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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages
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६००श्रीरामकृष्णवचनामृत७ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – (चौंककर) – क्या भोग किया था?

अधर – उतने बड़े पण्डित थे, कितना मान था!

श्रीरामकृष्ण – दूसरों की दृष्टि में वह मान था, उनकी दृष्टि में कुछ भी नहीं था। "मुझे तुम जैसा डिप्टी माने अथवा यह छोटा निरंजन, मेरे लिए दोनों एक हैं, सच कहता हूँ। एक धनी आदमी मेरे वश में रहे ऐसा भाव मेरे मन में नहीं पैदा होता। मनोमोहन ने कहा है, 'सुरेन्द्र कहता था, राखाल इनके (श्रीरामकृष्ण के) पास रहता है, इसका दावा हो सकता है' मैंने कहा, कौन है रे सुरेन्द्र? जिसकी दरी और तकिया यहाँ है, और जो दस रुपया महीना देता है, उसकी इतनी हिम्मत कि वह ऐसी बातें कहे?"

अधर – क्या दस रुपये प्रति महिना देते हैं?

श्रीरामकृष्ण – दस रुपये में दो महीने का खर्च चलता है। कुछ भक्त यहाँ रहते हैं, वह भक्तों की सेवा के लिए खर्च देता है। यह उसी के लिए पुण्य है, इसमें मेरा क्या है? मैं राखाल और नरेन्द्र आदि को प्यार करता हूँ तो क्या किसी अपने लाभ के लिए?

मास्टर – यह प्यार माँ के प्यार की तरह है।

श्रीरामकृष्ण – माँ फिर भी इस आशा से बहुत कुछ करती है कि नौकरी करके खिलायेगा। मैं जो इन्हें प्यार करता हूँ, इसका कारण यह है कि मैं इन्हें साक्षात् नारायण देखता हूँ – यह बात की बात नहीं है।

(अधर से) "सुनो, दिया जलाने पर कीड़ों की कमी नहीं रहती। उन्हें पा लेने पर फिर वे सब बन्दोबस्त कर देते हैं, कोई कमी नहीं रह जाती। वे जब हृदय में आ जाते हैं, तब सेवा करनेवाले बहुत इकट्ठे हो जाते हैं।

"एक कम उम्र का संन्यासी किसी गृहस्थ के यहाँ भिक्षा के लिए गया। वह जन्म से ही संन्यासी था। संसार की बातें कुछ न जानता था। गृहस्थ की एक युवती लड़की ने आकर भिक्षा दी। संन्यासी ने कहा, 'माँ, इसकी छाती पर कितने बड़े-बड़े फोड़े हुए हैं?' उस लड़की की माँ ने कहा, 'नहीं महाराज, इसके पेट से बच्चा होगा, बच्चे को दूध पिलाने के लिए ईश्वर ने इसे स्तन दिये हैं – उन्हीं स्तनों का दूध बच्चा पीयेगा।' तब संन्यासी ने कहा, 'फिर सोच किस बात की है? मैं अब क्यों भिक्षा माँगूँ? जिन्होंने मेरी सृष्टि की है, वे ही मुझे खाने को भी देंगे।'

"सुनो, जिस यार के लिए सब कुछ छोड़कर स्त्री चली आयी है, उससे मौका आने पर वह अवश्य कह सकती है कि तेरी छाती पर चढ़कर भोजन-वस्त्र लूँगी।

"न्यांगटा कहता था कि एक राजा ने सोने की थाली और सोने के गिलास में साधुओं को भोजन कराया था। काशी में मैंने देखा, बड़े-बड़े महन्तों का बड़ा मान है – कितने ही पश्चिम के अमीर हाथ जोड़े हुए उनके सामने खड़े थे और कह रहे थे – कुछ आज्ञा हो।

७ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद ८० | ६०१

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७ सितम्बर, १८८४परिच्छेद ८०६०१

“परन्तु जो सच्चा साधु है - यथार्थ त्यागी है, वह न तो सोने की थाली चाहता है और न मान। परन्तु यह भी है कि ईश्वर उनके लिए किसी बात की कमी नहीं रखते। उन्हें पाने के लिए प्रयत्न करते हुए जिसे जिस चीज की जरूरत होती है, वे पूरी कर देते हैं।

“आप हाकिम हैं - क्या कहूँ - जो कुछ अच्छा समझो, वही करो। मैं तो मूर्ख हूँ।”

अधर - (हँसते हुए, भक्तों से) - क्या ये मेरी परीक्षा ले रहे हैं?

श्रीरामकृष्ण - (सहास्य) - निवृत्ति ही अच्छी है। देखो न, मैंने दस्तखत नहीं किये। ईश्वर ही वस्तु हैं और सब अवस्तु।

हाजरा भक्तों के पास जमीन पर आकर बैठे। हाजरा कभी कभी ‘सोऽहम्-सोऽहम्’ किया करते हैं। वे लाटू आदि भक्तों से कहते हैं - ‘उनकी पूजा करके क्या होता है? उन्हीं की वस्तु उन्हें दी जाती है।’ एक दिन उन्होंने नरेन्द्र से भी यही बात कही थी। श्रीरामकृष्ण हाजरा से कह रहे हैं -

“लाटू से मैंने कहा था, कौन किसकी भक्ति करता है।”

हाजरा - भक्त आप ही अपने को पुकारता है।

श्रीरामकृष्ण - यह तो बड़ी ऊँची बात है। महाराज बलि से वृन्धावलि ने कहा था, तुम ब्रह्मण्य देव को क्या धन दोगे?

“तुम जो कुछ कहते हो, उसी के लिए साधन-भजन तथा उनके नाम और गुणों का कीर्तन है।

“अपने भीतर अगर दर्शन हो जायँ तब तो सब हो गया। उसके देखने के लिए ही साधना की जाती है। और उसी साधना के लिए शरीर है। जब तक सोने की मूर्ति नहीं ढल जाती तब तक मिट्टी के साँचे की जरूरत रहती है। सोने की मूर्ति के बन जाने पर मिट्टी का साँचा फेंक दिया जाता है। ईश्वर के दर्शन हो जाने पर शरीर का त्याग किया जा सकता है।

“वे केवल अन्तर में ही नहीं हैं, बाहर भी हैं। काली-मन्दिर में माँ ने मुझे दिखाया, सब कुछ चिन्मय है। माँ स्वयं सब कुछ बनी हैं - प्रतिमा, मैं, पूजा की चीजें, पत्थर - सब चिन्मय हैं।

“इसका साक्षात्कार करने के लिए ही साधन-भजन, नाम-गुण-कीर्तन आदि सब हैं। इसके लिए ही उनकी भक्ति करना है। वे लोग (लाटू आदि) अभी साधारण भावों को लेकर हैं - अभी उतनी ऊँची अवस्था नहीं हुई। वे लोग भक्ति लेकर हैं। और उनसे ‘सोऽहम्’ आदि बातें मत कहना।”

अधर और निरंजन जलपान करने के लिए बरामदे में गये। मास्टर श्रीरामकृष्ण के पास जमीन पर बैठे हुए हैं।

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६०२श्रीरामकृष्णवचनामृत७ सितम्बर, १८८४

अधर – (सहास्य) – हम लोगों की इतनी बातें हो गयीं, ये (मास्टर) तो कुछ भी न बोले।

श्रीरामकृष्ण – केशव के दल का एक लड़का – वह चार परीक्षाएँ पास कर चुका था – सब को मेरे साथ तर्क करते हुए देखकर बस मुस्कराता था और कहता था, इनसे भी तर्क! मैंने केशव सेन के यहाँ एक बार और उसे देखा था, परन्तु तब उसका वह चेहरा न रह गया था।

विष्णुमन्दिर के पुजारी राम चक्रवर्ती श्रीरामकृष्ण के कमरे में आये। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं – “देखो राम! तुमने क्या दयाल से मिश्री की बात कही है? – नहीं-नहीं, इसके कहने की जरूरत नहीं है। बड़ी बड़ी बातें हो गयी हैं।”

रात में श्रीरामकृष्ण काली के प्रसाद की दो-एक पूड़ियाँ तथा सूजी की खीर खाते हैं। श्रीरामकृष्ण जमीन पर, आसन पर प्रसाद पाने के लिए बैठे। पास ही मास्टर बैठे हुए हैं, लाटू भी कमरे में हैं। भक्तगण सन्देश तथा कुछ मिठाइयाँ ले आये थे। एक सन्देश लेते ही श्रीरामकृष्ण ने कहा, यह किसका सन्देश है? इतना कहकर खीरवाले कटोरे से निकालकर उन्होंने वह नीचे डाल दिया। (मास्टर और लाटू से) – “यह मैं सब जानता हूँ। आनन्द चैटर्जी का लड़का ले आया है जो घोषपाड़ा-वाली औरत के पास जाता है।”

लाटू ने एक दूसरी बर्फी देने के लिए पूछा।

श्रीरामकृष्ण – किशोरी लाया है।

लाटू – क्या इसे दूँ?

