित्यपरिवर्तनभूयस्त्ववता कालप्रदेशेन
संयोगादसमवायिकारणात् तस्मिन्नेव स्थविरे परत्वस्योत्पत्तिः, स्थविरं चावधिं कृत्वा यूनि
सन्निकृष्टा बुद्धिरुत्पद्यते, तां बुद्धिमपेक्ष्यापरेणादित्यपरिवर्त्तनोपलक्षितेन कालप्रदेशेन
संयोगादपरत्वस्योत्पत्तिः । युवस्थविरशरीरयोः कालसंयोगाल्पीयस्त्वभूयस्त्वे शरीर-
सन्तानापेक्षया, न तु व्यक्तिविषयत्वेन, तयोः प्रतिक्षणं विनाशात् ।
होती है, जिसमें वह पुरुष समवायिकारण है एवं सूर्य की अधिक क्रियावाले काल
प्रदेश के साथ उस पुरुष का संयोग असमवायिकारण है एवं उक्त विप्रकृष्ट बुद्धि
निमित्तकारण है । (इसी प्रकार) वृद्ध पुरुष को अवधि मानकर युवा पुरुष में
अल्पकाल सम्बन्धरूप सन्निकृष्ट बुद्धि की उत्पत्ति होती है । इसी बुद्धिरूप
निमित्तकारण से युवा पुरुषरूप समवायिकारण में कालिक अपरत्व (कनिष्ठत्व) की
उत्पत्ति होती है, जिसका असमवायिकारण आदित्य की अल्पगति से परिमित
कालप्रदेश और उस युवा पुरुष का संयोग है । यद्यपि युवा शरीर और वृद्ध
शरीर दोनों ही क्षणिक हैं, (अतः दोनों ही के एक-एक शरीर में समान ही काल
का सम्बन्ध है) अतः दोनों में अधिककाल सम्बन्ध और अल्पकाल सम्बन्ध
वर्तमानकाल के दोनों शरीर के समुदायों को दृष्टि में रखकर कहा गया है ।

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४०० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतत्येकः कालः। ततोऽपेक्षाबुद्धेर्विनाशो गुणबुद्धे-
श्चोत्पत्तिः, ततोऽपेक्षाबुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता, गुणज्ञान-
बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि को विनष्ट करनेवाले
कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं एवं (परत्वादि में रहनेवाले उक्त) सामान्य
एवं सामान्य के ज्ञान और परत्वादि गुणों के साथ उक्त सामान्य का
सम्बन्ध इन सबों से परत्वादि गुणविषयक बुद्धि के उत्पादक कारण-
समूह भी एकत्र हो जाते हैं । ये सभी कार्य एक समय में होते
हैं । उसके बाद (एक ही समय) अपेक्षा-बुद्धि का विनाश और
(परत्वादि) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, इसके बाद
अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से परत्वादि गुणों के विनाशक कारणसमूह का
एकत्र होना, परत्वादि गुण, उसके ज्ञान एवं द्रव्य के साथ परत्वादि
न्यायकन्दली
कृतकस्यावश्यं विनाशः, स च निर्हेतुको न भवतीति परत्वापरत्वयोर्विनाशहेतुमाह-
विनाशस्त्विति । परत्वापरत्वयोर्विनाशोऽपेक्षाबुद्धिविनाशात्, संयोगविनाशात्, द्रव्यविना-
शात्, द्रव्यापेक्षाबुद्धयोर्विनाशात्, द्रव्यसंयोगयोर्विनाशात्, संयोगापेक्षाबुद्धयोर्विनाशात्, अपेक्षा-
बुद्धिसंयोगद्रव्याणां विनाशादिति सप्तविधो विनाशक्रमः ।
(१) अपेक्षाबुद्धिविनाशात् तावद्विनाशः कथ्यते । उत्पन्ने परत्वे
यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्ये बुद्धिरुत्पन्ना भवति। तत इति सप्तम्यर्थे सार्व-
जिसकी उत्पत्ति होती है उसका विनाश भी अवश्य ही होता है । एवं विनाश
भी बिना कारणों के नहीं होता । अतः (परत्व और अपरत्व की उत्पत्ति के
निरूपण के बाद) परत्व और अपरत्व के विनाश के हेतुओं का निरूपण
'विनाशस्तु' इत्यादि सन्दर्भ से किया गया है । विनाश इन सात प्रकार के
विनाशक्रमों में से ही किसी से होता है-(परत्व और अपरत्व का विनाश) (१)
अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से, (२) संयोग के विनाश से, (३) द्रव्य के विनाश से,
(४) द्रव्य और अपेक्षा-बुद्धि दोनों के विनाश से, (५) द्रव्य और संयोग इन दोनों
के विनाश से (६) संयोग और अपेक्षा-बुद्धि इन दोनों के विनाश से एवं (७)
अपेक्षा-बुद्धि, संयोग और द्रव्य, इन तीनों के विनाश से ।
इनमें क्रमप्राप्त सबसे पहले (१) अपेक्षा-बुद्धि के विनाश से होनेवाले परत्व और
अपरत्व के विनाश का क्रम 'अपेक्षाबुद्धिविनाशात्तावत्' इत्यादि सन्दर्भ से उपपादित
हुआ है । 'ततः' इस पद में सप्तमी विभक्ति के अर्थ में 'तसिल्' प्रत्यय है । इसी समय

