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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६५

Page 326Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६५
प्रशस्तपादभाष्यम्
संयोगवत् । विभागस्तु द्विविधः-कारणविभागात्, कारणाकारणविभागा-
च्च । तत्र कारणविभागात् तावत् कार्याविष्टे कारणे कर्मोत्पन्नं
(उक्त नाम के दोनों) संयोगों की तरह हैं । (किन्तु) विभागज विभाग
दो प्रकार का है--१. केवल कारणों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला एवं
२. कारण और अकारण इन दोनों के विभाग से उत्पन्न होनेवाला ।
न्यायकन्दली
प्राप्तिविरोधी गुणविशेषः, स विभाग इति वाक्यार्थः । किं प्राप्तेः पूर्वावस्थानमात्रम् ?
किं वा विभागं प्रति हेतुत्वमप्यस्ति ? अवस्थितिमात्रमिति ब्रूमहे, संयोगस्य विभाग-
हेतुत्वेऽवयवसंयोगानन्तरमेव तद्विभागस्योत्पत्तौ द्रव्यानुत्पत्तिप्रसङ्गात् । कर्मसहकारी संयोगः
कारणमिति चेत् ? अन्वयव्यतिरेकाद्यद्गतसामर्थ्यं कर्मैव कारणमस्तु, न संयोगः, तस्मिन्
सत्यप्यभावात् । प्रध्वंसोत्पत्ताविव भावस्य । विभागोत्पत्तौ संयोगस्य पूर्वकालतानियमः,
विभागस्य तद्विरोधित्वस्वभावत्वात् ।
स च त्रिविध इति भेदकथनम् । अत्रापि चशब्दोऽवधारणे,
त्रिविध एव । अन्यतरकर्मज उभयकर्मजो विभागजश्च विभाग इति ।
गुण के विरोधी विभाग नाम के गुण का ही बोधक है (संयोग के अभाव का
नहीं) । 'प्राप्ति' (संयोग) के रहने पर जो 'अप्राप्ति' अर्थात् प्राप्ति का विरोधी
गुणविशेष वही 'विभाग' है । (प्र.) विभाग के उत्पन्न होने से पहले संयोग (प्राप्ति)
केवल रहता है या वह उसका उत्पादक भी है ? (उ.) हम तो कहते हैं कि विभाग
की उत्पत्ति के पूर्व (नियमतः) संयोग केवल विद्यमान रहता है (वह विभाग का
कारण नहीं है); क्योंकि संयोग अगर विभाग का कारण हो, तो फिर द्रव्यों की
उत्पत्ति ही रुक जाएगी; क्योंकि अवयवों में संयोग के होने के बाद उस संयोग से
अवयवों के विभाग उत्पन्न होंगे । अगर कहें कि (प्र.) (केवल) संयोग ही विभाग
का कारण नहीं है क्रिया भी उसकी सहायिका है ? (उ.) तो फिर अन्वय और
व्यतिरेक के द्वारा जिस क्रिया में विभाग का सामर्थ्य निश्चित है, वह क्रिया ही
विभाग का कारण है, संयोग नहीं । क्योंकि संयोग के रहते हुए भी बिना क्रिया
के विभाग की उत्पत्ति नहीं होती है । अतः जिस प्रकार ध्वंस की उत्पत्ति से पहले
(उसके प्रतियोगी) भाव की नियमतः सत्ता (ही) रहती है (एवं वह ध्वंस का कारण
नहीं होता), उसी प्रकार संयोग भी विभाग से पहले नियमतः केवल रहता है, वह
उसका उत्पादक नहीं है; क्योंकि विभाग स्वभावतः संयोग का विरोधी है ।
'स च त्रिविधः' इस वाक्य के द्वारा विभाग के भेद कहे गये हैं । यहाँ भी 'च'
शब्द का अवधारण ही अर्थ है, (तदनुसार इस वाक्य का यह अर्थ है कि) विभाग
के ये तीन ही प्रकार हैं-(१) अन्यतरकर्मज, (२) उभयकर्मज और (३) विभागज ।

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३६६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यदा तस्यावयवान्तराद् विभागं करोति, न तदाकाशादिदेशात् । यदा
त्याकाशादिदेशाद् विभागं करोति, न तदावयवान्तरादिति स्थितिः । अतोऽ-
इनमें कारण मात्र के विभाग से उत्पन्न होनेवाले विभाग का निरूपण करते
हैं । वस्तुस्थिति यह है कि कार्य से सम्बद्ध अवयव में उत्पन्न हुई क्रिया
जिस समय अपने आश्रयरूप अवयव द्रव्य में दूसरे अवयव से विभाग
को उत्पन्न करती है, उस समय विभक्त अवयवों में आकाशादि देशों से
विभाग को उत्पन्न नहीं करती एवं जिस समय (वही क्रिया) अवयवों में
आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय एक अवयव में
न्यायकन्दली
तत्र तेषु मध्येऽन्यतरकर्मजोभयकर्मजौ संयोगवत् । यथा क्रियावता निष्क्रियस्य
संयोगोऽन्यतरकर्मजस्तथा विभागोऽपि । यथोभयकर्मजः संयोगो मल्ल्योर्मेषयोर्वा तथा
विभागोऽपि । विभागजस्तु द्विविध इति । तुशब्देनास्य पूर्वाभ्यां विशेषकथनम् ।
कारणयोर्विभागादेको विभागो भवति । अपरस्तु कारणाकारणयोर्विभागादिति द्वैविध्यम् ।
कारणविभागाच्च विभागः कथ्यते - कार्याविष्ट इत्यादिना ।
कार्याविष्टे व्याप्ते अवरुद्धे कारणे कर्मोत्पन्नं यदा तस्यावयवस्या-
वयवान्तराद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशकं विभागं करोति, न तदा द्रव्यावरुद्धा-
'तत्र' अर्थात् उनमें अन्यतरकर्मज और उभयकर्मज ये दोनों 'संयोगवत्' हैं, अर्थात्
जिस प्रकार क्रिया से युक्त एक द्रव्य का और क्रिया से रहित दूसरे द्रव्य का
संयोग अन्यतरकर्मज है, उसी प्रकार (निष्क्रिय एक द्रव्य के साथ क्रिया से युक्त
दूसरे द्रव्य का) विभाग भी (अन्यतरकर्मज) है । एवं जिस प्रकार (लड़ते हुए) दो
भेड़ों का (या) पहलवानों का संयोग उभयकर्मज है, उसी प्रकार उनका विभाग भी
(उभयकर्मज) है । 'विभागजस्तु द्विविधः' इस वाक्य में प्रयुक्त 'तु' शब्द से
विभागज विभाग में कथित दोनों विभागों से भेद सूचित किया गया है । एक
प्रकार का विभागज विभागकारणीभूत दोनों द्रव्यों के ही विभाग से उत्पन्न होता है
और दूसरे प्रकार का विभागज विभागकारणीभूत एक द्रव्य और दूसरा
अकारणीभूत द्रव्य, इन दोनों द्रव्यों के विभाग से उत्पन्न होता है । विभागज
विभाग के ये ही दो भेद हैं ।
'कार्याविष्टे कारणे' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा कारण (मात्र) के विभाग
से उत्पन्न (विभागज) विभाग का निरूपण किया गया है । वस्तुस्थिति यह
है कि कार्य से 'आविष्ट' अर्थात् नियत रूप से सम्बद्ध (अवयव रूप)
कारण में उत्पन्न हुई क्रिया जिस समय अवयवी द्रव्य के उत्पादक संयोग
के विनाशक विभाग को उत्पन्न करती है, उस समय (वह क्रिया) उस द्रव्य के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३६७
न्यायकन्दली
दाकाशादिदेशाद् विभागं करोति । यदा चाकाशादिदेशात्, न तदावयवान्तरादिति
स्थितिनियमः । अतोऽवयवकर्मार्वयवान्तरादेव विभागमारभते । यत आकाशविभाग-
कारणं कर्म अवयवान्तराद् विभागं न करोतीति नियमः, अतोऽवयवान्तरविभागा-
रम्भकं कर्म अवयवान्तरादेव विभागं करोति, नाकाशादिदेशात् ।
अयमभिसन्धिः-आकाशविभागकर्तृत्वं कर्मणो द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागाना-
रम्भकत्वेन व्याप्तम्, द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागानारम्भकत्वविरुद्धं च द्रव्यारम्भक-
संयोगविरोधिविभागोत्पादकत्वम् । अतो यत्रेदमुपलभ्यते तत्र द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधि-
विभागानुत्पादकत्वे निवर्तमान तद्व्याप्तमाकाशविभागकर्तृत्वमपि निवर्तते । यथा वह्निव्या-
वृत्तौ धूमव्यावृत्तिः ।
आकाशविभागकर्तृत्वस्य द्रव्यारम्भकसंयोगविरोधिविभागानारम्भ-
कत्वस्य च सहभावमात्रं न व्याप्तिरिति चेत् ? न, व्यभिचारानुपलब्धेः ।
ययोः क्वचिद्व्यभिचारो दृश्यते तयोः सहभावमात्रम्, यथा वज्रे पार्थिवत्वलोह-
साथ सम्बद्ध आकाशादि देशों के साथ विभाग को उत्पन्न नहीं करती, अतः
अवयव की क्रिया दूसरे अवयव से (अपने) विभाग को ही उत्पन्न करती है। चूँकि
यह नियम है कि जिस कारण से आकाश के साथ अवयवों का विभाग उत्पन्न
होगा उस कारण से एक अवयव के दूसरे अवयव का विभाग उत्पन्न नहीं होगा,
अतः एक अवयव में रहनेवाले जिस विभाग की उत्पत्ति जिस क्रिया से होगी, वह
क्रिया (एक अवयव में) दूसरे अवयव से विभाग की ही उत्पादिका होगी,
आकाशादि देशों के साथ विभाग की नहीं ।
अभिप्राय यह है कि 'जिस क्रिया में आकाशविभाग का कर्तृत्व है, उसमें द्रव्य
के उत्पादक संयोग के विरोधी विभाग का कर्तृत्व नहीं है' यह अव्यभिचरित नियम
है । सुतरां द्रव्य के उत्पादक संयोग (अवयवद्वय-संयोग) के विरोधी विभाग का
अनुत्पादकत्व एवं द्रव्य के अनुत्पादक संयोग के विरोधी विभाग का उत्पादकत्व, ये
दोनों परस्पर विरोधी धर्म हैं । अतः जहाँ द्रव्य के उत्पादक संयोग के विरोधी
विभाग का उत्पादकत्व उपलब्ध होता है, वहाँ द्रव्य के आरम्भक संयोग के विरोधी
विभाग का अनारम्भकत्व (उससे स्वयं) दूर हटते हुए अपने से व्याप्त आकाश
विभागकर्तृत्व को भी दूर हटा देता है । जैसे कि (जलादि में) वह्नि के प्रतिक्षिप्त
होने के कारण धूम (स्वयं ही जल से हट जाता है) ।
(प्र.) आकाश-विभाग का कर्तृत्व एवं द्रव्य के उत्पादक संयोग के विरोधी
विभाग का अनारम्भकत्व, ये दोनों एक आश्रय में केवल रहते भर हैं, (इसका
यह अर्थ नहीं कि) दोनों में परस्पर व्याप्ति सम्बन्ध भी है । (उ.) यह
(कहना ठीक) नहीं है; क्योंकि उक्त दोनों धर्मों में कहीं व्यभिचार उपलब्ध
नहीं है, (समानाधिकरण) जिन दो धर्मों में से एक-दूसरे के बिना भी उपलब्ध
होता है, उन दोनों धर्मों के लिए कह सकते हैं कि वे केवल एक आश्रय में