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – हाँ।

मास्टर अंग्रेजी पढ़े हुए हैं। श्रीरामकृष्ण उनसे कहने लगे –

“सब लोगों की चीजें नहीं खा सकता। क्या यह सब तुम मानते हो?”

मास्टर – देखता हूँ, सब धीरे धीरे मानना पड़ेगा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ।

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में हाथ धोने के लिए गये। मास्टर हाथ पर पानी छोड़ रहे हैं।

शरत्काल है। चाँद निकला हुआ है। आकाश निर्मल है। भागीरथी का हृदय स्वच्छ दर्पण के समान झलक रहा है; भांटे का समय है, भागीरथी दक्षिण की ओर बह रही हैं; मुँह धोते हुए श्रीरामकृष्ण मास्टर से कह रहे हैं – ‘तो नारायण को रुपया दोगे न?’ मास्टर – ‘जी हाँ, जैसी आज्ञा, जरूर दूँगा।’


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परिच्छेद ९०

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परिच्छेद ९०

साधना तथा साधुसंग

(१)

'ज्ञान, अज्ञान के परे चले जाओ।' शशधर का शुष्क ज्ञान

श्रीरामकृष्ण दोपहर के भोजन के बाद अपने कमरे में विश्राम कर रहे हैं। कुछ भक्त भी बैठे हुए हैं। आज नरेन्द्र, भवनाथ आदि भक्त कलकते से आये हैं। दोनों मुखर्जी भाई, ज्ञानबाबू, छोटे गोपाल, बड़े काली, ये भी आये हैं। तीन-चार भक्त कोन्नगर से आये हुए हैं। उन्हें बुखार आया था, सूचना आयी थी। आज रविवार है, १४ सितम्बर, १८८४।

पिता का स्वर्गवास हो जाने पर नरेन्द्र अपनी माँ और भाइयों की चिन्ता में पड़कर बड़े व्याकुल हैं। वे कानून की परीक्षा के लिए तैयारी कर रहे हैं।

ज्ञानबाबू चार परीक्षाएँ पास कर चुके हैं। वे सरकारी नौकरी करते हैं। दस-ग्यारह बजे के लगभग आये हैं।

श्रीरामकृष्ण – (ज्ञानबाबू को देखकर) – क्यों जी, एकाएक ज्ञानोदय, यह क्या?

ज्ञान – (सहास्य) – जी, बड़े भाग्य से ज्ञानोदय होता है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – तुम ज्ञानी होकर भी अज्ञानी क्यों हो? हाँ, मैं समझा, जहाँ ज्ञान है, वहीं अज्ञान है! वशिष्ठ देव इतने ज्ञानी थे, परन्तु लड़कों के शोक से वे भी रोये थे। अतएव तुम ज्ञान और अज्ञान के पार हो जाओ। पैरों में अज्ञान का काँटा लग गया है, उसे निकालने के लिए ज्ञानरूपी काँटे की जरूरत है। निकल जाने पर दोनों काँटे फेंक देना चाहिए।

"ज्ञान कहता है, यह संसार धोखे की टट्टी है; और जो ज्ञान और अज्ञान के पार चले गये हैं, वे कहते हैं, यह आनन्द की कुटिया है। वह देखता है, ईश्वर ही जीव-जगत् और चौबीसों तत्त्व हुए हैं।

"उन्हें पा लेने पर फिर संसार में रहा जा सकता है। तब आदमी निर्लिप्त हो सकता है। उस देश में बढ़ई की औरतों को मैंने देखा है, ढेंकी में चूड़ा कूटती हैं, एक हाथ से धान चलाती हैं, दूसरे से बच्चे को दूध पिलाती हैं, साथ ही खरीददारों से बातचीत भी करती हैं, कहती हैं तुम्हारे ऊपर दो आने उधार हैं, दे जाना। परन्तु उनका बारह आना मन


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६०४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १४ सितम्बर, १८८४

हाथ पर रहता है कि कहीं ढेंकी न गिर जाय।

“बारह आना मन ईश्वर पर रखकर चार आने से काम करना चाहिए।”

श्रीरामकृष्ण शशधर पण्डित की बात भक्तों से कह रहे हैं – “देखा, एकरुखा आदमी है। केवल सूखा ज्ञान और विचार लेकर है।

“जो नित्य में पहुँचकर लीला लेकर रहता है, उसका ज्ञान पक्का है, उसकी भक्ति भी पक्की है।

“नारदादि ने ब्रह्मज्ञान के पश्चात् भक्ति ली थी, इसी का नाम विज्ञान है।

“केवल ज्ञान शुष्क होता है – जैसे एकाएक फूट पड़नेवाले आतशबाजी के अनार – कुछ देर फूल छूटने पर तुरन्त फूट जाते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ज्ञान, जैसे अच्छे अनार। थोड़ी देर एक तरह के फूल निकलते हैं, फिर बन्द होकर दूसरी तरह के फूल निकलने लगते हैं। नारद और शुकदेव आदि का ईश्वर पर प्रेम हुआ था। प्रेम सच्चिदानन्द को पकड़ने की रस्सी है।”

दोपहर के भोजन के बाद श्रीरामकृष्ण जरा विश्राम कर रहे हैं।

बकुल के पेड़ के नीचे बैठने की जो जगह है, वहाँ दो-चार भक्त बैठे हुए गप्पें लड़ा रहे हैं। भवनाथ, दोनों मुखर्जी भाई, मास्टर, छोटे गोपाल, हाजरा आदि। श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले की ओर जा रहे हैं, वहाँ जाकर जरा बैठे।

मुखर्जी – (हाजरा से) – आपने इनके पास से बहुत कुछ सीखा है।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – नहीं बचपन से ही इनकी यह अवस्था है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण झाऊतल्ले से लौट रहे हैं। भक्तों ने देखा, भावावेश में हैं। पागल की तरह चल रहे हैं। जब कमरे में आये तब प्रकृतिस्थ हो गये।

(२)

गुरुवाक्य पर विश्वास। शास्त्रों की धारणा कब होती है?

श्रीरामकृष्ण के कमरे में बहुत से भक्तों का समागम हुआ है। कोन्नगर के भक्तों में एक साधक अभी पहले-पहल आये हैं। उम्र पचास के ऊपर होगी। देखने से मालूम होता है कि भीतर पाण्डित्य का पूरा अभिमान है। बातचीत करते हुए वे कह रहे, 'समुद्र-मंथन के पहले क्या चन्द्र न था? परन्तु इसकी मीमांसा कौन करे?'

मास्टर – (सहास्य) – देवी के एक गाने में है – जब ब्रह्माण्ड ही न था, तब मुण्डमाला तुझे कहाँ मिली होगी?