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ४०१
प्रशस्तपादभाष्यम्
तत्सम्बन्धेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः ततो द्रव्यबुद्धेरुत्पत्तिर्गुणस्य
विनाश इति ।
संयोगविनाशादपि कथम् ? अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव परत्वाधारे
कर्मोत्पद्यते । तेन कर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते । अपेक्षाबुद्धितः
गुणों का सम्बन्ध इन सबों से (परत्वादि गुण से युक्त) द्रव्यविषयक बुद्धि
के उत्पादक कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं । इतने सारे काम एक ही
समय होते हैं । इसके बाद (परत्वादि गुणविशिष्ट) द्रव्य विषयक
(विशिष्ट) बुद्धि की उत्पत्ति और परत्वादि गुणों का विनाश ये दोनों
काम एक ही समय होते हैं ।
२. (प्र.) केवल संयोग के विनाश से (परत्व और अपरत्व का विनाश)
किस प्रकार होता है ? (उ.) (जहाँ) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही
परत्वादि गुणों के आधारभूत द्रव्य में क्रिया होती है, एवं उस क्रिया के द्वारा
उस द्रव्य और दिक्प्रदेश इन दोनों का विभाग उत्पन्न होता है, और अपेक्षा-
न्यायकन्दली
विभक्तिस्तसिलिति तसिल् । एतस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेर्विनश्यत्ता विनाश-
कारणासन्निध्यम् । सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः परत्वसामान्यं च, परत्वसामान्यज्ञानं च,
परत्वगुणसम्बन्धश्च, तेभ्यः परत्वगुणबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । परत्वसामान्यज्ञान-
मेवापेक्षाबुद्धिविनाशकारणम्, गुणबुद्धेश्चोत्पत्तिकारणम्, अतस्तदुत्पाद एवापेक्षाबुद्धे-
र्विनश्यत्ता गुणबुद्धेश्चोत्पद्यमानता स्यात् । ततः क्षणान्तरेऽपेक्षाबुद्धेर्विनाशः,
परत्वगुणबुद्धेश्चोत्पादः । ततस्तस्मादपेक्षाबुद्धिविनाशाद् गुणस्य विनश्यत्ता । गुणश्च
गुणज्ञानं च तत्सम्बन्धश्च तेभ्यो द्रव्यबुद्धेरुत्पद्यमानतेत्येकः कालः । अपेक्षाबुद्धिविनाशो
(अर्थात् परत्व की उत्पत्ति हो जाने पर जिस समय परत्व गुण में रहनेवाले सामान्य का
ज्ञान होता है, उसके बाद) अपेक्षा-बुद्धि की 'विनश्यत्ता' अर्थात् विनाश के सभी
कारणों का समावेश होता है । 'सामान्यतज्ज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः' (इस भाष्य सन्दर्भ
का) 'परत्वसामान्यञ्च परत्वसामान्यज्ञानञ्च परत्वगुणसम्बन्धश्च तेभ्यः' इस व्युत्पत्ति
के अनुसार यह अभिप्राय है कि परत्वसामान्य एवं परत्वसामान्य का ज्ञान और
परत्वगुण का सम्बन्ध, इन तीन कारणों से 'परत्वगुण की उत्पद्यमानता' अर्थात् परत्व-
गुण के उत्पादक सभी कारणों का संनिवेश होता है, ये सभी काम एक ही समय
होते हैं । परत्वसामान्य का ज्ञान ही अपेक्षाबुद्धि के विनाश एवं गुणबुद्धि की उत्पत्ति
इन दोनों का कारण है। अतः अपेक्षाबुद्धि की विनश्यत्ता और गुणबुद्धि की उत्पद्यमा-
नता दोनों ही वस्तुतः परत्वसामान्य बुद्धि की उत्पत्ति स्वरूप ही हैं । इसके बाद
दूसरे क्षण में अपेक्षाबुद्धि का विनाश होगा एवं परत्वगुणबुद्धि की उत्पत्ति होगी । 'ततः'

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४०२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः, ततः सामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः, दिक्पिण्ड-
संयोगस्य च विनाशः । ततो यस्मिन् काले गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव
बुद्धि के द्वारा परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है । उसके बाद (परत्वादि
गुणों में रहनेवाले) सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, उक्त द्रव्य और पूर्व-
दिक्प्रदेश इन दोनों के संयोग का नाश, ये दोनों काम एक ही समय होते
हैं । इसके बाद जिस समय परत्वादिविषयक (विशिष्ट) बुद्धि की उत्पत्ति
होती है, उसी समय (कथित) दिक्प्रदेश और (परत्वादि गुणों के आधार-
न्यायकन्दली
गुणविनाशस्य कारणम्, गुणबुद्धिश्च द्रव्यबुद्धेः कारणम्, अपेक्षाबुद्धिविनाशगुणबुद्ध्युत्पादौ
च युगपत् स्याताम्, अतो गुणस्य विनश्यत्ता द्रव्यबुद्धेश्चोत्पद्यमानतापि युगपत् स्यात् ।
ततः परत्वविशिष्टद्रव्यबुद्धेरुत्पादः परत्वगुणस्य च विनाशः ।
संयोगविनाशादपि कथं परत्वापरत्वयोर्विनाश इति प्रश्ने कृते
सत्याह-अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव परत्वस्याधारे पिण्डे कर्मोत्पद्यते,
क्षणान्तरे तेन कर्मणा दिशः परत्वाधारपिण्डस्य च विभागः क्रियते, अपेक्षा-
इसके बाद, अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुण की विनश्यत्ता (उत्पन्न होती है) ।
'गुणज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः' (इस भाष्यपङ्क्ति का) गुणश्च गुणज्ञानञ्च तत्सम्बन्धश्च
तेभ्यः' (इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह अभिप्राय है कि) गुण एवं गुण का ज्ञान
और गुण का सम्बन्ध इन तीनों से द्रव्यबुद्धि (अर्थात् परत्व गुणविशिष्ट द्रव्य बुद्धि
की) उत्पद्यमानता निष्पन्न होती है । ये सभी काम एक ही समय होते हैं ।
अपेक्षाबुद्धि का विनाश (परत्वादि) गुणों के विनाश का कारण है । गुणबुद्धि
(गुणविशिष्ट) द्रव्यबुद्धि का कारण है । अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और
गुणबुद्धि का उत्पादन दोनों एक ही समय होते हैं । इसीलिए गुण की विनश्यत्ता
और द्रव्यबुद्धि की उत्पद्यमानता ये दोनों ही एक ही समय होंगी । एवं इसी कारण
(परत्व) गुण की विनश्यत्ता और (परत्वगुण विशिष्ट) द्रव्य बुद्धि की उत्पद्यमानता
ये दोनों भी एक ही समय होंगी । इसके बाद परत्वगुण विशिष्ट द्रव्यबुद्धि की
उत्पत्ति एवं परत्व गुण का विनाश होगा ।
(२) केवल संयोग के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश किस रीति से
(किस स्थिति में) होता है ? यह प्रश्न किये जाने पर 'अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव' इत्यादि
सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जहाँ निम्नलिखित स्थिति होती है, वहाँ संयोग के
विनाश से परत्व का विनाश होता है । (जैसे) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही
पिण्ड (परत्वादि के आधार पर भूत द्रव्य) में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के
द्वारा आगे दूसरे क्षण में उक्त पिण्ड का पूर्व दिशा के साथ विभाग उत्पन्न होता है,