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३६८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
वयवकर्मान्यवयवान्तरादेव विभागमारभते, ततो विभागाच्च द्रव्यारम्भक-
संयोगविनाशः । तस्मिन् विनष्टे कारणाभावात् कार्याभाव इत्यवयवि-
दूसरे अवयव से विभाग को उत्पन्न नहीं करती, अतः अवयव में रहनेवाली
क्रिया उसमें दूसरे अवयव से ही विभाग को उत्पन्न करती है । इसके
बाद (अवयवी) द्रव्य के उत्पादक संयोग का नाश होता है । उसके
विनष्ट हो जाने पर (असमवायि) कारण के अभाव से (अवयवी द्रव्य
न्यायकन्दली
लेख्यत्वयोः, सत्यपि पार्थिवत्वे काष्ठादिषु लोहलेख्यत्वात् । न तु व्योमविभागकर्तृत्वस्य
विशिष्टविभागानुत्पादकत्वस्य च व्यभिचारो दृश्यते । अदृश्यमानोऽपि कदाचिदयं
भविष्यतीत्याशङ्क्येत यद्यनयोः शिष्याचार्ययोरिवोपाधिकृतः सहभावः प्रतीयेत । न
चैवमप्यस्ति, उपाधीनामनुपलम्भात् । यत्प्रतीतव्यभिचारो निरुपाधिकः सहभावो न
व्याप्तिहेतुरित्यग्निधूमयोरपि व्याप्तिर्न स्यादित्युच्छिन्नेदानीं जगत्यनुमानवार्ता ।
यद्यवयवकर्मान्यवयवान्तराद् विभागः क्रियते नाकाशादिदेशात्,
ततः किं सिद्धम् ? तत्राह- विभागाच्च द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशः । आकाश-
रहते हैं, उनमें परस्पर व्याप्ति सम्बन्ध नहीं है । जैसे कि काष्ठादि (रूप एक
आश्रय) में पार्थिवत्व और लौहलेख्यत्व (लोहे से लिखने पर चिह्न पड़ जाना) दोनों
के रहते हुए भी वज्रादि पत्थरों में (पार्थिवत्व के रहते हुए भी) लौहलेख्यत्व के न
रहने के कारण, उन दोनों धर्मों के प्रसङ्ग में यह कहा जाता है कि पार्थिवत्व और
लौहलेख्यत्व दोनों धर्म एक आश्रय में केवल रहते हैं; किन्तु उन दोनों में व्याप्ति
सम्बन्ध नहीं है; किन्तु आकाशविभाग का कर्तृत्व तथा द्रव्य के उत्पादक संयोग के
विरोधी विभाग का अनुत्पादकत्व इन दोनों में से कोई एक को छोड़कर कहीं नहीं
देखा जाता है । व्यभिचार के उपलब्ध न होने पर भी उक्त दोनों धर्मों में इस
प्रकार के व्यभिचार की शङ्का हो सकती थी कि 'कदाचित् ये दोनों भी व्यभिचरित
हों', अगर शिष्य और आचार्य के सम्बन्ध की तरह उनमें भी उपाधिमूलकत्व की
उपलब्धि होती; किन्तु वह भी सम्भव नहीं है; क्योंकि प्रकृत में कोई उपाधि भी
उपलब्ध नहीं है, अगर उपाधि से रहित जिस सामानाधिकरण्य में व्यभिचार
उपलब्ध न हो, वह भी अगर व्याप्ति का प्रयोजक न हो तो फिर वह्नि और धूम
में भी व्याप्ति नहीं होगी । इस प्रकार संसार से अनुमान की बात ही उठ जायेगी ।
अगर अवयव की क्रिया से दूसरे अवयव से ही उसका विभाग उत्पन्न हो,
आकाशादि देशों से नहीं, तो फिर इससे क्या सिद्ध होता है ? इसी प्रश्न के उत्तर
में यह वाक्य लिखा गया है कि 'विभागाच्च पूर्वसंयोगनाशः'। अभिप्राय यह है कि

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३६१
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशः । यदा कारणयोर्वर्तमानो विभागः कार्यविनाशविशिष्टं
कालं त्यतन्त्रं वाप्यवयवमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्तादा-
काशादिदेशाद् विभागमारभते न निष्क्रियस्य, कारणाभावादुत्तरसंयोगा-
रूप) कार्य का (अभाव) नाश होता है । उस समय (विभाग के आश्रय
और विभाग के अवधि रूप) दोनों अवयवों में विद्यमान क्रिया कार्य से
संयुक्त आकाशादि देशों के साथ क्रिया से युक्त अवयवों के ही विभाग
को उत्पन्न करती है । (यह दूसरी बात है कि) उसे इस विभाग के उत्पादन
में कार्य के नाश से युक्त काल या आश्रयीभूत अवयव के साहाय्य की भी
न्यायकन्दली
विभागकर्तृत्वे विशिष्टविभागात्नुत्पादाद् द्रव्यारम्भकसंयोगविनाशो न भवेदित्यर्थः । संयोग-
विनाशे किं स्यादत आह-तस्मिन्निति । संयोगेऽसमवायिकारणे तस्मिन्नष्टे कारणस्याभावात्
कार्याभाव इति न्यायादवयविनो विनाशः । अवयवद्वये नष्टे किं स्यादत आह-तदेति । द्रव्ये
विनष्टे तत्कारणयोरवयवयोरवर्तमानो विभागः कार्यविनाशेन विशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वा अवय-
वमपेक्ष्य सक्रियस्यैवावयवस्य कार्यसंयुक्तादाकाशादिदेशाद् विभागमारभते । यावत् कार्यद्रव्यं
न विनश्यति, तावदवयवस्य स्वातन्त्र्यम् । पृथग्देशगमने योग्यता नास्तीत्यवयवदेशाद् विभागो
न घटते, तदर्थमुक्तं कार्यविनाशविशिष्टं कालं स्वतन्त्रं वाप्यवयवमपेक्षते । कारणयोर्वर्त-
(अवयव की क्रिया में) आकाश विभाग का भी कर्तृत्व अगर मान लें
तो फिर उससे (अवयवी के नाशजनक) विशेष प्रकार के विभाग की
उत्पत्ति नहीं होगी । फलतः (अवयवी) द्रव्य के उत्पादक संयोग का विनाश नहीं
होगा । दोनों अवयवों के संयोग के विनाश से कौन-सा कार्य होगा ? (जिसके न
होने का आपने भय दिखलाया है ।) इसी प्रश्न का समाधान 'तस्मिन्'
इत्यादि से कहा गया है । 'तस्मिन्नष्टे' अर्थात् (अवयवी के) असमवायिकारण
रूप उस संयोग के नष्ट होने पर 'कारण के अभाव से कार्य का अभाव'
इस न्याय से अवयवी का नाश होगा । अवयविरूप द्रव्य के नाश होने पर क्या
होगा ? इस प्रश्न कां समाधान 'तदा' इत्यादि पङ्क्ति से कहा गया है । अर्थात्
(अवयविरूप द्रव्य के नष्ट हो जाने पर उसके कारणीभूत दोनों अवयवों में
रहनेवाला विभाग) क्रिया से युक्त अवयवों के ही आकाशादि देशों से विभाग को
उत्पन्न करता है । उस (विभाग) को इस विभाग के उत्पादन में (अवयविरूप)
कार्य के नाश से युक्त काल, स्वतन्त्र रूप से केवल अवयव, इन दोनों में से किसी
एक का साहाय्य अपेक्षित होता है । अवयविरूप कार्यद्रव्य के विनष्ट हुए
बिना उसके अवयवों में स्वतन्त्र रूप से दूसरे देश में जाने की योग्यता नहीं आती ।

