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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages
Page 1842Permalink

अमित्रहा वृत्रहा दस्युहंतमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा.. (२)
दीप्तिशाली, विस्तृत, भली-भांति पुष्ट, अन्न का अतिशय दाता, वायु द्वारा धारित,
सूर्यमंडल में स्थित, विनाशनरहित, शत्रुघातक, वृत्रहननकर्त्ता, राक्षसों को मारने वालों में श्रेष्ठ,
आयुध फेंकने वालों का घातक एवं सहज विरोधियों को समाप्त करने वाला सूर्यरूप तेज
प्रकट होता है. (२)
इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धनजिदुच्यते बृहत्.
विश्वभ्राड् भ्राजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम्.. (३)
सूर्य ज्योतियों में उत्तम ज्योति, श्रेष्ठ, विश्व को जीतने वाले, धन विजय करने वाले एवं
विशाल कहलाते हैं. विश्वप्रकाशक, दीप्तिशाली एवं महान् सूर्य देखने के लिए विस्तृत
अंधकारनाशक एवं अविनाशी तेज का विस्तार करते हैं. (३)
विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वर्अगच्छो रोचनं दिवः.
येनेमा विश्वा भुवनान्याभृता विश्वकर्मणा विश्वदेव्यावता.. (४)
हे सूर्य! तुम अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करते हुए दिव्य स्थान में गए थे.
सभी कार्यों के हेतु व सभी यज्ञों के अनुकूल सूर्य प्रकाश के द्वारा सारे लोक को भर जाते हैं.
(४)
सूक्त—१७१ देवता—इंद्र
त्वं त्यमिततो रथमिन्द्र प्रावः सुतावतः. अशृणोः सोमिनो हवम्.. (१)
हे इंद्र! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले त्यट् ऋषि के रथ की रक्षा की एवं सोमधारणकर्त्ता
त्यट् की पुकार सुनी. (१)
त्वं मखस्य दोधतः शिरोऽव त्वचो भरः. अगच्छः सोमिनो गृहम्.. (२)
तुमने भय से कांपते हुए यज्ञ का सिर शरीर से अलग कर दिया. तुम सोमरसधारी त्यट्
के घर गए. (२)
त्वं त्यमिन्द्र मर्त्यमास्त्रबुध्नाय वेन्यम्. मुहुः श्रथ्ना मनस्यवे.. (३)
हे इंद्र! तुमने अस्त्रबुध्न की स्तुति बार-बार सुनकर वेनपुत्र पृथु को उसके वश में कर
दिया था. (३)
त्वं त्यमिन्द्र सूर्यं पश्चा सन्तं पुरस्कृधि. देवानां चित्तिरो वशम्.. (४)
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सूक्त—१७२ देवता—उषा

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हे इंद्र! तुम सायंकाल के समय पश्चिम में डूबे हुए एवं देवों द्वारा भी अज्ञात सूर्य को
अगले दिन पूर्व में ले जाते हो. (४)
सूक्त—१७२ देवता—उषा
आ याहि वनसा सह गावः सचन्त वर्तनिं यदूधभिः.. (१)
हे उषा! तुम शोभन तेज के साथ आओ. भरे हुए थनों वाली गाएं मार्ग पर चल रही हैं.
(१)
आ याहि वस्व्या धिया मंहिष्ठो जारयन्मखः सुदानुभिः.. (२)
हे उषा! तुम प्रशंसनीय स्तुतियां लेकर आओ. यह काल शोभन दान वाले पुरुषों द्वारा
दानयुक्त एवं यज्ञसमाप्ति का होता है. (२)
पितृभृतो न तन्तुमित्सुदानवः प्रति दध्मो यजामसि.. (३)
अन्न के स्वामियों के समान शोभन दान वाले हम धागों के समान इस यज्ञ का विस्तार
करते हैं एवं उस यज्ञ से उषा की पूजा करते हैं. (३)
उषा अप स्वसुस्तमः सं वर्तयति वर्तनिं सुजातता.. (४)
उषा अपनी बहिन रात का अंधकार मिटाती है एवं अपना रथ भली प्रकार चलाती है.
(४)
सूक्त—१७३ देवता—राजा की स्तुति
आ त्वाहार्षमन्तरेधि ध्रुवस्तिष्ठाविचाचलिः.