साधक – (विरक्ति से) – वह दूसरी बात है।

कमरे में खड़े होकर श्रीरामकृष्ण ने एकाएक कहा – 'वह आया था – नारायण।'

१४ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९० । ६०५

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१४ सितम्बर, १८८४ । परिच्छेद ९० । ६०५

नरेन्द्र बरामदे में हाजरा आदि से बातें कर रहे हैं – उनकी चर्चा का शब्द श्रीरामकृष्ण के कमरे में सुन पड़ रहा है।

श्रीरामकृष्ण – खूब बक सकता है। इस समय घर की चिन्ता में बहुत पड़ गया है।

मास्टर - जी हाँ।

श्रीरामकृष्ण – नरेन्द्र ने विपत्ति को सम्पत्ति समझने के लिए कहा था न?

मास्टर – जी हाँ, मनोबल खूब है।

बड़े काली – कम क्या है?

श्रीरामकृष्ण अपने आसन पर बैठ गये। कोन्नगर के एक भक्त श्रीरामकृष्ण से कह रहे हैं – 'महाराज, ये (साधक) आपको देखने आये हैं; इन्हें कुछ पूछना है।

साधक देह और सिर ऊँचा किये बैठे हैं।

साधक – महाराज, उपाय क्या है?

श्रीरामकृष्ण – गुरु की बातों पर विश्वास करना। उनके आदेश के अनुसार चलने पर ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। जैसे डोर अगर ठिकाने से लगी हुई हो तो उसे पकड़कर चलने से पते पर पहुँचा जा सकता है।

साधक – क्या उनके दर्शन होते हैं?

श्रीरामकृष्ण – वे विषय-बुद्धि के रहते नहीं मिलते। कामिनी और कांचन का लेशमात्र रहते उनके दर्शन नहीं हो सकते। वे शुद्ध मन और शुद्ध बुद्धि से गोचर होते हैं। वह मन चाहिए जिसमें आसक्ति का लेशमात्र न हो। शुद्ध-मन, शुद्ध-बुद्धि और शुद्ध आत्मा, ये एक ही वस्तु हैं।

साधक – परन्तु शास्त्र में है – 'यतो वाचो निवर्तन्ते अप्राप्य मनसा सह' – वे मन और वाणी से परे हैं।

श्रीरामकृष्ण – रखो इसे। साधना किये बिना शास्त्रों का अर्थ समझ में नहीं आता। 'भंग-भंग' चिल्लाने से क्या होता है? पण्डित जितने हैं, सर्राटे के साथ श्लोकों की आवृत्ति करते हैं, परन्तु इससे होता क्या है? भंग जाहे जितनी देह में लगा ली जाय, पर इससे नशा नहीं होता, नशा लाने के लिए तो भंग पीनी ही चाहिए।

"दूध में मक्खन है, दूध में मक्खन है, इस तरह चिल्लाते रहने से क्या होता है? दूध जमाओ, दही बनाओ, मथो, तब होगा।"

साधक – मक्खन बनाना, ये सब तो शास्त्र की ही बातें हैं।

श्रीरामकृष्ण – शास्त्र की बात कहने या सुनने से क्या होता है? – उसकी धारणा होनी चाहिए। पंचाग में लिखा हैं – वर्षा पूरी होंगी, परंतु पंचाग दबाओं तो कही बूंद भर भी पानी नहीं निकलता।

साधक – मक्खन निकालना बतलाते हैं – आपने निकाला है मक्खन?

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६०६श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – मैंने क्या किया है और क्या नहीं किया यह बात रहने दो। और ये बातें समझाना बहुत मुश्किल है। कोई अगर पूछे कि घी का स्वाद कैसा है तो कहना पड़ता है, जैसा है – वैसा ही है।

“यह सब समझना हो तो साधुओं का संग करना चाहिए। कौनसी नाड़ी कफ की है, कौनसी पित्त की और कौन वायु की, इसके जानने की अगर जरूरत हो तो सदा वैद्य के साथ रहना चाहिए।”

साधक – दूसरे के साथ रहने में कोई कोई आपत्ति करते हैं।

श्रीरामकृष्ण – वह ज्ञान के बाद – ईश्वर-प्राप्ति के बाद की अवस्था है। पहले तो सत्संग चाहिए ही न?

साधक चुप हैं।

साधक – (कुछ देर बाद, झुंझलाकर) – आपने उन्हें जाना? – कहिये – प्रत्यक्ष रूप से हो या अनुभव से। इच्छा हो और आप कह सकें तो कहिये, नहीं तो न सही।

श्रीरामकृष्ण – (मुस्कराते हुए) – क्या कहूँ, आभास मात्र कहा जा सकता हैं।

साधक – वही कहिये।

नरेन्द्र गायेंगे। नरेन्द्र कहते हैं, पखावज अभी तक नहीं लाया गया।

छोटे गोपाल – महिमाचरण बाबू के पास है।

श्रीरामकृष्ण – नहीं, उसकी चीज ले आने की कोई जरूरत नहीं।

कोन्नगर के एक भक्त कलाकारों के ढंग के गाने गा रहे हैं। गाना हो रहा है और श्रीरामकृष्ण एक एक बार साधक की अवस्था देख रहे हैं। गवैया नरेन्द्र के साथ गाने और बजाने के विषय पर घोर तर्क कर रहे हैं।

साधक गवैये से कह रहे हैं, “तुम भी तो यार कम नहीं हो, इन सब वाद-विवादों से गरज?” इस विवाद में एक और महाशय बोल रहे थे; श्रीरामकृष्ण ने साधक से कहा, “आपने इन्हें कुछ न कहा?”

श्रीरामकृष्ण कोन्नगर के भक्तों से कह रहे हैं, “देखता हूँ, आप लोगों के साथ भी इनकी नहीं बनती।” नरेन्द्र गा रहे हैं।

गाना सुनते हुए साधक ध्यानमग्न हो गये। श्रीरामकृष्ण के तख्त के उत्तर की ओर मुँह किये बैठे हैं। दिन के तीन या चार बजे का समय होगा – पश्चिम की ओर से धूप आकर उन पर पड़ रही थी। श्रीरामकृष्ण ने फौरन एक छाता लेकर अपने पश्चिम ओर रखा, जिससे धूप न लगे। नरेन्द्र गा रहे हैं –

“इस मलिन और पंकिल मन को लेकर तुम्हे कैसे पुकारूँ? क्या जलती हुई आग में कभी तृण पैठने का भी साहस कर सकता है? तुम पुण्य के आधार हो, जलती हुई आग के समान हो, मैं तृण जैसे पापी तुम्हारी पूजा कैसे करूँ? परन्तु सुना है, तुम्हारे नाम के

१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६०७

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१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६०७

गुणों से महापापियों का भी परित्राण हो जाता है, पर तुम्हारे पवित्र नाम का उच्चारण करते हुए मेरा हृदय न जाने क्यों काँप रहा है। मेरा अभ्यास पाप की सेवा में बढ़ गया है, जीवन वृथा ही चला जाता है, मैं पवित्र मार्ग का आश्रय किस तरह लूँगा? यदि इस पातकी और नराधम को तुम अपने दयालु नाम के गुण से तारो तो तार दो। कहो, मेरे केशों को पकड़कर कब अपने चरणों में आश्रय दोगे?"