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३७० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
नुपत्तावनुपभोग्यत्वप्रसङ्गः । न तु तदवयवकर्मार्काशादिदेशाद् विभागं
अपेक्षा होती है, अथवा स्वतन्त्ररूप से ही वह उक्त विभाग को उत्पन्न
करती है । निष्क्रिय अवयवों में वह विभागों को उत्पन्न नहीं कर सकती;
क्योंकि (उसके बाद) कारण के न रहने से उत्तर देश के साथ संयोग की
न्यायकन्दली
मानो विभागः सक्रियस्यैव विभागं करोतीत्यत्र को हेतुरिति चेत् ? अत आह- न,
निष्क्रियस्य कारणाभावादिति । विभागाद् विभागोत्पत्तौ कर्मापि निमित्तकारणम्, तस्या-
भावान्न निष्क्रियस्य विभागः । अत्रैवार्थे युक्त्यन्तरमाह-उत्तरसंयोगानुपत्तावनुप-
भोग्यत्वप्रसङ्ग इति । क्रिया हि प्राधान्येन उत्तरसंयोगार्थमुपजाता, देशान्तरप्राप्तेन द्रव्येण
कस्यचित् पुरुषार्थस्य सम्पादनात् । तत्र यदि सक्रियस्यावयवस्य कार्यसंयुक्तादाकाशादि-
देशाद् विभागो न भवति, तदा पूर्वसंयोगस्य प्रतिबन्धकस्यान्निवृत्तेरुत्तरसंयोगानुत्पत्तौ
सानुपभोग्या निष्प्रयोजना स्यात् । न चैतद्युक्तम् । तस्मात् सक्रियस्यैव विभाग
इत्यर्थः । अवयवक्रिययोः अवयवविभागसमकालमाकाशादिविभागकर्तृत्वं नोपपद्यत
इति । मा कार्यादियं युगपद्विभागद्वयम्, क्रमकरणे तु को विरोधो येन विभाग-
अतः (दूसरे) अवयव देश से (उस समय तक) विभाग नहीं हो सकता । इसीलिए
कहा गया है कि 'काल' (काल और अवयव) अथवा स्वतन्त्र रूप से (केवल)
अवयव की अपेक्षा रखता है । इसमें क्या कारण है कि कारणीभूत दोनों अवयवों
में रहनेवाला विभाग, क्रिया से युक्त द्रव्य के ही विभाग को उत्पन्न करता है ?
इस प्रश्न के समाधान के लिए ही 'न निष्क्रियस्य कारणाभावात्' यह वाक्य लिखा
गया है । विभाग से जो विभाग की उत्पत्ति होती है, उसमें क्रिया भी
निमित्तकारण है । क्रिया के न रहने से ही निष्क्रिय द्रव्य में विभाग नहीं होता ।
इसी में दूसरी युक्ति 'उत्तरसंयोगानुत्पत्तावनुपभोग्यत्वप्रसङ्गः' इस वाक्य के द्वारा
दिखायी गयी है । उत्तरदेश के साथ संयोग ही क्रिया की उत्पत्ति का मुख्य प्रयोजन
है; क्योंकि दूसरे (उत्तर) देश में प्राप्त द्रव्य के द्वारा ही वह पुरुष के किसी
प्रयोजन का सम्पादन करती है । अभिप्राय यह है कि अगर क्रिया के द्वारा उससे
युक्त अवयवरूप द्रव्य का कार्य (अवयवी) द्रव्य से संयुक्त आकाशादि देशों से
विभाग उत्पन्न न हो एवं (अवयवी के) प्रतिबन्धक पहले (दोनों अवयवों के)
संयोग का विनाश भी न हो, तो फिर क्रिया 'अनुपभोग्या' अर्थात् प्रयोजन से
रहित (व्यर्थ) हो जायेगी; किन्तु सो उचित नहीं है, अतः सक्रिय द्रव्य का ही
विभाग होता है । अर्थात् दोनों अवयवों की दोनों क्रियाओं से जिस समय दोनों
अवयवों का विभाग उत्पन्न होगा, उसी समय क्रियाओं से अवयवों के आकाशादि
देशों के साथ विभाग की उत्पत्ति उचित नहीं है । (प्र.) अवयवों की वे दोनों क्रियायें

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १७१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् १७१
प्रशस्तपादभाष्यम्
करोति, तदारम्भकालातीतत्वात् । प्रदेशान्तरसंयोगं तु करोत्येव,
उत्पत्ति नहीं होगी, जिससे विभाग की उत्पत्ति 'अनुपभोग्य' अर्थात् निष्प्र-
योजन हो जाएगी। अवयव की क्रिया आकाशादि देशों से विभाग को उत्पन्न
नहीं करती; क्योंकि उसके उत्पादन का काल ही बीत गया रहता है;
किन्तु दूसरे प्रदेशों के साथ संयोग को अवश्य उत्पन्न करती है; क्योंकि
न्यायकन्दली
जनने दृष्टसामर्थ्यामिमां परित्यज्यादृष्टसामर्थ्यस्य विभागस्य विभागहेतुत्वमाश्रीयते ?
इत्यत्राह-न तु तदवयवकर्म्राकाशादिदेशाद् विभागं करोति, तदारम्भककाला-
तीतत्त्वात् । एवं हि कर्मणः स्वभावो यत् तदसमवायिकारणतया विभागमारभमाणं
स्वोत्पत्त्यनन्तरक्षण एवारभते, न क्षणान्तरे, स च तस्य विभागारम्भकालो द्वितीयभागो-
त्पत्तिकालेऽतीत इति न तस्मादस्योत्पत्तिः ।
नन्वेवमुत्तरसंयोगमपि कुतः करोति ? अनेकक्षणव्यवधानात्, अत आह-
प्रदेशान्तरसंयोगं करोतीति । यथा कर्मणः स्वोत्पादानन्तरक्षणे विभागारम्भ-
कालस्तथा पूर्वसंयोगनिवृत्त्यनन्तरक्षणः प्रदेशान्तरसंयोगारम्भकालः, पूर्वदेशाव-
एक ही समय (अवयवों के परस्पर विभाग और अवयवों का आकाशादि देशों के
साथ विभाग इन) दोनों विभागों को उत्पन्न न भी कर सकें, फिर भी वे ही
क्रियायें क्रमशः उन दोनों विभागों को उत्पन्न कर सकती हैं, इसमें तो कोई विरोध
नहीं है । चूँकि जिस (क्रिया) में विभाग को उत्पन्न करने का सामर्थ्य उपलब्ध है,
उसे छोड़कर जिस (विभाग) में विभाग को उत्पन्न करने का सामर्थ्य दीख नहीं
पड़ता है, उसमें विभाग की कारणता स्वीकार करते हैं ? (उ.) इसी प्रश्न का
उत्तर 'न तु तदवयवकर्म्राकाशादिदेशाद्विभागं करोति, तदारम्भकालातीतत्वात्' इस
वाक्य से दिया गया है । क्रिया का यह स्वभाव है कि जिस विभाग का वह
असमवायिकारण होगी, उसे अपनी उत्पत्ति के अव्यवहित उत्तर क्षण में ही उत्पन्न
करेगी; आगे के क्षणों में नहीं । वही (उक्त अव्यवहितोत्तर) क्षण इसका
आरम्भकाल है । यह काल द्वितीय विभाग (विभागज विभाग) की उत्पत्ति के
समय बीत जाता है, अतः क्रिया से इस (विभागज विभाग) की उत्पत्ति नहीं होती ।
(अगर दोनों अवयवों की क्रिया का आरम्भकाल उसका अव्यवहित उत्तर
क्षण ही है तो फिर) कुछ क्षणों के बाद वही क्रिया उत्तर संयोग को कैसे उत्पन्न
करती है ? इसी प्रश्न का समाधान 'प्रदेशान्तरसंयोगं करोति' इस वाक्य से दिया
है । अर्थात् जिस प्रकार क्रिया का अव्यवहित उत्तर क्षण विभाग के उत्पादन का
उपयुक्त समय है, उसी प्रकार पूर्वसंयोग (दोनों अवयवों के संयोग) के नाश का अव्यवहित
उत्तर क्षण ही उस दूसरे प्रदेशों के साथ संयोग (उत्तरसंयोग) के उत्पादन का

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३७२ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
अकृतसंयोगस्य कर्मणः कालात्ययाभावादिति ।
कारणाकारणविभागादपि कथम् ? यदा हस्ते कर्मोत्पन्न-
संयोग को उत्पन्न करनेवाली क्रिया का काल तब तक नहीं बीता रहता
है, जब तक कि वह संयोग को उत्पन्न न कर दे ।
(प्र.) कारण और अकारण के विभाग से (कारणाकारण विभाग-
जनित) विभाग की उत्पत्ति कैसे होती है ? (उ.) जिस समय हाथ में उत्पन्न
न्यायकन्दली
स्थितस्य द्रव्यस्य देशान्तरप्राप्तेरसम्भवात् । तस्य च संयोगारम्भकालस्यात्ययोऽतिक्रमो न
भूतः, तदानीं हि कालोऽयमतिक्रान्तः स्याद् यदि कर्मणा प्रदेशान्तरसंयोगः कृतो भवेन्न
त्वेवम्, तस्मादकृतसंयोगस्य कर्मणो यः संयोगारम्भकालस्तस्यात्ययाभावात् कर्म संयोगं
करोति, न विभागम् । तेन चेदयं न कृतोऽन्यस्यासम्भवादसमवायिकारणेन विना च
वस्तुनोऽनुत्पादादेकार्थसमवेतो विभागोऽस्य कारणमित्यवतिष्ठते । इतिशब्दः प्रक्रमसमाप्तौ ।
एवं कारणविभागपूर्वकं विभागं प्रतीत्य कारणाकारणविभागपूर्वकं
विभागं प्रत्येतुमिच्छन् पृच्छति - कारणाकारणविभागादपि कथमिति ।
उपयुक्त समय है, एक देश में रहते हुए द्रव्य का दूसरे देश के साथ संयोग सम्भव
नहीं है । (अतः) इस (उत्तर) संयोगोत्पादन के समय का 'अत्यय' अर्थात्
अतिक्रम नहीं हुआ है । इस संयोग के काल का अतिक्रमण तब होता, जब कि
उस क्रिया से उत्तरदेश संयोग का उत्पादन हो गया होता; किन्तु सो नहीं हुआ है,
अतः जिस क्रिया ने जिस संयोग को जब तक उत्पन्न नहीं किया है, तब तक उस
क्रिया से उस संयोग के उत्पादन का काल नहीं बीता है । अतः क्रिया उत्तरदेश
संयोग को उत्पन्न करने पर भी (विभागज) विभाग को उत्पन्न नहीं करती है ।
दोनों अवयवों के विभाग से अगर (विभागज) विभाग की उत्पत्ति न मानें, तो
फिर उस (विभागज) विभाग का कोई दूसरा असमवायिकारण नहीं हो सकता ।
असमवायिकारण के न रहने पर (समवेत) कार्य की उत्पत्ति ही नहीं होती है ।
इससे सिद्ध होता है कि विभागज विभाग के आश्रयीभूत एक द्रव्य में समवाय
सम्बन्ध से रहनेवाला (दोनों अवयवों का) विभाग ही उस (पूर्वदेश के साथ
अवयवों के) विभाग का (असमवायि) कारण है । 'इति' शब्द प्रसङ्ग की समाप्ति
का बोधक है ।
इस प्रकार कारण (मात्र) के विभाग से उत्पन्न विभाग (विभागज विभाग) को
समझा कर कारण और अकारण के विभाग से उत्पन्न होने वाले (विभागज) विभाग
को समझाने के अभिप्राय से 'कारणाकारणविभागादपि कथम् ?' इस वाक्य के