विशस्त्वा सर्वा वाञ्छन्तु मा त्वद्राष्ट्रमधि भ्रशत्.. (१)
हे राजन्! मैंने तुम्हें अपने राष्ट्र का स्वामी बनाया है. तुम हमारे बीच अधिकारी बनो एवं
दृढ़ तथा अविचल होकर रहो. सभी प्रजाएं तुम्हें चाहें. तुम्हारे पास से राज्य का अधिकार भ्रष्ट
न हो. (१)
इहैवैधि माप च्योष्ठाः पर्वत इवाविचाचलिः.
इन्द्र इवेह ध्रुवस्तिष्ठेह राष्ट्रमु धारय.. (२)
हे राजन्! तुम पर्वत के समान अविचल होकर बढ़ो एवं राज्य से च्युत न बनो. तुम इंद्र
के समान ध्रुव होकर यहां ठहरो एवं राष्ट्र को धारण करो. (२)
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ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे.

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इममिन्द्रो अदीधरद् ध्रुवं ध्रुवेण हविषा.
तस्मै सोमो अधि ब्रवत्तस्मा उ ब्रह्मणस्पतिः.. (३)
इंद्र ने ध्रुव हवि पाकर इस राजा को स्थिर बनाया है. सोम एवं ब्रह्मणस्पति ने उसे
आशीर्वाद दिया है. (३)
ध्रुवा द्यौर्ध्रुवा पृथिवी ध्रुवासः पर्वता इमे.
ध्रुवं विश्वमिदं जगद् ध्रुवो राजा विशामयम्.. (४)
जिस प्रकार द्युलोक, धरती, ये पर्वत एवं सारा विश्व ध्रुव है, उसी प्रकार प्रजाओं के बीच
यह राजा भी अविचल रहे. (४)
ध्रुवं ते राजा वरुणो ध्रुवं देवो बृहस्पतिः.
ध्रुवं त इन्द्रश्चाग्निश्च राष्ट्रं धारयतां ध्रुवम्.. (५)
हे राजन्! राजा वरुण, देव बृहस्पति, इंद्र एवं अग्नि तुम्हारे राज्य ध्रुव रूप में धारण करें.
(५)
ध्रुवं ध्रुवेण हविषाभि सोमं मृशामसि.
अथो त इन्द्रः केवलीर्विशो बलिहृतस्करत्.. (६)
हे राजन्! हम अविनाशी पुरोडाश के साथ स्थिर सोमरस को मिलाते हैं इसलिए इंद्र ने
तुम्हारी प्रजाओं को भक्त एवं कर देने वाली बनाया है. (६)
सूक्त—१७४ देवता—राजस्तुति
अभीवर्तेन हविषा येनेन्द्रो अभिवावृते. तेनास्मान्ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्तय.. (१)
हे ब्रह्मणस्पति! जिस हवि से इंद्र ने सब कुछ प्राप्त किया है, हम उसी हवि से यज्ञ करते
हैं. तुम हमें राज्यप्राप्ति में लगाओ. (१)
अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः.
अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो न इरस्यति.. (२)
हे राजन्! शत्रुओं, सेना लेकर चढ़ाई करने वालों, दानरहित लोगों एवं हमसे द्वेष करने
वालों को पराजित करो. (२)
अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृतत्.
अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तो यथाससि.. (३)
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हे राजन्! सविता देव, सोम एवं सभी प्राणी तुम्हारे अनुकूल हो गए हैं. इस प्रकार तुम
सबका आश्रय पा गए हो. (३)
येनेन्द्रो हविषा कृत्व्यभवद् द्युम्न्युत्तमः. इदं तदक्रि देवा असपत्नः किलाभुवम्.. (४)
हे देवो! जिस हवि द्वारा इंद्र यज्ञकर्म वाले यशस्वी एवं उत्तम बने हैं, उसी हव्य द्वारा मैंने
यज्ञ किया है. मैं इसीसे शत्रुरहित बना हूं. (४)
असपत्नः सपत्नहाभिराष्ट्रो विषासहिः. यथाहमेषां भूतानां विराजानि जनस्य च.. (५)
शत्रुरहित, शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मैं इन प्रजाओं एवं मंत्री आदि सेवकों का
स्वामी बना हूं. (५)
सूक्त—१७५ देवता—सोमरस निचोड़ने के
पत्थर
प्र वो ग्रावाणः सविता देवः सुवतु धर्मणा. धूर्षु युज्यध्वं सुनुत.. (१)
हे पथरो! सविता देव अपने प्रेरणात्मक कर्म से तुम्हें सोमरस निचोड़ने में लगावें. तुम
सभी स्थानों में नियुक्त होकर सोमरस निचोड़ो. (१)
ग्रावाणो अप दुच्छुनामप सेधत दुर्मतिम्. उस्राः कर्तन भेषजम्.. (२)
हे पथरो! दुःख पहुंचाने वाली प्रजा एवं दुर्बुद्धि को हमसे दूर करो. तुम गायों को हमारे
लिए ओषधि तुल्य बनाओ. (२)
ग्रावाण उपरेष्वा महीयन्ते सजोषसः. वृष्णे दधतो वृष्ण्यम्.. (३)
छोटे पत्थर आपस में मिलकर बड़े पत्थर पर शोभा पा रहे हैं. ये पत्थर रस बरसाने
वाले सोम के प्रति अपनी शक्ति का प्रयोग करते हैं. (३)
ग्रावाणः सविता नु वो देवः सुवतु धर्मणा. यजमानाय सुन्वते.. (४)
हे पथरो! सविता देव सोमयज्ञ करने वाले यजमान के लिए सोमरस निचोड़ने के काम
में तुम्हें लगावें. (४)
सूक्त—१७६ देवता—ऋभु एवं अग्नि
प्र सूनव ऋभूणां बृहन्नवन्त वृजना. क्षामा ये विश्वधायसोऽश्रन्धेनुं न मातरम्.. (१)
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ऋभुओं के पुत्र विशाल युद्ध करने के लिए निकले. बछड़ा जिस प्रकार दुधारू गाय के
दूध को पीता है, उसी प्रकार ऋभुगण सारी धरती पर फैल गए. (१)
प्र देवं देव्या धिया भरता जातवेदसम्. हव्या नो वक्षदानुषक् .. (२)
हे ऋत्विजो! ज्ञानी अग्नि देव को दिव्य स्तोत्र से प्रसन्न करो. अग्नि विधि के अनुसार
हमारा हव्य वहन करें. (२)
अयमु ष्य प्र देवयुर्होता यज्ञाय नीयते. रथा न योरभीवृतो घृणीवाञ्चेतति त्मना.. (३)
ये वही अग्नि हैं, जो देवों के यजन की अभिलाषा रखते हैं एवं होता हैं. यज्ञ के लिए
इन्हें स्थापित किया जाता है. अग्नि रथ के समान हव्यवहनकर्त्ता, ऋत्विज्, यजमान आदि से
घिरे हुए, किरणों से युक्त एवं स्वयं ही यज्ञ पूरा करने वाले हैं. (३)
अयमग्निरुरुष्यत्यमृतादिव जन्मनः सहसश्चित्सहीयान्देवो जीवातवे कृतः.. (४)
ये अग्नि देवों के समान मानवों के भय से भी रक्षा करते हैं. यह अतिशय शक्तिशाली
एवं आयुवृद्धि के लिए उत्पन्न हुए हैं. (४)
सूक्त—१७७ देवता—माया
पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति विपश्चितः.
समुद्रे अन्तः कवयो वि चक्षते मरीचीनां पदमिच्छन्ति वेधसः.. (१)
विद्वानों ने विचार करके मन की आंखों से जीवात्मारूपी पक्षी को देखा. उसे असुरों की
माया घेर चुकी थी. उन विद्वानों ने सूर्यमंडल के मध्य में देखा. उन विधाताओं ने सूर्यकिरणों
के स्थान में जाने की अभिलाषा की. (१)
पतङ्गो वाचं मनसा बिभर्ति तां गन्धर्वोऽवदद् गर्भे अन्तः.
तां द्योतमानां स्वर्यं मनीषामृतस्य पदे कवयो नि पान्ति.. (२)
वह आत्मारूपी पक्षी मन ही मन वचन को धारण करता है. गंधर्व ने यह बात उसे गर्भ
में ही बताई है. विद्वान् लोग सत्य के मार्ग में उस दीप्तिशालिनी, स्वर्ग देने वाली एवं वृद्धि की
स्वामिनी वाणी की रक्षा करते हैं. (२)
अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तम्.
