श्री रामकृष्ण वचनामृत (प्रथम भाग - सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला' द्वारा अनूदित)
Sri Ramakrishna Vachanamrita (Part 1 - Tr. Nirala)
by श्री 'म' (महेंद्रनाथ गुप्त) / सूर्यकान्त त्रिपाठी 'निराला'
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About this granth
Sri Ramakrishna Vachanamrita (श्री रामकृष्ण वचनामृत) is the Hindi version of the Sri Sri Ramakrishna Kathamrita, the record of Sri Ramakrishna Paramahamsa's conversations kept by his householder disciple Mahendranath Gupta, who wrote as 'M'. Gupta noted the talks at Dakshineswar and Calcutta between 1882 and 1886 in his diary, with dates, which gives the work the feel of an eyewitness account.
This first part is the translation by the Hindi poet Suryakant Tripathi 'Nirala'. It is arranged in numbered sections, each tied to a date such as 11 March, 16 October or 28 October 1882, and covers Ramakrishna's teaching on God-realisation, devotion and knowledge, spiritual life for householders, maya and the harmony of religions, told through his everyday parables. A foreword and introduction open the volume.
The copy comes from the library of Gurukul Kangri University, Haridwar, and has about 711 pages.
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उतारता था।
“बदचलन औरतों को पहचान सकता था। विधवा है - पर सिर पर सीधी माँग है और बड़ी लगन से शरीर पर तेल की मालिश कर रही है। लज्जा कम, बैठने का ढंग ही दूसरा है।
“रहने दो विषयी लोगों की बातें!”
रामलाल को गाना गाने के लिए कह रहे हैं। रामलाल गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “रणांगण में यह कौन मेघवर्ण नारी नाच रही है? मानो रुधिर-सरोवर में नवीन नलिनी तैर रही हो।”
अब रामलाल रावण-वध के बाद मन्दोदरी के विलाप का गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - “हे कान्त, अबला के प्राणप्रिय, यह तुमने क्या किया! प्राणों का अन्त हुए बिना तो अब शान्ति नहीं मिलेगी! स्वर्णपुरी के सम्राट् होते हुए भी तुम आज धरती पर लेटे हो - यह देखकर भला तुम्हारी भार्या कैसे धीरज धर सकती है! स्वयं यमराज जहाँ दासत्व करें इतना बड़ा आधिपत्य स्वर्ग, मर्त्य, पाताल में और किसी का देखा गया है? जो इन्द्रादि की भी अधिश्वरी थी, वह तुम्हारी रानी आज संसार में भिखारिन बन गयी! उन नवीन जटाधारी वनविहारी को मनुष्य समझने के कारण तुमने सब कुछ खो डाला। स्वयं ब्रह्मा और ईशान जिनके चरणों की अभिलाषा रखते हैं, उन राम को हे राजा, तुमने माना ही नहीं। तुमने तो सुना था कि उनके चरण-स्पर्श से पाषाण भी नारी बन जाता है।”
आखिर का गाना सुनते सुनते श्रीरामकृष्ण आँसू बहा रहे हैं और कह रहे हैं - “मैने झाऊतल्ले में शौच जाते समय सुना था, नाव के माँझी नाव में यही गाना गा रहे हैं। वहाँ जब तक बैठा रहा, केवल रो रहा था। लोग पकड़कर मुझे कमरे में लाए थे।”
फिर गाना चलने लगा -
(भावार्थ) - “सुना है राम तारकब्रह्म हैं, जटाधारी राम मनुष्य नहीं हैं। हे पिताजी, क्या वंश का नाश करने के लिए उनकी सीता को चुराया है?”
अक्रूर श्रीकृष्ण को रथ पर बैठाकर मथुरा ले जा रहे हैं। यह देख गोपियों ने रथचक्रों को जकड़कर पकड़ लिया है और उनमें से कोई कोई रथचक्र के सामने लेट गयी हैं। वे अक्रूर पर दोषारोपण कर रही हैं। वे नहीं जानतीं कि श्रीकृष्ण अपनी ही इच्छा से जा रहे हैं।
(भावार्थ) - “रथचक्र को न पकड़ो, न पकड़ो। क्या रथ चक्र से चलता है? जिनके चक्र से जगत् चलता है वे हरि ही इस चक्र के चक्री है।”
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) - अहा, गोपियों का यह कैसा प्रेम! श्रीमती राधिका ने अपने हाथ से श्रीकृष्ण का चित्र अंकित किया है, परन्तु पैर नहीं बनाया, कहीं वे वृन्दावन से मथुरा न भाग जाएँ!
“मैं इन सब गानों को बचपन में खूब गाता था। एक एक नाटक सारा का सारा गा
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सकता था। कोई कहता था कि मै कालीयदमन नाटक-दल में था।”
एक भक्त नयी चद्दर ओढ़कर आए हैं। राखाल का बालक जैसा स्वभाव है - कैंची लाकर उनकी चद्दर के किनारे के सूतों को काटने जा रहे हैं। श्रीरामकृष्ण बोले, “क्यों काटता है? रहने दे। शाल की तरह अच्छा दिखायी देता है। हाँ जी, इसका क्या दाम है?” उन दिनों विलायती चद्दरों का दाम कम था। भक्त ने कहा, “एक रुपया छः आना जोड़ी।” श्रीरामकृष्ण बोले, “क्या कहते हो! जोड़ी! एक रुपया छः आना जोड़ी!”
थोड़ी देर बाद श्रीरामकृष्ण भक्त से कह रहे हैं, “जाओ, गंगा स्नान कर लो! अरे, इन्हें तेल दो तो थोड़ा'!”
स्नान के बाद जब वे लौटे तो श्रीरामकृष्ण ने ताक पर से एक आम लेकर उन्हे दिया। कहा, “यह आम इन्हें देता हूँ। तीन डिग्रियाँ पास हैं ये! अच्छा, तुम्हारा भाई अब कैसा है?”
भक्त – हाँ, दवा तो ठीक हो रही है, अब असर ठीक हो तो ठीक है!
श्रीरामकृष्ण – उसके लिए किसी नौकरी की व्यवस्था कर सकते हो? बुरा क्या है, तुम मुखिया बनोगे!
भक्त – स्वस्थ होने पर सभी सुविधाएँ हो जाएँगी।
(२)
साधन-भजन करो और व्याकुल होओ
श्रीरामकृष्ण भोजन के उपरान्त छोटे तख्त पर जरा बैठे हैं – अभी विश्राम करने का समय नहीं हुआ था। भक्तों का समागम होने लगा। पहले मणिरामपुर से भक्तों का एक दल आकर उपस्थित हुआ। एक व्यक्ति पी. डब्ल्यू. डी. में काम करते थे। इस समय पेन्शन पाते हैं। एक भक्त उन्हें लेकर आए हैं। धीरे धीरे बेलघर से भक्तों का एक दल आया। श्री मणि मल्लिक आदि भक्तगण भी धीरे धीरे आ पहुँचे।
मणिरामपुर के भक्तों ने कहा, “आपके विश्राम में विघ्न हुआ।”
श्रीरामकृष्ण बोले, “नहीं, नहीं, यह तो रजोगुण की बातें हैं कि वे अब सोएँगे।”
चाणक मणिरामपुर का नाम सुनकर श्रीरामकृष्ण को अपने बचपन के मित्र श्रीराम का स्मरण हुआ। श्रीरामकृष्ण कह रहे हैं, “श्रीराम की दूकान तुम्हारे वहीं पर है। श्रीराम मेरे साथ पाठशाला में पढ़ता था। थोड़े दिन हुए यहाँ पर आया था।”
मणिरामपुर के भक्तगण कह रहे हैं, “दया करके हमें जरा बता दीजिए कि किस उपाय से ईश्वर को प्राप्त किया जा सकता है।”
श्रीरामकृष्ण – थोड़ा साधन-भजन करना होता है। 'दूध में मक्खन है' केवल कहने से ही नहीं होता, दूध से दही बनाकर, मथन करके मक्खन उठाना पड़ता है। परन्तु बीच
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बीच में जरा निर्जन में रहना चाहिए।* कुछ दिन निर्जन में रहकर भक्ति प्राप्त करके उसके बाद फिर कहीं भी रहो। पैर में जूता पहनकर काँटेदार जंगल में भी आसानी से जाया जा सकता है।
“मुख्य बात है विश्वास। जैसा भाव वैसा लाभ, मूल बात है विश्वास। विश्वास हो जाने पर फिर भय नहीं होता।”
मणिरामपुर के भक्त – महाराज, गुरु क्या आवश्यक ही है?