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०३
प्रशस्तपादभाष्यम्
काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशाद् गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यविनाशादपि कथम् परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्नं यस्मिन्नेव
कालेऽवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षा-
भूत द्रव्य इन दोनों के) संयोग के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश
होता है ।
३. (प्र.) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से (परत्वादि गुणों का)
विनाश किस प्रकार (किस स्थिति में) होता है ? (उ.) (जहाँ)
परत्वादिगुणों के आधारभूत द्रव्य (के एक अवयव) में उत्पन्न हुई क्रिया
जिस समय एक अवयव का दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है,
न्यायकन्दली
बुद्धेश्च परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । तत उत्पन्ने परत्वे परत्वसामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः
दिक्पिण्डसंयोगस्य च विभागाद् विनाश इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले
सामान्यज्ञानाद् गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव काले दिक्पिण्डसंयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशो
नापेक्षाबुद्धिविनाशात्, अपेक्षाबुद्धेरपि तदानीमेव विनाशात् ।
द्रव्यविनाशादपि कथं विनाश इत्याह-परत्वाधारावयव इति । भविष्यतः
परत्वस्याधारो द्रव्यम्, तस्यावयवे कर्मोत्पन्नं यदाऽवयवान्तराद् विभागं करोति,
तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले
द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, तस्मिन्नेव कालेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वमुत्पद्यते । ततः
एवं अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही
समय होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्वगत जातिरूप) सामान्य के ज्ञान से
गुणविशिष्टद्रव्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय दिशा और
(परत्व के आधारभूत द्रव्य रूप) पिण्ड इन दोनों के संयोग के विनाश से परत्व
का भी विनाश होता है । (यहाँ) परत्व का विनाश अपेक्षाबुद्धि के विनाश से
सम्भव नहीं है, क्योंकि उसी समय (परत्वनाश के समय ही) अपेक्षाबुद्धि का भी
विनाश होता है ।
(३) (आधारभूत) द्रव्य के विनाश से परत्वादि का विनाश किस प्रकार होता है ?
इस प्रश्न का उत्तर 'परत्वाधारावयवे' इत्यादि ग्रन्थ से दिया गया है । उत्पन्न होनेवाले
परत्व के आधारभूत अवयवि द्रव्य ही (प्रकृत में 'परत्वाधार' शब्द से इष्ट है) इस (द्रव्य)
के अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय (अपने आधारभूत एक अवयव द्रव्य
का) दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि भी उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश

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४०४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धिरुत्पद्यते । ततो विभागाद् यस्मिन्नेव काले संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले
परत्वमुत्पद्यते । ततः संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, तद्विनाशाच्च तदाश्रितस्य
गुणस्य विनाशः ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे
इसके बाद जिस समय उक्त विभाग के द्वारा परत्वादि के आधारभूत
द्रव्य के उत्पादक दोनों अवयवों के संयोग का नाश होता है, उसी समय
परत्वादि गुणों की उत्पत्ति भी होती है । इसके बाद (उक्त) संयोग के
विनाश से (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य का नाश होता है, एवं द्रव्य
के विनाश से उसमें रहनेवाले परत्वादि गुणों का भी नाश हो जाता है ।
४. एक ही समय (परत्वादि के आधारभूत) द्रव्य और अपेक्षाबुद्धि
इन दोनों के विनाश से परत्वादि गुणों का विनाश (कहाँ और किस
न्यायकन्दली
संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः । ततो द्रव्यविनाशात् तदाश्रितस्य गुणस्य विनाशः ।
तदानीमेव परत्वसामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाशः, आश्रयविनाशाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश
इत्यनयोर्न हेतुत्वं सहभावित्वात् ।
द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदैव परत्वाधारावयवे
कर्मोत्पद्यते, तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः क्रियते, परत्व-
स्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्यारम्भक-
होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि के द्वारा परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इसके बाद
उक्त संयोग के विनाश से (अवयवि) द्रव्य का विनाश होता है । चूँकि परत्वगुण में
रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का विनाश एवं (उक्त अवयवी रूप)
आश्रय के विनाश से दिशा और पिण्ड के संयोग का विनाश, ये दोनों भी उसी
समय उत्पन्न होते हैं, अतः (परत्व के विनाशक रूप में कथित होने पर भी) ये
दोनों प्रकृत में परत्वादि के विनाशक नहीं हो सकते ।
(४) एक ही समय उत्पन्न होनेवाले द्रव्य का विनाश, और अपेक्षा बुद्धि का
विनाश इन दोनों से किस प्रकार परत्वादि का विनाश होता है ? 'द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योः'
इत्यादि से इस प्रश्न का उपपादन किया गया है, एवं 'यदैव परत्वाधारावयवे'
इत्यादि से उसके समाधान का उपपादन हुआ है । (जहाँ) जिस समय परत्व के

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४०५

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४०५
प्रशस्तपादभाष्यम्
कर्मोत्पद्यते तदैवापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते । कर्मणा चावयवान्तराद्विभागः
क्रियते, परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव कालेऽवयव-
विभागाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशस्तस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धि-
रुत्पद्यते, तदनन्तरं संयोगविनाशाद् द्रव्यविनाशः, सामान्य-
क्रिया) और अपेक्षाबुद्धि दोनों एक ही समय उत्पन्न होती हैं, एवं क्रिया उसी
समय दोनों अवयवों में विभाग को उत्पन्न करती है, एवं (अपेक्षाबुद्धि) परत्वादि
गुणों को उत्पन्न करती है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं ।
इसके बाद जिस समय उक्त विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का
विनाश होता है, उसी समय (परत्वादिगुणों में रहनेवाली) सामान्य (जाति)
विषयक बुद्धि भी उत्पन्न होती है । इसके बाद (उक्त संयोग के नाश से)
न्यायकन्दली
संयोगविनाशः, तस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यज्ञानमुत्पद्यते । तदनन्तरं संयोगविनाशाद्
द्रव्यविनाशः, सामान्यबुद्धेश्चापेक्षाबुद्धेरपि विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षा-
बुद्धयोर्विनाशात् परत्वस्य विनाशः, प्रत्येकमनयोर्भयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वप्रतीतेः ।
इह चान्यतरविशेषानवधारणादुभयोरपि विनाशं प्रति कारणत्वम् ।
आधारभूत द्रव्य के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है, उसी समय क्रिया से उसके
आधारभूत अवयव द्रव्य का दूसरे अवयव से विभाग उत्पन्न होता है, एवं (उक्त
अवयवी द्रव्य में) परत्व की भी उत्पत्ति होती है । इतने सारे काम एक ही समय
होते हैं । इसके बाद जिस समय अवयवों के विभाग से द्रव्य (अवयवि) के
उत्पादक संयोग का विनाश होता है, उसी समय परत्व (में रहनेवाले) सामान्य का
ज्ञान भी उत्पन्न होता है । इसके बाद (अवयवों के) संयोग के विनाश से द्रव्य का
विनाश होता है, एवं कथित सामान्य विषयक ज्ञान से अपेक्षा बुद्धि का भी विनाश
होता है । इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद परत्व का विनाश
होता है, वह द्रव्य विनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश, इन दोनों से ही होता
है; क्योंकि इन दोनों में से प्रत्येक में परत्व विनाश की कारणता स्वीकृत हो चुकी
है । एवं दोनों में से किसी एक में किसी विशिष्टता की प्रतीति नहीं होती, जिससे
कि किसी एक को ही कारण मानें दूसरे को नहीं, अतः (समानयुक्ति रहने के
कारण) दोनों को ही परत्व-विनाश का कारण मानना पड़ता है ।