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७३

Page 334Permalink

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७३
प्रशस्तपादभाष्यम्
मवयवान्तराद् विभागमकुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरे
संयोगानारभते, तदा ते कारणाकारणविभागाः, कर्म यां दिशं प्रति कार्या-
रम्भाभिमुखं तामपेक्ष्य कार्यकार्याकार्यविभागानारभन्ते तदनन्तरं कारणाकारण-
संयोगाच्च कार्याकार्यसंयोगानिति ।
हुई क्रिया शरीर के दूसरे अवयवों से विभाग को उत्पन्न करती हुई
आकाशादि देशों के साथ विभागों को उत्पन्न करने के बाद (उत्तर देश)
संयोगों को उत्पन्न करती है, उस समय के वे विभाग (शरीर के) कारण
(अवयव) और (शरीर के) अकारण के विभाग हैं। क्रिया जिस दिशा
में (उत्तरसंयोगरूप) कार्य को करने के लिए उत्सुक रहती है, उसी दिशा
के साहाय्य से वे (कारण और अकारण के विभाग) कार्य और अकार्य
के विभागों को उत्पन्न करते हैं। इसके बाद (वे ही कारण और
अकारण के विभाग) कारणों और अकारणों के संयोगों के साहाय्य से
उन कारणों से उत्पन्न कार्य द्रव्यों और उनसे अनुत्पन्न अकार्य द्रव्यों में
संयोगों को उत्पन्न करते हैं।
न्यायकन्दली
उत्तरमाह- यदेत्यादिना । हस्ते कुतश्चित् कारणात् कर्मोत्पन्नं तस्य हस्तस्यावयवान्तराद् विभाग-
मकुर्वदाकाशादिदेशेभ्यो विभागानारभ्य प्रदेशान्तरैः सह यदा संयोगानारभते तदा ते कारणा-
कारणविभागाः शरीरकारणस्य हस्तस्याकारणानामाकाशादिदेशानां विभागाः, कर्म च यस्यां
दिशि कार्यारम्भाभिमुखं कर्मणा यत्रोत्तरसंयोगो जनयितव्यः, तां दिशमपेक्ष्य, कार्याकार्य-
विभागान् हस्तकार्यस्य शरीरस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां विभागानारभन्ते । यतः
कुड्यादिदेशाद्धस्तस्य विभागः, ततः शरीरस्यापि विभागो दृश्यते । न चायं शरीरक्रियाकार्यः,
द्वारा प्रश्न किया गया है । 'यदा' इत्यादि सन्दर्भ से उक्त प्रश्न का उत्तर
देते हैं । हाथ में जिस किसी कारण से उत्पन्न हुई क्रिया शरीर के अवयवों में
विभागों को उत्पन्न न कर, जिस समय हाथ में आकाशादि (पूर्व) देशों के साथ
विभागों को उत्पन्न कर, उत्तर प्रदेशों के साथ हाथ के संयोग का उत्पादन करती
है, उस समय के वे (हाथ का आकाशादि पूर्वदेशों से) विभाग
'कारणाकारणविभाग' है, अर्थात् शरीर के 'कारण' हाथ और 'अकारणीभूत'
आकाशादि प्रदेश, इन दोनों के विभाग हैं । क्रिया जिस दिशा में कार्य को उत्पन्न
करने को उत्सुक रहती है, अर्थात् क्रिया से जिस देश में उत्तर संयोग उत्पन्न होता
है, उस दिशा के साहाय्य से ही क्रिया, कार्य और अकार्य के, अर्थात्
हाथ के कार्य शरीर का उसके अकार्य आकाशादि प्रदेशों के साथ विभागों
को उत्पन्न करती है । चूँकि दीवाल प्रभृति देशों से हाथ का विभाग होने पर

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३७४ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
न्यायकन्दली
तदानीं शरीरस्य निष्क्रियत्वात् । नापि हस्तक्रियाकार्यो भवितुमर्हति, व्यधिकरणस्य
कर्मणो विभागहेतुत्वादर्शनात् । अतः कारणाकारणविभागस्तस्य कारणमिति कल्प्यते ।
आकाशादावित्यादिपदं समस्तविभुद्रव्यावरोधार्थम् । अत एव विभागानिति बहुवचनम्,
तद्विभागानां बहुत्वात् ।
अत्राहुरेके-कुड्यादिदेशाद्धस्तशरीरविभागयोर्युगपद्भावप्रतीतेस्तयोः कार्यकारणभावा-
भिधानं प्रत्यक्षविरुद्धमिति । तदसङ्गतम्, हस्तविभागकाले शरीरविभागोत्पत्तिकारणा-
भावात् । न चासति कारणे कार्योत्पत्तिरस्ति, हस्तक्रिया च न कारणमित्युक्तम् । तस्मात्
तयोर्युगपदभिमानो भ्रान्तः ।
अनुमानगम्यः क्रमभावः, प्रत्यक्षसिद्धं च यौगपद्यम्, प्रत्यक्षे च परिपन्थि-
न्यनुमानस्योत्पत्तिरेव नास्ति, अबाधितविषयत्वाभावात् । कथं तदनुरोधात्
प्रत्यक्षस्य भ्रान्तत्वमिति चेत् ? उत्पलपत्रशतव्यतिभेदेऽपि कुतोऽनुमानप्रवृत्तिः ?
प्रत्यक्षविरोधात् । अथ मन्यसे तत्र प्रत्यक्षविरोधादनुमानं नोदेति, यत्रानेन
शरीर का भी उससे विभाग देखा जाता है । यह (शरीर और दीवाल का विभाग
शरीर की) क्रिया से उत्पन्न नहीं होता है; क्योंकि शरीर उस समय निष्क्रिय रहता
है । हाथ की क्रिया से वह (शरीर और दीवाल का) विभाग उत्पन्न नहीं हो
सकता; क्योंकि एक आश्रय में रहनेवाली क्रिया से उस आश्रयरूप देश से भिन्न
देशों में विभाग की उत्पत्ति नहीं देखी जाती है । अतः यह कल्पना करते हैं कि
(शरीर के) कारण हाथ और अकारणीभूत प्रदेशों का विभाग ही उस विभाग
का कारण है । 'आकाशादि' शब्द में प्रयुक्त 'आदि' शब्द सभी विभु द्रव्यों का
संग्राहक है । इसी कारण 'विभागान्' यह बहुवचनान्त प्रयोग भी है; क्योंकि उनके
विभाग भी बहुत हैं ।
इस प्रसङ्ग में कोई कहते हैं कि (प्र.) दीवाल प्रभृति देशों की, हाथ और
शरीर दोनों के साथ, दोनों विभागों की प्रतीति एक ही समय होती है । अतः उन
दोनों विभागों में से एक को कारण मानना और दूसरे को कार्य मानना प्रत्यक्ष के
विरुद्ध है । (उ.) किन्तु यह ठीक नहीं है; क्योंकि जिस समय दीवाल से हाथ का
विभाग उत्पन्न होता है, उस समय दीवाल से शरीर के विभाग की उत्पत्ति होने का
कारण नहीं रहता है । कारणों के न रहने से कार्यों की उत्पत्ति सम्भव नहीं है ।
पहले कह चुके हैं कि हाथ की क्रिया उस (दीवाल और शरीर के विभाग) का
कारण नहीं है । अतः यह कहना भ्रान्त, अभिमान (मूलक) ही है कि हाथ एवं
शरीर दोनों से (दीवाल प्रभृति के) एक ही समय दो विभाग उत्पन्न होते हैं ।
(प्र.) उक्त दोनों विभागों का एक समय में उत्पन्न होना प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है
एवं उन दोनों विभागों का क्रमशः उत्पन्न होना अनुमान से सिद्ध होता है । प्रत्यक्ष से
विरुद्ध अनुमान की उत्पत्ति सम्भव नहीं है; क्योंकि अनुमान के विषय का प्रत्यक्ष के द्वारा
बाधित न होना आवश्यक है । तो फिर अयौगपद्य के अनुमान से यौगपद्य के प्रत्यक्ष