श्रीरामकृष्ण – अनेकों के लिए आवश्यक है।† परन्तु गुरुवाक्य में विश्वास करना पड़ता है। गुरु को ईश्वर मानना पड़ता है। तभी लाभ होता है। इसीलिए वैष्णव भक्त कहते हैं, – गुरु-कृष्ण-वैष्णव।
“उनका नाम सदा ही लेना चाहिए। कलि में नाम का माहात्म्य है। प्राण अन्नगत है, इसीलिए योग नहीं होता। उनका नाम लेकर ताली बजाने से पापरूपी पक्षी भाग जाते हैं।
“सत्संग सदा ही आवश्यक है। गंगाजी के जितने ही निकट जाओगे, उतनी ही ठण्डी हवा पाओगे। आग के जितने ही निकट जाओगे उतनी ही गर्मी होगी।
“सुस्ती करने से कुछ नहीं होगा। जिनकी सांसारिक विषयभोग की इच्छा है, वे कहते हैं, ‘होगा! कभी न कभी ईश्वर को प्राप्त कर लेंगे।’
“मैंने केशव सेन से कहा था, पुत्र को व्याकुल देखकर उसके पिता उसके बालिग होने के तीन वर्ष पहले ही उसका हिस्सा छोड़ देते हैं।
“माँ भोजन बना रही है, गोदी का बच्चा सो रहा है। माँ मुँह में चूसनी दे गयी है। जब चूसनी छोड़कर चीत्कार करके बच्चा रोता है, तब माँ हण्डी उतारकर बच्चे को गोदी में लेकर स्तनपान कराती है। ये सब बातें मैंने केशव सेन से कही थीं।
“कहते हैं, कलियुग में एक दिन एक रात भर रोने से ईश्वर का दर्शन होता है।
“मन में अभिमान करो और कहो, ‘तुमने मुझे पैदा किया है – दर्शन देना ही होगा!’
“गृहस्थी में रहो, अथवा कहीं भी रहो, ईश्वर मन को देखते हैं। विषयबुद्धिवाला मन मानो भीगी दियासलाई है, चाहे जितना रगड़ो कभी नहीं जलेगी। एकलव्य ने मिट्टी के बने द्रोण अर्थात् अपने गुरु की मूर्ति को सामने रखकर बाण चलाना सीखा था।
“कदम बढ़ाओ, – लकड़हारे ने आगे बढ़कर देखा था चन्दन की लकड़ी, चाँदी की खान, सोने की खान, और आगे बढ़कर देखा हीरा-मणि!
“जो लोग अज्ञानी हैं, वे मानो मिट्टी की दीवालवाले कमरे के भीतर हैं। भीतर भी
* योगी युञ्जीत सततमात्मानं रहसि स्थितः – गीता, ६.१०
† आचार्यवान् पुरुषो वेद। – छान्दोग्य उपनिषद ६। १४। २
२३२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १० जून, १८८३
रोशनी नहीं है और बाहर की किसी चीज को भी देख नहीं सकते! ज्ञान प्राप्त करके जो लोग संसार में रहते हैं वे मानो काँच के बने कमरे के भीतर हैं। भीतर रोशनी, बाहर भी रोशनी; भीतर की चीजों को भी देख सकते हैं और बाहर की चीजों को भी!
ब्रह्म और जगन्माता एक हैं
“एक के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। वे परब्रह्म जब तक 'मैं-पन' को रखते हैं, तब तक दिखाते हैं कि वे आद्याशक्ति के रूप में सृष्टि, स्थिति व प्रलय कर रहे हैं।
“जो ब्रह्म हैं, वे ही आद्याशक्ति हैं। एक राजा ने कहा था कि उसे एक ही बात में ज्ञान देना होगा। योगी ने कहा, 'अच्छा, तुम एक ही बात में ज्ञान पाओगे।' थोड़ी देर बाद राजा के यहाँ अकस्मात् एक जादूगर आ पहुँचा। राजा ने देखा, वह आकर सिर्फ दो उँगलियों को घुमा रहा है, कह रहा है, 'राजा यह देख, यह देख।' राजा विस्मित होकर देख रहा है! थोड़ी ही देर में दो उँगलियों की जगह एक ही उँगली रह गयी है। जादूगर एक उँगली घुमाता हुआ कह रहा है, 'राजा, यह देख, यह देख।' अर्थात् ब्रह्म और आद्याशक्ति पहले-पहल दो समझे जाते हैं, परन्तु ब्रह्मज्ञान होने पर फिर दो नहीं रह जाते। अभेद! एक! एक! अद्वितीय! अद्वैत!”
(३)
माया तथा मुक्ति
बेलघर से गोविन्द मुखोपाध्याय आदि भक्तगण आए हैं। श्रीरामकृष्ण जिस दिन उनके मकान पर पधारे थे, उस दिन गायक का “जागो, जागो, जननि” यह गाना सुनकर समाधिस्थ हुए थे। गोविन्द उस गायक को भी लाए हैं। श्रीरामकृष्ण गायक को देख आनन्दित हुए हैं और कह रहे हैं, “तुम कुछ गाना गाओ।” गायक इस आशय के गीत गा रहे हैं -
(१) “दोष किसी का नहीं है, माँ! मैं अपने ही खोदे हुए कुएँ के जल में डूबकर मर रहा हूँ।”
(२) “रे यम! मुझे न छूना, मेरी जात बिगड़ गयी है। यदि पूछता है कि मेरी जात कैसी बिगड़ी तो सुन, - उस सत्यानासी काली ने मुझे संन्यासी बना दिया है।”
(३) “जागो, जागो, जननि! कितने ही दिनों से कुलकुण्डलिनी मूलाधार में सो रही है। माँ, अपना काम साधने के लिए मस्तक में चलो, जहाँ पर सहस्रदल-पद्म में परमशिव विराजमान हैं। षट्चक्र को भेदकर, हे चैतन्यरूपिणि, मन के दुःख को मिटा दो।”
श्रीरामकृष्ण - इस गीत में षट्चक्र-भेद की बात है। ईश्वर बाहर भी हैं, भीतर भी हैं। वे भीतर से मन में अनेक प्रकार की लहरें उत्पन्न कर रहे हैं। षट्चक्र का भेद होने पर
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माया का राज्य छोड़, जीवात्मा परमात्मा के साथ एक हो जाता है। इसी का नाम है ईश्वरदर्शन।
"माया के रास्ता न छोड़ने पर ईश्वर का दर्शन नहीं होता। राम, लक्ष्मण और सीता एक साथ जा रहे हैं। सब से आगे राम, बीच में सीता और पीछे लक्ष्मण हैं। जिस प्रकार सीता के बीच में रहने से लक्ष्मण राम को नहीं देख सकते, उसी प्रकार बीच में माया के रहने से जीव ईश्वर का दर्शन नहीं कर सकता। (मणि मल्लिक के प्रति) परन्तु ईश्वर की कृपा होने पर माया दरवाजे से हट जाती है, जिस प्रकार दरवान लोग कहते हैं, 'साहब की आज्ञा हो तो इसे अन्दर जाने दूँ।'*
"दो मत हैं – वेदान्त मत और पुराण मत। वेदान्त मत में कहा है, 'यह संसार धोखे की टट्टी है' अर्थात् जगत् भूल है, स्वप्न की तरह है; परन्तु पुराण मत या भक्तिशास्त्र कहता है कि ईश्वर ही चौबीस तत्त्व बनकर विद्यमान हैं। भीतर-बाहर उन्हीं की पूजा करो।