स सध्रीचीः स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुवनेष्वन्तः.. (३)
मैंने रक्षक सूर्य को कभी पतित होते नहीं देखा, वे कभी समीपवर्ती और कभी दूरवर्ती
मार्ग से चलते हैं. वे कभी बहुत से वस्त्र एक साथ और कभी अलग-अलग पहनते हैं. वे
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सूक्त—१७८ देवता—गरुड़

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संसार में बार-बार आते हैं. (३)
सूक्त—१७८ देवता—गरुड़
त्यमू षु वाजिनं देवजूतं सहावानं तरुतारं रथानाम्.
अरिष्टनेमिं पृतनाजमाशुं स्वस्तये तार्क्ष्यमिहा हुवेम.. (१)
हम शक्तिशाली, देवों द्वारा सोम लाने के लिए प्रेरित बलयुक्त, संग्राम में शत्रुओं के रथों
के विजेता, आक्रमणरहित रथ वाले एवं सेनाओं को युद्ध के लिए प्रेरित करने वाले गरुड़ को
बुलाते हैं. (१)
इन्द्रस्येव रातिमाजोहुवानाः स्वस्तये नावमिवा रुहेम.
उर्वी न पृथ्वी बहुले गभीरे मा वामेतौ मा परेतौ रिषाम.. (२)
इंद्र की दानशक्ति के समान गरुड़ की दानशक्ति को आह्वान करने वाले हम इस पर
कल्याण के लिए नाव के समान चढ़ते हैं. हे विस्तृत, विशाल, व्यापक एवं गंभीर द्यावा-
पृथिवी! हम आतेजाते समय में नष्ट न हों. (२)
सद्यश्चिद्यः शवसा पञ्च कृष्टीः सूर्य इव ज्योतिषापस्ततान.
सहस्रसाः शतसा अस्य रंहिर्न स्मा वरन्ते युवतिं न शर्याम्.. (३)
जिस प्रकार सूर्य अपने तेज से जल का विस्तार करते हैं, उसी प्रकार गरुड़ ने अपने
बल से पांच वर्णों का शीघ्र विस्तार किया. गरुड़ की गति हजारों एवं सैकड़ों प्रकार का धन
देने वाली है. जिस प्रकार लक्ष्य की ओर जाने वाले बाण को कोई नहीं रोक पाता है, उसी
प्रकार गरुड़ की गति में बाधा नहीं पड़ती. (३)
सूक्त—१७९ देवता—इंद्र
उत्तिष्ठताव पश्यतेन्द्रस्य भागमृत्वियम्. यदि श्रातो जुहोतन यद्यश्रातो ममत्तन.. (१)
हे ऋत्विजो! उठो एवं इंद्र के ऋतु अनुकूल भाग के लिए प्रयत्न करो. इंद्र का भाग यदि
पक चुका है तो उसका होम करो और यदि वह नहीं पका है तो उसे पकाओ. (१)
श्रातं हविरो ष्विन्द्र प्र याहि जगाम सूरो अध्वनो विमध्यम्.
परि त्वास्ते निधिभिः सखायः कुलपा न व्राजपतिं चरन्तम्.. (२)
हे इंद्र! हव्य का पाक हो चुका है. तुम हमारे पास आओ. सूर्य अपने मार्ग के मध्य में
पहुंच चुके हैं. वंश के रक्षक पुत्र जिस प्रकार इधर-उधर घूमते हुए गृहपति की रक्षा करते हैं,
उसी प्रकार अनेक सखा यज्ञ की सामग्री लेकर तुम्हारी उपासना करते हैं. (२)
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सूक्त—१८० देवता—इंद्र

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श्रातं मन्य ऊधनि श्रातमग्नौ सुश्रातं मन्ये तदृतं नवीयः.
माध्यन्दिनस्य सवनस्य दध्नः पिबेन्द्र वज्रिन्पुरुकृज्जुषाणः.. (३)
गाय के थन में यह दुग्धरूप हवि सबसे पहले पकता है, हम लोग ऐसा मानते हैं. अग्नि
में पककर वह अति पवित्र एवं नवीन बनता है, यह हमारा विचार है. हे वज्रधारी एवं अधिक
धनदान करने वाले इंद्र! माध्यंदिन सवन नामक यज्ञ के उस दूध को तुम पिओ. (३)
सूक्त—१८० देवता—इंद्र
प्र ससाहिषे पुरुहूत शत्रूञ्ज्येष्ठस्ते शुष्म इह रातिरस्तु.