(३)

नरेन्द्रादि को शिक्षा; ‘वेद-वेदान्त में केवल आभास है।’

नरेन्द्र गा रहे हैं –

"हे दीनों के शरण! तुम्हारा नाम बड़ा ही मधुर है। उसमें अमृत की धारा बह रही है। हे प्राणों में रमण करनेवाले! उससे मेरे श्रवणेन्द्रिय शीतल हो जाते हैं। जब कभी तुम्हारे नाम की सुधा श्रवणों का स्पर्श करती है तो समस्त विषाद-राशि का एक क्षण में नाश हो जाता है। हे हृदय के स्वामी – चिदानन्दघन! तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है।"

ज्योंही नरेन्द्र ने गाया – 'तुम्हारे नामों को गाते हुए हृदय अमृतमय हो जाता है', श्रीरामकृष्ण समाधिमग्न हो गये। समाधि के आरम्भ में हाथ की उँगलियाँ, खासकर अँगूठा काँप रहा था। कोन्नगर के भक्तों ने श्रीरामकृष्ण की समाधि कभी नहीं देखी थी। श्रीरामकृष्ण को मौन धारण करते हुए देखकर वे लोग उठे।

भवनाथ – आप लोग बैठिये, यह इनकी समाधि की अवस्था है।

कोन्नगर के भक्तों ने फिर आसन ग्रहण किया। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भावावेश में नीचे उतरकर नरेन्द्र के पास जमीन पर बैठे। बड़ी देर बाद जब कुछ प्राकृत अवस्था हुई तब वही जमीन पर बिछी हुई चटाई पर जा बैठे। नरेन्द्र का गाना समाप्त हो गया। तानपूरा यथास्थान रख दिया गया। श्रीरामकृष्ण को भाव का आवेश अब भी है। उसी अवस्था में कह रहे हैं – "यह भला कैसी बात है माँ! मक्खन निकालकर मुँह के सामने रखो। न तालाब में चारा (मछलियों का) छोड़ेगा – न बंसी लेकर बैठा रहेगा – बस, मछली पकड़कर उसके हाथ में रख दो! कैसा उत्पात है! माँ! तर्क-विचार अब न सुनूँगा, कैसा उत्पात है! अब मैं फटकार दूँगा।

"वे वेदविधि के पार हैं। – क्या वेद, वेदान्त और शास्त्रों को पढ़कर कोई उन्हें प्राप्त कर सकता है? (नरेन्द्र से) समझा? वेदों में आभास मात्र है।"

नरेन्द्र ने फिर स्वयं तानपूरा ले आने के लिए कहा। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, मैं गाऊँगा। अब भी भावावेश है, श्रीरामकृष्ण गा रहे हैं।

उन्होंने कई गाने गाये। फिर वे गीत के एक चरण की आवृत्ति करते हुए कह रहे

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६०८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १४ सितम्बर, १८८४

हैं – “माँ, मुझे पागल कर दे। उन्हें ज्ञान और विचार द्वारा या शास्त्रों का पाठ करके कोई नहीं प्राप्त कर सकता।” वे विनयपूर्वक गानेवाले से कह रहे हैं – ‘भाई, आनन्दमयी का एक गाना गाइये।’ ”

गवैये – महाराज, क्षमा कीजियेगा।

श्रीरामकृष्ण गवैये को हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कह रह हैं – “नहीं भाई, इसके लिए आग्रह कर सकता हूँ।” इतना कहकर गोविन्द अधिकारी की यात्रा (नाटक) के दल में गायी जानेवाली वृन्दा की उक्ति को गाते हुए कह रहे हैं – ‘राधिका अगर कृष्ण को कुछ कहना चाहे तो कह सकती है, क्योंकि कृष्ण के लिए तमाम रात जगकर उन्होंने भोर कर दिया।’

“बाबू, तुम ब्रह्ममयी के पुत्र हो, वे घट-घट में हैं, तुम पर मेरा जोर अवश्य है। किसान ने अपने गुरु से कहा था – ‘तुम्हें ठोंककर मन्त्र लूँगा।”

गवैये – (सहास्य) – जूतियों से ठोंककर?

श्रीरामकृष्ण – (गुरु के उद्देश्य में प्रणाम करके, हँसकर) – नहीं, इतनी दूर नहीं बढ़ सकता हूँ।

फिर भावावेश में कह रहे हैं – “प्रवर्तक, साधक, सिद्ध और सिद्धों के सिद्ध हैं – क्या तुम सिद्ध हो या सिद्ध के सिद्ध? अच्छा गाओ।”

गवैये आलाप करके गाने लगे।

श्रीरामकृष्ण – (आलाप सुनकर) – भाई इससे भी आनन्द होता है।

गाना समाप्त हो गया। कोन्नगर के भक्त श्रीरामकृष्ण को प्रणाम करके बिदा हो गये। साधक हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए कह रहे हैं – ‘गुसाईंजी, तो मैं अब चलता हूँ।’ श्रीरामकृष्ण अब भी भावावेश में हैं – माता के साथ बातचीत कर रहे हैं –

“माँ, मैं या तुम? क्या मैं करता हूँ? – नहीं नहीं, तुम करती हो।

“अब तक तुमने विचार सुना या मैंने? ना – मैंने नहीं सुना – तुम्हीं ने सुना है।”

श्रीरामकृष्ण की प्राकृत अवस्था हो रही है। अब वे नरेन्द्र, भवनाथ, मुखर्जी आदि भक्तों से बातचीत कर रहे हैं। साधक की बात उठाते हुए भवनाथ ने पूछा, कैसा आदमी है?

श्रीरामकृष्ण – तमोगुणी भक्त है।

भवनाथ – खूब श्लोक कह सकता है।

श्रीरामकृष्ण – मैंने एक आदमी से कहा था – ‘वह रजोगुणी साधु है – उसे क्यों सीधा-फीधा देते हो?’ एक दूसरे साधु ने मुझे शिक्षा दी। उसने कहा – ‘ऐसी बात मत कहो, साधु तीन तरह के होते हैं – सतोगुणी, रजोगुणी और तमोगुणी।’ उस दिन से मैं सब तरह के साधुओं को मानता हूँ।

१४ सितम्बर, १८८४ | परिच्छेद १० | ६०९

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१४ सितम्बर, १८८४परिच्छेद १०६०९

नरेन्द्र – (सहास्य) – क्या? उसी तरह जैसे हाथी नारायण है? सभी नारायण हैं।

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – विद्या और अविद्या के रूपों से वे ही लीला कर रहे हैं। मैं दोनों को प्रणाम करता हूँ। चण्डी में है – 'वही लक्ष्मी है और अभागे के यहाँ की धूल भी वही है।' (भवनाथ आदि से) यह क्या विष्णु पुराण में है?

भवनाथ – (हँसते हुए) – जी, मुझे तो नहीं मालूम। कोन्नगर के भक्त आप की समाधि-अवस्था देखकर उठे चले जा रहे थे।

श्रीरामकृष्ण – कोई फिर कह रहा था कि तुम लोग बैठो।

भवनाथ – (हँसते हुए) – वह मैं हूँ।

श्रीरामकृष्ण – तुम जैसे लोगों को यहाँ लाते हो, वैसे ही भगा भी देते हो!

गवैये के साथ नरेन्द्र का वादविवाद हुआ था, उसी की बात चल रही है।

मुखर्जी – नरेन्द्र ने भी मोर्चा नहीं छोड़ा।

श्रीरामकृष्ण – हाँ, ऐसी दृढ़ता तो चाहिए ही। इसे सत्त्व का तम कहते हैं। लोग जो कुछ कहेंगे क्या उसी पर विश्वास करना होगा? वेश्या से क्या यह कहा जायगा कि तुम्हें जो रुचे वही करो? तो वेश्या की बात भी माननी होगी। मान करने पर एक सखी ने कहा था – 'राधिका को अहंकार हुआ है।' वृन्दे ने कहा, "यह 'अहं' किसका है? – यह उन्हीं का अहंकार है – कृष्ण के ही गर्व से वे गर्व करती हैं।"

अब हरिनाम के माहात्म्य की बात हो रही है।

भवनाथ – नाम करने पर मेरी देह हलकी पड़ जाती है।

श्रीरामकृष्ण – वे पाप का हरण करते हैं, इसीलिए उन्हें हरि कहते हैं। वे त्रिताप के हरण करनेवाले हैं।