"जब तक उन्होंने 'मैं'-पन को रखा है, तब तक सभी हैं। फिर स्वप्नवत् कहने का उपाय नहीं है। नीचे आग जल रही है, इसीलिए बर्तन में दाल, चावल और आलू उबल रहे हैं, कूद रहे हैं और मानो कह रहे हैं, 'मैं हूँ' 'मैं कूद रहा हूँ'। यह शरीर मानो बर्तन है, मन-बुद्धि जल है, इन्द्रियों के विषय मानो दाल, चावल और आलू हैं, 'अहं' मानो उनका अभिमान है कि मैं उबल रहा हूँ और सच्चिदानन्द अग्नि हैं।
"इसीलिए भक्तिशास्त्र में इस संसार को 'मजे की कुटिया' कहा है। रामप्रसाद के गाने में है, 'यह संसार धोखे की टट्टी है।' इसीलिए एक ने जवाब दिया था, 'यह संसार मजे की कुटिया है।' 'काली का भक्त जीवन्मुक्त है, नित्यानन्दमय है।' भक्त देखता है, जो ईश्वर हैं, वे ही माया बने हैं, वे ही जीव-जगत् बने हैं। भक्त ईश्वर-माया-जीव-जगत् सब को एक देखता है। कोई कोई भक्त सभी कुछ राममय देखते हैं। राम ही सब बने हैं। कोई राधाकृष्णमय देखते हैं। कृष्ण ही ये चौबीस तत्त्व बने हुए हैं, जिस प्रकार हरा चश्मा पहनने पर सभी कुछ हरा हरा दिखायी देता है।
"भक्ति के मत में, शक्ति के प्रकाश की न्यूनाधिकता होती है। राम ही सब कुछ बने हुए हैं, परन्तु कहीं पर अधिक शक्ति है और कहीं पर कम। अवतार में उनका एक प्रकार का प्रकाश है और जीव में दूसरे प्रकार का। अवतार को भी देह और बुद्धि है। माया के कारण ही शरीर धारण कर सीता के लिए राम रोए थे। परन्तु अवतार जान-बूझकर अपनी आँखों पर पट्टी बाँधते हैं, जैसे लड़के चोर-चोर खेलते हैं और माँ के पुकारते ही खेल बन्द कर देते हैं। जीव की बात अलग है। जिस कपड़े से आँखों पर पट्टी बँधी हुई है, वह कपड़ा पीछे से आठ गाँठों से बड़ी मजबूती से बँधा हुआ है। अष्ट पाश* ! लज्जा,
* मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। – गीता ७।१४
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घृणा, भय, जाति, कुल, शील, शोक, जुगुप्सा (निन्दा) – ये आठ पाश हैं।* जब तक गुरु खोल नहीं देते, तब तक कुछ नहीं होता।”
(४)
सच्चे भक्त के लक्षण। व्याकुल होकर प्रार्थना करो। हठयोग : तथा राजयोग
बेलघर के भक्त – आप हम पर कृपा कीजिये।
श्रीरामकृष्ण – सभी के भीतर वे विद्यमान हैं, परन्तु गैस कम्पनी में अर्जी दो – तुम्हारे घर के साथ संयोग हो जाएगा।
“परन्तु व्याकुल होकर प्रार्थना करनी होगी। कहावत है, तीन प्रकार के प्रेम के आकर्षण एक साथ होने पर ईश्वर का दर्शन होता है, – सन्तान पर माता का प्रेम, सती स्त्री का स्वामी पर प्रेम और विषयी जीवों का विषय पर प्रेम।
“सच्चे भक्त के कुछ लक्षण हैं। वह गुरु का उपदेश सुनकर स्थिर हो जाता है; सँपेरे के संगीत को साधारण विषधर साँप स्थिर होकर सुनता है, परन्तु नाग नहीं। और दूसरा लक्षण, – सच्चे भक्त की धारणा-शक्ति होती है। केवल काँच पर चित्र खींचा नहीं जाता, किन्तु रसायनयुक्त काँच पर खींचा जाता है। जैसा फोटोग्राफ। भक्ति है वह रासायनिक द्रव्य।
“एक लक्षण और है। सच्चा भक्त जितेन्द्रिय होता है, कामजयी होता है। गोपियों में काम का संचार नहीं होता था।
“तुम लोग गृहस्थी में हो, रहो न, इससे साधन-भजन में और भी सुविधा है, मानो किले में से युद्ध करना। जिस समय शवसाधन करते हैं उस समय बीच बीच में शव मुँह खोलकर डराता है। इसलिए भुना हुआ चावल-चना रखना पड़ता है और उसके मुख में बीच बीच में देना पड़ता है। शव के शान्त होने पर निश्चिन्त होकर जप कर सकोगे। इसलिए घरवालों को शान्त रखना चाहिए। उनके खाने-पीने की व्यवस्था कर देनी पड़ती है, तब साधन-भजन की सुविधा होती है।
“जिनका भोग अभी कुछ बाकी है, वे गृहस्थी में रहकर ही ईश्वर का नाम लेंगे। नित्यानन्द कहा करते थे, ‘मागुर मांछेर झोल, युवती नारीर कोल, बोल हरि बोल!’ – हरिनाम लेने से मागुर मछली की रसदार तरकारी तथा युवती नारी तुम्हें मिलेगी।
“सच्चे त्यागी की बात अलग है। मधुमक्खी फूल के अतिरिक्त और किसी पर भी नहीं बैठेगी। चातक की दृष्टि में सभी जल निःस्वाद हैं। वह दूसरे किसी भी जल को नहीं
* घृणा लज्जा भयं शंका जुगुप्सा चेति पंचमी।
कुलं शीलं तथा जातिरष्टौ पाशाः प्रकीर्तिताः।। – कुलार्णवतन्त्र
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पीएगा, केवल स्वाति नक्षत्र की वर्षा के लिए ही मुँह खोले रहेगा। सच्चा त्यागी अन्य कोई भी आनन्द नहीं लेगा, केवल ईश्वर का आनन्द। मधुमक्खी केवल फूल पर बैठती है। सच्चे त्यागी साधु मधुमक्खी की तरह होते है। गृही भक्त मानो साधारण मक्खियाँ हैं। मिठाई पर भी बैठती हैं और फिर सड़े घाव पर भी।
“तुम लोग इतना कष्ट करके यहाँ पर आए हो, तुम ईश्वर को ढूँढ़ते फिर रहे हो। अधिकांश लोग बगीचा देखकर ही सन्तुष्ट रहते हैं, मालिक की खोज बिरले ही लोग करते हैं। जगत् के सौन्दर्य को ही देखते हैं, इसके मालिक को नहीं ढूँढ़ते।”
श्रीरामकृष्ण (गानेवाले को दिखाकर) – इन्होंने षट्चक्र का गाना गाया। वह सब योग की बातें हैं। हठयोग और राजयोग। हठयोगी कुछ शारीरिक कसरतें करता है; सिद्धियाँ प्राप्त करना, लम्बी उम्र प्राप्त करना तथा अष्ट-सिद्धि प्राप्त करना, ये सब उद्देश्य हैं। राजयोग का उद्देश्य है भक्ति, प्रेम, ज्ञान, वैराग्य। राजयोग ही अच्छा है।
“वेदान्त की सप्तभूमि और योगशास्त्र के षट्चक्र आपस में बहुतकुछ मिलते-जुलते हैं। वेद की प्रथम तीन भूमियाँ और योगशास्त्र के मूलाधार, स्वाधिष्ठान तथा मणिपुर चक्र एक हैं। इन तीन भूमियों में – गुह्य, लिंग तथा नाभि में – मन का निवास है। जिस समय मन चौथी भूमि पर अर्थात् अनाहत पर उठता है, उस समय जीवात्मा का शिखा की तरह देदीप्यमान रूप में दर्शन होता है, और ज्योति का दर्शन होता है। साधक कह उठता है – ‘यह क्या! यह क्या!’
