वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context४०२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे परत्वापरत्व-
प्रशस्तपादभाष्यम्
परत्वस्योत्पत्तिरित्येकः कालः, ततः सामान्यबुद्धेरुत्पत्तिः, दिक्पिण्ड-
संयोगस्य च विनाशः । ततो यस्मिन् काले गुणबुद्धिरुत्पद्यते तस्मिन्नेव
बुद्धि के द्वारा परत्वादि गुणों की उत्पत्ति होती है । उसके बाद (परत्वादि
गुणों में रहनेवाले) सामान्य विषयक बुद्धि की उत्पत्ति, उक्त द्रव्य और पूर्व-
दिक्प्रदेश इन दोनों के संयोग का नाश, ये दोनों काम एक ही समय होते
हैं । इसके बाद जिस समय परत्वादिविषयक (विशिष्ट) बुद्धि की उत्पत्ति
होती है, उसी समय (कथित) दिक्प्रदेश और (परत्वादि गुणों के आधार-
न्यायकन्दली
गुणविनाशस्य कारणम्, गुणबुद्धिश्च द्रव्यबुद्धेः कारणम्, अपेक्षाबुद्धिविनाशगुणबुद्ध्युत्पादौ
च युगपत् स्याताम्, अतो गुणस्य विनश्यत्ता द्रव्यबुद्धेश्चोत्पद्यमानतापि युगपत् स्यात् ।
ततः परत्वविशिष्टद्रव्यबुद्धेरुत्पादः परत्वगुणस्य च विनाशः ।
संयोगविनाशादपि कथं परत्वापरत्वयोर्विनाश इति प्रश्ने कृते
सत्याह-अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव परत्वस्याधारे पिण्डे कर्मोत्पद्यते,
क्षणान्तरे तेन कर्मणा दिशः परत्वाधारपिण्डस्य च विभागः क्रियते, अपेक्षा-
इसके बाद, अपेक्षाबुद्धि के विनाश से गुण की विनश्यत्ता (उत्पन्न होती है) ।
'गुणज्ञानतत्सम्बन्धेभ्यः' (इस भाष्यपङ्क्ति का) गुणश्च गुणज्ञानञ्च तत्सम्बन्धश्च
तेभ्यः' (इस व्युत्पत्ति के अनुसार यह अभिप्राय है कि) गुण एवं गुण का ज्ञान
और गुण का सम्बन्ध इन तीनों से द्रव्यबुद्धि (अर्थात् परत्व गुणविशिष्ट द्रव्य बुद्धि
की) उत्पद्यमानता निष्पन्न होती है । ये सभी काम एक ही समय होते हैं ।
अपेक्षाबुद्धि का विनाश (परत्वादि) गुणों के विनाश का कारण है । गुणबुद्धि
(गुणविशिष्ट) द्रव्यबुद्धि का कारण है । अतः अपेक्षाबुद्धि का विनाश और
गुणबुद्धि का उत्पादन दोनों एक ही समय होते हैं । इसीलिए गुण की विनश्यत्ता
और द्रव्यबुद्धि की उत्पद्यमानता ये दोनों ही एक ही समय होंगी । एवं इसी कारण
(परत्व) गुण की विनश्यत्ता और (परत्वगुण विशिष्ट) द्रव्य बुद्धि की उत्पद्यमानता
ये दोनों भी एक ही समय होंगी । इसके बाद परत्वगुण विशिष्ट द्रव्यबुद्धि की
उत्पत्ति एवं परत्व गुण का विनाश होगा ।
(२) केवल संयोग के विनाश से परत्व और अपरत्व का विनाश किस रीति से
(किस स्थिति में) होता है ? यह प्रश्न किये जाने पर 'अपेक्षाबुद्धिसमकालमेव' इत्यादि
सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् जहाँ निम्नलिखित स्थिति होती है, वहाँ संयोग के
विनाश से परत्व का विनाश होता है । (जैसे) अपेक्षाबुद्धि की उत्पत्ति के समय ही
पिण्ड (परत्वादि के आधार पर भूत द्रव्य) में क्रिया उत्पन्न होती है । इस क्रिया के
द्वारा आगे दूसरे क्षण में उक्त पिण्ड का पूर्व दिशा के साथ विभाग उत्पन्न होता है,