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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 340 of 759

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Page 340

३७८ न्यायकन्दलीसंवलितप्रशस्तपादभाष्यम् [ गुणे विभाग-
प्रशस्तपादभाष्यम्
यदि कारणविभागानन्तरं कार्यविभागोत्पत्तिः,
कारणसंयोगानन्तरं कार्यसंयोगोत्पत्तिः । नन्वेवमवयवावयविनोर्युत-
सिद्धिदोषप्रसङ्ग इति । न, युतसिद्धयपरिज्ञानात् । सा पुनर्द्वयो-
(प्र.) अगर कारण विभाग की उत्पत्ति के बाद कार्य विभाग की उत्पत्ति
होती है एवं कारण संयोग के बाद कार्य संयोग की उत्पत्ति होती है, तो फिर
अवयव और अवयवी के युतसिद्धि की आपत्ति होगी ? (उ.) (यह आपत्ति)
नहीं है, युतसिद्धि को न समझने के कारण ही (आपने उक्त आपत्ति दी है)
न्यायकन्दली
कारणस्य हस्तस्याकारणानामाकाशादिदेशानां संयोगात् कर्मजाद् हस्तकार्यस्य शरीरस्य
निष्क्रियस्याकार्याणामाकाशादिदेशानां संयोगानारभन्ते न हस्तक्रिया, तस्याः स्वाश्रयस्य
देशान्तरप्राप्तिहेतुत्वात् । इतिशब्दः प्रक्रमसमाप्तौ ।
अत्र चोदयति-यदीति । कारणस्य हस्तस्य विभागानन्तरं यदि
कार्यस्य शरीरस्य विभागस्तथा कारणस्य संयोगानन्तरं कार्यस्य संयोगो
न तत्समकालम् । नन्वेवं सत्यवयवावयविनोर्युतसिद्धिः, पृथक्सिद्धिः
परस्परस्वातन्त्र्यं स्यात् । एतदुक्तं भवति । यदि हस्ताश्रितं शरीरं तदा हस्ते गच्छति
तदपि सहैव गच्छेत्, तथा सति च संयोगविभागक्रमो न स्यात्, क्रमेण चेदनयोः
संयोगविभागौ न तदा हस्तगमने शरीरस्य गमनमिति तस्य स्वातन्त्र्यप्रसक्तिः ।
ग्रन्थ से किया जाता है । (तत्) 'तस्मात्' अर्थात् विभागज विभाग के बाद, शरीर
के (समवायि) कारणीभूत सक्रिय हाथ का आकाशादि देशों के साथ (कर्मज)
संयोग से ही हाथ के कार्य शरीर का (हाथ के ) अकार्य आकाशादि देशों के
साथ संयोग उत्पन्न होता है, क्रिया से नहीं; क्योंकि क्रिया अपने आश्रय का किसी
दूसरे के साथ संयोग का ही कारण हो सकती है । यहाँ भी 'इति' शब्द प्रसङ्ग की
समाप्ति का ही बोधक है ।
'यदि' इत्यादि सन्दर्भ के द्वारा फिर से प्रश्न करते हैं कि अगर 'कारण'
अर्थात् हाथ के विभाग के बाद 'कार्य' का अर्थात् शरीर का विभाग मानें एवं कारण
(हाथ) के संयोग के बाद कार्य (शरीर) का संयोग मानें (अर्थात् एक ही समय
कार्य और कारण के दूसरे देशों के साथ संयोग या विभाग न मानें, क्रमशः ही
मानें), तो फिर अवयव और अवयवी इन दोनों की युतसिद्धि अर्थात् अलग-अलग
सिद्धियाँ माननी होगी, फलतः दोनों की स्वतन्त्रता की आपत्ति होगी । अभिप्राय यह
है कि अगर शरीर हाथ में आश्रित है, तो फिर हाथ के चलने पर शरीर भी उसके
साथ ही चले; किन्तु तब संयोग और विभाग का कथित क्रम ठीक नहीं होगा । अर्थात्
इनमें अगर क्रमशः संयोग और विभाग हो, तो फिर हाथ के चलने से शरीर का