"और चैतन्य देव ने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव अच्छा है। देखो, चैतन्य देव कितने बड़े पण्डित थे और वे अवतार थे। उन्होंने इस नाम का प्रचार किया था, अतएव यह बहुत ही अच्छा है। (हँसते हुए) कुछ किसान एक न्योते में गये थे। भोजन करते समय उनसे पूछा गया, तुम लोग आमड़ें की खटाई खाओगे? उन्होंने कहा, बाबुओं ने अगर उसे खाया हो तो हमें भी देना। मतलब यह कि उन्होंने खाया होगा तो वह चीज अच्छी ही होगी।" (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण की शिवनाथ शास्त्री से मिलने की इच्छा हुई है। वे मुखर्जियों से कह रहे हैं – 'एक बार शिवनाथ शास्त्री को देखने के लिए जाऊँगा, तुम्हारी गाड़ी से जाऊँगा तो किराया न पड़ेगा।'

मुखर्जी – जो आज्ञा, एक दिन भेज दी जायगी।

श्रीरामकृष्ण – (भक्तों से) – अच्छा, क्या वह हम लोगों को पसन्द करेगा? वे लोग साकारवादियों की कितनी निन्दा करते हैं।

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६१०श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

श्रीयुत महेन्द्र मुखर्जी तीर्थ-यात्रा करनेवाले हैं? श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं -

(सहास्य) “यह कैसी बात! प्रेम के अंकुर के उगते ही जा रहे हो? अंकुर होगा, फिर पेड़ होगा, तब फल होंगे। तुम्हारे साथ अच्छी बातें हो रही थीं।”

महेन्द्र - जी, जरा इच्छा हुई है, घूम लूँ। फिर जल्द ही आ जाऊँगा।

(४)

भक्तों के संग में

तीसरा पहर ढल गया है। दिन के पाँच बजे होंगे। श्रीरामकृष्ण उठे। भक्तगण बगीचे में टहल रहे हैं। उनमें से कितने ही शीघ्र घर जाने वाले हैं।

श्रीरामकृष्ण उत्तरवाले बरामदे में हाजरा से बातचीत कर रहे हैं। नरेन्द्र आजकल गुहों के बड़े लड़के अन्नदा के पास प्रायः जाया करते हैं।

हाजरा - सुना है, गुहों का लड़का आजकल कठोर साधना कर रहा है। भोजन भी थोड़ा सा ही करता है। चार दिन बाद अन्न खाता है।

श्रीरामकृष्ण - कहते क्या हो! ‘कौन कहे किस भेष से नारायण मिल जाय।’

हाजरा - नरेन्द्र ने स्वागत-गीत गाया था।

श्रीरामकृष्ण - (उत्सुकता से) - कैसा?

किशोर पास खड़ा था।

श्रीरामकृष्ण - तेरी तबियत अच्छी है न?

श्रीरामकृष्ण पश्चिमवाले गोल बरामदे में खड़े हैं। शरत् काल है। फलालैन का गेरुआ कुर्ता पहने हैं और नरेन्द्र से कह रहे हैं - “तूने स्वागत-गीत गाया था?” गोल बरामदे से उतरकर श्रीरामकृष्ण नरेन्द्र के साथ गंगा के बाँध पर आये। साथ मास्टर हैं। नरेन्द्र गा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण खड़े हुए सुन रहे हैं। सुनते सुनते उन्हें भावावेश हो रहा है।

अब भी दिन कुछ शेष है। सूर्य भगवान पश्चिम की ओर अभी कुछ दीख पड़ रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भाव में डूबे हुए हैं। एक ओर गंगा उत्तर की ओर बही जा रही हैं। अभी कुछ देर से ज्वार का आना शुरू हुआ है। पीछे फुलवाड़ी है। दाहिनी ओर नौबत और पंचवटी दिखायी दे रही हैं। पास में नरेन्द्र खड़े हुए गा रहे हैं। शाम हो गयी।

नरेन्द्र आदि भक्त प्रणाम करके बिदा हो गये। श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में आये। जगन्माता का स्मरण-चिन्तन कर रहे हैं। श्रीयुत यदु मल्लिक पासवाले बगीचे में आज आये हुए हैं। बगीचे में आने पर प्रायः आदमी भेजकर श्रीरामकृष्ण को बुलवा ले जाते हैं। आज भी आदमी भेजा है - श्रीरामकृष्ण जायेंगे। श्रीयुत अधर सेन कलकत्ते से आये और श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण श्रीयुत यदु मल्लिक के बगीचे में जायेंगे। लाटू से कह रहे हैं -

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१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६११

'लालटेन जला – जरा चलेंगे।'

श्रीरामकृष्ण लाटू के साथ अकेले जा रहे हैं। मास्टर भी साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम नारायण को लेते क्यों नहीं आये?

मास्टर कह रहे हैं – "क्या मैं भी साथ चलूँ?"

श्रीरामकृष्ण – चलोगे? अधर आदि सब हैं – अच्छा, चलो। दोनों मुखर्जी भाई रास्ते में खड़े थे। श्रीरामकृष्ण मास्टर से पूछ रहे हैं – "क्या ये लोग भी कोई जायेंगे? (मुखर्जियों से) अच्छा है चलो। तो हम जल्दी चले आ सकेंगे।"

श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के बैठकखाने में आये। कमरा सजा हुआ था। कमरे में और बरामदे में दीवारगीरें जल रही हैं। श्रीयुत यदुलाल छोटे-छोटे लड़कों को लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक दो-एक मित्रों के साथ बैठे हैं। नौकरों में से कोई आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है, कोई पंखा झल रहा है। यदु बाबू ने हँसकर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण से सम्भाषण किया, जैसे पुराने परिचितों का व्यवहार हो।

यदु बाबू गौरांग के भक्त हैं। उन्होंने स्टार थियेटर में चैतन्यलीला देखी थी। श्रीरामकृष्ण से उसी की बातचीत कर रहे हैं। कहा, चैतन्य-लीला का नया अभिनय बड़ा अच्छा हो रहा है।

श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक चैतन्यलीला की बातचीत सुन रहे हैं, रह-रहकर यदु बाबू के एक छोटे लड़के का हाथ लेकर खेल कर रहे हैं। मास्टर और दोनों मुखर्जी भाई उनके पास बैठे हुए हैं।

श्रीयुत अधर सेन ने कलकत्ता म्युनिसिपैल्टी के वाईस चेअरमन के पद के लिए बड़ी चेष्टा की थी। उस पद का वेतन हजार रुपया है। अधर डिप्टी मजिस्ट्रेट हैं। तीन सौ रुपया प्रति मास पाते हैं। उम्र तीस साल की होगी।

श्रीरामकृष्ण – (यदु बाबू से) – अधर का तो काम नहीं हुआ।

यदु और उनके मित्र – अधर की उम्र तो अभी ज्यादा नहीं हुई।

कुछ देर बाद यदु कह रहे हैं – 'तुम जरा उनके लिए नाम-जप करो।' श्रीरामकृष्ण गौरांग का भाव गाकर बतला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ने कीर्तन के कई गाने गाये।

(५)

राखाल के लिए चिन्ता

गीत के समाप्त हो जाने पर दोनों मुखर्जी भाई उठे। उनके साथ श्रीरामकृष्ण भी उठे। परन्तु भावावेश अब भी है। घर के बरामदे में आकर खड़े होते समाधिमग्न हो गये। बरामदे में कई बत्तियाँ जल रही थीं। बगीचे का दरवान भक्त था। वह श्रीरामकृष्ण को

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६१२श्रीरामकृष्णवचनामृत१४ सितम्बर, १८८४

आमन्त्रित करके कभी कभी भोजन कराता था। दरवान श्रीरामकृष्ण को बड़े पंखे से हवा करने लगा।