“मन के पाँचवीं भूमि में उठने पर केवल ईश्वर की ही बात सुनने की इच्छा होती है। यहाँ पर विशुद्ध चक्र है। षष्ठ भूमि और आज्ञा चक्र एक ही हैं। वहाँ पर मन के जाने से ईश्वर का दर्शन होता है। परन्तु वह उसी प्रकार होता है जिस प्रकार लालटेन के भीतर रोशनी रहती है – छू नहीं सकते, क्योंकि बीच में काँच रहता है।
“जनक राजा पंचम भूमि पर से ब्रह्मज्ञान का उपदेश देते थे। वे कभी पंचम भूमि पर और कभी षष्ठ भूमि पर रहते थे।
“षट्चक्रभेद के बाद सप्तम भूमि है। मन वहाँ जाने पर लीन हो जाता है। जीवात्मा परमात्मा एक हो जाते हैं; समाधि हो जाती है। देहबुद्धि चली जाती है, बाह्यज्ञान नहीं रहता, अनेकत्व का बोध नष्ट हो जाता है और विचार बन्द हो जाता है।
“त्रैलंग स्वामी ने कहा था, विचार करते समय ही अनेकता तथा विभिन्नता का बोध होता है। समाधि के बाद अन्त में इक्कीस दिन में मृत्यु हो जाती है।
“परन्तु कुण्डलिनी न जागने पर चैतन्य प्राप्त नहीं होता।
ईश्वर-दर्शन के लक्षण
“जिसने ईश्वर को प्राप्त किया है, उसके कुछ लक्षण हैं। वह बालक की तरह,
२३६ श्रीरामकृष्णवचनामृत १० जून, १८८३
उन्मत्त की तरह, जड़ की तरह, या पिशाच की तरह बन जाता है और उसे सच्चा अनुभव होता है कि 'मैं यन्त्र हूँ और वे यन्त्री हैं। वे ही कर्ता हैं, और सभी अकर्ता हैं।' जिस प्रकार सिक्खों ने कहा था, पत्ता हिल रहा है, वह भी ईश्वर की इच्छा है। राम की इच्छा से ही सब कुछ हो रहा है - यह ज्ञान होता है। जैसे जुलाहे ने कहा था, 'राम की इच्छा से ही कपड़े का दाम एक रुपया छः आना है; राम की इच्छा से ही डकैती हुई; राम की इच्छा से ही डाकू पकडे गये; राम की इच्छा से ही पुलिसवाले मुझे ले गए और फिर राम की ही इच्छा से मुझे छोड़ दिया।"
सन्ध्या निकट थी, श्रीरामकृष्ण ने थोड़ा भी विश्राम नहीं किया। भक्तों के साथ लगातार हरिकथा हो रही है। अब मणिरामपुर और बेलघर के तथा अन्य भक्तगण भूमिष्ठ होकर उन्हें प्रणाम कर देवालय में देवदर्शन के बाद अपने अपने स्थानों को लौटने लगे।
<div align="center">□ □ □</div>परिच्छेद ४०
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परिच्छेद ४०
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
गृहस्थाश्रम के सम्बन्ध में उपदेश
आज गंगापूजा, ज्येष्ठ शुक्ला दशमी, शुक्रवार का दिन है; तारीख १५ जून १८८३ ई.। भक्तगण श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए दक्षिणेश्वर कालीमन्दिर में आए हैं। गंगापूजा के उपलक्ष्य में अधर और मास्टर को छुट्टी मिली है।
राखाल के पिता और पिता के ससुर आए हैं। पिता ने दूसरी बार विवाह किया है। ससुर महाशय श्रीरामकृष्ण का नाम बहुत दिनों से सुनते आ रहे हैं; वे साधक पुरुष हैं, श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने आए हैं। श्रीरामकृष्ण उन्हें रुक-रुककर देख रहे हैं। भक्तगण जमीन पर बैठे हैं।
ससुर महाशय ने पूछा, "महाराज, क्या गृहस्थाश्रम में भगवान् का लाभ हो सकता है?"
श्रीरामकृष्ण (हँसते हुए) – क्यों नहीं हो सकता? कीचड़ में रहनेवाली मछली की तरह रहो। वह कीचड़ में रहती है, पर उसके शरीर में कीचड़ नहीं लगता। और असती स्त्री की तरह रहो जो घर का सारा कामकाज करती है, पर उसका मन अपने उपपति की ओर ही रहता है। ईश्वर से मन लगाए रखकर गृहस्थी का सब काम करो। परन्तु यह है बड़ा कठिन। मैंने ब्राह्मसमाजवालों से कहा था कि जिस कमरे में इमली का अचार और पानी का मटका है, यदि उसी कमरे में सन्निपात का रोगी भी रहे तो बीमारी किस तरह दूर हो? फिर इमली की याद आते ही मुँह में पानी भर आता है। पुरुषों के लिए स्त्रियाँ इमली के अचार की तरह हैं। और विषय की तृष्णा तो सदा लगी ही है; यही पानी का मटका है। इस तृष्णा का अन्त नहीं है। सन्निपात का रोगी कहता है कि मैं एक मटका पानी पिऊँगा! बड़ा कठिन है। संसार में बहुत कठिनाईयाँ हैं। जिधर जाओ उधर ही कोई न कोई बला आ खड़ी हो जाती है। और निर्जन स्थान न होने के कारण भगवान् की चिन्ता नहीं होती। सोने को गलाकर गहना गढ़ाना है, तो यदि गलाते समय कोई दस बार बुलाए, तो सोना किस तरह गलेगा? चावल छाँटते समय अकेले बैठकर छाँटना होता है। हर बार चावल
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२३८ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८३
हाथ में लेकर देखना पड़ता है कि कैसा साफ हुआ। छाँटते समय यदि कोई दस बार बुलाये तो अच्छी तरह छाँटना कैसे हो सकता है?
तीव्र वैराग्य। पाप-पुण्य। संसारव्याधि की महौषधी संन्यास
एक भक्त – महाराज, फिर उपाय क्या है?
श्रीरामकृष्ण – उपाय है। यदि तीव्र वैराग्य हो तो हो सकता है। जिसे मिथ्या समझते हो उसे हठपूर्वक उसी समय त्याग दो। जिस समय मैं बहुत बीमार था, गंगाप्रसाद सेन के पास लोग मुझे ले गए। गंगाप्रसाद ने कहा, 'यह औषधि खानी पड़ेगी पर जल नहीं पी सकते। हाँ, अनार का रस पी सकते हो।' सब लोगों ने सोचा कि बिना जल पिए मैं कैसे रह सकता हूँ। मैंने निश्चय किया कि अब जल न पीऊँगा। मैं 'परमहंस' हूँ। मैं बतख थोड़े ही हूँ, – मैं तो राजहंस हूँ दूध पिया करूँगा।
"कुछ काल निर्जन में रहना पड़ता है। खेल के समय पाला छू लेने पर फिर भय नहीं रहता। सोना हो जाने पर जहाँ जी चाहे रहो। निर्जन में रहकर यदि भक्ति मिली हो और भगवान् मिल चुके हों, तो फिर संसार में भी रह सकते हो। (राखाल के पिता के प्रति) इसीलिए तो लड़कों को यहाँ रहने के लिए कहता हूँ; क्योंकि यहाँ थोड़े दिन रहने पर भगवान् में भक्ति होगी; उसके बाद सहज ही संसार में जाकर रह सकेंगे।"
एक भक्त – यदि ईश्वर ही सब कुछ करते हैं, तो फिर लोग भला और बुरा, पाप और पुण्य, यह सब क्यों कहते हैं? तब तो पाप भी उन्हीं की इच्छा से होता है!
