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श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)

Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)

by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'

DevanagariHindipublished711 pages

Page 623 of 711

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Page 623
६००श्रीरामकृष्णवचनामृत७ सितम्बर, १८८४

श्रीरामकृष्ण – (चौंककर) – क्या भोग किया था?

अधर – उतने बड़े पण्डित थे, कितना मान था!

श्रीरामकृष्ण – दूसरों की दृष्टि में वह मान था, उनकी दृष्टि में कुछ भी नहीं था। "मुझे तुम जैसा डिप्टी माने अथवा यह छोटा निरंजन, मेरे लिए दोनों एक हैं, सच कहता हूँ। एक धनी आदमी मेरे वश में रहे ऐसा भाव मेरे मन में नहीं पैदा होता। मनोमोहन ने कहा है, 'सुरेन्द्र कहता था, राखाल इनके (श्रीरामकृष्ण के) पास रहता है, इसका दावा हो सकता है' मैंने कहा, कौन है रे सुरेन्द्र? जिसकी दरी और तकिया यहाँ है, और जो दस रुपया महीना देता है, उसकी इतनी हिम्मत कि वह ऐसी बातें कहे?"

अधर – क्या दस रुपये प्रति महिना देते हैं?

श्रीरामकृष्ण – दस रुपये में दो महीने का खर्च चलता है। कुछ भक्त यहाँ रहते हैं, वह भक्तों की सेवा के लिए खर्च देता है। यह उसी के लिए पुण्य है, इसमें मेरा क्या है? मैं राखाल और नरेन्द्र आदि को प्यार करता हूँ तो क्या किसी अपने लाभ के लिए?

मास्टर – यह प्यार माँ के प्यार की तरह है।

श्रीरामकृष्ण – माँ फिर भी इस आशा से बहुत कुछ करती है कि नौकरी करके खिलायेगा। मैं जो इन्हें प्यार करता हूँ, इसका कारण यह है कि मैं इन्हें साक्षात् नारायण देखता हूँ – यह बात की बात नहीं है।

(अधर से) "सुनो, दिया जलाने पर कीड़ों की कमी नहीं रहती। उन्हें पा लेने पर फिर वे सब बन्दोबस्त कर देते हैं, कोई कमी नहीं रह जाती। वे जब हृदय में आ जाते हैं, तब सेवा करनेवाले बहुत इकट्ठे हो जाते हैं।

"एक कम उम्र का संन्यासी किसी गृहस्थ के यहाँ भिक्षा के लिए गया। वह जन्म से ही संन्यासी था। संसार की बातें कुछ न जानता था। गृहस्थ की एक युवती लड़की ने आकर भिक्षा दी। संन्यासी ने कहा, 'माँ, इसकी छाती पर कितने बड़े-बड़े फोड़े हुए हैं?' उस लड़की की माँ ने कहा, 'नहीं महाराज, इसके पेट से बच्चा होगा, बच्चे को दूध पिलाने के लिए ईश्वर ने इसे स्तन दिये हैं – उन्हीं स्तनों का दूध बच्चा पीयेगा।' तब संन्यासी ने कहा, 'फिर सोच किस बात की है? मैं अब क्यों भिक्षा माँगूँ? जिन्होंने मेरी सृष्टि की है, वे ही मुझे खाने को भी देंगे।'

"सुनो, जिस यार के लिए सब कुछ छोड़कर स्त्री चली आयी है, उससे मौका आने पर वह अवश्य कह सकती है कि तेरी छाती पर चढ़कर भोजन-वस्त्र लूँगी।

"न्यांगटा कहता था कि एक राजा ने सोने की थाली और सोने के गिलास में साधुओं को भोजन कराया था। काशी में मैंने देखा, बड़े-बड़े महन्तों का बड़ा मान है – कितने ही पश्चिम के अमीर हाथ जोड़े हुए उनके सामने खड़े थे और कह रहे थे – कुछ आज्ञा हो।