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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 634 of 711

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Page 634

१४ सितम्बर, १८८४ परिच्छेद ९० ६११

'लालटेन जला – जरा चलेंगे।'

श्रीरामकृष्ण लाटू के साथ अकेले जा रहे हैं। मास्टर भी साथ हैं।

श्रीरामकृष्ण – (मास्टर से) – तुम नारायण को लेते क्यों नहीं आये?

मास्टर कह रहे हैं – "क्या मैं भी साथ चलूँ?"

श्रीरामकृष्ण – चलोगे? अधर आदि सब हैं – अच्छा, चलो। दोनों मुखर्जी भाई रास्ते में खड़े थे। श्रीरामकृष्ण मास्टर से पूछ रहे हैं – "क्या ये लोग भी कोई जायेंगे? (मुखर्जियों से) अच्छा है चलो। तो हम जल्दी चले आ सकेंगे।"

श्रीरामकृष्ण यदु मल्लिक के बैठकखाने में आये। कमरा सजा हुआ था। कमरे में और बरामदे में दीवारगीरें जल रही हैं। श्रीयुत यदुलाल छोटे-छोटे लड़कों को लिये हुए प्रसन्नतापूर्वक दो-एक मित्रों के साथ बैठे हैं। नौकरों में से कोई आज्ञा की प्रतीक्षा कर रहा है, कोई पंखा झल रहा है। यदु बाबू ने हँसकर बैठे हुए श्रीरामकृष्ण से सम्भाषण किया, जैसे पुराने परिचितों का व्यवहार हो।

यदु बाबू गौरांग के भक्त हैं। उन्होंने स्टार थियेटर में चैतन्यलीला देखी थी। श्रीरामकृष्ण से उसी की बातचीत कर रहे हैं। कहा, चैतन्य-लीला का नया अभिनय बड़ा अच्छा हो रहा है।

श्रीरामकृष्ण आनन्दपूर्वक चैतन्यलीला की बातचीत सुन रहे हैं, रह-रहकर यदु बाबू के एक छोटे लड़के का हाथ लेकर खेल कर रहे हैं। मास्टर और दोनों मुखर्जी भाई उनके पास बैठे हुए हैं।

श्रीयुत अधर सेन ने कलकत्ता म्युनिसिपैल्टी के वाईस चेअरमन के पद के लिए बड़ी चेष्टा की थी। उस पद का वेतन हजार रुपया है। अधर डिप्टी मजिस्ट्रेट हैं। तीन सौ रुपया प्रति मास पाते हैं। उम्र तीस साल की होगी।

श्रीरामकृष्ण – (यदु बाबू से) – अधर का तो काम नहीं हुआ।

यदु और उनके मित्र – अधर की उम्र तो अभी ज्यादा नहीं हुई।

कुछ देर बाद यदु कह रहे हैं – 'तुम जरा उनके लिए नाम-जप करो।' श्रीरामकृष्ण गौरांग का भाव गाकर बतला रहे हैं।

श्रीरामकृष्ण ने कीर्तन के कई गाने गाये।

(५)

राखाल के लिए चिन्ता

गीत के समाप्त हो जाने पर दोनों मुखर्जी भाई उठे। उनके साथ श्रीरामकृष्ण भी उठे। परन्तु भावावेश अब भी है। घर के बरामदे में आकर खड़े होते समाधिमग्न हो गये। बरामदे में कई बत्तियाँ जल रही थीं। बगीचे का दरवान भक्त था। वह श्रीरामकृष्ण को