राखाल के पिता के ससुर – उनकी इच्छा को हम कैसे समझें?
श्रीरामकृष्ण – पाप और पुण्य हैं, पर वे स्वयं निर्लिप्त हैं। वायु में सुगन्ध भी है और दुर्गन्ध भी, परन्तु वायु स्वयं निर्लिप्त है। ईश्वर की सृष्टि ऐसी ही है। भला-बुरा, सत्-असत् – दोनों हैं। जैसे पेड़ों में कोई आम का पेड़ है, कोई कटहल का, कोई किसी और चीज का। देखो न, दुष्ट आदमियों की भी आवश्यकता है। जिस तालुके की प्रजा उद्दण्ड होती है, वहाँ एक दुष्ट आदमी भेजना पड़ता है, तब कहीं तालुके का ठीक शासन होता है। फिर गृहस्थाश्रम के सम्बन्ध में बात चली।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों से) – बात यह है, संसार करने पर मन की शक्ति का अपव्यय होता है। इस अपव्यय से जो हानि होती है वह तभी पूरी हो सकती है जब कोई संन्यास ले। पिता प्रथम जन्मदाता है। उसके बाद द्वितीय जन्म उपनयन के समय होता है। एक बार फिर जन्म होता है, संन्यास के समय। कामिनी और कांचन – ये ही दो विघ्न हैं। स्त्री की आसक्ति पुरुष को ईश्वर के मार्ग से डिगा देती है। किस तरह पतन होता है, यह पुरुष नहीं जान सकता। किले के अन्दर जाते समय यह बिलकुल न जान सका कि ढालू रास्ते से जा रहा हूँ। जब किले के अन्दर गाड़ी पहुँची तो मालूम हुआ कि कितने नीचे आ
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१५ जून, १८८३ परिच्छेद ४० २३९
गया हूँ! स्त्रियाँ पुरुषों को कुछ नहीं समझने देतीं। कप्तान* कहता है, मेरी स्त्री ज्ञानी है! भूत जिस पर सवार होता है, वह नहीं जानता कि भूत सवार है, वह कहता है कि मैं आनन्द में हूँ। (सभी निस्तब्ध हैं।)
श्रीरामकृष्ण – संसार में केवल काम का ही नहीं, क्रोध का भी भय है। कामना के मार्ग में रुकावट होने से ही क्रोध पैदा हो जाता है।
मास्टर – भोजन करते समय मेरी थाली से बिल्ली कुछ खाना उठा लेने को बढ़ती है, मैं कुछ नहीं बोल सकता।
श्रीरामकृष्ण – क्यों! एक बार मारते क्यों नहीं? उसमें क्या दोष है? गृहस्थ को फुफकारना चाहिए, पर विष न उगलना चाहिए। किसी को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए, पर शत्रुओं के हाथ से बचने के लिए क्रोध का आभास दिखलाना चाहिए; नहीं तो शत्रु आकर उसे हानि पहुँचाएँगे। पर त्यागी के लिए फुफकारने की भी आवश्यकता नहीं है।
एक भक्त – महाराज, संसार में रहकर भगवान् को पाना बड़ा ही कठिन देखता हूँ। कितने आदमी ऐसे हो सकते हैं? ऐसा तो कोई देखने में नहीं आता।
श्रीरामकृष्ण – क्यों नहीं होगा? उधर सुना है कि एक डिप्टी है। बड़ा अच्छा आदमी है। प्रतापसिंह उसका नाम है। दानशीलता, ईश्वर की भक्ति आदि बहुतसे गुण उसमें हैं। मुझे लेने के लिए आदमी भेजा था। ऐसे लोग भी तो हैं।
(२)
साधना का प्रयोजन। गुरुवाक्य में विश्वास। व्यास का विश्वास
श्रीरामकृष्ण – साधना की बड़ी आवश्यकता है। फिर क्यों नहीं होगा? यदि ठीक ठीक विश्वास हो, तो अधिक परिश्रम नहीं करना पड़ता। चाहिए गुरु के वचनों पर विश्वास।
“व्यासदेव यमुना के उस पार जाएँगे इतने में वहाँ गोपियाँ आयीं। वे भी पार जाएँगी, पर नाव नहीं मिलती। गोपियों ने कहा, ‘महाराज, अब क्या किया जाय?’ व्यासदेव ने कहा, ‘अच्छा, तुम लोगों को पार किए देता हूँ; पर मुझे बड़ी भूख लगी है, तुम्हारे पास कुछ है?’ गोपियों के पास दूध, दही, मक्खन आदि था सब कुछ उन्होंने खाया। गोपियों ने कहा, ‘महाराज, अब पार जाने का क्या हुआ?’ व्यासदेव तब किनारे पर जाकर खड़े हुए और कहने लगे, ‘हे यमुने, यदि आज मैंने कुछ न खाया हो तो तुम्हारा जल दो भागों में बँट जाय’ यह कहते ही जल अलग-अलग हो गया। गोपियाँ यह देखकर दंग रह गयीं; सोचने लगीं, इन्होंने अभी अभी तो इतनी चीजें खायी हैं, फिर भी कहते हैं,
* श्री विश्वनाथ उपाध्याय
CC-0. In Public Domain. Gurukul Kangri Collection, Haridwar
२४० श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८३
'यदि आज मैंने कुछ न खाया हो'
"यही दृढ़ विश्वास है। मैंने नहीं - हृदय में जो नारायण हैं उन्होंने खाया है।
"शंकराचार्य तो ब्रह्मज्ञानी थे, पर पहले उनमें भेदबुद्धि भी थी। वैसा विश्वास न था। चाण्डाल माँस का बोझ लिए आ रहा था, वे गंगास्नान करके ही उठे थे कि चाण्डाल से स्पर्श हो गया। कह उठे, 'अरे! तूने मुझे छू लिया!' चाण्डाल ने कहा, 'महाराज, न आपने मुझे छुआ न मैंने आपको! शुद्ध आत्मा - न वह शरीर है, न पंचभूत है, और न चौबीस तत्त्व है।' तब शंकर को ज्ञान हुआ।
"जड़भरत राजा रहूगण की पालकी ले जाते समय जब आत्मज्ञान की बातें करने लगे, तब राजा ने पालकी से नीचे उतरकर कहा, 'आप कौन हैं? जड़भरत ने कहा, 'नेति नेति - मैं शुद्ध आत्मा हूँ।' उनका पक्का विश्वास था कि वे शुद्ध आत्मा हैं।
ज्ञानयोग और भक्तियोग
"‘सोऽहम्। मैं शुद्ध आत्मा हूँ - यह ज्ञानियों का मत है। भक्त कहते हैं, यह सब भगवान् का ऐश्वर्य है। धनी का ऐश्वर्य न होने से उसे कौन जान सकता है? पर यदि साधक की भक्ति देखकर ईश्वर कहेंगे कि जो मैं हूँ, वही तू भी है, तब दूसरी बात है। राजा बैठे हैं, उस समय नौकर यदि सिंहासन पर जाकर बैठ जाय और कहे, 'राजा, जो तुम हो वही मैं भी हूँ', तो लोग उसे पागल कहेंगे। पर यदि नौकर की सेवा से सन्तुष्ट हो राजा एक दिन यह कहें, 'आ जा, तू मेरे पास बैठ, इसमें कोई दोष नहीं; जो तू है वही मैं भी हूँ!' और तब यदि वह जाकर बैठे तो उसमें कोई दोष नहीं है। एक साधारण जीव का यह कहना कि सोऽहम् - मैं वही हूँ - अच्छा नहीं है। जल की ही तरंग होती है तरंग का जल थोड़े ही होता है।
"बात यह है कि मन स्थिर न होने से योग नहीं होता, तुम चाहे जिस राह से चलो। मन योगी के वश में रहता है, योगी मन के वश में नहीं।