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७५

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७५
न्यायकदली
विषयस्य बाधो निश्चितः स्यात् । इह त्वसौ सन्दिग्धः, पत्रशतव्यति-
भेदस्याशुभावित्वेनापि निमित्तेन यौगपद्यग्राहकस्य प्रत्यक्षस्य प्रवृत्तेः सम्भवात् । अस्ति च
सर्वलोकप्रसिद्धम् 'अतिदृढमव्यवहिता सूची भिनत्ति, न व्यवहितम्' इति व्याप्तिग्राहकं
प्रमाणम् । अतस्तत्सामर्थ्यात् प्रत्यक्षे सम्भवत्यपि भवत्यनुमानस्योदय इति । एवं चेदत्र
व्यधिकरणा क्रिया विभागं न करोतीति व्याप्तिग्राहकस्य प्रमाणस्यातिदृढत्वात्
प्रत्यक्षस्य चान्यथाप्युपपत्तेः सुस्थितं क्रमानुमानम् । अत एव चानेन प्रत्यक्षस्य बाधः ।
इदं हि सविषयम् । निर्विषयं च प्रत्यक्षम्, आशुभावित्वमात्रेण प्रवृत्तेः । यच्च सविषयं
तत् तथात्वेनावस्थितस्य विषयस्य साहाय्याप्त्या सबलम्, दुर्बलं च निर्विषयम-
सहायत्वात् । व्याप्तिग्राहकेणैव प्रत्यक्षेण हि बाधो यदनुमानेन प्रत्यक्षस्य बाधः । तथा
च दिङ्मोहादिष्वनुमानमेव बलवदिति मन्यन्ते वृद्धाः 'भवति वै प्रत्यक्षादप्यनुमानं
बलीयः' इति वदन्तः । वृद्धावुन्मन्तग्राहिणः प्रत्यक्षस्य तु नान्यथोपपत्तिरस्तीति
का भ्रान्तिरूप होना किस प्रकार सम्भव है ? । (उ.) तो फिर 'कमल के सौ पत्तों
का छेदन क्रमशः ही होता है' इस क्रमानुमान की निष्पत्ति किस प्रकार होगी ?
क्योंकि वहाँ भी तो प्रत्यक्ष का विरोध है । अगर यह मानें कि (प्र.) वहीं प्रत्यक्ष
के विरोध से अनुमान की प्रवृत्ति रोकी जाती है, जहाँ उनके विषय का प्रत्यक्ष के
द्वारा बाधित होना निश्चित हो । अनुमान के विषय कमल के पत्तों के क्रमशः
छेदन का प्रत्यक्ष के द्वारा बाध सन्दिग्ध है; क्योंकि सौ पत्तों का छेदन अतिशीघ्रता
से क्रमशः होने से भी यौगपद्य (एक ही समय उत्पन्न होने) के ग्राहक प्रत्यक्ष की
प्रवृत्ति हो सकती है । 'सूई अगर किसी से व्यवहित न रहे, तो अतिदृढ़ वस्तु का
भी भेदन करती है एवं व्यवहित होने पर नहीं' यह सर्वजनीन अनुभव ही (उक्त
क्रमानुमान के कारणीभूत) व्याप्ति का निश्चायक है । अतः इस व्याप्ति के बल से
विरोधी प्रत्यक्ष की प्रवृत्ति रहने पर भी अनुमान का उदय होता है । (उ.) तो
फिर प्रकृत में भी 'एक अधिकरण में रहनेवाली क्रिया दूसरे अधिकरण में विभाग
को उत्पन्न नहीं करती है' व्याप्ति का यह प्रमाण अत्यन्त दृढ़ है । एवं उक्त
यौगपद्य प्रत्यक्ष की उपपत्ति और प्रकार से भी हो सकती है । अतः (दीवाल से
हाथ का विभाग एवं दीवाल से शरीर का विभाग इन दोनों के) क्रमशः होने का
अनुमान सुस्थिर है । अतएव इस अनुमान से प्रत्यक्ष का बाध होता है; क्योंकि
यह (अनुमान) सविषयक (यथार्थ) है और प्रत्यक्ष निर्विषयक (भ्रम) है । केवल
दोनों के अतिशीघ्रता से उत्पन्न होने के कारण ही यौगपद्य में प्रवृत्ति है ।
सविषयक (यथार्थ) ज्ञान उस (ज्ञान के द्वारा प्रकाशित) रूप से यथार्थतः विद्यमान
वस्तु की सहायता प्राप्त होने के कारण बलवान् है । निर्विषयक (अयथार्थ)
ज्ञान उससे दुर्बल है; क्योंकि वह असहाय है । अनुमान से प्रत्यक्ष का यह
बाध वस्तुतः व्याप्ति के ग्राहक प्रत्यक्ष के द्वारा ही किया जाता है । अतएव 'कहीं

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३७६ न्यायकन्दलीसंबलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
न्यायकन्दली
तेनावधारिते विषयस्य बाधे नास्त्यनुमानस्य प्रवृत्तिः । किमर्थं पुनर्ज्ञानयोर्बाध्यबाधकभावः
कल्प्यते, समाने विषये तयोर्विरोधात् । एकमेव तद्वस्तु किञ्चिद्रजतमित्येवं बोधयति
शुक्तिकेयमिति चापरम् । शुक्तिकात्वरजतत्वयोश्च नैकत्र सम्भवः, सर्वदा तयोः
परस्परपरिहारेणावस्थानोपलम्भात् । अतो विषयविरोधात् तद्विज्ञानयोरपि विरोधे सति
बाध्यबाधकभावकल्पनम् ।
को बाधः ? विषयापहारः । ननु रजतज्ञानावभासितो धर्मी तावदुत्पन्नेऽपि
ज्ञानान्तरे तदवस्थ एव प्रतिभाति, रजतत्वं नास्त्येव, किमपहियते ?
सम्बन्धवियोजनस्यापहारार्थत्वात् । विज्ञाने प्रतिभातं तदिति चेत् ? सत्यं प्रतिभातं
न तु प्रतिभातं शक्यापहारम्, भूतत्वादेव । न हि प्रतिभासितोऽर्थोऽप्रतिभासितो
भवति, वस्तुवृत्त्या रजतमविद्यमानमपि ज्ञानेन विद्यमानवदुपदर्शितम् । तस्य
अनुमान से भी प्रत्यक्ष दुर्बल होता है' यह कहते हुए वृद्ध लोग दिग्भ्रम स्थल में
प्रत्यक्ष से अनुमान को ही बलवान् मानते हैं । वह्नि में उष्णत्व के ग्राहक प्रत्यक्ष
प्रमाण से अनुमान को दुर्बल मानते हैं । चूँकि वह्नि में उष्णत्व के ग्राहक प्रत्यक्ष
प्रमाण की किसी और प्रकार से उपपत्ति नहीं हो सकती, अतः प्रत्यक्ष से निश्चित
उष्णत्व रूप विषय का बाध रहने के कारण (वह्नि में अनुष्णत्वविषयक) अनुमान
की प्रवृत्ति नहीं होती है । (प्र.) यह कल्पना ही क्यों करते हैं कि एक ज्ञान बाध्य
है और दूसरा बाधक ? (उ.) चूँकि समान विषय के दो ज्ञानों में विरोध रहता है ।
एक ही वस्तु को कोई रजत समझता है, कोई सीप; किन्तु शुक्तिकात्व और
रजतत्व दोनों एक आश्रय में नहीं रह सकते; क्योंकि दोनों की प्रतीति बराबर
एक को छोड़कर ही होती है (कभी समानाधिकरण रूप से नहीं), अतः दोनों
विषयों में विरोध (सहानवस्थान) के कारण दोनों के ज्ञानों में भी विरोध होता है।
इसी से एक में बाधकत्व और दूसरे में बाध्यत्व की कल्पना भी की जाती है ।
(प्र.) बाध कौन-सी वस्तु है ? (उ.) विषयों का अपहरण ही ज्ञानों का बाध
है । (प्र.) (शुक्तिका में) 'यह रजत है' इस आकार के ज्ञान से प्रकाशित होनेवाला
शुक्तिकारूप धर्मी, शुक्तिका में 'यह शुक्तिका है' इस आकार के बाधक ज्ञान के
उत्पन्न होने पर भी ज्यों का त्यों प्रतिभासित होता है और रजतत्व तो शुक्तिका में
है ही नहीं, तो फिर ('यह शुक्तिका है, रजत नहीं' इत्यादि आकार के) बाधक
ज्ञान किन विषयों का अपहरण करते हैं ? (उ.) बाधक ज्ञान से (ज्ञान में भासित
होनेवाले धर्मी और धर्म के) सम्बन्ध का अपहरण होता है । (प्र.) वह (सम्बन्ध)
भी तो (शुक्तिका में 'यह रजत है' इस) विज्ञान में प्रतिभासित है ही । (उ.)
अवश्य ही सम्बन्ध भी उक्त ज्ञान में प्रतिभासित होता है; क्योंकि प्रतिभान
(ज्ञान) का तो अपहरण हो नहीं सकता; क्योंकि ज्ञान की यथार्थ में सत्ता है ।

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७७
न्यायकन्दली
ज्ञानप्रसञ्जितस्य साक्षाद्विरोधप्रतिपादनमेव वियोजनमिति चेद्रजताभावे प्रतिपादिते
रजतज्ञानस्य का क्षतिर्भूत् ? न ह्यस्य रजतस्थितिकरणे व्यापारः, अपि त्वस्य प्रकाशने,
तच्चानेन जायमानेन कृतमिति पर्यवसितमिदं किं बाध्यते ? रजताभावप्रतीतौ पूर्वोप-
जातस्य रजतज्ञानस्य अयथार्थतास्वरूपं प्रतीयत इत्येषा क्षतिर्भूत् ।
नन्वेवं फलापहार एव बाधः, अयथार्थतावगमे सति ज्ञानस्य व्यवहारानङ्गत्वात् ।
मैवम् । फलापहारस्य विषयापहारनान्तरीयकत्वात् । न तावज् ज्ञानस्य सर्वत्र
फलनिष्ठता, तस्य पुरुषेच्छाधीनस्याप्यनुपजनेऽप्युपेक्षासंवितेः पर्यवसानात् । यत्रापि
फलार्थिता, तत्रापि फलस्य विषयप्रतिबद्धत्वादिषयस्य ज्ञानप्रतिबद्धत्वाद्धिषयापहार एव
ज्ञानस्य बाधो न फलापहारः, तस्य विषयापहारनान्तरीयकत्वादिति कृतं ग्रन्थविस्तरेण
संग्रहटीकायाम् ।
विभागजविभागानन्तरभावित्वात् पूर्वं प्रतिज्ञातं चिरोत्पन्नस्य च संयोगज-
संयोगं प्रतिपादयति-तदनन्तरमिति । तस्माद्विभागजविभागादनन्तरं शरीर-
प्रतिभासित विषय अप्रतिभासित नहीं हो सकते । (प्र.) वस्तुओं के स्वभाव के
कारण (शुक्तिका स्थल में) अविद्यमान रजत भी शुक्तिका के अधिकरण में (इदं
रजतम्) इस ज्ञान के द्वारा विद्यमान के समान दिखाई देता है । अगर ज्ञान से
उत्थापित रजत के साक्षात् विरोध के प्रतिपादन को ही उक्त 'विरोध' कहें, तो
फिर शुक्तिका के अधिकरण में रजत का अभाव प्रतिपादित होने पर भी उक्त
(भ्रमात्मक) रजतज्ञान की क्या क्षति हुई ? इस ज्ञान का इतना ही काम है कि वह
रजत को प्रकाशित करे, रजत की स्थिति का ज्ञान उसका काम नहीं है । रजत
के प्रकाशन का अपना काम तो उसने उत्पन्न होते ही कर दिया है, तो फिर उस
ज्ञान से बाध किसका होता है ? (उ.) रजत के अभाव की प्रतीति होने पर पहले
(शुक्तिका के अधिकरण में रजत के) ज्ञान में जो अयथार्थत्व की प्रतीति होती है,
बाधक ज्ञान से बाध्यज्ञान की यही क्षति है ।
(प्र.) इस प्रकार तो 'फल' का अपहरण ही बाध है; क्योंकि अयथार्थता का
ज्ञान होने पर, वह ज्ञान फिर उस व्यवहार का अङ्ग नहीं रह जाता । (उ.) ऐसी
बात नहीं है; क्योंकि विषयापहरण के विना फल का अपहरण हो ही नहीं सकता ।
सभी जगह ज्ञान 'फलनिष्ठ' अर्थात् फल का उत्पादक नहीं होता; क्योंकि पुरुष
की इच्छा के अनुसार फल की उत्पत्ति न होने पर वह (ज्ञान) उपेक्षाज्ञान में
परिणत हो जाता है । जहाँ पर ज्ञान फल का उत्पादक होता भी है, वहाँ भी फल
का सम्बन्ध विषय के साथ ही रहता है और विषय का सम्बन्ध ज्ञान के साथ
रहता है, अतः विषय का अपहरण ही बाध है, फल का अपहरण नहीं; क्योंकि
फल का अपहरण विषय के अपहरण के साथ नियमित है । (इससे अधिक)
संग्रह-रूप टीका-ग्रन्थ में विस्तार करना व्यर्थ है ।
विभागज विभाग के बाद उत्पन्न होने के कारण एवं पूर्व में प्रतिज्ञात होने के
कारण चिरकाल से उत्पन्न द्रव्यों के संयोगज संयोग का प्रतिपादन 'तदनन्तरम्' इत्यादि