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४०६ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धेश्चापेक्षाबुद्धिर्विनाश इत्येकः कालः । ततो द्रव्यापेक्षाबुद्ध्योर्विनाशात्
परत्वस्य विनाशः ।
द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथम् ? यदा परत्वाधारावयवे कर्मोत्पन्न-
मवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग-
पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले विभा-
द्रव्य का नाश एवं उक्त सामान्यविषयक बुद्धि और अपेक्षाबुद्धि इन
दोनों का भी नाश होता है । इसके बाद उक्त द्रव्यनाश और अपेक्षा-
बुद्धि का विनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
(५) (प्र.) द्रव्यनाश और संयोगनाश इन दोनों से परत्वादि गुणों
का विनाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय
परत्वादि के आधारभूत द्रव्यके अवयवमें उत्पन्न क्रिया उसके दूसरे अवयव
से विभाग को उत्पन्न करती है, उसी समय परत्वादि के आधारभूत (अवयवि)
द्रव्य में भी क्रिया एवं अपेक्षाबुद्धि दोनों की उत्पत्ति पहिले की तरह होती
है, इसके बाद जिस समय परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है, उसी
न्यायकन्दली
द्रव्यसंयोगविनाशादपीत्यादि । द्रव्यसंयोगविनाशादपि कथंम् विनाशः ? यदा परत्वा-
धारावयवे कर्मोत्पन्नमवयवान्तराद्विभागं करोति, तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मापेक्षाबुद्ध्योर्युग-
पदुत्पत्तिः । ततो यस्मिन्नेव काले परत्वस्योत्पत्तिस्तस्मिन्नेव कालेऽवयवविभागाद् द्रव्या-
रम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डस्य च विभागः क्रियत इत्येकः कालः ।
ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते, तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्ड-
(५) 'द्रव्यसंयोगादवि' इत्यादि भाष्यग्रन्थ के द्वारा यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य
का विनाश और संयोग का विनाश इन दोनों से परत्वादि का विनाश कैसे होता
है ? (उ.) (जहाँ) जिस समय परत्वादि के आधारभूत अवयव में कर्म उत्पन्न होकर
अपने आश्रयरूप अवयव का दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करता है, उसी
समय एक साथ ही अवयवी में क्रिया और अपेक्षाबुद्धि इन दोनों की उत्पत्ति
होती है । इसके बाद जिस समय परत्व की उत्पत्ति होती है, उसी समय अवयवों के
विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का भी विनाश होता है । एवं अवयवी की क्रिया
के द्वारा दिशा से अवयवी का विभाग भी उत्पन्न होता है। इतने सारे काम एक ही समय
होते हैं । इसके बाद जिस समय (परत्व गुण में रहनेवाले) सामान्य का ज्ञान होता है, उसी
समय द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश से अवयवी का विनाश भी उत्पन्न होता है ।

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०७
प्रशस्तपादभाष्यम्
गाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः, पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डस्य च विभागः
क्रियत इत्येकः कालः । ततो यस्मिन्नेव काले सामान्यबुद्धिरुत्पद्यते,
तस्मिन्नेव काले द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, पिण्ड-
समय विभाग से द्रव्य के उत्पादक संयोग का नाश, और (उक्त अवयवि-
रूप) पिण्ड की क्रिया से पिण्ड का पूर्वदिक्प्रदेश से विभाग, ये दोनों
काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद जिस समय सामान्य विषयक बुद्धि
उत्पन्न होती है, उसी समय (अवयवि) द्रव्य के उत्पादक संयोग के विनाश
से (परत्वादि के आधारभूत अवयवि) पिण्डद्रव्य का विनाश, और पिण्ड के
विनाश से (पूर्वदिक् प्रदेश के साथ) पिण्डसंयोग का विनाश भी होता
न्यायकन्दली
विनाशः, पिण्डविनाशाच्च पिण्डसंयोगविनाशः, ततो गुणबुद्धिसमकालं पिण्डदिक्पिण्ड-
संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः । अपेक्षाबुद्धिविनाशास्तु न कारणम्, तदानीमेव
सामान्यबुद्धेस्तस्य सम्भवात् ।
संयोगापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् । यदा परत्वमुत्पद्यते तदा
परत्वस्याधारे द्रव्ये कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यबुद्धिरुत्पद्यते
परत्वस्याधारे तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते । ततः
सामान्यबुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशो दिक्पिण्डविभागाच्च दिक्पिण्डसंयोग-
एवं अवयवी के विनाश से उसमें रहनेवाले संयोग का भी विनाश होता जाता है ।
इसके बाद जिस समय परत्व गुण (विशिष्टद्रव्य) की बुद्धि उत्पन्न होती है, उसी
समय परत्व का विनाश भी होता है । अपेक्षाबुद्धि का विनाश यहाँ परत्व के
विनाश का कारण नहीं हो सकता, क्योंकि परत्व के विनाश के काल में ही परत्व
में रहनेवाले सामान्य के ज्ञान से वह उत्पन्न होती है ।
(६) (प्र.) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से परत्व
का विनाश किस प्रकार होता है ? (उ.) (इस प्रकार होता है कि) जिस समय
परत्व उत्पन्न होता है उसी समय परत्व के आधारभूत द्रव्य में क्रिया भी उत्पन्न
होती है । इसके बाद जिस समय परत्व में रहनेवाले सामान्य का ज्ञान उत्पन्न होता
है, उसी समय परत्व के आधार भूत द्रव्य में उसी में रहनेवाली क्रिया से दिशा के साथ
उसका विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद परत्व में रहनेवाले सामान्य विषयक
बुद्धि के विनाश से अपेक्षाबुद्धि का विनाश उत्पन्न होता है, एवं दिशा और (परत्व के