'मन स्थिर होने पर वायु स्थिर होती है - उससे कुम्भक होता है। वह कुम्भक भक्तियोग से भी होता है, भक्ति से वायु स्थिर हो जाती है। 'मेरे निताई मस्त हाथी हैं!' 'मेरे निताई मस्त हाथी हैं!' यह कहते कहते जब भाव हो जाता है, तब वह मनुष्य पूरा वाक्य नहीं कह सकता, केवल 'हाथी हैं' 'हाथी हैं' कहता है। इसके बाद सिर्फ 'हा -' इतना ही! भाव से वायु स्थिर होती है, और उससे कुम्भक होता है।
"एक आदमी झाड़ू दे रहा था कि किसी ने आकर कहा, 'अजी, अमुक मर गया!' जो झाड़ू दे रहा था, उसका यदि वह अपना आदमी न हुआ, तो वह झाड़ू देता ही रहता है और बीच बीच में कहता है, 'दुःख की बात है, वह आदमी मर गया! बड़ा अच्छा आदमी था।' इधर झाड़ू भी चल रहा है। परन्तु यदि कोई अपना हुआ तो झाड़ू उसके साथ
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से छूट जाता है, और 'हाय!' कहकर वह बैठ जाता है। उस समय उसकी वायु स्थिर हो जाती है; कोई काम या विचार उससे फिर नहीं हो सकता। औरतों में नहीं देखा – यदि कोई निर्वाक् होकर कुछ देखे या सुने तो दूसरी औरतें उससे कहती हैं, 'क्यों, क्या तुझे भाव हुआ हैं?' यहाँ पर भी वायु स्थिर हो गयी है, इसी से निर्वाक् होकर मुँह खोले रहती है।
ज्ञानी के लक्षण। साधना-सिद्ध और नित्य-सिद्ध
"‘सोऽहम् सोऽहम्’ कहने से ही नहीं होता। ज्ञानी के लक्षण हैं। नरेन्द्र के नेत्र उभरे हुए हैं। इनके भी कपाल और नेत्र का लक्षण अच्छा है।
"फिर सब की एक-सी हालत नहीं होती। जीव चार प्रकार के कहे गए हैं – बद्ध, मुमुक्षु, मुक्त और नित्य। सभी को साधना करनी पड़ती है, यह बात भी नहीं है। नित्य-सिद्ध और साधना-सिद्ध, दो तरह के साधक हैं। कोई अनेक साधनाएँ करने पर ईश्वर को पाता है; कोई जन्म से ही सिद्ध है, जैसे प्रह्लाद। ‘होमा’ नाम की चिड़िया आकाश में रहती है। वहीं वह अण्डा देती है। अण्डा आकाश से गिरता है और गिरते ही गिरते वह फूट जाता है, और उससे बच्चा निकलकर गिरता है। वह इतने ऊँचे पर से गिरता है कि गिरते ही गिरते उसके पंख निकल आते हैं। जब वह पृथ्वी के पास आ जाता है तब देखता है कि जमीन से टकराते ही वह चूरचूर हो जाएगा। तब वह सीधे ऊपर उड़ जाता है – अपनी माँ के पास!
"प्रह्लाद आदि नित्य-सिद्ध भक्तों की साधना बाद में होती है। साधना के पहले ही उन्हें ईश्वर का लाभ होता है, जैसे लौकी, कुम्हड़े का पहले फल, और उसके बाद फूल होता है। (राखाल के पिता से) नीच वंश में भी यदि नित्य-सिद्ध जन्म ले तो वह वही होता है, दूसरा कुछ नहीं होता। चने के मैली जगह में गिरने पर भी चने का ही पेड़ होता है।
शक्ति का तारतम्य – विद्यासागर
"ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति दी है, किसी को कम। कहीं पर एक दिया जल रहा है, कहीं पर एक मशाल। विद्यासागर की बात से जान लिया कि उनकी बुद्धि की पहुँच कितनी दूर है। जब मैंने शक्तिविशेष की बात कही, तब विद्यासागर ने कहा, 'महाराज, तो क्या ईश्वर ने किसी को अधिक शक्ति दी है और किसी को कम?' मैंने भी कहा, 'फिर क्या? शक्ति की कमी-बेशी हुए बिना तुम्हारा इतना नाम क्यों है? तुम्हारी विद्या, तुम्हारी दया, यही सब सुनकर तो हम लोग आए हैं। तुम्हारे कोई दो सींग तो निकले नहीं हैं!' विद्यासागर की इतनी विद्या और इतना नाम होते हुए भी उन्होंने ऐसी कच्ची बात कह दी! बात यह है कि जाल में पहले-पहल बड़ी मछलियाँ पड़ती हैं; रोहू, कातल आदि। उसके बाद मछुआ पैर से कीचड़ को घोंट देता है। तब तरह तरह की छोटी छोटी मछलियाँ
२४२ श्रीरामकृष्णवचनामृत १५ जून, १८८३
निकल आती हैं, और तुरन्त फँस जाती हैं। ईश्वर को न जानने से थोड़ी ही देर में भीतर से छोटी छोटी मछलियाँ (कच्ची बातें) निकल पड़ती हैं! केवल पण्डित होने से क्या होगा?"
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परिच्छेद ४१
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परिच्छेद ४१
दक्षिणेश्वर में भक्तों के साथ
(१)
तान्त्रिक भक्त तथा संसार। निर्लिप्त को भी भय है
श्रीरामकृष्ण भोजन के बाद दक्षिणेश्वर मन्दिर के अपने कमरे में थोड़ा विश्राम कर रहे हैं। अधर तथा मास्टर ने आकर प्रणाम किया। एक तान्त्रिक भक्त भी आए हैं। राखाल, हाजरा, रामलाल आदि आजकल श्रीरामकृष्ण के पास रहते हैं। आज रविवार है, १७ जून १८८३ ई.।
श्रीरामकृष्ण (भक्तों के प्रति) – गृहस्थाश्रम में होगा क्यों नहीं? परन्तु बहुत कठिन है। जनक आदि ज्ञान प्राप्त करने के बाद गृहस्थाश्रम में आए थे। परन्तु फिर भी भय है! निष्काम गृहस्थ को भी भय है! भैरवी को देखकर जनक ने मुँह नीचा कर लिया। स्त्री के दर्शन से संकोच हुआ था। भैरवी ने कहाँ, 'जनक! मैं देखती हूँ कि तुम्हें अभी ज्ञान नहीं हुआ। तुममें अभी भी स्त्रीपुरुष-बुद्धि विद्यमान है।'
"कितना ही सयाना क्यों न हो, काजल की कोठरी में रहने पर शरीर पर कुछ न कुछ काला दाग लगेगा ही।
"मैंने देखा है, गृहस्थ भक्त जिस समय शुद्धवस्त्र पहनकर पूजा करते हैं उस समय उनका अच्छा भाव रहता है। यहाँ तक कि जलपान करने तक वही भाव रहता है। उसके बाद अपनी वही मूर्ति; फिर से रज, तम।
"सत्त्वगुण से भक्ति होती है। किन्तु भक्ति का सत्त्व, भक्ति का रज, भक्ति का तम है। भक्ति का सत्त्व विशुद्ध है; इसकी प्राप्ति होने पर, ईश्वर को छोड़ और किसी में भी मन नहीं लगता। देह की रक्षा हो सके, केवल इतना ही शरीर की ओर ध्यान रहता है।
परमहंस त्रिगुणातीत होते हैं
"परमहंस तीनों गुणों से अतीत होते हैं।* उनमें तीन गुण हैं और फिर नहीं भी हैं।
* मां च योऽव्यभिचारेण भक्तियोगेन सेवते।
स गुणान् समतीत्यैतान् ब्रह्मभूयाय कल्पते।। - गीता, १४। २६
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२४४ | श्रीरामकृष्णवचनामृत | १७ जून, १८८३
ठीक बालक जैसा, किसी गुण के अधीन नहीं है। इसलिए परमहंस छोटे छोटे बच्चों को अपने पास आने देते हैं, जिससे उनके स्वभाव को अपना सकें।
“परमहंस संचय नहीं कर सकते। यह अवस्था गृहस्थों के लिए नहीं है। उन्हें अपने घरवालों के लिए संचय करना पड़ता है।”
तान्त्रिक भक्त – क्या परमहंस को पाप-पुण्य का बोध रहता है?