बगीचे के कर्मचारी श्रीयुत रतन ने आकर श्रीरामकृष्ण को प्रणाम किया।

श्रीरामकृष्ण की प्राकृत अवस्था हो रही है।

उन लोगों से सम्भाषण करते हुए वे 'नारायण-नारायण' उच्चारण कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण भक्तों के साथ ठाकुर-मन्दिर के सदर फाटक तक आये। यहाँ मुखर्जी उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।

अधर श्रीरामकृष्ण को खोज रहे थे।

श्रीरामकृष्ण – (सहास्य) – इनके (मास्टर के) साथ तुम लोग सदा मिलते रहना और बातचीत करना।

प्रिय मुखर्जी – (सहास्य) – हाँ, ये अब से हमारे मास्टर बने।

श्रीरामकृष्ण – गंजेड़ी का स्वभाव है कि दूसरे गंजेड़ी को देखकर उसे आनन्द होता है। अमीरों के आने पर तो वह बोलता भी नहीं। परन्तु अगर एक अभागा कहीं का गंजेड़ी आ जाय तो उसे गले लगाने लगता है। (सब हँसते हैं।)

श्रीरामकृष्ण बगीचे के रास्ते से पश्चिम की ओर होकर अपने कमरे की ओर जा रहे हैं। रास्ते में कह रहे हैं – 'यदु बड़ा हिन्दू है – भागवत की बहुत सी बातें कहता है।'

मणि कालीमन्दिर में चरणामृत ले रहे हैं। श्रीरामकृष्ण भी वहीं पहुँचे। माता के दर्शन करेंगे।

रात के नौ बजे मुखर्जियों ने प्रणाम करके बिदा ली। अधर और मास्टर जमीन पर बैठे हुए हैं। श्रीरामकृष्ण अधर से राखाल की बातें कर रहे हैं।

राखाल वृन्दावन में हैं, बलराम के साथ। पत्र द्वारा संवाद मिला था, वे बीमार हैं। दो-तीन दिन हुए श्रीरामकृष्ण राखाल की बीमारी का हाल पाकर इतने चिन्तित हो गये थे कि दोपहर की सेवा के समय हाजरा से, क्या होगा, कहकर बालक की तरह रोने लगे थे। अधर ने राखाल को रजिस्ट्री करके चिट्ठी लिखी है। परन्तु अब तक पत्र की स्वीकृति उन्हें नहीं मिली।

श्रीरामकृष्ण – नारायण को पत्र मिला और तुम्हें पत्र का जवाब भी नहीं मिला?

अधर – जी नहीं, अभी तक तो नहीं मिला।

श्रीरामकृष्ण – और मास्टर को भी लिखा है।

श्रीरामकृष्ण – चैतन्य-लीला देखने जायेंगे, इसी सम्बन्ध में बातचीत हो रही है।

श्रीरामकृष्ण – (हँसते हुए) – यदु ने कहा था, एक रुपये वाली जगह से खूब दीख पड़ता है और सस्ता भी है!

"एक बार हम लोगों को पेनेटी ले जाने की बातचीत हुई थी, यदु ने हम लोगों के

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१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६१३

चढ़ने के लिए चलती नाव किराये पर लेने की बातचीत की थी! (सब हँसते हैं।)

"पहले ईश्वर की बातें कुछ-कुछ सुनता था। अब वह नहीं दीख पड़ता। कुछ खुशामदी लोग यदु के दाँये-बाँये हमेशा बने रहते हैं - उन लोगों ने और चकाचौंध लगा दिया है।

"बड़ा हिसाबी है। जाने के साथ ही उसने पूछा, कितना किराया है? मैंने कहा, 'तुम्हारा न सुनना ही अच्छा है। तुम ढाई रुपया देना।' इससे चुप हो गया और वही ढाई रुपये देता है!" (सब हँसते हैं)

रात हो गयी है। अधर जायेंगे, प्रणाम कर रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण - (मास्टर से) - नारायण को लेते आना।


परिच्छेद ९१

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परिच्छेद ९१

अभ्यासयोग

(१)

दक्षिणेश्वर में महेन्द्र, राखाल आदि भक्तों के साथ

श्रीरामकृष्ण अपने कमरे में भक्तों के साथ बैठे हुए हैं। शरत् काल है। शुक्रवार, १९ सितम्बर, १८८४। दिन के दो बजे होंगे। आज भादों की अमावास्या है, महालया। श्रीयुत महेन्द्र मुखोपाध्याय और उनके भाई श्रीयुत प्रिय मुखोपाध्याय, मास्टर, बाबूराम, हरीश, किशोर और लाटू जमीन पर बैठे हैं। कुछ लोग खड़े भी हैं – कोई कमरे में आ-जा रहे हैं। श्रीयुत हाजरा बरामदे में बैठे हैं। राखाल बलराम के साथ वृन्दावन में हैं।

श्रीरामकृष्ण – (महेन्द्रादि भक्तों से) – कलकत्ते में मैं कप्तान के घर गया था। लौटते हुए बड़ी रात हो गयी थी।

“कप्तान का कैसा स्वभाव है! कैसी भक्ति है! छोटी धोती पहनकर आरती करता है। पहले तीन बत्तीवाले प्रदीप से आरती करता है – इसके बाद एक बत्तीवाले प्रदीप से और फिर कपूर से।

“उस समय बोलता नहीं। मुझे इशारे से आसन पर बैठने के लिए कहा।

“पूजा करते समय आँखें लाल हो जाती हैं, मानो बर्र ने काट लिया हो।

“गाना तो नहीं गा सकता। परन्तु स्तवपाठ बहुत ही सुन्दर करता है।

“वह अपनी माँ के पास नीचे बैठता है। माँ ऊँचे आसन पर बैठती हैं।

“बाप अंग्रेज का हवलदार है। लड़ाई के मैदान में एक हाथ में बन्दूक रखता है और दूसरे हाथ से शिवजी की पूजा करता है। नौकर शिवमूर्ति बना दिया करता है। बिना पूजा किये जल ग्रहण भी नहीं करता। सालाना छः हजार रुपये पाता है।

“कभी कभी अपनी माँ को काशी भेजता है। वहाँ उसकी माँ की सेवा पर बारह-तेरह आदमी रहते हैं। बड़ा खर्च होता है। वेदान्त, गीता, भागवत, कप्तान को कण्ठाग्र हैं।

“वह कहता है, कलकत्ते के बाबुओं का आचार बहुत ही भ्रष्ट है।

“पहले उसने हठयोग किया था, इसलिए जब मुझे समाधि या भावावस्था होती है

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तब सिर पर हाथ फेरने लगता है।

“कप्तान की स्त्री के दूसरे इष्ट देवता हैं, गोपाल। अब की बार उसे उतनी कंजूसी करते नहीं देखा। वह भी गीता जानती है, कैसी भक्ति है उनकी! – मुझे जहाँ भोजन कराया, वहीं हाथ मुँह भी धुलाया। दाँत खोदने की सींक भी वहीं दी।

“मेरे खा चुकने पर कप्तान या उसकी पत्नी पंखा झलती है।

“उनमें बड़ी भक्ति है। साधुओं का बड़ा सम्मान करते हैं। पश्चिम के आदमियों में साधुओं के प्रति भक्ति ज्यादा है। जंग बहादुर के लड़के और उसके भतीजे कर्नल यहाँ आये थे। जब आये तब पतलून उतारकर मानो बहुत डरते हुए आये।

“कप्तान के साथ उसके देश की एक स्त्री भी आयी थी। बड़ी भक्त थी – विवाह अभी नहीं हुआ था। गीतगोविन्द के गाने कण्ठाग्र थे। द्वारका बाबू आदि उसका गाना सुनने के लिए बैठे थे। जब उसने गीतगोविन्द का गाना गाया तब द्वारका बाबू रूमाल से आँसू पोंछने लगे। विवाह क्यों नहीं किया, इस प्रश्न के पूछने पर उसने कहा – ‘ईश्वर की दास हूँ? और किसकी दासी होऊँगी।’ और सब लोग उसे देवी समझकर बहुत मानते हैं – जैसा पुस्तकों में लिखा हुआ मिलता है।

(महेन्द्रादि से) “आप लोग आते हैं, जब सुनता हूँ कि इससे कुछ उपकार होता है तब मन बहुत अच्छा रहता है। (मास्टर से) यहाँ आदमी क्यों आते हैं? – वैसा पढ़ा-लिखा भी तो नहीं हूँ।”

मास्टर – जी, कृष्ण जब स्वयं सब चरवाहे और गौएँ बन गये (ब्रह्मा के हर लेने पर) तब चरवाहों की माताएँ नये बच्चों को पाकर फिर यशोदा के पास नहीं गयीं।

श्रीरामकृष्ण – इससे क्या हुआ?