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७७

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७७
न्यायकन्दली
ज्ञानप्रसञ्जितस्य साक्षाद्विरोधिप्रतिपादनमेव वियोजनमिति चेद्रजताभावे प्रतिपादिते
रजतज्ञानस्य का क्षतिर्भूत् ? न ह्यस्य रजतस्थितिकरणे व्यापारः, अपि त्वस्य प्रकाशने,
तच्चानेन जायमानेन कृतमिति पर्यवसितमिदं किं बाध्यते ? रजताभावप्रतीतौ पूर्वोप-
जातस्य रजतज्ञानस्य अयथार्थतास्वरूपं प्रतीयत इत्येषा क्षतिर्भूत् ।
नन्वेवं फलापहार एव बाधः, अयथार्थतावगमे सति ज्ञानस्य व्यवहारानङ्गत्वात् ।
मैवम् । फलापहारस्य विषयापहरनान्तरीयकत्वात् । न तावज् ज्ञानस्य सर्वत्र
फलनिष्ठता, तस्य पुरुषेच्छाधीनस्थानुपजननेऽप्युपेक्षासंवित्तेः पर्यवसानात् । यत्रापि
फलार्थिता, तत्रापि फलस्य विषयप्रतिबद्धत्वाद्विषयस्य ज्ञानप्रतिबद्धत्वाद्धिषयापहार एव
ज्ञानस्य बाधो न फलापहारः, तस्य विषयापहारनान्तरीयकत्वादिति कृतं ग्रन्थविस्तरेण
संग्रहटीकायाम् ।
विभागजविभागानन्तरभावित्वात् पूर्वं प्रतिज्ञातं चिरोत्पन्नस्य च संयोगज-
संयोगं प्रतिपादयति-तदनन्तरमिति । तस्माद्विभागजविभागादनन्तरं शरीर-
प्रतिभासित विषय अप्रतिभासित नहीं हो सकते । (प्र.) वस्तुओं के स्वभाव के
कारण (शुक्तिका स्थल में) अविद्यमान रजत भी शुक्तिका के अधिकरण में (इदं
रजतम्) इस ज्ञान के द्वारा विद्यमान के समान दिखाई देता है । अगर ज्ञान से
उत्थापित रजत के साक्षात् विरोध के प्रतिपादन को ही उक्त 'विरोध' कहें, तो
फिर शुक्तिका के अधिकरण में रजत का अभाव प्रतिपादित होने पर भी उक्त
(भ्रमात्मक) रजतज्ञान की क्या क्षति हुई ? इस ज्ञान का इतना ही काम है कि वह
रजत को प्रकाशित करे, रजत की स्थिति का ज्ञान उसका काम नहीं है । रजत
के प्रकाशन का अपना काम तो उसने उत्पन्न होते ही कर दिया है, तो फिर उस
ज्ञान से बाध किसका होता है ? (उ.) रजत के अभाव की प्रतीति होने पर पहले
(शुक्तिका के अधिकरण में रजत के) ज्ञान में जो अयथार्थत्व की प्रतीति होती है,
बाधक ज्ञान से बाध्यज्ञान की यही क्षति है ।
(प्र.) इस प्रकार तो 'फल' का अपहरण ही बाध है; क्योंकि अयथार्थता का
ज्ञान होने पर, वह ज्ञान फिर उस व्यवहार का अङ्ग नहीं रह जाता । (उ.) ऐसी
बात नहीं है; क्योंकि विषयापहरण के विना फल का अपहरण हो ही नहीं सकता ।
सभी जगह ज्ञान 'फलनिष्ठ' अर्थात् फल का उत्पादक नहीं होता; क्योंकि पुरुष
की इच्छा के अनुसार फल की उत्पत्ति न होने पर वह (ज्ञान) उपेक्षाज्ञान में
परिणत हो जाता है । जहाँ पर ज्ञान फल का उत्पादक होता भी है, वहाँ भी फल
का सम्बन्ध विषय के साथ ही रहता है और विषय का सम्बन्ध ज्ञान के साथ
रहता है, अतः विषय का अपहरण ही बाध है, फल का अपहरण नहीं; क्योंकि
फल का अपहरण विषय के अपहरण के साथ नियमित है । (इससे अधिक)
संग्रह-रूप टीका-ग्रन्थ में विस्तार करना व्यर्थ है ।
विभागज विभाग के बाद उत्पन्न होने के कारण एवं पूर्व में प्रतिज्ञात होने के
कारण चिरकाल से उत्पन्न द्रव्यों के संयोगज संयोग का प्रतिपादन 'तदनन्तरम्' इत्यादि

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३७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यदि कारणविभागानन्तरं कार्यविभागोत्पत्तिः,
कारणसंयोगानन्तरं कार्यसंयोगोत्पत्तिः । नन्वेवमवयवावयविनोर्युत-
सिद्धिदोषप्रसङ्ग इति । न, युतसिद्धयपरिज्ञानात् । सा पुनर्द्वयो-
(प्र.) अगर कारण विभाग की उत्पत्ति के बाद कार्य विभाग की उत्पत्ति
होती है एवं कारण संयोग के बाद कार्य संयोग की उत्पत्ति होती है, तो फिर
अवयव और अवयवी के युतसिद्धि की आपत्ति होगी ? (उ.) (यह आपत्ति)
नहीं है, युतसिद्धि को न समझने के कारण ही (आपने उक्त आपत्ति दी है)
न्यायकन्दली
कारणस्य हस्तस्याकारणानामाकाशादिदेशानां संयोगात् कर्मजाद् हस्तकार्यस्य शरीरस्य
निष्क्रियस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां संयोगानारभन्ते न हस्तक्रिया, तस्याः स्वाश्रयस्य
देशान्तरप्राप्तिहेतुत्वात् । इतिशब्दः प्रक्रमसमाप्तौ ।
अत्र चोदयति-यदीति । कारणस्य हस्तस्य विभागानन्तरं यदि
कार्यस्य शरीरस्य विभागस्तथा कारणस्य संयोगानन्तरं कार्यस्य संयोगो
न तत्समकालम् । नन्वेवं सत्यवयवावयविनोर्युतसिद्धिः, पृथक्सिद्धिः
परस्परस्वातन्त्र्यं स्यात् । एतदुक्तं भवति । यदि हस्ताश्रितं शरीरं तदा हस्ते गच्छति
तदपि सहैव गच्छेत्, तथा सति च संयोगविभागक्रमो न स्यात्, क्रमेण चेदनयोः
संयोगविभागौ न तदा हस्तगमने शरीरस्य गमनमिति तस्य स्वातन्त्र्यप्रसक्तिः ।
ग्रन्थ से किया जाता है । (तत्) 'तस्मात्' अर्थात् विभागज विभाग के बाद, शरीर
के (समवायि) कारणीभूत सक्रिय हाथ का आकाशादि देशों के साथ (कर्मज)
संयोग से ही हाथ के कार्य शरीर का (हाथ के ) अकार्य आकाशादि देशों के
साथ संयोग उत्पन्न होता है, क्रिया से नहीं; क्योंकि क्रिया अपने आश्रय का किसी
दूसरे के साथ संयोग का ही कारण हो सकती है । यहाँ भी 'इति' शब्द प्रसङ्ग की
समाप्ति का ही बोधक है ।
'यदि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा फिर से प्रश्न करते हैं कि अगर 'कारण'
अर्थात् हाथ के विभाग के बाद 'कार्य' का अर्थात् शरीर का विभाग मानें एवं कारण
(हाथ) के संयोग के बाद कार्य (शरीर) का संयोग मानें (अर्थात् एक ही समय
कार्य और कारण के दूसरे देशों के साथ संयोग या विभाग न मानें, क्रमशः ही
मानें), तो फिर अवयव और अवयवी इन दोनों की युतसिद्धि अर्थात् अलग-अलग
सिद्धियाँ माननी होगी, फलतः दोनों की स्वतन्त्रता की आपत्ति होगी । अभिप्राय यह
है कि अगर शरीर हाथ में आश्रित है, तो फिर हाथ के चलने पर शरीर भी उसके
साथ ही चले; किन्तु तब संयोग और विभाग का कथित क्रम ठीक नहीं होगा । अर्थात्
इनमें अगर क्रमशः संयोग और विभाग हो, तो फिर हाथ के चलने से शरीर का