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४०८ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशाच्च पिण्डसंयोगविनाशः । ततो गुणबुद्धि समकालं पिण्डदिक्पिण्ड-
संयोगाविनाशात् परत्वस्य विनाशः ।
संयोगापेक्षाबुद्धयोर्युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदा परत्वमुत्पद्यते, तदा
परत्वाधारे कर्म, ततो यस्मिन्नेव काले परत्वसामान्यबुद्धिरुत्पद्यते,
तस्मिन्नेव काले पिण्डकर्मणा दिक्पिण्डविभागः क्रियते, ततः सामान्य-
है । इसके बाद (परत्वादि) गुणविषयक बुद्धि की उत्पत्ति के समय
(परत्वादि के आधारभूत) पिण्ड के नाश और पिण्ड का (पूर्वदिक् प्रदेश
के साथ) संयोग के नाश, इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
(६) एक ही समय संयोग और अपेक्षाबुद्धि दोनों के विनाश से
(कहाँ और) किस स्थिति में परत्वादिगुणों का विनाश होता है ? (उ.)
(जहाँ) जिस समय परत्वादि की उत्पत्ति होती है, उसी समय उनके
आधारभूत द्रव्यों में क्रिया भी उत्पन्न होती है । इसके बाद जिस समय
परत्वादि गुणों में रहनेवाले (परत्वादि) सामान्यविषयक बुद्धि उत्पन्न
होती है, उसी समय पिण्ड (द्रव्य) की क्रिया से पूर्वदिक्प्रदेश के साथ
पिण्ड (द्रव्य) का विभाग भी उत्पन्न होता है । इसके बाद उक्त
सामान्यविषयक ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का विनाश और उक्त विभाग से
पूर्वदिक्प्रदेश के साथ पिण्ड के संयोग का विनाश इतने कार्य एक समय
में होते हैं । इसके बाद उक्त संयोगनाश और अपेक्षाबुद्धि का विनाश
इन दोनों से परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
न्यायकन्दली
विनाश इत्येकः कालः । ततः संयोगापेक्षाबुद्धिविनाशात् परत्वस्य विनाशः ।
द्रव्यविनाशस्तु तदानीं नास्त्येवेति न तस्य हेतुत्वम् ।
त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशादपि कथम् ?
आधारभूत) द्रव्य के विभाग से उन दोनों के संयोग का नाश होता है । इतने सारे
काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद कथित (दिक्पिण्ड) संयोग और
अपेक्षाबुद्धि इन दोनों के विनाश से परत्व विनाश होता है । उस समय द्रव्य का
विनाश नहीं है, अतः वह (उस समय के परत्व विनाश का) कारण नहीं हो सकता ।
(७) 'त्रयाणाम्' इत्यादि वाक्य के द्वारा (समवायि चासमवायि च निमित्तञ्च समवाय्य-
समवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानि) इस
विग्रह के अनुसार यह प्रश्न किया गया है कि द्रव्य या रूप समवायिकारण, दिक्पिण्ड

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४०९
प्रशस्तपादभाष्यम्
बुद्धितोऽपेक्षाबुद्धिविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्डसंयोगविनाश इत्येकः कालः ।
ततः संयोगविनाशात् परत्वस्य विनाशः। त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां
युगपद्विनाशादपि कथम् ? यदापेक्षाबुद्धिरुत्पद्यते, तदा पिण्डावयवे कर्म, ततो
यस्मिन्नेव काले कर्मणाऽवयवान्तराद्विभागः क्रियतेऽपेक्षाबुद्धेः परत्वस्य
चोत्पत्तिस्तस्मिन्नेव काले पिण्डेऽपि कर्म, ततोऽवयवविभागात् पिण्डारम्भकसंयोग-
(७) (प्र.) समवायिकारण (परत्वादि के आधारभूत द्रव्य) असमवायि-
कारण (दिक्प्रदेशसंयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों के
नाश से परत्वादि गुणों का नाश (कहाँ और) किस स्थिति में होता है ?
(उ.) जहाँ जिस समय अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति होती है, उसी समय
(परत्वादि के समवायिकारण) पिण्ड के अवयव में क्रिया उत्पन्न होती है ।
इसके बाद जिस समय उक्त क्रिया से (एक अवयव का) दूसरे अवयव से
विभाग उत्पन्न होता है, उसी समय अपेक्षाबुद्धि और परत्वादि गुण इन
दोनों की उत्पत्ति होती है । एवं पिण्ड (अवयवि) में भी क्रिया उसी समय
उत्पन्न होती है । इसके बाद अवयवों के उक्त विभाग से पिण्ड के
न्यायकन्दली
समवायि चासमवायि च निमित्तं च समवाय्यसमवायिनिमित्तानि, तानि च कारणानि चेति
समवाय्यसमवायि निमित्तकारणानि द्रव्यसंयोगापेक्षाज्ञानानि, तेषां त्रयाणां युगपद्विनाशात्
कथं परत्वस्य विनाश इति प्रश्ने कृते प्रत्युत्तरमाह - यदेति । इत्येतत् सर्वं युगपद्भवति कारण-
यौगपद्यात्, ततश्च त्रयाणां समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश
इति । परत्वस्य विनाश इत्युपलक्षणमिदम् । अपरत्वस्याप्ययमेव विनाशक्रमो दर्शयितव्यः ।
संयोग रूप असमवायिकरण, एवं अपेक्षाबुद्धिरूप निमित्तकारण, इन तीनों कारणों
के एक ही समय विनाश के कारण परत्व का विनाश किस प्रकार होता है ? इसी
प्रश्न के उत्तर में 'यदा' इत्यादि भाष्य सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जब एक ही
समय उक्त तीनों कारणों के विनाश कारणसमूह एकत्र हो जाते हैं, तो फिर तीनों
का एक ही समय विनाश हो जाता है । इसके बाद परत्व के तीनों कारणों के
विनाश से परत्व का विनाश हो जाता है । इस प्रकरण में 'परत्वविनाश' शब्द
उपलक्षणमात्र है (नियामक नहीं), अतः इसी से अपरत्व नाश का भी यही क्रम
जानना चाहिए ।

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४१० न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशः पिण्डकर्मणा च दिक्पिण्डविभागः क्रियते, सामान्यबुद्धेश्चोत्पत्ति-
रित्येकः कालः । ततः संयोगविनाशात् पिण्डविनाशः, विभागाच्च दिक्पिण्ड-
संयोगविनाशः, सामान्यज्ञानादपेक्षाबुद्धेर्विनाश इत्येतत् सर्वं युगपत् त्रयाणां
समवाय्यसमवायिनिमित्तकारणानां विनाशात् परत्वस्य विनाश इति ॥
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इति पर्यायाः । सा चानेकप्रकारा, अर्थानन्त्यात्
प्रत्यर्थनियतत्वाच्च ।
उत्पादक संयोग का विनाश, और अवयवी (पिण्ड) की क्रिया, उसका
पूर्वदिक्प्रदेश के साथ विभाग और सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति,
इतने सारे काम एक ही समय होते हैं । इसके बाद उक्त संयोग के
विनाश से पिण्ड का विनाश एवं पूर्वदिशा और पिण्ड के विभाग से इन
दोनों के संयोग का नाश, एवं सामान्य ज्ञान से अपेक्षाबुद्धि का नाश
होता है । इस प्रकार एक ही समय समवायिकारण (परत्वादि के
आधारभूत पिण्डद्रव्य), असमवायिकारण (उक्त पिण्ड का पूर्वादि
दिक्प्रदेशों के साथ संयोग) और निमित्तकारण (अपेक्षाबुद्धि) इन तीनों
के विनाश से (भी) परत्वादि गुणों का विनाश होता है ।
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान और प्रत्यय (ये सभी) शब्द अभिधावृत्ति के
द्वारा एक ही अर्थ के बोधक हैं ।
यह अनेक (अनन्त) प्रकार की है, क्योंकि इसके विषय अनन्त हैं
और यह प्रत्येक विषय में स्वतन्त्र रूप से (भी) अवश्य ही सम्बद्ध है ।
न्यायकन्दली
बुद्धिजे परत्वापरत्वे इति समर्थिते । अथ केयं बुद्धिरित्याह-बुद्धिरित्यादि ।
प्रधानस्य विकारो महदाख्यमन्तःकरणं चित्तपर्यायबुद्धिः । बुद्धी-
यह समर्थन कर चुके हैं कि परत्व और अपरत्व दोनों ही बुद्धि से उत्पन्न होते
हैं । किन्तु 'यह बुद्धि कौन-सी वस्तु है ?' (इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर)
'बुद्धिः' इत्यादि पङ्क्ति से देते हैं ।
सांख्याचार्यों का कहना है कि प्रकृति (प्रधान) का महत् नाम का विकाररूप
अन्तःकरण ही 'बुद्धि' है, जिसे 'चित्त' भी कहते हैं। इस बुद्धि की वह विषयाकार की