मास्टर – ईश्वर स्वयं ही चरवाहे बने थे कि नहीं, इसीलिए उनमें इतना आकर्षण था। ईश्वर की सत्ता रहने से ही मन खिंच जाता है।

श्रीरामकृष्ण – यह योगमाया का आकर्षण था – वह जादू डाल देती है। जटिला के डर से बछड़े को उठाये हुए सुबल का रूप धरकर राधिका जा रही थीं; जब उन्होंने योगमाया की शरण ली तब जटिला ने भी उन्हें आशीर्वाद दिया।

“हरि की सब लीलाएँ योगमाया की सहायता से हुई थीं।

“गोपियों का प्यार क्या है, परकीया रति है। कृष्ण के लिए गोपियों को प्रेमोन्माद हुआ था। अपने स्वामी के लिए इतना नहीं होता। अगर कोई कहे, ‘अरी तेरा स्वामी आया है’, तो कहती है, ‘आया है तो आये – खुद भोजन कर लेगा।’ परन्तु अगर दूसरे पुरुष की बात सुनती है कि बड़ा रसिक है, बड़ा सुन्दर है और रसपण्डित है तो दौड़कर देखने के लिए जाती हैं – और ओट से झाँककर देखती है।

“अगर कहो कि उन्हें तो हमने देखा ही नहीं फिर गोपियों की तरह उन पर चित्त कैसे

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६१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४

लग सकता है? – तो इसके लिए यह कहना है कि सुनने पर भी वह आकर्षण होता है।

“एक गाने में कहा है, बिना जाने ही, उनका नाममात्र सुनकर मन उनमें आकर लिप्त हो गया।”

एक भक्त – अच्छा जी, वस्त्रहरण का क्या अर्थ है?

श्रीरामकृष्ण – आठ पाश हैं। गोपियों के सब पाश छिन्न हो गये थे, केवल लज्जा बाकी थी। इसलिए उन्होंने उस पाश का भी मोचन कर दिया। ईश्वर-प्राप्ति होने पर सब पाश चले जाते हैं।

(महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों से) “ईश्वर पर सब का मन नहीं लगता। आधारों की विशेषता होती है। संस्कार के रहने से होता है। नहीं तो बागबाजार में इतने आदमी थे, उनमें केवल तुम्हीं यहाँ कैसे आये?

“मलय-पर्वत की हवा के लगने पर सब पेड़ चन्दन के हो जाते हैं; सिर्फ पीपल, बट, सेमर, ऐसे ही कुछ पेड़ चन्दन नहीं बनते।

“तुम लोगों को रुपये-पैसे का कुछ अभाव थोड़े ही है। योगभ्रष्ट होने पर भाग्यवानों के यहाँ जन्म होता है, इसके पश्चात् फिर वह ईश्वर के लिए तपस्या करता है।”

महेन्द्र मुखर्जी – मनुष्य क्यों योगभ्रष्ट होता है?

श्रीरामकृष्ण – पूर्वजन्म में ईश्वर की चिन्ता करते हुए एकाएक भोग करने की लालसा हुई होगी। इस तरह होने पर योगभ्रष्ट हो जाता है। और दूसरे जन्म में फिर उसी के अनुसार जन्म होता है।

महेन्द्र – इसके बाद उपाय?

श्रीरामकृष्ण – कामना के रहते, भोग की लालसा के रहते, मुक्ति नहीं होती। इसलिए खाना-पहनना, रमण करना, यह सब कर लेना। (सहास्य) तुम क्या कहते हो? स्वकीया के साथ या परकीया के साथ?

मास्टर, मुखर्जी, ये लोग हँस रहे हैं।

(२)

श्रीमुख द्वारा कथित आत्मचरित

श्रीरामकृष्ण – भोग-लालसा का रहना अच्छा नहीं। इसीलिए मेरे मन में जो कुछ उठता था, मैं कर डालता था।

“बड़ा बाजार के रंगे सन्देश खाने की इच्छा हुई। इन लोगों ने मँगा दिया। मैंने खूब खाया, फिर बीमार पड़ गया!

“लड़कपन में गंगा नहाते समय, एक लड़के की कमर में सोने की करधनी देखी थी। इस अवस्था के बाद उस करधनी के पहनने की इच्छा हुई। परन्तु अधिक देर रख

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सकता ही न था, करधनी पहनी तो भीतर से सरसराकर हवा ऊपर की ओर चढ़ने लगी – देह में सोना छू गया न? जरा देर रखकर उसे खोल डाला। नहीं तो उसे तोड़ डालना पड़ता।

“धनियाखाली का कोईचूर (एक तरह की मिठाई), खानाकुल कृष्णनगर का सरभाजा (एक तरह की मिठाई) खाने की भी इच्छा हुई थी। (सब हँसते हैं।)

“शम्भू के चण्डी-गीत सुनने की इच्छा हुई थी। उसके सुन लेने के बाद फिर राजनारायण के चण्डी-गीतों के सुनने की इच्छा हुई। उसके गीतों को भी मैंने सुना।

“उस समय बहुत से साधु आते थे। इच्छा हुई कि उनकी सेवा के लिए एक अलग भण्डार किया जाय। सेजो बाबू ने वैसा ही किया। उसी भण्डार से साधुओं को सीधा, लकड़ी आदि सब दिया जाता था।

“एक बार जी में आया कि खूब अच्छा जरी का साज पहनूँ और चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीऊँ। सेजो बाबू ने नया साज, गुड़गुड़ी सब भेज दिया। साज पहना, गुड़गुड़ी कितनी ही तरह से पीने लगा। एक बार इस ओर से, एक बार उस ओर से – खड़ा होकर और बैठकर। तब मैंने कहा, मन, देख ले, इसी का नाम है चाँदी की गुड़गुड़ी में तम्बाकू पीना। बस इतने से ही गुड़गुड़ी का त्याग हो गया। साज थोड़ी देर में खोल डाला – पैरों से उसे रौंदने लगा – कहा, इसी का नाम है साज! इसी पोशाक के कारण रजोगुण बढ़ता है।”

बलराम के साथ राखाल वृन्दावन में हैं। पहले-पहल वे वृन्दावन की बड़ी तारीफ करके चिट्ठी लिखते थे। मास्टर को चिट्ठी लिखी थी – ‘यह बड़ी अच्छी जगह है – मोर नाचते रहते हैं – और नृत्य गीत, सदा ही आनन्द होता है!’ इसके पश्चात् उन्हें बुखार आया, वृन्दावन का बुखार! श्रीरामकृष्ण को बड़ी चिन्ता रहती है। उनके लिए चण्डी के नाम पर उन्होंने मन्नत की है। श्रीरामकृष्ण राखाल की बातें कर रहे हैं – “यहाँ बैठकर पैर दबाते समय राखाल को पहले-पहल भाव हुआ था। एक भागवती पण्डित इस कमरे में बैठा हुआ भागवत की बातें कह रहा था। उन्हीं बातों को सुन-सुनकर राखाल सिहर-सिहर उठता था। इसके बाद वह बिलकुल स्थिर हो गया।