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३७९
प्रशस्तपादभाष्यम्
रन्यतरस्य वा पृथग्गतिमत्त्वमियन्तु नित्यानाम्, अनित्यानां तु
युतेब्ध्याश्रयेषु समवायो युतसिद्धिरिति । त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथग्गति-
मत्त्वं नास्ति, युतेब्ध्याश्रयेषु समवायोऽस्तीति परस्परेण संयोगः
दोनों में से एक की गतिशीलता नित्यों की युतसिद्धि है । पृथक् आश्रयों
में समवाय का रहना अनित्यों की युतसिद्धि है । त्वगिन्द्रिय और शरीर
दोनों यद्यपि स्वतन्त्र रूप से गतिशील नहीं हैं, फिर भी दोनों भिन्न आश्रयों
में रहते हैं, अतः सिद्ध होता है कि शरीर और त्वगिन्द्रिय में संयोग (ही)
न्यायकन्दली
परिहरति-नेति । युतसिद्धिप्रसङ्ग इति न, कुतः ? युतसिद्धेरपरिज्ञानात् । यादृशं
युतसिद्धेर्लक्षणं तादृशं त्वया न ज्ञातमित्यर्थः । कीदृशं तस्या लक्षणं तत्राह-सा पुनर्द्वयोरिति ।
द्वयोरेकस्य वा परस्परसंयोगविभागहेतुभूतकर्मसमवाययोग्यता युतसिद्धिः । द्वयोः
परमाण्वोः पृथग्गमनमाकाशपरमाण्वोश्चान्यतरस्य पृथग्गमनमियं तु नित्यानाम् । तुशब्दोऽ-
वधारणे, नित्यानामित्यस्मात् परो द्रष्टव्यः, नित्यानामेवेयं युतसिद्धिरित्यर्थः । अनित्यानां
तु युतेब्ध्याश्रयेषु समवायो युतसिद्धिः । द्वयोरन्यतरस्य वा परस्परपरिहारेणान्यत्राश्रये
समवायो युतसिद्धिरनित्यानां द्वयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं समवायः । शकुन्याकाशयो-
चलना सिद्ध नहीं होगा, इस प्रकार अवयव और अवयवी दोनों में (युतसिद्धि
रूप) स्वतन्त्रता की आपत्ति होगी ।
'न' इत्यादि से इसका परिहार करते हैं । अर्थात् 'युतसिद्धि' की जो आपत्ति
दी गई है, वह ठीक नहीं है; क्योंकि (आपत्ति देनेवाले को) 'युतसिद्धि' का
यथार्थज्ञान नहीं है । अर्थात् युतसिद्धि का जो लक्षण है, उसका तुम्हें ज्ञान ही नहीं
है । युतसिद्धि का क्या लक्षण है ? इस प्रश्न के उत्तर में 'सा पुनर्द्वयोः' इत्यादि
सन्दर्भ लिखा गया है । अर्थात् परस्पर के संयोग और विभाग के प्रतियोगी
और अनुयोगी दोनों में या दोनों में से एक में, उक्त संयोग और विभाग के
कारणीभूत क्रिया के समवाय की योग्यता ही 'युतसिद्धि' है । द्व्यणुक समवाय
के दोनों ही अनुयोगी (दोनों ही परमाणु) गतिशील हैं, आकाश और परमाणु इन
दोनों में से एक गतिशील है । यह नित्यों की युतसिद्धि है । अतः दोनों परमाणुओं
में या परमाणु और आकाश में संयोग ही होते हैं, समवाय नहीं (क्योंकि
समवाय अयुतसिद्धों में ही होता है) । 'तु' शब्द अवधारण का बोधक है ।
अर्थात् युतसिद्धि का कथित लक्षण नित्य के युतसिद्ध का ही है । अनित्य
युतसिद्धों के लिए युतसिद्धि का दूसरा लक्षण खोजना चाहिए । 'युत' आश्रयों में
समवाय ही अनित्यों की युतसिद्धि है । अर्थात् दोनों का, अथवा दोनों में से
एक का परस्पर एक को छोड़कर दूसरे आश्रय में समवाय ही (अनित्यों की)
युतसिद्धि है । फलतः दोनों का अथवा दोनों में से एक का पृथक् आश्रयाश्रयित्व,

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१८० न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
सिद्धः । अण्वाकाशयोस्त्वाश्रयान्तराभावेऽप्यन्यतरस्य पृथग्गति-
मत्त्वात् संयोगविभागौ सिद्धौ । तन्तुपटयोरनित्ययोराश्रयान्तरा-
है (समवाय नहीं)। परमाणु और आकाश इन दोनों में से कोई भी
पृथक् आश्रय में नहीं रहता (क्योंकि दोनों का कोई आश्रय ही नहीं
है), फिर भी दोनों में से एक (परमाणु) में स्वतन्त्र गति है, अतः
आकाश और परमाणु इन दोनों में संयोग की सिद्धि (और संयोगसिद्धि
के कारण ही) विभाग की भी सिद्धि समझनी चाहिए। चूँकि अनित्य
न्यायकन्दली
श्चान्यतरस्य शकुनेः पृथगाश्रयाश्रयित्वम् । यद्यप्यन्यतरस्य पृथग्गमनमप्यस्ति, तथापि तस्य
पृथग्गमनस्य ग्रहणं तस्य नित्यविषयतयेन व्याख्यानात् ।
अनित्यानामपि पृथग्गमनमेव युतसिद्धिः किं नोच्यते ? तदाह-त्वगिन्द्रियशरीरयोः
पृथग्गमनं नास्ति, युतेष्वाश्रयेषु समवायोऽस्तीति परस्परेण संयोगः सिद्धः । यदि त्वनि-
त्यानामपि पृथग्गमनं युतसिद्धिरुच्यते, त्वगिन्द्रियशरीरयोः पृथग्गमनाभावाद्युतसिद्धता
स्यात् । ततश्च तयोः परस्परसंयोगो न प्राप्नोति, तस्य युतसिद्धयैव व्याप्तत्वात् ।
तस्मादनित्यानां न पृथग्गमनं युतसिद्धिरित्यर्थः । आश्रयाभावादेव पृथगाश्रयाश्रयित्वं
नित्येषु नास्ति । तेषां च पृथग्गतिमत्त्वात् परस्परसंयोगविभागौ सिद्धौ, तेनेषां पृथग्गमन-
मेव युतसिद्धिरित्यभिप्रायेणाह-अण्वाकाशयोस्त्वाश्रयान्तराभावेऽप्यन्यतरस्य पृथग्गति-
अर्थात् समवाय ही अनित्यों की 'युतसिद्धि' है। बाज पक्षी और आकाश इन
दोनों में से एक में (बाज पक्षी में) पृथक् 'आश्रयाश्रयित्व' है। यद्यपि दोनों में से
एक (बाज पक्षी) में पृथक् गतिशीलता भी है; किन्तु उस पृथक् गमन का यहाँ
ग्रहण नहीं है; क्योंकि नित्यों की युतसिद्धि के लिए उसका उपादान किया गया है ।
(प्र.) पृथक् गमन-शीलता को ही अनित्यों की भी युतसिद्धि का लक्षण क्यों नहीं
मानते ? इसी प्रश्न के उत्तर में कहते हैं कि त्वगिन्द्रिय और शरीर ये दोनों यद्यपि
स्वतन्त्र रूप से गतिशील हैं, फिर भी युत आश्रयों में इन दोनों का समवाय है, अतः
सिद्ध होता है कि दोनों में संयोग ही है (अयुतसिद्धों में रहनेवाला समवाय नहीं) ।
अभिप्राय यह है कि अनित्यों की युतसिद्धि भी अगर 'पृथग् गमन' रूप ही कही
जाय, तो त्वगिन्द्रिय और शरीर इन दोनों में से किसी में भी पृथक् गतिशीलता न
रहने के कारण वे दोनों भी अयुतसिद्ध होंगे। इससे उन दोनों में संयोग असम्भव
हो जाएगा; क्योंकि यह नियम है कि संयोग युतसिद्धों में ही होता है । अतः
'पृथग् गमनशीलत्व' अनित्यों की युतसिद्धि नहीं है । नित्य द्रव्यों का कोई आश्रय
नहीं होता, अतः 'पृथगाश्रयाश्रयित्व' नित्यों की युतसिद्धि नहीं हो सकती ।