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४११

Page 376Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४११
प्रशस्तपादभाष्यम्
तस्याः सत्यप्यनेकविधत्वे समासतो द्वे विधे-विद्या चाविद्या चेति ।
तत्राविद्या चतुर्विधा-संशयविपर्ययानध्यवसायस्वप्नलक्षणा ।
संशयस्तावत् प्रसिद्धानेकविशेषयोः सादृश्यमात्रदर्शनादुभय-
विशेषास्मरणार्द्धर्म्माच्च किंस्विदित्युभयालम्वी विमर्शः
यह (बुद्धि व्यक्तिशः) अनन्त प्रकार की होने पर भी संक्षेप में (१)
विद्या (यथार्थज्ञान) और २. अविद्या (अयथार्थ ज्ञान) भेद से दो प्रकार
की है । इनमें अविद्या के (१) संशय (२) विपर्यय (३) अनध्यवसाय
और (४) स्वप्न, ये चार भेद हैं ।
जिन दो वस्तुओं के साधारण धर्म पहिले से ज्ञात हैं, उन दोनों के
केवल साधारण धर्म रूप सादृश्य के ज्ञान, एवं पश्चात् दोनों के असाधारण
धर्मों के स्मरण और अधर्म इन (तीनों हेतुओं) से 'यह अमुक वस्तु है ?
या उससे भिन्न ?' इस प्रकार के दो विरुद्ध विषयों का ज्ञान ही 'संशय'
है । यह (१) अन्तःसंशय और (२) बहिःसंशय भेद से दो प्रकार का
न्यायकन्दली
न्द्रियप्रणालिकया बाह्यविषयोपरक्तायास्तदाकारोपग्रहवती सत्त्वगुणाश्रयवृत्ति-
ज्ञानम्, प्राप्तविषयाकारोपग्राहां बुद्धौ प्रतिबिम्बितायाश्चेतनाशक्तेस्तद्वृत्यनुकार
उपलब्धिः । तथा चाह स्म भगवान् पतञ्जलिः - "अपरिणामिनी हि
भोक्तृशक्तिरप्रतिसङ्क्रमा च परिणामिन्यर्थे प्रतिसंक्रान्तेव तद्वृत्तिमनुभव-
तीति" इति । भोक्तृशक्तिरिति चितिशक्तिरुच्यते, सा चात्मैव ।
परिणामिन्यर्थ इति बुद्धितत्त्वे प्रतिसङ्क्रान्तेवेति प्रतिबिम्बितेवेत्यर्थः । तद्वृत्तिमनु-
भवति बुद्धौ प्रतिबिम्बिता सती बुद्धिच्छायापत्त्या बुद्धिवृत्त्यनुकारिणी
वृत्ति ही ज्ञान है, जिसमें सत्वगुण की प्रधानता रहती है, एवं जो ज्ञानेन्द्रिय के मार्ग
से बुद्धि के निकलने पर विषयों के साथ उसके सम्बद्ध होने के कारण उत्पन्न
होती है । एवं विषय के आकार में परिणत बुद्धि (ज्ञान में) प्रतिबिम्बित पुरुष
के उस वृत्ति के अनुकरण को ही 'उपलब्धि' कहते हैं । जैसा कि भगवान्
पतञ्जलि ने कहा है कि भोक्तृशक्ति अपरिणामिनी एवं किसी में प्रतिबिम्बित
होनेवाली नहीं है; किन्तु (बुद्धिरूप) परिणामी अर्थ में प्रतिबिम्बित की तरह
उसकी वृत्तियों का अनुभव करती है । अभिप्राय यह है कि चितिशक्ति को
ही भोक्तृशक्ति कहते हैं जो वस्तुतः आत्मा ही है । परिणामी अर्थ में-अर्थात्
बुद्धितत्व में 'प्रतिसंक्रान्तेव' अर्थात् प्रतिबिम्बित की तरह 'तद्वृत्तिमनुभवति'
अर्थात् बुद्धि की छाया पड़ने के कारण वह (चितिशक्ति) बुद्धि की वृत्तियों
का अनुकरण करने-सी लगती है । सुखादि आकार के (अहं सुखी-इत्यादि