इन्द्रा भर दक्षिणेना वसूनि पतिः सिन्धूनामसि रेवतीनाम्.. (१)
हे बहुतों द्वारा बुलाए गए इंद्र! तुम शत्रुओं को हराते हो. तुम्हारा तेज श्रेष्ठ है. इस यज्ञ में
तुम्हारा दान हमें मिले. तुम दाहिने हाथ से हमें धन दो. तुम जल वाली सरिताओं के पति हो.
(१)
मृगो न भीमः कुचरो गविष्ठाः परावत आ जगन्था परस्याः.
सृकं संशाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून्ताळ्हि वि मृधो नुदस्व.. (२)
हे इंद्र! तुम भयानक पैरों एवं पर्वतवासी पशु के समान भयानक हो. तुम दूरवर्ती
स्वर्गलोक से आए हो. तुम गतिशील एवं तीखे वज्र पर सान चढ़ाकर शत्रुओं को मारो और
विरोधियों को दूर भगाओ. (२)
इन्द्र क्षत्रमभि वाममोजोऽजायथा वृषभ चर्षणीनाम्.
अपानुदो जनममित्रयन्तमुरुं देवेभ्यो अकृणोरु लोकम्.. (३)
हे इंद्र! तुम कष्ट से रक्षा करने वाले एवं सुंदर तेज को लेकर उत्पन्न हुए हो. हे कामपूरक
इंद्र! तुम हमारे प्रति शत्रुता रखने वाले लोगों का नाश करो एवं देवों के लिए संसार को
विस्तृत बनाओ. (३)
सूक्त—१८१ देवता—विश्वेदेव
प्रथश्च यस्य सप्रथश्च नामानुष्टुभस्य हविषो हविर्यत्.
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णो रथन्तरमा जभारा वसिष्ठः.. (१)
वसिष्ठ के पुत्र पृथु हैं और भरद्वाज के सुप्रथ हैं. इन में से वसिष्ठ धाता, दीप्तिशाली
सविता और विष्णु के समीप से अनुष्टुप् छंद वाला एवं हवि को शुद्ध करने वाला साममंत्र
लाए थे. (१)
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अविन्दन्ते अतिहितं यदासीद्यज्ञस्य धाम परमं गुहा यत्.
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोर्भरद्वाजो बृहदा चक्रे अग्नेः.. (२)
धाता आदि ने छिपा हुआ, हव्य का संस्कार करने वाला व गुफा में सुरक्षित साममंत्र
पाया. भरद्वाज ऋषि धाता, दीप्तिशाली सविता, विष्णु और अग्नि के पास से उस बृहत्
साममंत्र को लाए. (२)
तेऽविन्दन्मनसा दीध्याना यजुः ष्फन्नं प्रथमं देवयानम्.
धातुर्द्युतानात्सवितुश्च विष्णोरा सूर्याद्भरन्घर्ममेते.. (३)
धाता आदि ने ध्यान करते हुए मन में यज्ञसाधक, अभिषेकक्रिया संपन्न करने वाले,
मुख्य एवं देवों को प्राप्त करने के साधन उस धर्ममंत्र को पाया. पुरोहितों ने धाता, तेजस्वी
सविता, विष्णु और सूर्य से इस मंत्र को प्राप्त किया. (३)
सूक्त—१८२ देवता—बृहस्पति
बृहस्पतिर्नयतु दुर्गहा तिरः पुनर्नेषदघशंसाय मन्म.
क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (१)
दुर्दशा को नष्ट करने वाले बृहस्पति हमारे पापों को नष्ट करें व हमारा अनर्थ चाहने वाले
व्यक्ति के ऊपर आयुध उठावें. वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि का नाश करें एवं यजमान को रोग
से बचाकर निर्भय करें. (१)
नराशंसो नोऽवतु प्रयाजे शं नो अस्त्वनुयाजो हवेषु.
क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (२)
पांच प्रयाजों में नराशंस अग्नि हमारी रक्षा करें. आह्वानाें में अनुयाज हमारी रक्षा करें.