“दूसरी बार बलराम के घर में भाव हुआ था। भावावेश में लेट गया था।

“राखाल साकार की श्रेणी का है, निराकार की बात सुनकर उठ जायगा।

“उसके लिए मैंने चण्डी की मन्नत की। उसने घर-द्वार सब छोड़कर मेरा सहारा लिया था न? उसकी स्त्री के पास उसे मैं ही भेज दिया करता था, भोग कुछ बाकी रह गया था।

“वृन्दावन से इन्हें लिख रहा है, यह बड़ा अच्छा स्थान है – मोरों का नृत्य हुआ करता है। अब मोरों ने विपत्ति में डाल दिया।

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६१८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १९ सितम्बर, १८८४

"वहाँ बलराम के साथ है। अहा, बलराम का क्या स्वभाव है! मेरे लिए उस देश में नहीं जाता। उसके भाई ने उसे मासिक व्यय देना बन्द कर दिया था और लिखा था - 'तुम यहाँ आकर रहो, वाहियात क्यों इतना रुपया खर्च करते हो!' परन्तु उसने उसकी बात नहीं सुनी, मुझे देखने के लिए।

"कैसा स्वभाव है! दिन-रात केवल देवताओं को लेकर रहता है। माली फूलों की माला बनाते ही रहते हैं। रुपये बचेंगे, इस विचार से दो महीने वृन्दावन में रहेगा। दो सौ का मुसहरा पाता है।

"लड़कों को क्यों प्यार करता हूँ? - उनके भीतर कामिनी और कांचन का प्रवेश अब तक नहीं हो पाया। मैं उन्हें नित्यसिद्ध देखता हूँ!

"नरेन्द्र जब पहले-पहल आया, एक मैली चादर ओढ़े हुए था, परन्तु उसका मुँह और उसकी आँखें देखकर जान पड़ता था कि उसके भीतर कुछ है। तब ज्यादा गाने न जानता था। दो एक गाने।

"जब आता था तब घर भर आदमी रहते थे, परन्तु मैं उसी की ओर नजर करके बातचीत करता था। जब वह कहता था - 'इससे भी बातचीत कीजिये' - तब दूसरे लोगों से बातचीत करता था।

"यदु मल्लिक के बगीचे में रोया करता था - उसे देखने के लिए मैं पागल हो गया था। यहाँ भोलानाथ का हाथ पकड़कर मैं रोने लगा! भोलानाथ ने कहा, एक कायस्थ के लड़के के लिए आपको इस तरह का रोना शोभा नहीं देता। मोटे ब्राह्मण ने एक दिन हाथ जोड़कर कहा - 'वह बहुत कम पढ़ा-लिखा है, उसके लिए भी आप इतना रोते हैं?'

"भवनाथ नरेन्द्र की जोड़ी है - दोनों जैसे पति-पत्नी। इसीलिए भवनाथ से मैंने नरेन्द्र के पास ही मकान भाड़े पर लेने को कहा। वे दोनों ही अरूप के दर्जे के हैं।

संन्यासियों का कठिन नियम। लोकशिक्षार्थ त्याग

"मैं लड़कों को मना कर देता हूँ जिससे वे औरतों के पास आया-जाया न करें।

"हरिपद एक घोषाल-औरत के फेर में पड़ा है। वह वात्सल्यभाव करती है। हरिपद बच्चा है, कुछ समझता तो है नहीं, मैंने सुना, हरिपद उसकी गोद में सोता है। और वह अपने हाथ से उसे भोजन कराती है। मैं उससे कह दूँगा, यह सब अच्छा नहीं। इसी वात्सल्यभाव से फिर हीन भाव पैदा हो जाते हैं।

"उन लोगों की वर्तमान साधना आदमी को लेकर की जाती है। आदमी को वे लोग श्रीकृष्ण समझती हैं। वे उसे 'रागकृष्ण' कहती हैं। गुरु पूछता है, 'रागकृष्ण' तुझे मिले? वे कहती हैं हाँ, मिले।

"उसी दिन वह औरत आयी थी। उसकी चितवन का ढंग मैंने देखा, अच्छा नहीं

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१९ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९१ ६१९

हैं। उसी के भावों में उससे कहा, हरिपद के साथ जैसा चाहो करो; परन्तु बुरा भाव न लाना।

“लड़कों की यह साधना की अवस्था है। इस समय केवल त्याग करना चाहिए। संन्यासियों को स्त्रियों का चित्र भी न देखना चाहिए। मैं उनसे कहता हूँ, स्त्री अगर भक्त भी हो तो भी उसके पास बैठकर बातचीत न करनी चाहिए। खड़े होकर चाहे कुछ कह लिया जाय। सिद्ध होने पर भी इसी तरह चलना पड़ता है – अपनी सावधानी के लिए भी और लोकशिक्षा के लिए भी। औरतों के आने पर मैं थोड़ी ही देर में कहता हूँ, तुम लोग जाकर देवताओं के दर्शन करो। इससे भी अगर वे न उठीं तो मैं खुद उठ जाता हूँ। मुझे देखकर दूसरे शिक्षा ग्रहण करेंगे।

“अच्छा, ये जो सब लड़के आ रहे हैं, इसका क्या अर्थ है? और तुम लोग जो आ रहे हो, इसका भी क्या अर्थ है? इसके (अपने को दिखाकर) भीतर कुछ है जरूर, नहीं तो आकर्षण फिर कैसे होता?

“उस देश में जब मैं हृदय के घर में था, मुझे वे लोग श्यामबाजार ले गये थे। मैं समझा, गौरांग के भक्त हैं यहाँ। गाँव में घुसने से पहले ही मुझे माँ ने दिखा दिया – साक्षात् गौरांग! फिर वहाँ इतना आकर्षण हुआ कि सात दिन और सात रात लोगों की भीड़ लगी रही। सदा ही कीर्तन और आनन्द मचा हुआ था। इतने आदमी आये कि चार-दीवार और पेड़ों पर भी आदमी चढ़कर बैठे थे।

“मैं नटवर गोस्वामी के यहाँ गया था। वहाँ रातदिन भीड़ लगी रहती। मैं वहाँ से भागकर एक ताँती (जुलाहे) के यहाँ सुबह को बैठा करता था। फिर देखा, थोड़ी ही देर में सब लोग वहाँ भी पहुँच गये थे। सब खोल-करताल ले गये। – फिर ‘तिरकिट्-तिरकिट्’ कर रहे थे। भोजन आदि तीन बजे होता था।

“चारों ओर अफवाह फैल गयी थी कि एक ऐसा आदमी आया है जो सात बार मरकर सातों बार जी उठता है। मुझे सर्दी-गर्मी न हो जाय इस डर से हृदय मुझे बाहर मैदान में घसीट ले जाता था। वहाँ फिर चींटियों की पाँत की तरह आदमी उमड़ चलते थे – फिर वही खोल-करताल और ‘तिरकिट’। हृदय ने खूब फटकारा, कहा – ‘क्या हम लोगों ने कभी कीर्तन सुना नहीं?’

“वहाँ के गोस्वामी झगड़ा करने के लिए आये थे। उन्होंने सोचा था कि ये लोग हमारा चढ़ाव हड़पने के लिए आये हैं। उन्होंने देखा, मैंने एक जोड़ा धोती तो क्या एक ताग सूत भी नहीं लिया। किसी ने कहा ब्रह्मज्ञानी है। इस पर गोस्वामी सब थाह लेने के लिए आये। एक ने पूछा, इनके माला, तिलक क्यों नहीं हैं? उन्हीं में से किसी ने कहा, नारियल का पत्ता आप ही निकलकर गिर गया है। नारियल के पत्तेवाली बात मैंने वहीं सीखी थी। ज्ञान के होने पर उपाधियाँ आप छूट जाती हैं।

“दूर के गाँवों से लोग आकर इकट्ठे होते थे। वे लोग रात को वहीं रहते थे। जिस