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४१२ न्यायसन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
संशयः। स च द्विविधः - अन्तर्बहिश्च । अन्तस्तावद्यद् आदेशिकस्य सम्यङ्
मिथ्या चोद्दिश्य पुनरादिशतस्त्रिषु कालेषु संशयो भवति - 'किन्नु सम्यङ् मिथ्या
वा' इति ।
है । (१) अन्तःसंशय (का उदाहरण यह है कि जहाँ) किसी ज्योतिषी
ने (एक समय एक व्यक्ति के ग्रह स्थिति को देखकर उसे) कहा कि तुम्हें
अमुक इष्ट या अनिष्ट फल भूत काल में मिल चुका है, या भविष्य में
मिलनेवाला है (या) वर्त्तमान में भी है । उनका यह फलादेश सत्य हुआ ।
किन्तु उनके ही अन्य निर्देश मिथ्या सिद्ध हुए । (ऐसी स्थिति में वही
यदि) पुनः फलादेश करते हैं तो उस व्यक्ति को ज्योतिषी के इस आदेश
से उत्पन्न अपने ज्ञान में संशय होता है कि 'यह सत्य है या मिथ्या ?'
न्यायकन्दली
भवतीत्यर्थः । बुद्धेर्विषयः सुखाद्याकारः प्रत्ययः । तथा चाह स एव भगवान् - "शुद्धोऽपि
पुरुषः प्रत्ययं बौद्धमनुपश्यति, अनुपश्यंस्तदात्मापि तदात्मक इव प्रत्यवभासते" इति ।
एतत् सांख्यमतं निराकर्तुमाह-बुद्धिरित्यादि ।
यस्या अमी पर्यायशब्दाः, सा बुद्धिः । या पुनरियं प्रक्रियोपदर्शिता
सा प्रतीत्यभावादेव पराणुद्यते । विषयहानोपादानानुगुणमुत्पादव्ययधर्मकमेकम्,
तदधिकरणं चापरम्, यस्य तदुत्पादात् प्रवृत्तिनिवृत्ती स्याताम्, इत्युभयं
प्रत्यात्ममनुभूयते, न प्रकारान्तरम् । या चास्या बुद्धेर्वृत्तिः, सा किं बुद्धेरन्यानन्या वा ?
न तावदन्या, वृत्तिवृत्तिमतोरेकान्तिकतादात्म्याभ्युपगमात् । अथानन्या, तदा
आकार के) प्रत्यय ही बुद्धि के विषय हैं। जैसा कि भगवान् पतञ्जलि ने ही कहा
है कि पुरुष शुद्ध (अपरिणामी) होने पर भी बुद्धि की देखी हुई वस्तुओं को ही
उसके पीछे देखता है । उसके बाद देखने ही के कारण विषय स्वरूप न होने पर
भी विषय रूप से प्रतिभासित होता है ।
इसी सांख्यमत का खण्डन करने के लिए 'बुद्धि' इत्यादि पङ्क्ति लिखी गई है ।
अर्थात् अभिधावृत्ति के द्वारा इन सभी शब्दों से जिसका बोध हो वही 'बुद्धि' है ।
सांख्य के अनुयायियों की जो रीति ऊपर लिखी गयी है, वह साधारण प्रतीति के विरुद्ध
होने के कारण ही खण्डित हो जाती है । बुद्धि एक ऐसी वस्तु है ; जिसके द्वारा
(अभिमत) विषयों को ग्रहण और (प्रतिकूल विषयों का) त्याग होता है । एवं जिसकी

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३

Page 378Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ४१३
प्रशस्तपादभाष्यम्
बहिर्द्विविधः-प्रत्यक्षविषये चाप्रत्यक्षविषये च। तत्राप्रत्यक्षविषये तावत् साधारण-
लिङ्गदर्शनादुभयविशेषांनुस्मरणार्द्धर्माच्च संशयो भवति । यथाऽटव्यां विषाणमात्र-
दर्शनाद् गौर्गवयो वेति । प्रत्यक्षविषयेऽपि स्थाणुपुरुषयोरूर्ध्वतामात्रसादृश्यदर्शनाद्
बहिःसंशय दो प्रकार का है १. जिसके विषय प्रत्यक्ष प्रमाण के
द्वारा गृहीत हों एवं २. जिसके विषय प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत न हो सकें ।
इनमें अप्रत्यक्षविषय का बहिःसंशय वह है जो दोनों कोटियों में
रहनेवाले (साधारण) धर्म के ज्ञान, एवं दोनों कोटियों में से प्रत्येक के
असाधारण धर्म की अनुस्मृति (पश्चात्स्मरण) और अधर्म इन कारणों
से उत्पन्न होता है । जैसे जङ्गल में (जाने पर) केवल सींग के देखने पर
यह संशय होता है कि यह (सींगवाला) गो है या गवय ? प्रत्यक्ष के
द्वारा गृहीत होनेवाले विषयों के संशय (का यह उदाहरण है कि) स्थाणु
और पुरुष दोनों में समान रूप से रहनेवाला उच्चता (ऊँचाई) रूप
से सादृश्य का ज्ञान, दोनों में से प्रत्येक में रहनेवाली वक्रता
न्यायकन्दली
बुद्धेरेकत्वे विषयाकारवतीनां तद्वतीनामप्येकत्वात् त्रिचतुरादिप्रत्ययो दुर्लभः,
परस्परविलक्षणाकारसंवेदनाभावाद् बुद्ध्यारूढाकारमात्रवेदित्वाच्च पुरुषस्य । यथोक्तम् -
'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुष' इति । वृत्तीनां वा नानात्वे बुद्धेरपरापि नानात्वादेकत्वव्याघात'
इत्यादि दूषणमूह्यम् ।
बुद्धेर्भेदं निरूपयति-सा चानेकप्रकारेति । अत्र कारणमाह-अर्था-
उत्पत्ति और विनाश दोनों ही होते हैं । एवं जिसका कोई दूसरा आश्रय है ।
जिसमें उसकी उत्पत्ति से प्रवृत्ति और निवृत्ति दोनों ही उपपन्न होती हैं । (बुद्धि के
प्रसङ्ग में) इन्हीं दोनों प्रकारों का प्रत्येक आत्मा अनुभव करता है, दूसरे का नहीं ।
(इस प्रसङ्ग में यह प्रश्न भी उठता है कि) बुद्धि की यह कथित 'वृत्ति' बुद्धि से
भिन्न है या अभिन्न ? सांख्याचार्यगण वृत्ति और उसके आश्रय दोनों में अत्यन्त
अभेद मानते हैं, अतः (उनके मत से) ये दोनों भिन्न तो हो नहीं सकते । यदि
वृत्ति और वृत्तिमान में भेद मानें, तो ये तीन हैं, ये चार हैं इत्यादि विभिन्न प्रकार
की प्रतीतियाँ दुर्लभ होंगी, क्योंकि बुद्धि के एक होने के कारण उसकी वृत्ति
भी एक ही होगी, अतः वृत्तियों में परस्पर विशेष नहीं हो सकता, क्योंकि
सभी आकार एक ही बुद्धि में आरूढ हैं । जैसा कि (भगवान् पतञ्जलि ने)