वे शत्रु का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोग से बचाकर निर्भय करें. (२)
तपुर्मूर्धा तपतु रक्षसो ये ब्रह्मद्विषः शरवे हन्तवा उ.
क्षिपदशस्तिमप दुर्मतिं हन्नथा करद्यजमानाय शं योः.. (३)
जो स्तोत्रों से द्वेष करने वाले राक्षस हैं, उन्हें हिंसक असुरों के नाश हेतु तप्त शिर वाले
बृहस्पति कष्ट दें. वे अमंगल का नाश करें, दुर्बुद्धि को मिटावें एवं यजमान को रोगमुक्त करके
निर्भय बनावें. (३)
सूक्त—१८३ देवता—यजमान और उसकी
पत्नी
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अपश्यं त्वा मनसा चेकितानं तपसो जातं तपसो विभूतम्.
इह प्रजामिह रयिं रराणः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकाम.. (१)
हे कर्मों के ज्ञानी, तप से उत्पन्न एवं तपस्या से उन्नत यजमान! मैंने अपने मन की आंखों
से तुम्हें देखा है. तुम यहां संतान एवं धन पाकर प्रसन्न बनो एवं पुत्र की कामना से संतान के
रूप में जन्म लो. (१)
अपश्यं त्वा मनसा दीध्यानां स्वायां तनू ऋत्व्ये नाधमानाम्.
उप मामुच्चा युवतिर्बभूयाः प्र जायस्व प्रजया पुत्रकामे.. (२)
हे पत्नी! मैंने मन की आंखों से तुम्हें दीप्तिशालिनी व ऋतु के अनुसार अपने शरीर में
गर्भाधान की कामना करती हुई देखा है. हे पुत्र की कामना करने वाली! मेरे समीप तुम उत्तम
तरुणी बनो एवं पुत्र उत्पन्न करो. (२)
अहं गर्भमदधामोषधीष्वहं विश्वेषु भुवनेष्वन्तः.
अहं प्रजा अजनयं पृथिव्यामहं जनिभ्यो अपरीषु पुत्रान्.. (३)
मैं होता हूं, ओषधियों में गर्भ धारण करता हूं एवं सभी प्राणियों में गर्भ धारण का
कारण बनता हूं. मैंने धरती पर प्रजा को जन्म दिया है. मैं यज्ञ करके सब नारियों में पुत्र
उत्पन्न कर सकता हूं. (३)
सूक्त—१८४ देवता—विष्णु आदि
विष्णुर्योनिं कल्पयतु त्वष्टा रूपाणि पिंशतु.
आ सिञ्चतु प्रजापतिर्धाता गर्भं दधातु ते.. (१)
विष्णु नारी की योनि को गर्भाधान के योग्य बनावें. त्वष्टा उस में स्त्री एवं पुरुष के चिह्नों
का भाग सम्मिलित करें. प्रजापति योनि को वीर्य से सींचें एवं धाता तेरा गर्भ धारण करें. (१)
गर्भं धेहि सिनीवालि गर्भं धेहि सरस्वति.
गर्भं ते अश्विनौ देवावा धत्तां पुष्करस्रजा.. (२)
हे सिनीवाली! तुम गर्भ धारण कराओ. हे सरस्वती! तुम गर्भ की रक्षा करो. हे स्त्री!
सुनहरे कमलों की माला पहनने वाले अश्विनीकुमार देव तुम्हारे शरीर में गर्भ धारण करें. (२)
हिरण्ययी अरणी यं निर्मन्थतो अश्विना.