श्रीरामकृष्ण – केशव सेन ने यह बात पूछी थी। मैंने कहा, ‘और अधिक कहने पर तुम्हारा दल-बल नहीं रहेगा।’ केशव ने कहा, ‘तो फिर रहने दीजिए, महाराज।’
“पाप-पुण्य क्या है, जानते हो? परमहंस-अवस्था में अनुभव होता है कि वे ही सुबुद्धि देते हैं, वे ही कुबुद्धि देते हैं। फल क्या मीठे, कडुए नहीं होते? किसी पेड़ में मीठा फल, किसी में कडुआ या खट्टा फल। उन्होंने मीठे आम का वृक्ष भी बनाया है और फिर खट्टे फल का वृक्ष भी!”
तान्त्रिक भक्त – जी हाँ, पहाड़ पर गुलाब की खेती दिखायी देती है। जहाँ तक दृष्टि जाती है केवल गुलाब ही गुलाब का खेत!
श्रीरामकृष्ण – परमहंस देखता है, यह सब उनकी माया का ऐश्वर्य है, सत्-असत्, भला-बुरा, पाप-पुण्य यह सब समझना बहुत दूर की बात है। उस अवस्था में दल-बल नहीं रहता।
कर्मफल। पाप-पुण्य
तान्त्रिक भक्त – तो फिर कर्मफल है?
श्रीरामकृष्ण – वह भी है। अच्छा कर्म करने पर सुफल और बुरा कर्म करने पर कुफल मिलता है। मिर्च खाने पर तीखा तो लगेगा ही! यह सब उनकी लीला है, खेल है।
तान्त्रिक भक्त – हमारे लिए क्या उपाय है? कर्म का फल तो है न?
श्रीरामकृष्ण – होने दो, परन्तु उनके भक्तों की बात अलग है।
यह कहकर आप गाने लगे –
(भावार्थ) – “रे मन! तुम खेती का काम नहीं जानते हो! ऐसी मनुष्यदेहरूपी जमीन पड़ी ही रह गयी! यदि तुम खेती करते तो इसमें सोना फल सकता था। पहले तुम कालीनाम का घेरा लगा लो, फसल नष्ट न होगी। वह तो मुक्तकेशी का पक्का घेरा है, उसके पास यम भी नहीं आता। गुरु का दिया हुआ बीज बोकर भक्ति का जल सींच देना। हे मन, यदि तुम अकेले न कर सको, तो रामप्रसाद को साथ ले लेना।”
फिर गा रहे हैं –
(भावार्थ) – “ ‘यम के आने का रास्ता बन्द हो गया। मेरे मन का सन्देह मिट गया। मेरे घर के नौ दरवाजों पर चार शिव पहरेदार हैं। एक ही स्तम्भ पर घर है, जो तीन रस्सियों
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से बँधा हुआ है। सहस्रदल-कमल पर श्रीनाथ अभय देते हुए बैठे हैं।'
"काशी में ब्राह्मण मरे या वेश्या – सभी शिव होंगे।
-"जब हरिनाम से, कालीनाम से, रामनाम से, आँखों में आँसू भर आते हैं, तब सन्ध्या-कवच आदि की कुछ भी आवश्यकता नहीं रह जाती। कर्म का त्याग हो जाता है। कर्म का फल स्पर्श नहीं करता।"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "चिन्तन करने पर भाव का उदय होता है। जैसा भाव, वैसी ही प्राप्ति होती है – विश्वास ही मूल बात है। यदि चित्त काली के चरणरूपी अमृत-सरोवर में डूबा रहता है, तो फिर पूजा-होम, यज्ञ आदि का कुछ भी महत्त्व नहीं है।"
श्रीरामकृष्ण फिर गा रहे हैं -
(भावार्थ) - "'जो त्रिसन्ध्या में काली का नाम लेता है, क्या वह पूजा-सन्ध्यादि चाहता है? सन्ध्या स्वयं उसकी खोज में फिरती रहती है, पर उससे मिल नहीं पाती! यदि 'काली काली' कहते हुए मेरे प्राण निकल जाए, तो फिर गया, गंगा, प्रभास, काशी, कांची आदि की कौन परवाह करता है!'
"ईश्वर में मग्न हो जाने पर फिर असद्बुद्धि, पापबुद्धि नहीं रह जाती।"
तान्त्रिक भक्त – आपने कहा है 'विद्या का मैं' रहता है।
श्रीरामकृष्ण – 'विद्या का मैं', 'भक्त मैं', 'दास मैं', 'भला मैं' रहता है। 'बदमाश मैं' चला जाता है। (हँसी)
तान्त्रिक भक्त – जी महाराज, हमारे अनेक सन्देह मिट गए।
श्रीरामकृष्ण – आत्मा का साक्षात्कार होने पर सब सन्देह मिट जाते हैं।*
भक्ति का तम। सन्देह। अष्टसिद्धि
"भक्ति का तम लाओ। कहो, – जब मैंने राम का नाम लिया, काली का नाम लिया, तब यह कैसे सम्भव है कि मेरा बन्धन रहे, मेरा कर्मफल रहे?"
श्रीरामकृष्ण फिर गाना गा रहे हैं -
(भावार्थ) – "माँ, यदि मैं 'दुर्गा दुर्गा' कहता हुआ मरूँ, तो हे शंकरी, देखूँगा कि अन्त में इस दीन का तुम कैसे उद्धार नहीं करतीं! माँ! गो-ब्राह्मण की, भ्रूण की तथा नारी की हत्या, सुरापान आदि पापों की रत्तीभर परवाह न कर मैं ब्रह्मपद प्राप्त कर सकता हूँ।"
श्रीरामकृष्ण फिर कहते हैं – "विश्वास, विश्वास, विश्वास! गुरु ने कह दिया है, 'राम ही सब कुछ बनकर विराजमान हैं। वही राम घट-घट में लेटा।' कुत्ता रोटी खाता जा
* भिद्यते हृदयग्रन्थिश्चिद्यन्ते सर्वसंशयाः।
क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन्दृष्टे परावरे।। – मुण्डक उपनिषद, २।२।८
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रहा है। भक्त कहता है, 'राम! ठहरो, ठहरो, रोटी में घी लगा दूँ।' गुरुवाक्य में ऐसा विश्वास!