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४१४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् | गुणे बुद्धि-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वक्रादिविशेषानुपलब्धितः स्थाणुत्वादिसामान्यविशेषानाभिव्यक्तावुभयविशेषानु-
स्मरणादुभयत्राकृष्यमाणस्यात्मनः प्रत्ययो दोलायते— किं नु खल्वयं स्थाणुः
स्यात् पुरुषो वेति ?
(टेढ़ापन) और हस्तपादादि असाधारण धर्मों का अज्ञान, दोनों कोटियों
में से प्रत्येक में रहनेवाले स्थाणुत्वपुरुषत्वादि जाति रूप विशेष धर्मों का
अप्रत्यक्ष, एवं इन दोनों जातियों की पश्चात् स्मृति, इन सभी कारणों से
पुरुष का चित्त झूले की तरह स्थाणु और पुरुष दोनों तरफ डोलता है
और उसे संशय होता है कि यह (सामने दीखनेवाला) स्थाणु है ? या पुरुष ?
न्यायकन्दली
नन्वादिति । यदि नामार्थस्य विषयस्यानन्तत्वं बुद्धेरनेकविधत्वे किमायातम् ? तत्राह-
प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्चेति । प्रत्यर्थं प्रतिविषयमस्मदादिबुद्धयो नियताः, अर्थाश्चानन्ता इति
प्रत्येकं तत्र बुद्धयोऽप्यनन्ताः । यदि क्वचिदनेकविषयमेकं विज्ञानं तदपि तावदर्थनियत-
त्वात् तदर्थाद् विज्ञानान्तराद् विलक्षणमेवेत्यदोषः ।
बुद्धेर्विषयभेदेन सत्यपि भेदे संक्षेपतो द्वैविध्यमाह—तस्या इति ।
निःसन्दिग्धाबाधिताध्यवसायात्मिका प्रतीतिर्विद्या, तद्विपरीता चाविद्येति । अत्र
प्रतिपादनमात्रस्य विवक्षितत्वात् पश्चादुद्दिष्टामप्यविद्यां प्रथमं कथयति-
कहा है कि 'बुद्धेः प्रतिसंवेदी पुरुषः ।' अर्थात् बुद्धि में आरूढ़ आकारों को ही
पुरुष अनुभव करता है । वृत्ति को यदि अनेक मानें तो फिर बुद्धि को भी नाना
मानना पड़ेगा ही, जिससे बुद्धि की एकता खतरे में पड़ जाएगी, इन सभी दोषों
की भी कल्पना करनी चाहिए ।
'सा चानेकप्रकारा' इत्यादि सन्दर्भ से बुद्धि के भेदों का निरूपण करते हैं ।
'अर्थानन्त्यात्' इस पद के द्वारा इसमें हेतु दिखलाया गया है (कि बुद्धि अनेक
प्रकार की क्यों है?) यदि अर्थ या विषय अनन्त हैं, तो फिर इसलिए बुद्धियाँ क्यों
अनेक हों ? इसी प्रश्न का समाधान 'प्रत्यर्थनियतत्त्वाच्च' इस वाक्य के द्वारा दिया
गया है । 'प्रति अर्थ' अर्थात् प्रत्येक विषय में हम लोगों की बुद्धियाँ नियत रूप से
अलग हैं । ये 'अर्थ' या विषय असंख्य हैं, फिर बुद्धियाँ भी अवश्य ही अनन्त
होंगी । जहाँ कहीं अनेक विषयक एक ज्ञान उपलब्ध भी होता है, वह भी उतने
अर्थों में नियत तो है ही, किन्तु जो अपने विषयों से भिन्नविषयक या
अल्पाधिक-विषयक ज्ञानों से भिन्न भी हैं । इस प्रकार (विषयभेद से ज्ञानभेद

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५

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प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ४१५
न्यायकन्दली
तत्रेति । तयोर्विद्याऽविद्ययोर्मध्ये अविद्या चतुर्विधा चतुष्प्रकारा संशयविपर्ययानध्य-
वसायस्वप्नलक्षणा ।
नन्वविद्या चतुर्विधेति परिसंख्यानानुपपत्तिः, रूढस्य तर्कज्ञानस्यापि सम्भवात् ।
अनुभूयते ह्यन्तरा संशयं निर्णयं च तर्कः । तथा हि-उत्पत्तिधर्मक आत्मेत्येके ।
अनुत्पत्तिधर्मक इत्यपरे । ततो विप्रतिपत्तेः किंस्विदयमुत्पत्तिधर्मा आहोस्विदेवं न भवतीति
संशये विचारात्मकस्तर्कः प्रवर्तते । यद्ययमुत्पत्तिधर्मकः, तदैकस्यानेकशरीरादिसंयोग-
लक्षणः संसारस्तदत्यन्तविमोक्षलक्षणश्चापवर्गो नोपपद्यते । अनुत्पत्तिधर्मके तु ज्ञातरि
स्यातां संसारापवर्गावित्यनुत्पत्तिधर्मकेणानेन भवितव्यमिति ।
किमस्य सम्भावनाप्रत्ययस्य प्रयोजनम् ? तत्त्वज्ञानमेव, प्रतिपक्षनिश्चयवत् प्रतिपक्ष-
संशयेऽपि हि हेतोरप्रवृत्तिरेव, वस्तुनो द्वैरूप्याभावात् । यथाहर्भट्टमिश्राः-
यावद्व्यतिरेकित्वं शतांशेनापि शङ्क्यते ।
विपक्षस्य कुतस्तावद्धेतोर्गमनिकाबलम् ॥ इति ।
के मानने में) कोई दोष नहीं है । 'तस्याः' इत्यादि से कहते हैं कि विषयों के भेद
से बुद्धियों के असंख्य भेद होने पर भी संक्षेपतः उसके दो ही प्रकार हैं । सन्देह
से भिन्न वह निश्चयात्मक ज्ञान ही 'विद्या' है, जिसके विषय बाधित न हों । यहाँ
जिस किसी प्रकार से विषयों का प्रतिपादन ही इष्ट है, अतः पीछे कही गयी
अविद्या का भी 'तत्र' इत्यादि से पहिले ही निरूपण करते हैं । 'तयोः' अर्थात्
विद्या और अविद्या इन दोनों में अविद्या 'चतुर्विधा' अर्थात् (१) संशय
(२) विपर्यय (३) अनध्यवसाय और (४) स्वप्न भेद से चार प्रकार की है ।
(प्र.) 'अविद्या चार ही प्रकार है' संख्या का यह नियम ठीक नहीं है; क्योंकि
अविद्या के अन्तर्गत इनसे भिन्न तर्क रूप पाँचवें ज्ञान की भी सम्भावना है ।
क्योंकि संशय और विपर्यय के मध्यवर्ती तर्क का भी अनुभव होता है । जैसे कि
कोई कहता है कि आत्मा की उत्पत्ति होती है । दूसरे उसे अनुत्पत्तिशील कहते
हैं । इस विप्रतिपत्ति से यह संशय होता है कि 'आत्मा उत्पत्तिशील है या नहीं ?'
इस संशय के बाद यह विचार रूप तर्क उपस्थित होता है कि अगर आत्मा
उत्पत्तिशील वस्तु हो, तो फिर अनेक शरीरों के साथ इसका सम्बन्ध रूप संसार
और उस सम्बन्ध के अत्यन्त विनाश रूप अपवर्ग ये दोनों ही अनुपपन्न होंगे । यदि
इसे अनुत्पत्तिधर्मक मान लेते हैं, तो फिर कथित संसार और अपवर्ग दोनों ही
उपपन्न हो जाते हैं । अतः इसे अनुत्पत्तिधर्मक ही होना चाहिए ।