तं ते गर्भं हवामहे दशमे मासि सूतवे.. (३)
हे पत्नी! अश्विनीकुमार जिस स्वनिर्मित अरणि का मंथन करते हैं, हम दशम मास में
तुम्हारे गर्भ के जन्म के लिए उसी अरणि को बुलाते हैं. (३)

सूक्त—१८५ देवता—आदित्य

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सूक्त—१८५ देवता—आदित्य
महि त्रीणामवोऽस्तु द्युक्षं मित्रस्यार्यम्णः. दुराधर्षं वरुणस्य.. (१)
वरुण, मित्र एवं अर्यमा—इन तीन देवों का दीप्तिशाली, अपराजेय एवं महान् रक्षण हमें
प्राप्त हो. (१)
नहि तेषाममा चन नाध्वसु वारणेषु. ईशे रिपुरघशंसः.. (२)
वरुण, अर्यमा एवं मित्र द्वारा अनुगृहीत स्तोताओं को घर, मार्ग एवं दुर्गम स्थान में बुरा
चाहने वाला शत्रु नहीं दबा सकता. (२)
यस्मै पुत्रासो अदितेः प्र जीवसे मर्त्याय. ज्योतिर्यच्छन्त्यजस्रम्.. (३)
अदिति के ये तीनों पुत्र जिसके जीवन के लिए ज्योति प्रदान करते हैं, उस पर शत्रु का
अधिकार नहीं होता. (३)
सूक्त—१८६ देवता—वायु
वात आ वातु भेषजं शम्भु मयोभु नो हृदे. प्र ण आयूंषि तारिषत्.. (१)
वायु ओषधि बनकर हमारे हृदय में आवें तथा हमारे लिए कल्याण एवं सुख दें. वायु
हमारी आयु बढ़ावें. (१)
उत वात पितासि न उत भ्रातोत नः सखा. स नो जीवातवे कृधि.. (२)
हे वायु! तुम हमारे पिता भाई एवं मित्र हो. तुम हमारे जीवन के लिए यज्ञ करो. (२)
यददो वात ते गृहे३ मृतस्य निधिर्हितः. ततो नो देहि जीवसे.. (३)
हे वायु! तुम्हारे घर में जो अमृत का खजाना छिपा है, उससे हमारे जीवन के लिए
अमृत दो. (३)
सूक्त—१८७ देवता—अग्नि
प्राग्नये वाचमीरय वृषभाय क्षितीनाम्. स नः पर्षदति द्विषः.. (१)
हे स्तोताओ! मानवों की अभिलाषा पूरी करने वाले अग्नि की स्तुति करो. अग्नि हमें
शत्रु से बचावें. (१)
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यः परस्याः परावतस्तिरो धन्वातिरोचते. स नः पर्षदति द्विषः.. (२)
जो अग्नि अत्यंत दूरवर्ती आकाश को पार करके आए हैं, वे हमें शत्रु से बचावें. (२)
यो रक्षांसि निजूर्वति वृषा शुक्रेण शोचिषा. स नः पर्षदति द्विषः.. (३)
जो अग्नि अपनी वर्षाकारक एवं उज्ज्वल ज्वाला से राक्षसों का नाश करते हैं, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (३)
यो विश्वाभि विपश्यति भुवना सं च पश्यति. स नः पर्षदति द्विषः.. (४)
जो अग्नि सारे संसार को एक-एक करके एवं सामूहिक रूप से देखते हैं वे शत्रुओं से हमारी रक्षा करें. (४)
यो अस्य पारे रजसः शुक्नो अग्निरजायत. स नः पर्षदति द्विषः.. (५)
जिन अग्नि ने इस अंतरिक्ष के पार उज्ज्वल रूप में जन्म लिया है, वे हमें शत्रुओं से बचावें. (५)
सूक्त—१८८ देवता—ज्ञानी अग्नि
प्र नूनं जातवेदसमश्वं हिनोत वाजिनम्. इदं नो बर्हिरासदे.. (१)
हे ऋत्विजो एवं यजमानो! ज्ञानी, व्याप्त एवं अन्न वाले अग्नि को कुशों पर बैठने के लिए बुलाओ. (१)
अस्य प्र जातवेदसो विप्रवीरस्य मीळ्हुषः. महीमियर्मि सुष्टुतिम्... (२)
विद्वान्, यजमानों के पिता एवं वर्षाकारक अग्नि के लिए मैं यह विशाल तथा शोभन स्तुति करता हूं. (२)
या रुचो जातवेदसो देवत्रा हव्यवाहनीः ताभिर्नो यज्ञमिन्वतु.. (३)
अग्नि की जो ज्वालाएं देवों के लिए हव्यवहन करने वाली हैं, उनके द्वारा अग्नि हमारे यज्ञ की रक्षा करें. (३)
सूक्त—१८९ देवता—सूर्य एवं सार्पराज्ञी
आयं गौः पृश्निरक्रमीदसद्न् मातरं पुरः. पितरं च प्रयन्त्स्वः.. (१)
गमनशील व तेज प्राप्त करने वाले सूर्य उदयाचल को पाकर अपनी माता पूर्व दिशा को
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प्राप्त करते हैं. वे इसके बाद अपने पिता आकाश के पास जाते हैं. (१)
अन्तश्चरति रोचनास्य प्राणादपानती. व्यख्यन्महिषो दिवम्.. (२)
इस सूर्य के भीतर दीप्ति विचरण करती है एवं इनके प्राण के साथ ऊपर-नीचे जाती है.