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प्रकरणम्] भाषानुवादसहितम् ३८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावात् परस्परतः संयोगविभागाभाव इति। दिगादीनां तु पृथग्गतिमत्त्वाभावादिति
परस्परेण संयोगविभागाभाव इति ।
तन्तु और अनित्य पट के अलग से स्वतन्त्र आश्रय नहीं रहते, अतः यह
सिद्ध होता है कि इन दोनों में संयोग और (तन्मूलक) विभाग नहीं होते ।
दिगादि (विभु द्रव्यों में) स्वतन्त्र गति न रहने के कारण ही उनमें
परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही नहीं होते ।
न्यायकन्दली
मत्त्वात् संयोगविभागौ सिद्धाविति । पूर्वमसत्यपि पृथग्गतिमत्त्वे त्वगिन्द्रियशरीरयोः
पृथगाश्रयाश्रयित्वे सति संयोगसम्भवादनित्यानां पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिर्न पृथग्गमन-
मित्यक्तम् ।
सम्प्रत्येनमेवार्थं समर्थयितुं तन्तुपटयोरन्यतरस्य पृथग्गतिमत्त्वासम्भवेऽपि पृथगाश्रयत्वा-
भावात् संयोगविभागाभावं दर्शयति-तन्तुपटयोरित्यादिना । विभूनां तु द्वयोरन्यतरस्य
वा पृथग्गमनाभावान्न परस्परेण संयोगः, नापि विभागः, तस्य संयोगपूर्वकत्वात्; किन्तु
स्वरूपस्थितिमात्रमित्याह-दिगादीनामिति । एतावता सन्दर्भेणैतदुपपादितम्, हस्ते गच्छति
शरीरं न गच्छतीति, एतावता न युतसिद्धिः । यदि तु हस्तशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं
स्यात्, तदा भवेद्दनयोर्युतसिद्धता । तत्तु नास्ति, शरीरस्य हस्ते समवेतत्वात् ।
अनित्य द्रव्य पृथक् गतिशील हैं एवं इनमें परस्पर संयोग और विभाग भी होते हैं
। अतः पृथक् गमनशीलता ही अनित्यों की युतसिद्धि है । इसी अभिप्राय से 'अणु'
इत्यादि सन्दर्भ लिखे गये हैं । अर्थात् परमाणु और आकाश इन दोनों का दूसरा
कोई आश्रय न रहने पर भी चूँकि दोनों में से एक (अर्थात् परमाणु) स्वतन्त्र रूप
से गतिशील है । अतः आकाश और परमाणु (दोनों के युतसिद्ध होने के कारण)
इन दोनों में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । पहले पृथक् गति न रहने
पर भी त्वगिन्द्रिय और शरीर में पृथगाश्रयाश्रयित्व के रहने के कारण दोनों में
संयोग सम्भव होता है । इसीलिए कहा गया है कि पृथगाश्रयाश्रयित्व ही अनित्यों
की युतसिद्धि है, पृथक् गमन नहीं ।
तन्तु और पट इन दोनों में से एक में पृथक् गति की सम्भावना न
रहने पर भी, पृथक् आश्रयत्व के न रहने से ही दोनों में संयोग और विभाग
नहीं होते, यही बात 'तन्तुपटयोः' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलाया गया है ।
'दिगादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से यह प्रतिपादित हुआ है कि दो विभुद्रव्यों में या दो
में से किसी एक विभुद्रव्य में भी पृथक् गति नहीं है । अतः दो विभुद्रव्यों
में परस्पर संयोग नहीं होता । संयोग के न होने के कारण ही दोनों में विभाग
भी नहीं होता; क्योंकि संयुक्तद्रव्यों में ही विभाग भी होता है । इन पङ्क्तियों
के द्वारा यही कहा गया है कि हाथ के चलने पर भी शरीर नहीं चलता,

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३८२ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
विनाशास्तु सर्वस्य विभागस्य क्षणिकत्वात्, उत्तरसंयोगावधि-
सद्भावात् क्षणिक इति। न तु संयोगवद्वयोरेव विभागस्तयोरेव
चूँकि विभाग क्षणिक है, अतः उत्पत्ति के तृतीय क्षण में ही उसका
विनाश हो जाता है । सभी विभाग क्षणिक इस हेतु से हैं कि
उत्तर देश के साथ (विभाग के दोनों अवधि द्रव्यों के) संयोगपर्यन्त
ही उनकी सत्ता रहती है । जिस प्रकार संयोग का विनाश उसके
दोनों आश्रयों के विभाग से ही होता है, उसी प्रकार विभाग
न्यायकन्दली
विनाशास्तु सर्वस्य विभागस्य, क्षणिकत्वात् । कर्मजस्य विभागजस्य च कारणवृत्तेः
कारणाकारणवृत्तेश्च विभागस्य सर्वस्य क्षणिकत्वमाशुतरविनाशित्वं कुतः सिद्ध-
मित्यत्राह—उत्तरसंयोगावधिसद्भावादिति । उत्तरसंयोगोऽवधिः सीमा, तस्य सद्भावात्
क्षणिको विभागः। किमुक्तं स्यान्न विभागो निरवधिः, किन्त्वस्योत्तरसंयोगोऽवधिरस्ति, उत्तर-
संयोगश्चानन्तरमेव जायते, तस्मादाशुविनाश्युत्तरसंयोगो विभागस्यावधिरित्येतदेव कुतस्त-
त्राह—न तु संयोगवदिति । यथा संयोगः स्वाश्रययोरेव परस्परविभागाद्विनश्यति, नैवं विभागः
इसलिए वे दोनों युतसिद्ध नहीं हो सकते, अगर हाथ और शरीर दोनों
पृथगाश्रयाश्रयी होते तो वे दोनों युतसिद्ध होते, सो नहीं है, अतः हाथ में शरीर
(अयुतसिद्ध होने के कारण) समवाय सम्बन्ध से है (हाथ और शरीर दोनों में
संयोग सम्बन्ध नहीं है ) ।
सभी विभाग के क्षणिक होने के कारण अपनी उत्पत्ति के तीसरे ही क्षण में
विनष्ट हो जाते हैं । कारण (मात्र) में रहनेवाले एवं कारण और अकारण दोनों
में रहनेवाले क्रिया से उत्पन्न और विभाग से उत्पन्न दोनों ही प्रकार के विभागों में
क्षणिकत्व अर्थात् अतिशीघ्र विनष्ट होने का स्वभाव किस हेतु से है ? इसी प्रश्न
का उत्तर 'उत्तरसंयोगावधिसद्भावात्' इस वाक्य से दिया गया है । अर्थात् उत्तर
संयोग ही उसकी अवधि अर्थात् सीमा है, इसी अवधि के कारण विभाग
क्षणिक है । इससे क्या तात्पर्य निकला ? (यही कि) विभाग निरवधि (नित्य) नहीं
है एवं उत्तर संयोग ही उसकी अवधि है; क्योंकि विभाग के बाद ही उत्तरसंयोग
की उत्पत्ति होती है । अतः शीघ्रतर विनाशी उत्तरसंयोग ही उसकी अवधि है ।
(प्र.) यही (उत्तरदेश का संयोग) क्यों ? (विभाग का विनाशक है ? केवल अपने
दोनों अवयवियों का संयोग ही क्यों नहीं विभाग का विनाशक है ?) इसी
प्रश्न का उत्तर 'न तु संयोगवत्' इत्यादि सन्दर्भ से दिया गया है । अर्थात्

प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८१

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प्रकरणम् ] भाषानुवादसहितम् ३८१
प्रशस्तपादभाष्यम्
भावात् परस्परतः संयोगविभागाभाव इति। दिगादीनां तु पृथग्गतिमत्त्वाभावादिति
परस्परेण संयोगविभागाभाव इति ।
तन्तु और अनित्य पट के अलग से स्वतन्त्र आश्रय नहीं रहते, अतः यह
सिद्ध होता है कि इन दोनों में संयोग और (तन्मूलक) विभाग नहीं होते ।
दिगादि (विभु द्रव्यों में) स्वतन्त्र गति न रहने के कारण ही उनमें
परस्पर संयोग और विभाग दोनों ही नहीं होते ।
न्यायकन्दली
मत्त्वात् संयोगविभागौ सिद्धाविति । पूर्वमसत्यापि पृथग्गतिमत्त्वे त्वगिन्द्रियशरीरयोः
पृथगाश्रयाश्रयित्वे सति संयोगसम्भवादनित्यानां पृथगाश्रयाश्रयित्वं युतसिद्धिर्न पृथग्गमन-
मित्यक्तम् ।
सम्प्रत्यनेनेवार्थं समर्थयितुं तन्तुपटयोरन्यतरस्य पृथग्गतिमत्त्वासम्भवेऽपि पृथगाश्रयत्या-
भावात् संयोगविभागाभावं दर्शयति-तन्तुपटयोरित्यादिना । विभूनां तु द्वयोरन्यतरस्य
वा पृथग्गमनाभावान्न परस्परेण संयोगः, नापि विभागः, तस्य संयोगपूर्वकत्वात्; किन्तु
स्वरूपस्थितिमात्रमित्याह-दिगादीनामिति । एतावता सन्दर्भेणैतदुपपादितम्, हस्ते गच्छति
शरीरं न गच्छतीति, एतावता न युतसिद्धिः । यदि तु हस्तशरीरयोः पृथगाश्रयाश्रयित्वं
स्यात्, तदा भवेदनयोर्युतसिद्धता । तन्तु नास्ति, शरीरस्य हस्ते समवेतत्वात् ।
अनित्य द्रव्य पृथक् गतिशील हैं एवं इनमें परस्पर संयोग और विभाग भी होते हैं
। अतः पृथक् गमनशीलता ही अनित्यों की युतसिद्धि है । इसी अभिप्राय से 'अणु'
इत्यादि सन्दर्भ लिखे गये हैं । अर्थात् परमाणु और आकाश इन दोनों का दूसरा
कोई आश्रय न रहने पर भी चूँकि दोनों में से एक (अर्थात् परमाणु) स्वतन्त्र रूप
से गतिशील है । अतः आकाश और परमाणु (दोनों के युतसिद्ध होने के कारण)
इन दोनों में संयोग और विभाग की सिद्धि होती है । पहले पृथक् गति न रहने
पर भी त्वगिन्द्रिय और शरीर में पृथगाश्रयाश्रयित्व के रहने के कारण दोनों में
संयोग सम्भव होता है । इसीलिए कहा गया है कि पृथगाश्रयाश्रयित्व ही अनित्यों
की युतसिद्धि है, पृथक् गमन नहीं ।
तन्तु और पट इन दोनों में से एक में पृथक् गति की सम्भावना न
रहने पर भी, पृथक् आश्रयत्व के न रहने से ही दोनों में संयोग और विभाग
नहीं होते, यही बात 'तन्तुपटयोः' इत्यादि सन्दर्भ से दिखलाया गया है ।
'दिगादीनाम्' इत्यादि सन्दर्भ से यह प्रतिपादित हुआ है कि दो विभुद्रव्यों में या दो
में से किसी एक विभुद्रव्य में भी पृथक् गति नहीं है । अतः दो विभुद्रव्यों
में परस्पर संयोग नहीं होता । संयोग के न होने के कारण ही दोनों में विभाग
भी नहीं होता; क्योंकि संयुक्तद्रव्यों में ही विभाग भी होता है । इन पङ्क्तियों
के द्वारा यही कहा गया है कि हाथ के चलने पर भी शरीर नहीं चलता,