Skip to content
SarvaKosh
श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 639 of 711

Read in context
Page 639

६१६ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १९ सितम्बर, १८८४

लग सकता है? – तो इसके लिए यह कहना है कि सुनने पर भी वह आकर्षण होता है।

“एक गाने में कहा है, बिना जाने ही, उनका नाममात्र सुनकर मन उनमें आकर लिप्त हो गया।”

एक भक्त – अच्छा जी, वस्त्रहरण का क्या अर्थ है?

श्रीरामकृष्ण – आठ पाश हैं। गोपियों के सब पाश छिन्न हो गये थे, केवल लज्जा बाकी थी। इसलिए उन्होंने उस पाश का भी मोचन कर दिया। ईश्वर-प्राप्ति होने पर सब पाश चले जाते हैं।

(महेन्द्र मुखर्जी आदि भक्तों से) “ईश्वर पर सब का मन नहीं लगता। आधारों की विशेषता होती है। संस्कार के रहने से होता है। नहीं तो बागबाजार में इतने आदमी थे, उनमें केवल तुम्हीं यहाँ कैसे आये?

“मलय-पर्वत की हवा के लगने पर सब पेड़ चन्दन के हो जाते हैं; सिर्फ पीपल, बट, सेमर, ऐसे ही कुछ पेड़ चन्दन नहीं बनते।

“तुम लोगों को रुपये-पैसे का कुछ अभाव थोड़े ही है। योगभ्रष्ट होने पर भाग्यवानों के यहाँ जन्म होता है, इसके पश्चात् फिर वह ईश्वर के लिए तपस्या करता है।”

महेन्द्र मुखर्जी – मनुष्य क्यों योगभ्रष्ट होता है?

श्रीरामकृष्ण – पूर्वजन्म में ईश्वर की चिन्ता करते हुए एकाएक भोग करने की लालसा हुई होगी। इस तरह होने पर योगभ्रष्ट हो जाता है। और दूसरे जन्म में फिर उसी के अनुसार जन्म होता है।

महेन्द्र – इसके बाद उपाय?

श्रीरामकृष्ण – कामना के रहते, भोग की लालसा के रहते, मुक्ति नहीं होती। इसलिए खाना-पहनना, रमण करना, यह सब कर लेना। (सहास्य) तुम क्या कहते हो? स्वकीया के साथ या परकीया के साथ?

मास्टर, मुखर्जी, ये लोग हँस रहे हैं।

(२)

श्रीमुख द्वारा कथित आत्मचरित

श्रीरामकृष्ण – भोग-लालसा का रहना अच्छा नहीं। इसीलिए मेरे मन में जो कुछ उठता था, मैं कर डालता था।

“बड़ा बाजार के रंगे सन्देश खाने की इच्छा हुई। इन लोगों ने मँगा दिया। मैंने खूब खाया, फिर बीमार पड़ गया!

“लड़कपन में गंगा नहाते समय, एक लड़के की कमर में सोने की करधनी देखी थी। इस अवस्था के बाद उस करधनी के पहनने की इच्छा हुई। परन्तु अधिक देर रख