“भुक्कड़ों को विश्वास नहीं होता। सदा ही सन्देह! आत्मा का साक्षात्कार हुए बिना सब सन्देह दूर नहीं होते।
“शुद्ध भक्ति, जिसमें कोई कामना न हो, ऐसी भक्ति द्वारा उन्हें शीघ्र प्राप्त किया जा सकता है।
“अणिमा आदि सिद्धियाँ – ये सब कामनाएँ हैं। कृष्ण ने अर्जुन से कहा है, 'भाई, अणिमा आदि सिद्धियों में से एक के भी रहते ईश्वर की प्राप्ति नहीं होती। शक्ति को थोड़ा बढ़ा भर सकती हैं वे।'"
तान्त्रिक भक्त – महाराज, तान्त्रिक क्रिया आजकल सफल क्यों नहीं होती?
श्रीरामकृष्ण – सर्वांगीण नहीं होती और भक्तिपूर्वक भी नहीं की जाती, इसीलिए सफल नहीं होती।
अब श्रीरामकृष्ण उपदेश समाप्त कर रहे हैं। कह रहे हैं – “भक्ति ही सार है। सच्चे भक्त को कोई भय, कोई चिन्ता नहीं। माँ सब कुछ जानती है। बिल्ली चूहा पकड़ती है एक प्रकार से, परन्तु अपने बच्चे को पकड़ती है दूसरे प्रकार से।”
परिच्छेद ४२
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पानीहाटी महोत्सव में
(१)
कीर्तनानन्द में
श्रीरामकृष्ण पानीहाटी के महोत्सव में राजपथ पर बहुत लोगों से घिरे हुए संकीर्तनदल के बीच में नृत्य कर रहे हैं। दिन का एक बजा है। आज सोमवार, ज्येष्ठ शुक्ला त्रयोदशी तिथि है। तारीख १८ जून १८८३ ई.।
संकीर्तन के बीच में श्रीरामकृष्ण के दर्शन करने के लिए चारों ओर लोग कतार बाँधकर खड़े हैं। श्रीरामकृष्ण प्रेम में मतवाले हो नाच रहे हैं। कोई कोई सोच रहे हैं कि क्या श्रीगौरांग फिर प्रकट हुए हैं! चारों ओर हरि-ध्वनि सागर की तरंगों के समान उमड़ रही है। चारों ओर से लोग फूल बरसा रहे हैं और बतासे लुटा रहे हैं।
श्री नवद्वीप गोस्वामी संकीर्तन करते हुए राघव पण्डित के मन्दिर की ओर आ रहे थे कि एकाएक श्रीरामकृष्ण दौड़कर उनसे आ मिले और नाचने लगे।
यह राघव पण्डित का 'चिउड़े का महोत्सव' है। शुक्लपक्ष की त्रयोदशी तिथि पर प्रतिवर्ष महोत्सव होता है। इस महोत्सव को पहले दास रघुनाथ ने किया था। उसके बाद राघव पण्डित प्रतिवर्ष करते थे। दास रघुनाथ से नित्यानन्द ने कहा था, "अरे, तू घर से केवल भाग-भागकर आता है, और हमसे छिपाकर प्रेम का स्वाद लेता रहता है! हमें पता तक नहीं लगने देता! आज तुझे दण्ड दूँगा; तू चिउड़े का महोत्सव करके भक्तों की सेवा कर।" श्रीरामकृष्ण प्रायः प्रतिवर्ष यहाँ आते हैं, आज भी यहाँ राम आदि भक्तों के साथ आनेवाले थे। राम सबेरे मास्टर के साथ कलकत्ते से दक्षिणेश्वर आये। श्रीरामकृष्ण को प्रणाम कर वहीं उत्तरवाले बरामदे में उन्होंने प्रसाद पाया। राम कलकत्ते से जिस गाड़ी पर आये थे, उसी पर श्रीरामकृष्ण पानीहाटी आये। राखाल, मास्टर, राम, भवनाथ तथा और भी दो-एक भक्त उनके साथ थे।
गाड़ी मैगजीन रोड से होकर चानक के बड़े रास्ते पर आयी। जाते जाते श्रीरामकृष्ण बालक भक्तों से विनोद करने लगे।
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पानीहाटी के महोत्सव-स्थल पर गाड़ी पहुँचते ही राम आदि भक्त यह देखकर विस्मित हुए कि श्रीरामकृष्ण जो अभी गाड़ी में विनोद कर रहे थे, एकाएक अकेले ही उतरकर बड़े वेग से दौड़ रहे हैं। बहुत ढूँढ़ने पर उन्होंने देखा कि वे नवद्वीप गोस्वामी के संकीर्तन के दल में नृत्य कर रहे हैं और बीच बीच में समाधिस्थ भी हो रहे हैं। समाधि की दशा में कहीं वे गिर न पड़ें, इसलिए नवद्वीप गोस्वामी उन्हें बड़े यत्न से सम्हाल रहे हैं। चारों ओर भक्तगण हरि-ध्वनि कर उनके चरणों पर फूल और बतासे चढ़ा रहे हैं और एक बार उनके दर्शन पाने के लिए धक्कमधक्का कर रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण अर्धबाह्य दशा में नृत्य कर रहे हैं। फिर बाह्य दशा में आकर वे गाने लगे -
(भावार्थ) - “हरि का नाम लेते ही जिनकी आँखों से आँसुओं की झड़ी लग जाती है, वे दोनों भाई आये हैं; जो स्वयं नाचकर जगत् को नचाते हैं, वे दोनों भाई आये हैं जो स्वयं रोकर जगत् को रुलाते हैं, और जो मार खाकर भी प्रेम की याचना करते हैं, वे आये हैं”!
श्रीरामकृष्ण के साथ सब उन्मत्त हो नाच रहे हैं, और अनुभव कर रहे हैं कि गौरांग और निताई हमारे सामने नाच रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण फिर गाने लगे -
(भावार्थ) - “गौरांग के प्रेम के हिलोरों से नवद्वीप डाँवाडोल हो रहा है।”
संकीर्तन की तरंग राघव के मन्दिर की ओर बढ़ रही है। वहाँ परिक्रमा और नृत्य आदि करने के बाद श्रीविग्रह को प्रणाम कर वह तरंगायित जनसंघ गंगातट पर अवस्थित श्रीराधाकृष्ण के मन्दिर की ओर बढ़ रहा है।
संकीर्तनकारों में से कुछ ही लोग श्रीराधाकृष्ण के मन्दिर में घुस पाये हैं। अधिकांश लोग दरवाजे से ही एक दूसरे को ढकेलते हुए झाँक रहे हैं।
श्रीरामकृष्ण श्रीराधाकृष्ण के आँगन में फिर नाच रहे हैं। कीर्तनानन्द में बिलकुल मस्त हैं! बीच बीच में समाधिस्थ हो रहे हैं और चारों ओर से फूल-बतासे चरणों पर पड़ रहे हैं। आँगन के भीतर बारम्बार हरि-ध्वनि हो रही है। वही ध्वनि सड़क पर आते ही हजारों कण्ठों से उच्चारित होने लगी। गंगा पर नावों से आने-जानेवाले लोग चकित होकर इस सागर-गर्जन के समान उठती हुई ध्वनि को सुनने लगे और वे स्वयं भी ‘हरिबोल’ ‘हरिबोल’ कहने लगे।
पानीहाटी के महोत्सव में एकत्रित हजारों नर-नारी सोच रहे हैं कि इन महापुरुष के भीतर निश्चित ही श्रीगौरांग का आविर्भाव हुआ है। दो-एक आदमी यह विचार कर रहे हैं कि शायद ये ही साक्षात् गौरांग हों।
छोटेसे आँगन में बहुतसे लोग एकत्रित हुए हैं। भक्तगण बड़े यत्न से श्रीरामकृष्ण