सूर्य महान् बनकर आकाश को व्याप्त करते हैं. (२)
त्रिंशद्धाम वि राजति वाक्पतङ्गाय धीयते. प्रति वस्तोरह द्युभि:.. (३)
सूर्य के तीस स्थान शोभा पाते हैं एवं गतिशील सूर्य के लिए स्तुति की जाती है. सूर्य
प्रतिदिन अपनी किरणों से शोभा पाते हैं. (३)
सूक्त—१९० देवता—सृष्टि
ऋतं च सत्यं चाभीद्धात्तपसोऽध्यजायत. ततो रात्र्यजायत ततः समुद्रो अर्णव:.. (१)
प्रज्वलित तप से यज्ञ और सत्य उत्पन्न हुए. इसके बाद रात तथा दिन उत्पन्न हुए. इसके
पश्चात् जलपूर्ण सागर उत्पन्न हुए. (१)
समुद्रादर्णवादधि संवत्सरो अजायत. अहोरात्राणि विदधद्विश्वस्य मिषतो वशी.. (२)
जलपूर्ण सागर से संवत्सर उत्पन्न हुए. पलक झपकाने में संसार के स्वामी ईश्वर ने दिन
एवं रात बनाए. (२)
सूर्याचन्द्रमसौ धाता यथापूर्वमकल्पयत्. दिवं च पृथिवीं चान्तरिक्षमथो स्व:.. (३)
ईश्वर ने पूर्वकाल के अनुसार सूर्य और चंद्रमा को बनाया. उसने इसके बाद द्युलोक,
पृथ्वी एवं अंतरिक्ष को बनाया. (३)
सूक्त—१९१ देवता—अग्नि व ज्ञान
संसमिद्युवसे वृषन्नग्ने विश्वान्यर्य आ. इळस्पदे समिध्यसे स नो वसून्या भर.. (१)
हे अभिलाषापूरक एवं स्वामी अग्नि! तुम सभी प्राणियों को भली प्रकार मिश्रित करते
हो. तुम यज्ञवेदी पर प्रज्वलित होते हो. तुम हमें धन दो. (१)
संगच्छध्वं सं वदध्वं सं वो मनांसि जानताम्.
देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते.. (२)
हे स्तोताओ! तुम लोग आपस में मिलो, एक साथ स्तोत्र बोलो. तुम्हारे मन समान बात
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को जानें. प्राचीन देव जिस प्रकार सम्मिलित होकर यज्ञ का भाग प्राप्त करते थे, उसी प्रकार
तुम भी मिलकर संपत्ति का भोग करो. (२)
समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सह चित्तमेषाम्.
समानं मन्त्रमभि मन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि.. (३)
पुरोहितों की स्तुतियां समान हों. ये लोग यज्ञ में एक साथ आवें. उनके मन और चित्त
भी समान हों. हे पुरोहितो! मैं एक ही मंत्र से तुम सबको अभिमंत्रित करता हूं और एक ही
प्रकार के हवि से तुम्हारा हवन करता हूं. (३)
समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः.
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसहासति.. (४)
हे यजमानो व पुरोहितो! तुम्हारा व्यवसाय समान हो. तुम्हारे हृदय समान हों व तुम्हारा
मन समान हो. तुम लोग एकरूप में संगठित बनो. (४)
(ऋग्वेद संहिता संपूर्ण)

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यजुर्वेद
ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ .. वेद ॥ अथर्ववेद ॥
द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद .. सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद , ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
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वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद
ामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद `
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अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद ॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ -
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सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजुर्वेद । ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ य. '॥ ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद
२ ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद 'वेद ॥ सामवेद ॥ अथर्ववेद ॥
द ॥ सामवेद ॥ अथर्ववे 'ग्वेद ॥ अथर्ववेद ॥ यजु
ऋग्वेद ॥ सामवे- -॥ अथर्ववेद ॥
डा. रेखा व्यास
एम.ए. (संस्कृत), पी-एच.डी.